11 Feb 2018

शिव दर्शन अघोरी मंत्र साधना

हे मेरे प्रिय भोलेनाथ, आपके कृपा से मैं जीवित हु ।
हर सांस भी आपको दे दु तो,वो भी आपकी ही है,अब आपही बताए आपको क्या अर्पित कर सकता हूँ ?

यही बात है जो हर शिव भक्त अपने दिल मे रखता है,करे तो क्या करे अपने प्रिय ईष्ट भगवान शिव जी के लिए,बहोत कुछ करने की चाह होती है और मन मे एक ही स्वप्न होता है के मैं शिव जी का आशिर्वाद प्राप्त करु ।

13 फरवरी को महाशिवरात्रि का दिव्य पावन अवसर है जिसे खोना नही चाहिए अपितु अपने ईष्ट के कृपा को प्राप्त करने के लिए भक्ति, सेवा या मंत्र जाप अवश्य करना चाहिए । कोई एक बुरा आदत छोड़ ही दो इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जैसे शराब पीना,सिगरेट पीना,मास खाना,घुटका खाना या फिर तंबाकू,जो भी इसमें से किसी भी शिव भक्त को बुरा आदत हो वह अब छोड़ ही दो । शिव भक्त को त्याग करना आना चाहिए और बुरे से बुरे आदतों को त्याग कर जो भी शिव भक्त भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ता है उसे शिव कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है ।

अघोरी बड़े नशे में धुत होते है और उनका दिमाग सातवे आसमान पर बैठकर बाते करता है के "मैं ये हु-मैं वो हु,मैं ये कर सकता हु-मैं वो कर सकता हु" । हमेशा याद रखो ऐसे लोग अघोरी नही अपितु चप्पल चोर होते है और इन्हें नशा करने के अलावा कुछ नही आता है । मैंने अपने जीवन मे ऐसे अघोरी देखे है जिनको नशे की आदत नही है और कुछ तो ऐसे भी देखे के वह चाहे कितना भी शराब पिये उनको नशा होता ही नही था । सच्चा अघोरी हो या फिर सच्चा शिव भक्त हो वह सिर्फ एक ही बात समझता हैं, शिवभक्ती से बड़ा नशा इस संसार में है ही नही ।

भक्त ही समझे भक्ति का नशा,
और कौन जाने क्या होता है नशा ।

इसलिए कह रहा हु के इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिवभक्ती के नशे में डूब जाओ परंतु बेकार के चीजो से नशा मत करो और अब तक नशा करते आये हो तो उसको अब त्याग दो,तो ही आप सच्चे शिवभक्त कहलाओगे अन्यथा ढोंगी भक्तों को हर बार भगवान से भिक मांगते रहना पड़ता है और सच्चे भक्तों को भगवान कुछ भी मांगने से पहिले ही आशीर्वाद के रूप में जो चाहे वह दे देते है ।

शिव जी पर तो शिवपुराण के साथ साथ कई ग्रंथ लिखे हुए है परंतु भोले बाबा को कैसे प्रसन्न करे यह तो रावण ने इस दुनिया को सिखाया था । माँ सती  में स्वयं के जीवन को त्याग दिया तब जाकर कहा माँ पार्वती के रूप में आज भी वह भोले बाबा के साथ विराजमान है,यही बात रावण ने समझ ली और दशानन रावण अपने मुण्ड को काट कर चढ़ा रहा था,वह भी अपने जीवन को त्याग रहा था परंतू शिव जी ने उसको रोक लिया और आत्मलिंग प्रदान कर दिया ।

अब रावण तो दूसरा कोई बनना है ही नही परंतु कुछ तो त्याग करके देख ही लो और नशे का त्याग करोगे तो गारंटी के साथ बोल रहा हु मरोगे नही ।

मेरा काम था समझाना,जिसे समझना है वो समझ लेगा और इसी विश्वास के साथ आज का यह अद्वितीय मंत्र साधना दे रहा हु ।

यह मंत्र मुझे एक विचित्र अघोरी बाबा ने दिया था,इस मंत्र से बहोत सारे काम होते है परंतु मैं सिर्फ आपको शिव जी के कृपा को प्राप्त करने हेतु साधना विधान बता रहा हु,बाकी इस मंत्र से काम कैसे करने है वह गोपनीय रखना आवश्यक है ।

महाशिवरात्रि के रात्रि में अन्नग्रहण ना करे,जो भी खाना हो वह सूर्यास्त से पहिले ही खाना है । शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने एक गाय के घी का दीपक जलाएं और उस दीपक के लौ में देखते हुये 3 घंटे तक जाप करे तो अवश्य ही शिव जी का दर्शन संभव है । साधना रात्रि में 9.30 बजे के बाद कभी भी शुरू करे सिर्फ 12 बजे से पहिले शुरू करे । आसन वस्त्र किसी भी रंग का चलेगा और मंत्र जाप के समय उत्तर दिशा में मुख करके बैठना है । जलते हुए दीपक के लौ में भोले बाबा के दर्शन संभव है,ऐसा मत सोचो के सामने आकर प्रत्यक्ष होंगे क्योंके प्रत्यक्ष दर्शन हेतु कठिन तपस्या की आवश्यकता होती है । साधना में धूपबत्ति जला सकते हो परंतु साधना कक्ष में ज्यादा धुवा मत करो नही तो आंखों में जलन होगा । दीपक के लौ में त्राटक करना है इसलिए ज्यादा से ज्यादा आंखों को खुला रखो ।

अघोर मंत्र

।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।

इसमें सिर्फ शब्द है,नाही ॐ है और नाही आदेश है और नाही कोई दूहाई है फिर भी यह एक अद्वितीय अघोर मंत्र है । मंत्र जाप के समय ज्यादा गर्मी महसूस हो तो साधना में से उठ जाना उचित रहेगा क्योंके साधना जबरदस्ती संपन्न मत करो ।

आदेश
।।ॐ नमः शिवाय ।।



Shiv Darshan Aghori Mantra Saadhna

"My Dear Lord, I am alive by your grace. Every breath that I take belongs to you. What can I offer to you when everything that is mine has been given by you "

These are the thoughts of every Shiv bhakt. Every Shiv bhakt wants to do a lot for his Lord and carries the dream that one day He or She will receive the Lord's blessing. 


This year,  Mahashivratri is falling on 13th February, and it is a very auspicious time to get Lord Shiva's blessings through bhakti ( devotion), seva ( servitude)  or Mantra jap. This Mahashivratri, leave some of the bad habits that you've been carrying uptill now, like drinking alcohol, smoking cigarettes, eating meat, or even chewing tobacco. Every Shiv bhakt should learn to sacrifice, and anyone who leaves his bad habits and follows the bhakti path of Shiva always receives His blessings. 

A lot of aghoris stay intoxicated and say things like " I'm this - I'm that- I can do this- I can do that". You should know that these people are not real aghoris, they are fakes and they don't know anything except staying intoxicated. I've seen aghoris that do not take intoxicants and I've also seen aghoris who can drink huge quantities of alcohol and still not get drunk. A real shiv bhakt only knows one thing - 

 Only a devotee can understand the intoxicantation of devotion, 


No one else can understand intoxication. 

That's why I'm saying, this year get intoxicated with the love of lord but leave other intoxicants like alcohol and cigarettes. And if you've been doing so uptill now,  stop. Only then you will be seen as a true shiv bhakt. If you, then you are no different from the fake bhakts of God who have to beg Him for everything while the real ones get everything from Him without asking. 


There have been a lot of Granths written about Lord Shiva, including the Shiv puran, but it was Ravana who taught people how to impress Him. He understood that Maa Sati had to give up her life before she could get a permanent place beside the Lord. So even he was ready to cut off his head and tribute it to Him, but he was stopped by Shiva who rewarded him with the Atma-lingam. 


Learn how to sacrifice from ravana, and leave intoxicants. You won't die, I assure you. 

My work was to advise,  and that is done. Those who have wisdom will follow what has been said. Keeping that in mind, I'm giving a mantra has no double. This was given to be by an aghori baba, it is used for a lot of purposes, but only giving the vidhi to get blessing of the lord, nothing else. 

Don't eat at night on mahashivratri, eat before the sunset. Light a cow ghee lamp/diya in front of a Shivling or a photo of Lord Shiva, and stare into its flame continously while chanting the mantra for 3 hours. If done with diligence, then Darshan of the lord is definitely possible. Begin after 9:30 pm anytime but before 12 am. The asan and  clothes can be of any colour but the direction has to be North. Darshan of lord Shiv is definitely possible inside the flame of the lamp. Don't think there will be a pratyaksh darshan, that is only possible through very difficult austerities. You can light Dhoop batti but take care that the room does not get filled with smoke or your eyes will start to tear. Keep your eyes open as much as you can as you need to do tratak while staring into the flame. 


Mantra 


" ।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।


" Bum Bum Bhole, Aghor Goura Parbati, Shivji Kunwara Sang Rahe" 



There are only words in this mantra,  but it is very powerful. If you feel hot during the chant, it would be better to get up rather than forcefully trying to complete the saadhna. 

Aadhesh... 


4 Feb 2018

सूर्यग्रहण मंत्र साधना





16 फ़रवरी 2018 को साल का पहला सूर्य ग्रहण घटित होगा। भारतीय समयानुसार इस सूर्य ग्रहण ग्रहण की समयावधि रात्रि 00:25:51 से सुबह 04:17:08 बजे तक रहेगी,ग्रहण के समय अनुसार यह ग्रहण 15 फरवरी के रात्रि में घटित होगा। यह आंशिक सूर्य ग्रहण होगा जो भारत में नहीं दिखाई देगा। हालांकि दुनिया के अन्य क्षेत्रों जैसे- साउथ अमेरिका, पेसिफिक, अटलांटिक और अंटार्कटिका में इसकी दृश्यता रहेगी। ग्रहण चाहे दुनिया मे कही पर भी हो परंतु तंत्र साधना हेतु वह एक अच्छा समय होता है जिसमे मंत्र सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ।

यह ग्रहण हमारे देश मे तंत्र साधना हेतु फायदेमंद है क्युके जो मंत्र साधना हमे रात्रि में करना है,ठीक समयानुसार ग्रहण काल भी रात्रि में है । इसलिए हम इस बार "तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना" करेंगे, जो एक महत्वपूर्ण साधना है ।

यदि हम जीवन का गहराई से विश्लेषण करें, तो पायेंगे, कि व्यक्ति हर पल, हर क्षण, भय एवं बाधाओं से आशंकित रहता है। गहराई से विश्लेषण करने पर ऐसा ही प्रतीत होता है कि मनुष्य की शक्तियां कीलित हो गई हैं। शक्तियों का यह कीलन स्वार्थी लोगों द्वारा या उनकी स्वयं की गलतियों से भी हो सकता है। इस कारण जीवन में भय का वातावरण बना रहता है और यह भी सत्य है कि निर्भय हुए बिना जीवन का आनन्द संभव ही नहीं है।

जीवन में निर्भयता एवं बाधाओं के निवारण के लिए व्यक्ति अनेक उपाय करता ही रहता है। जिस प्रकार कांटे से कांटा निकाला जा सकता है उसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं, ऐसी समस्याएं होती हैं जिन्हें उच्च तंत्र साधनाओं द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।

आवश्यकता केवल इस बात कि है कि हम अपने जीवन का विश्लेषण करें तथा इस बात को समझें कि हमारे जीवन में जो घटित हो रहा है वह सामान्य है अथवा असामान्य। सामान्य समस्याओं का हल तो सामान्य प्रयोगों से किया जा सकता है। किन्तु असामान्य समस्याओं का हल तो विशेष तंत्र प्रयोगों से ही संभव है और इस हेतु उच्चस्तरीय तंत्र साधनाएं सम्पन्न करनी होती हैं। इस हेतु श्रेष्ठ उपाय है – ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’।

त्रिपुर भैरवी दस महाविद्याओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तीव्र शक्ति स्वरूपा हैं। इनकी कृपा से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त होेने लगती है और समस्त बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इनकी तंत्र शक्ति के माध्यम से साधक पूर्ण क्षमतावान एवं वेगवान बन सकता है।

भगवती त्रिपुर भैरवी, महाभैरव की ही शक्ति हैं, उनकी मूल शक्ति होने के कारण उनसे भी सहस्र गुणा अधिक तीव्र तथा क्रियाशील हैं। साधक जिन लाभों को भैरव साधना सम्पन्न करने से प्राप्त करता है, जैसे शत्रुबाधा निवारण, वाद-विवाद मुकदमा आदि में विजय, आकस्मिक दुर्घटना टालना, रोग निवारण आदि इस साधना के माध्यम से इन विषम स्थितियों पर भी आसानी से नियंत्रण कर सकता है।

कैसा भी वशीकरण प्रयोग करवा दिया गया हो, कैसा भी भीषण तांत्रिक प्रयोग कर दिया गया हो, दुर्भावना वश वशीकरण प्रयोग कर दिया गया हो, गृहस्थ या व्यापार बन्ध प्रयोग हुआ हो, तो तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना सम्पन्न करने पर वह बेअसर हो जाता है।



उच्च स्तरीय तंत्र प्रयोग

जब किसी व्यक्ति पर या उसके परिवार पर द्वेष वश तांत्रिक प्रयोग होता है, तो वह परिवार अत्यन्त कष्ट भोगने के लिए विवश हो जाता है। तांत्रिक बाधा के कारण उसके समस्त कार्य बाधित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में तंत्र साधना सम्पन्न करने पर व्यक्ति का जीवन निष्कंटक तथा तेजस्वी क्षमताओं से युक्त हो जाता है।



कीलन दोष क्या है?

कीलन का तात्पर्य है, एक बन्धन। जिस प्रकार एक खूंटे से बंधा पशु उस खूंटे के चारों ओर तो चक्कर लगा सकता है लेकिन वह सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता, खूंटे से गले तक की रस्सी किसी के लिए छोटी हो सकती है और किसी के लिए बड़ी, परन्तु बन्धन तो बन्धन ही है, वह एक पक्षी की भांति स्वच्छन्द विचरण तो नहीं कर सकता, इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की शक्तियों का कीलन किया हुआ है, और यह कीलन उसके कर्मों के कारण, उसके दोषों के कारण, उस पर किये गये किसी तांत्रिक प्रयोगों द्वारा आदि शक्ति के प्रभाव से हो जाता है, और जब तक यह दोष दूर नहीं हो जाता तब तक वह कितना ही प्रयास करे, उसके कार्य सफल नहीं हो पाते, उसके देखते-देखते उसके साथ वाले जीवन की दौड़ में आगे निकल जाते हैं और वह एक पशु की भांति अपने ही स्थान पर बंधा छटपटाता रहता है।



उत्कीलन क्या है?

क्या कीलन दोष का कोई उपाय है? क्या कीलन दोष ऐसा कलंक है, जिसे उतारा ही नहीं जा सकता? क्या साधक अपने भीतर अपनी शक्ति का उस स्तर तक विकास नहीं कर सकता, जिससे कीलन दोष दूर हो जाय?

ठीक यही प्रश्न तंत्र के आदि रचियता भगवान शिव से पार्वती ने किया था कि – हे प्रभु! आप तो भक्तों पर परम कृपा करने वाले हैं, आगम-निगम बीज मंत्रों के स्वरूप हैं, भक्ति मुक्ति के प्रदाता हैं फिर आपने मन्त्रों का कीलन क्यों किया? क्यों सांसारिक प्राणियों को मंत्र सिद्धि में पूर्णता प्राप्त नहीं होती?

देवों के देव महादेव ने कहा, कि जैसे-जैसे युग बदलेगा वैसे-वैसे लोगों में भक्ति-प्रीति कम होगी, राग, द्वेष, ईर्ष्या, विरोध, शत्रुता में वृद्धि होगी, एक प्राणी दूसरे प्राणी को देखकर प्रसन्न नहीं होगा, अपितु ईर्ष्या करेगा और इस ईर्ष्या के वशीभूत अपनी शक्तियों का उपयोग बुरे कार्यों में करेगा, यदि ऐसे गलत व्यक्तियों के हाथ में मंत्र सिद्धि, तंत्र सिद्धि लग गई तो वे संसार में विपत्ति की स्थिति उत्पन्न कर देंगे।



उत्कीलन महाविद्या

मनुष्य जीवन में ऐसा ही हो रहा है, कुछ स्वार्थी व्यक्तियों या स्वयं की कुछ गलतियों के कारण भी जीवन कीलित हो जाता है और उसके द्वारा किये गये कार्यों का उसे पूर्ण फल नहीं मिल पा रहा है। जीवन में उसे किसी भी प्रकार के कीलन को समाप्त करने हेतु ही ब्लॉग में विशेष ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’ दिया जा रहा है। जिससे कीलन दोष शांत करने में सफलता प्राप्त होगी, वह अपने ऊपर अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये तंत्र दूर कर सकेगा, अपने तंत्र ज्ञान को अपनी रक्षा के लिए प्रयोग कर सकेगा।



साधना विधान

यह साधना विशेष रूप से सूर्यग्रहण के समय और होली के रात्रि को 10 बजे के पश्चात् सम्पन्न करें। इस साधना हेतु आवश्यक है –एक नारियल, लाल सुपारी और काली हकीक माला आवश्यक है जो आपको पंसारी के दुकान में आसानी से मिल जाएगा । नारियल के सामने जब साधक मंत्र जप करता है तो कैसा ही कीलन प्रयोग हुआ हो वह स्वतः ही समाप्त हो जाता है क्युके नारियल स्वयं त्रिनेत्र से पूर्ण फल है,जिसे श्री फल भी कहा जाता है।

अपने सामने एक बाजोट पर लाल कपड़ा बिछा दें तथा उस लाल कपड़े पर कुंकुम से रंगे चावल और अष्टगन्ध फैला दें, उस पर एक पंक्ति में तिल तथा सरसों बराबर मात्रा में मिलाकर उनकी 11 ढेरियां बनाएं तथा प्रत्येक ढेरी पर एक-एक ‘ लाल सुपारी’ रख दें, अब इनके सामने ही ‘ नारियल ’ एक ताम्र पात्र में स्थापित कर दें। अब सर्वप्रथम विनियोग करें –


विनियोग

ॐ अस्य श्री सर्वयंत्रमंत्राणां उत्कीलनमंत्र स्तोत्रस्य मूल प्रकृतिर्ॠषिर्जगतीच्छन्दः, निरंजनी देवता क्लीं बीजं ह्रीं शक्तिः, ह्रः लौं कीलकं सप्तकोटिमन्त्रयन्त्रतन्त्रकी
लकानां संजीवन सिद्धर्थे जपे विनियोगः।


विनियोग के पश्चात् त्रिपुर भैरवी का ध्यान निम्न मंत्र का जप करते हुए करें –

उद्यद्भानु सहस्र कांति मरुणा क्षौमां शिरोमालिकाम् रक्तालिप्त पयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्र विलसद् वक्त्रार विन्द श्रियम् देवी बद्ध हिमांशु रत्न मुकुटां वन्दे – रमन्दस्तिाम्।

भगवती त्रिपुर भैरवी की देह कान्ति उदीयमान सहस्र सूर्यों की कांति के समान है। वे रक्त वर्ण के रेशमी वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके गले में मुण्ड माला तथा दोनों स्तन रक्त से लिप्त हैं। वे अपने हाथों में जप-माला, पुस्तक, अभय मुद्रा तथा वर मुद्रा धारण किए हुए हैं। उनके ललाट पर चन्द्रमा की कला शोभायमान है। रक्त कमल जैसी शोभा वाले उनके तीन नेत्र हैं। आपके मस्तक पर रत्न जटित मुकुट है तथा मुख पर मन्द मुस्कान है। आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो।



अपने दाहिने हाथ से नारियल को स्पर्श करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्त्यै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ सर्वसागराय नमः। ॐ मणिद्विषाय नमः। ॐ चिन्तामणि गृहाय नमः। ॐ श्मशानाय नमः। ॐ पारिजाताय नमः। ॐ रत्न वेदिकायै नमः। ॐ मणिपीठाय नमः। ॐ नानामुनिभ्यो नमः। ॐ शिवेभ्यो नमः। ॐ शिवमुण्डेभ्यो नमः। ॐ बहुमांसास्थिमोदमान शिवोभ्यो नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराज्ञाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः। ॐ अवराज्ञानाय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ आनन्दकन्दाय नमः। ॐ सर्वतत्वात्मपद्माय नमः। ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः। ॐ विकारमयकेसरेभ्यो नमः। ॐ पंचाशद्वर्णढ़यकर्णिकायै नमः। ॐ अर्कमण्डलाय नमः। ॐ सोममण्डलाय नमः। ॐ महीमण्डलाय नमः। ॐ सत्वाय नमः। ॐ रजसे नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ आत्मने नमः। ॐ अन्तरात्मने नमः। ॐ परमात्मने नमः। ॐ ज्ञानात्मने नमः। ॐ क्रियायै नमः। ॐ आनन्दायै नमः। ॐ ऐं पारयै नमः। ॐ परापरायै नमः। ॐ निस्धानाय नमः। ॐ महारुद्र भैरवाय नमः॥

मंत्र उच्चारण के पश्चात् मानसिक रूप से भगवान सदाशिव का ध्यान करें तथा भगवान सदाशिव से तंत्र बाधाओं से मुक्त कराने का निवेदन करें। भगवान शिव के ध्यान के पश्चात् साधक ‘ काली हकीक माला ’ से निम्न भैरवी उत्कीलन मंत्र की एक माला जप करें।


मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं षट् पंचाक्षराणाम उत्कीलय उत्कीलय स्वाहा। ॐ जूं सर्वमन्त्र यन्त्र तन्त्राणां संजीवनं कुरु कुुरु स्वाहा॥
Om hreem hreem hreem shat panchaaksharaanaam utkilay utkilay swaahaa,om jum sarvmantra yantra tantranaam sanjivanam kuru kuru swaahaa


भैरवी उत्कीलन मंत्र पश्चात् साधक निम्न त्रिपुर भैरवी मंत्र की 31 माला मंत्र जप करें –

मंत्र
॥ह्सैं ह्सकरीं ह्सैं॥
Hasaim hasakareem hasaim


मंत्र जप की पूर्णता पर शक्ति स्वरूपा त्रिपुरा से तंत्र बाधाओं की समाप्ति की प्रार्थना करें तथा समस्त साधना सामग्री को लाल कपड़े में बांधकर होली की अग्नि में विसर्जित कर दें।

अन्य किसी मुहूर्त पर साधना प्रारम्भ करने पर सात दिन तक नित्य साधना सम्पन्न करने के पश्चात् आठवें दिन समस्त साधना सामग्री को किसी निर्जन स्थान पर जमीन में गाड़ दें। यह विशेष तांत्रोक्त प्रयोग सूर्यग्रहण और होली पर करे तो निच्छित ही सफलता मिलते हुए देखा गया है ।

आदेश......

3 Feb 2018

महाशिवरात्रि साधना



ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने का मंत्रतात्मक-तंत्रात्मक मार्ग भगवान शिव का ग्रहाधिपति स्वरूप चन्द्रमौलिश्वर मंत्र  साधना है । यह साधना आनेवाले महाशिवरात्रि के अवसर पर अवश्य ही संपन्न कर प्रत्यक्ष लाभ उठाने का प्रयास करे ।

भगवान् शिव अपने ‘चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप’ द्वारा ग्रहों के दूषित प्रभावों से व्यक्ति को या साधक को छुटकारा दिलाते हैं, क्योंकि भगवान् चन्द्रमौलिश्वर देवाधिपति हैं, तंत्रेश्वर हैं, अतः समस्त मंत्र-तंत्र भी उनके अधीन हैं, ऐसे भगवान चन्द्रमौलिश्वर की साधना तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।

ग्रह का शाब्दिक अर्थ पकड़ लेना, कब्जे में कर लेना होता है। नवग्रह पृथ्वी-वासियों के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है और प्रत्येक मनुष्य नवग्रहों के प्रभाव से सन्तप्त या प्रसन्न होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य नवग्रहों के अधीन हैं। दुष्कर्म-सत्कर्म, पाप और पुण्य ग्रहों से ही संचालित होते हैं। ग्रहों के द्वारा त्रस्त होकर मनुष्य भांति-भांति के उपाय करता है, पर परिणाम आधा-अधूरा ही मिलता है। फिर मार्ग क्या है जिसके द्वारा रूष्ट ग्रह मनाए जा सकें और उनके प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त किया जा सके।

यों तो ग्रह किसी को नहीं छोड़ते चाहे वह गरीब हो या अमीर, या फिर देवता ही क्यों न हों। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं हमारे सामने, जिनसे यह ज्ञात होता है, कि ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर कितना अधिक प्रभाव पड़ता है ।भ गवान श्रीराम जी को भी शनि की दशा से ग्रस्त होकर महल को छोड़कर वन में चौदह साल तक दर-दर भटकना पड़ा, यह बात ओर है कि वाल्मीकि ने भक्ति भाव पूर्वक उस वनवास को कुछ और नाम दे दिया, किन्तु सत्य यही है कि राम को भी जीवन में ग्रहों के दूषित प्रभाव के कारण चौदह साल तक जंगलों में रहकर जीवनयापन करना पड़ा।

महात्मा बुद्ध को भी मंगल एवं राहु के दूषित प्रभाव से ग्रसित होकर, अपना राजपाट छोड़कर उन सबसे संन्यास लेना पड़ा और राजा हरिश्चन्द्र को भी शनि की साढ़े साती के प्रभाव के कारण अपना राज्य त्याग कर श्मशान में रहना पड़ा और यही नहीं, अपितु उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जब वह अपने पुत्र की लाश पर कफन भी न डाल सके, इस प्रकार की अनेकों ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इतने बड़े-बड़े महापुरुष भी ग्रहों के दूषित प्रभावों से बच नहीं पाये, भले ही इन घटनाओं को समाज ने कोई और (नाम) रूप दे दिया हो, किन्तु सत्य यही है, कि ग्रहों के प्रभाव से ही उनकी यह गति हुई।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए अवश्य ही ऐसी सत्ता के पास जाना पड़ेगा जिनके अधीन सभी ग्रह और नक्षत्र हैं, पर इससे पहले यह समझते हैं कि शास्त्र इसके विषय में क्या कहते हैं?

देवाधीनम् जगत
सर्वम् मंत्राधीनाश्च देवता –

देवताओं के अधीन समस्त जगत है, पर मंत्र के अधीन देवता हैं अर्थात् मंत्र जप द्वारा देवताओं को तुष्ट किया जा सकता है।
नवग्रहों को भी देवताओं का दर्जा दिया गया है। सूर्य जगत की आत्मा हैं, वे सौर मंडल के मुखिया हैं। चंद्रमा मन को शीतलता प्रदान करने वाले देव हैं। मंगल युद्ध (पराक्रम) के देवता हैं। बुध को व्यापार का देवता माना गया है। बृहस्पति देवताओं और शुक्र दानवों के गुरु हैं। गुरु का स्थान तो सर्वोपरि है। शनि एक अर्ध देवता हैं। राहु उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं और केतु दक्षिण चन्द्र आसंधि के देवता हैं।

ग्रह देवता स्वरूप हैं और सैद्धान्तिक रूप से मंत्रों के अधीन हैं। इसलिए ज्योतिषी आपकी जन्मपत्री का अध्ययन करके आपको ग्रहों की विपरीत दशा होने पर मंत्र जप की सलाह देते हैं और पंडित को यह कार्य देकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। पर ग्रह दशा तो दूर नहीं होती है।

ज्योतिष के अनुसार प्रमुख नौ ग्रह होते हैं – सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यों तो आकाश में सैकड़ों ग्रह हैं, किन्तु ज्योतिष विज्ञान में मुख्य ग्रह नौ ही माने जाते हैं, जिनका प्रभाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हमारे ऊपर पड़ता ही रहता है और इन्हीं के प्रभाव से हमें जीवन में सफलता-असफलता मिलती रहती है। हर ग्रह का मानव जीवन पर अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। इन नौ ग्रहों में भी पांच ग्रह ऐसे हैं, जिनका प्रभाव प्रायः व्यक्ति पर मुख्य रूप से देखने को मिलता ही है।

1. सूर्य – जन्मपत्रिका में यदि सूर्य की स्थिति व्यक्ति को विपरीत फल देने वाली हो, तो उसे समाज में बदनामी, विश्वासघात एवं कष्टप्रदायक जीवन बिताते हुए असफलताओं का शिकार होना पड़ता है।

2. मंगल – यदि मंगल की स्थिति जन्मपत्री में अच्छी न हो, तो व्यक्ति का जीवन कई प्रकार की उलझनों से ग्रस्त रहता है, जिनसे उसे जीवन भर तनाव बना रहता है, यह ग्रह व्यक्ति को जेल की यात्रा, चोर या हत्यारा आदि भी बना देता है।

3. शुक्र – स्वप्न दोष, विवाह-बाधा आदि इस ग्रह बाधा के कारण ही होते हैं।

4. शनि – जन्मपत्रिका में शनि की अच्छी स्थिति में ना होती व्यक्ति को एक-एक पैसे का मोहताज बना देती है, जिसके कारण व्यक्ति का जीवन दरिद्रता और गरीबी में बीतने पर वह शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तनावों से ग्रस्त होकर, मृत्यु तक को प्राप्त हो जाता है। इसके अलावा ऐक्सिडेन्ट, नौकरी छिन जाना, कोर्ट-कचहरी, डॉक्टरों आदि के चक्कर लगना आदि ये सब परेशानियां इस ग्रह बाधा के कारण ही मानव-मात्र को झेलनी पड़ती हैं।

5. राहु – इस ग्रह-दोष के कारण गृह कलह, आपसी मन मुटाव आदि अनेक प्रकार की समस्याओं से मनुष्य हर पल घिरा रहता है।


इस प्रकार अन्य ग्रह भी अपना दूषित प्रभाव मानव-जीवन पर डालते रहते हैं। जिनके चंगुल से बच निकलना मानव के लिए एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। कई व्यक्ति ढोंगी पण्डित-पुरोहितों के चंगुल में फंसकर उपरोक्त समस्याओं के निवारण हेतु उनके द्वारा बताए गये उपायों को आजमाते हैं, परन्तु उनसे उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता, अपने कार्यों की सिद्धि एवं सफलता के लिए वे उनसे कई प्रकार के छोटे-मोटे अनुष्ठान प्रयोग भी करवाते हैं, किन्तु फिर भी उनका अनुकूल फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, तब उनका देवताओं आदि पर से विश्वास उठने लगता है, क्योंकि वे उन समस्याओं एवं परेशानियों का कारण नहीं जान पाते, जबकि इन आपदाओं-विपदाओं का मूल कारण ‘ ग्रह-बाधा ’ ही है।



कैसे करें ग्रहों के दुष्प्रभाव का पूर्ण शमन?

देवता मंत्रों के अधीन हैं और नवग्रह देवता स्वरूप हैं फिर भी ग्रह शांति मंत्र के लिए किया गया जप सफल क्यों नहीं होता। यही सोच रहे हैं ना आप? चलिए समझते हैं इसे-

इत्थं रूपेण कीलेन
महादेवेन कीलितम्

दुर्गा सप्तशती के कीलक अध्याय में स्पष्टतः वर्णित है कि महादेव ने मंत्रों को कीलित कर दिया। महादेव ने मंत्रों पर ताला लगा दिया है जिससे ईर्ष्या और लोभवश इन मंत्रों का दुरुपयोग नहीं किया जा सके, इस कारण मंत्र कीलित हैं।

जैसे हलवाई की दुकान पर आप विभिन्न प्रकार की मिठाईयां देखते हैं, उनकी खुशबू सूंघते हैं और क्षणिक तृप्ति का अहसास भी होता है, पर उससे आपकी भूख तो नहीं मिटेगी, क्षुधा तो तृप्त नहीं होगी क्योंकि मोल देकर आपने वह मिष्ठान खाया नहीं।

इसी तरह नवग्रह शांति हेतु पंडितों द्वारा किया मंत्र जाप क्षणिक संतोष दे सकता है, एक दिवास्वप्न की तरह, उनसे ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि मंत्र कीलित हैं और उनका जप कोई और आपके लिए कर रहा है। जब आपको भोजन खाना है तो उसे पकाना भी पड़ेगा और खाना भी आपको ही पड़ेगा।



मंत्रों का निष्कीलन कैसे होगा?

ये विद्या किसे आती है? शास्त्रानुसार यह विद्या सिर्फ गुरु को आती है। गुरु आपकी योग्यता को भांप कर आपको उसके अनुरूप मंत्र देते हैं और साथ ही शक्तिपात द्वारा आपको सार्मथ्यवान बनाते हैं कि आप सफलता पूर्वक मंत्र जप करें और आपके मनोरथ दुष्ट ग्रहों के दुष्प्रभाव से अछुते रहें। यही कारण है कि, गुरु आशीर्वाद देते हुए कहते हैं –

मंत्रार्था सफला सन्तुः
सफला सन्तुः मनोरथाः

जिस कार्य हेतु आप मंत्र जप कर रहे हैं, वह सफल हो आपके मनोरथ पूर्ण हों और जब गुरु आशीर्वाद देते हैं, तो उसके उपरांत कार्य सिद्धि अवश्यम्भावी है।

तात्त्पर्य है कि नवग्रह शान्ति हेतु निष्कीलित मंत्र गुरु आज्ञा के पश्चात् जप करें। पर ग्रह तो नव (नौ) हैं तो मंत्र भी निश्चित रूप से नौ तो होंगे ही फिर ग्रहों की दशा भी तो परिवर्तित होती रहती है, तो समयानुरूप मंत्र जप भी भिन्न -भिन्न होंगे।

एक साधे सब सधे

पर, अगर आप उस एक साधना की तलाश में हैं जो नवग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों का आमूल नाश कर सके तब आपके लिए चंद्रमौलिश्वर साधना है।

मंत्रों को कीलित किया है शिव ने, सृष्टि के केन्द्र में शिव स्थित हैं, सभी देवों से श्रेष्ठ शिव हैं, महादेव रूप में। चन्द्रमा को जब दक्ष ने क्षय का श्राप दिया तो उसे अपनी जटाओं में स्थापित कर शिव ने पुनः जीवन दिया। इसी कारण से अमावस्या के बाद प्रतिपदा से हर दिन चन्द्रमा बढ़ता है और पूर्णिमा को अपने पूर्ण यौवन को प्राप्त होता है।

शिव आदि गुरु हैं। पार ब्रह्म परमेश्वर हैं और अगर बाधाएं ग्रह-दोष के कारण जीवन में आ रही हैं, तो उनका पूर्ण निवारण सिवाय शिव के किसी के पास नहीं है। शिव का चंद्रमौलिश्वर स्वरूप बाधाओं का पूर्ण संहार कर देगा।

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शंकरे,
सर्पैभूषित कण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थ वैश्वानरे।
दन्तित्वक् कृत सुन्दराम्बर धरे त्रैलोक्य सारे हरे,
मोक्षार्थ कुरुचित्तवृत्तिमचलाम् अन्यैस्तु किं कर्मभिः॥

अर्थात् – ‘सिर पर अर्धचन्द्र को धारण किए हुए भगवान् चन्द्रमौलिश्वर, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, जिनके मस्तक से गंगा प्रवाहित हो रही है, कण्ठहार के रूप में सर्प को धारण किए हुए हैं, जिनके तृतीय नेत्र से वैश्वानर अग्नि निकल रही है, हस्ति चर्म को सुन्दर वस्त्र के रूप में धारण किए हुए तीनों लोकों में अद्वितीय भगवान् शंकर, जो अपने इस रूप-गुण के कारण ‘ चन्द्रमौलिश्वर ’ कहे जाते हैं, वे मेरे मन और बुद्धि को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए मेरे समस्त ग्रह जन्य दोषों को दूर करें।’
आप स्वयं सोचिए जब आपके बच्चे को नजर लग जाती है तब आप लाल मिर्च अग्नि में जलाकर, उसकी नजर उतारते हैं, पर जब बाधा ग्रहों के दूषित प्रभाव की हो, तब अग्नि भी तो प्रचण्ड होनी चाहिए और शिव के त्रिनेत्र की ज्वाला से विकराल कोई अग्नि नहीं है। उनके एक दृष्टिपात से विपरीत ग्रहों के दुष्प्रभाव भस्म हो जाएंगे।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को समाप्त करने की ही साधना है – 

चन्द्रमौलिश्वर साधना। इस साधना के बल पर वह व्यक्ति अपने जीवन में समस्त नौ ग्रहों के दूषित प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर उन ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने में सफल हो पाता है, और तब उसे जीवन में कभी भी किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

ग्रहों की दशा यदि सही रहे, तो व्यक्ति के जीवन में उन्नति के स्रोत हमेशा के लिए खुले रहते हैं, और वह कामयाबी की मंजिल की ओर बढ़ते हुए अपने जीवन में पूर्ण सुखी एवं सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इस साधना-शक्ति के द्वारा व्यक्ति/साधक एक बार में ही अपनी समस्त परेशानियों एवं बाधाओं से मुक्ति पा लेता है।

सामग्री – पाँच मुखी रुद्राक्ष, रुद्राक्ष माला।
दिवस – महाशिवरात्रि या किसी सोमवार के दिन।
समय – रात्रि 8 बजे के बाद से 11.30 तक।


साधना-विधान

रात्रिकालीन इस साधना में बैठने से पहले साधक स्नानादि करके पूर्णतया शुद्ध होकर, पीली धोती धारण कर अपने सामने किसी लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें और फिर आसन पर शांतचित्त होकर बैठ जाएं, इसके पश्चात् तीन बार ‘ ॐ ’ की ध्वनि का उच्चारण करने के बाद 5 मिनट तक गुरु का ध्यान करें और प्रार्थना करें कि मुझे समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त हो, ऐसा कहकर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें, जिन्हें गुरु ना हो वह साधक शिव जी का ही ध्यान करे तत्पश्चात् किसी प्लेट में कुंकुम से ‘ॐ’ लिखकर, उसमें ‘पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ को स्थापित कर दें, फिर कुंकुम का तिलक करके उस पर ‘ ॐ चन्द्रमौलिश्वराय नमः ’ मंत्र बोलते हुए 11 बार थोड़े-थोड़े चावल चढ़ाएं, तथा 11 बार इसी मंत्र से काले तिल, काली सरसों, काली मिर्च अलग-अलग चढ़ाएं, और धूप या अगरबत्ती जलाकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, ध्यान रहे कि पूरे साधना काल में दीपक प्रज्वलित रहे।
फिर साधक मन ही मन शिव के ‘ चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप ’ को नमस्कार कर ‘ रुद्राक्ष माला ’ से निम्न मंत्र का 9 माला मंत्र जप करें।


मंत्र

॥ॐ शं चं चन्द्रमौलिश्वराय नमः॥
Om sham cham chandramoulishwaraay namah


जप-समाप्ति के बाद शिव-आरती करें, फिर ‘ पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ पर अर्पित सामग्रियों को रात्रि के समय पूरे घर व दुकान तथा जो भी अपके आवासीय या व्यापारिक संस्थान हैं, सब जगह छिड़क दें, जिससे दुष्ट ग्रहों का प्रभाव दूर हो सके तथा भविष्य में भी उन ग्रह-दोषों का प्रभाव न हो, इसके पश्चात् रुद्राक्ष तथा माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।

यह साधना पूर्ण सफलतादायक है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और लगन से करने की आवश्यकता है, तभी साधक को इससे निश्चित लाभ की प्राप्ति संभव है।



आदेश......
।।ॐ नमः शिवाय ।।

30 Jan 2018

खग्रास चन्द्रग्रहण–31 जनवरी 2018




इस वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण 31 जनवरी 2018 को है. बता दें कि 2018 में दो चंद्र ग्रहण आएंगे, पहला 31 जनवरी को और दूसरा चंद्र ग्रहण 27-28 जुलाई 2018 को है. दोनों ही चंद्र ग्रहण भारत सहित अन्य देशों में भी दिखाई देंगे 31 जनवरी 2018 को आ रहे चंद्र ग्रहण पर 176 साल बाद पुष्य नक्षत्र का विशेष योग भी बन रहा है. अब आपको बताते हैं कि इस बार के चंद्र ग्रहण का आपके जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है. यह ग्रहण माघ की पूर्णिमा को है जो कि कुछ लोगों के लिए बेहद शुभ है लेकिन वहीं दूसरी और कुछ लोगों के लिए अशुभ हो सकता है. भारत में चंद्र ग्रहण का समय क्या होगा? अगर आपके भी जहन में भी ये सवाल घूम रहा है तो आइए आपको इस सवाल का जवाब भी दे दें. भारत में चंद्र ग्रहण सायं 06.21 से 09.38 तक देखा जा सकेगा.


खग्रास चन्द्रग्रहण – 31 जनवरी 2018 (भूभाग में ग्रहण समय – शाम 5.17 से रात्रि 8.42 तक) (पूरे भारत में दिखेगा, नियम पालनीय ।) चन्द्रग्रहण बेध (सूतक) का समय सुबह 8.17 तक भोजन कर लें । बूढ़े, बच्चे, रोगी और गर्भवती महिला आवश्यकतानुसार दोपहर 11.30 बजे तक भोजन कर सकते हैं । रात्रि 8.42 पर ग्रहण समाप्त होने के बाद पहने हुए वस्त्रोंसहित स्नान और चन्द्रदर्शन करके भोजन आदि कर सकते हैं । ग्रहण पुण्यकाल जिन शहरों में शाम 5.17 के बाद चन्द्रोदय है वहाँ चन्द्रोदय से ग्रहण समाप्ति (रात्रि 8.42) तक पुण्यकाल है । जैसे अमदावाद का चन्द्रोदय शाम 6.21 से ग्रहण समाप्त रात्रि 8.42 तक पुण्यकाल है । शहरों का स्थान और चन्द्रोदय नीचे कुछ मुख्य शहरों का चन्द्रोदय दिया जा रहा है उसके अनुसार अपने-अपने शहरों का ग्रहण के पुण्यकाल का जानकर अवश्य लाभ लें । इलाहाबाद (शाम 5.40), अमृतसर (शाम 5.58), बैंगलुरू (शाम 6.16), भोपाल (शाम 6.02), चंडीगढ़ (शाम 5.52), चेन्नई (शाम 6.04), कटक (शाम 5.32), देहरादून (शाम 5.47), दिल्ली (शाम 5.54), गया (शाम 5.27), हरिद्वार (शाम 5.48), मुज़फ़्फ़नगर ( शाम5.56 ) जालंधर (शाम 5.56), कोलकत्ता (शाम 5.17), लखनऊ (शाम 5.41), मुजफ्फरपुर (शाम 5.23), नागपुर (शाम 5.58), नासिक (शाम 6.22), पटना (शाम 5.26), पुणे (शाम 6.23), राँची (शाम 5.28), उदयपुर (शाम 6.15), उज्जैन (शाम 6.09), वड़ोदरा (शाम 6.21), कानपुर (शाम 5.44) (इन दिये गये स्थानों के अतिरिक्तवाले अधिकांश स्थानों में पुण्यकाल का समय लगभग शाम 5.17 से रात्रि 8.42 के बीच समझें ।) ग्रहण के समय पालनीय (1) ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए । (2) सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना । यदि गंगा-जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना फलदायी होता है । (3) ग्रहण-काल जप, दीक्षा, मंत्र-साधना (विभिन्न देवों के निमित्त) के लिए उत्तम काल है । (4) ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।



यहां ग्रहण काल में जाप करने हेतु कुछ मंत्र दे रहा हु और इनमें से कोई भी एक ही मंत्र का जाप पूर्ण ग्रहण काल के अवधि में करो तो निच्छित ही आपको 12 वर्षों के लिए सिद्धि प्राप्त हो सकती है ।

मनोकामना सिद्धि-
।। ॐ ह्रीं घृणिं मनोवांछितं सिद्धये फट ।।
Om hreem ghruneem manovaancchitam siddhaye phat


सम्मोहन सिद्धि-
॥ ॐ ह्रीं सूर्य सम्मोहय ह्रीं ॐ ॥
Om hreem sury sammohay hreem om


अप्सरा सिद्धि-
।। ॐ क्लीं क्रीं अप्सरा सिद्धिं क्रीं क्लीं ॐ फट ।।
Om kleem kreem apsara siddhim kreem kleem om phat


वशीकरण सिद्धि-
।।ॐ ह्रीं क्लीं अमुकं वश्यय वश्यय मोहय मोहय क्लीं ह्रीं ॐ फट ।।
Om hreem kleem amukam vashyay vashyay mohay mohay kleem hreem om phat


रोगमुक्ति सिद्धि-
।। ॐ ह्लीं सर्व रोग नाशय नाशय ह्लीं फट स्वाहा ।।
Om hleem sarv rog naashay naashay hleem phat swaahaa


यहां पर जो 5 मंत्र है वह आपके उपयोग में आएंगे और आपका जीवन कई सारे कठिनाई से मुक्त होगा यही आशा करता हूँ ।


आदेश.....

28 Dec 2017

गुप्तकाली साधना




महाकाली को ही महाकाल पुरुष की शक्ति के रूप में माना जाता है । महाकाल का कोई लक्षण नहीं, वह अज्ञात है, तर्क से परे है । उसी की शक्ति का नाम है महाकाली । सृष्टि के आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभ में यही महाविद्या चतुर्दिक विकीर्ण थी । महाकाली शक्ति का आरंभिक अवतरण था । यही कारण है कि आगमशास्त्र में इसे प्रथमा व आद्या आदि नामों से भी संबोधित किया गया है ।

आगमशास्त्र में रात्रि को महाप्रल्य का प्रतीक माना गया है । रात के १२ बजे का समय अत्यंत अंधकारमय होता है । यही कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । रात के १२ बजे से लेकर सूर्योदय होने से पहले तक संपूर्ण कालखंड महाकाली है । सूर्योदय होते ही अंधकार क्रमश: घटता जाता है । अंधकार के उतार-चढाव को देखते हुए इस कालखंड को ऋषि-मुनियों ने कुल ६२ विभागों में विभाजित किया है । इसी प्रकार महाकाली के भी अलग-अलग रूपों के ६२ विभाग हैं । शक्ति के अलग-अलग रूपों की व्याख्या करने के उद्देश्य से ऋषि-मुनियों ने निदान विद्या के आधार पर उनकी मूर्तियां बनाईं ।


समस्त शक्तियों को अचिंत्या कहा गया है । वे अदृश्य और निर्गुण हैं । शक्तियों की मूर्तियों को उनकी काया का स्वरूप मानना चाहिए ।

अचिंत्यस्थाप्रामैयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ।
उपासकानां सिद्धयर्थ ब्रह्मणों रूपकल्पना ॥

अर्थात:शक्तियों के रूप की कल्पना करते हुए काल्पनिक मूर्तियों का इसलिए निर्माण किया गया, ताकि उनकी उपासना की जा सके तथा उनके रूप के दर्शन किए जा सकें ।


यह साधना महाकाली जी के गोपनीय रूप का साधना है जिसे गुप्तकाली कहा जाता है,गुप्तकाली मंत्र साधना से गोपनीय ज्ञान के साथ साथ गुप्त शक्तियाँ और सिद्धिया साधक प्राप्त कर सकता है । जिसने यह साधना किसी भी ग्रहण काल (101 माला जाप ) में कर ली तो समझ जाएंगे कि इसी साधना के माध्यम से उसने कई सिद्धियों को प्राप्त करने हेतु अपना जीवन तंत्र शास्त्र हेतु समर्पित कर दिया है । इस साधना में मंत्र जाप हेतु मुख दक्षिण दिशा में और काले रंग के वस्त्रों का उपयोग होगा । साधना रात को करना है,किसी भी समय 9 बजे के बाद और साधना किसी भी अमावस्या से प्रारंभ करे । काली हकीक माला और काली विग्रह आप मार्केट से खरीद ले और दोनों का प्राण-प्रतिष्ठा विधि इस ब्लॉग पर 2013 के आर्टिकल्स में मिल जाएगा ।



दाहिने हाथ मे जल लेकर विनियोग मंत्र बोलकर जल को जमीन पर छोड़ दे ।

विनियोग-
।। अस्य श्री गुप्तकाली मंत्रस्य भैरव ऋषिः उष्णिक् छन्दः, गुप्त कालिके देवता, क्रीं बीजम्, हूं शक्तिः, क्रीं कीलकम्, ममाभीष्ट सिध्यर्थे जपे विनियोगः ।।


ऋष्यादिन्यास:-
ॐ भैरव ऋषये नमः (शिरसि) ।
उष्णिक्छन्दसे नमः (मुखे) ।
गुप्तकालिका देवतायै नमः (ह्रदि) ।
क्रीं बीजाय नमः (गुहये) ।
हूं शक्तये नमः (पादयो:) ।
क्रीं कीलकाय नमः (नाभौ) ।
विनियोगाय नमः (सर्वाङ्गे) ।


करन्यास:-
ॐ क्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।


हृदयादि न्यास:-
ॐ क्रां ह्रदयास नमः ।
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ क्रूं शिखायै वषट् ।
ॐ क्रैं कवचाय हुम् ।
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ क्रः अस्त्राय फट् ।


अक्षर न्यासः-
ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋं लृं लृं नमो (हृदि)
ॐ एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं नमो (दक्ष भुजे)
ॐ ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं नमो वाम (भुजे)
ॐ णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं नमो दक्ष (पादे)
ॐ मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं नमो वाम (पादे) (इत विन्यासः)


सर्वांग न्यास :-
ॐ क्रीं नमः (ब्रह्मरन्ध्रे) ।
ॐ क्रीं नमः (भ्रू मध्ये) ।
ॐ क्रीं नमः (ललाटे) ।
ॐ ह्नीं नमः (नाभौ) ।
ॐ ह्नीं नमः (गुह्ये) ।
ॐ ह्नूं नमः (वक्त्रे) ।
ॐ ह्नूं नमः (गुर्वङ्गे) ।


ध्यान:-
ॐ शवारूढां महाभीमां घोरदंष्ट्रां हसन्मुखीम् ।
चतुर्भुजां खङ्गमुण्डवराभय करां शिवाम् ॥
मुण्डमालाधरां देवीं ललज्जिह्वां दिगम्बराम् ।
एवं सञ्चिन्तयेत्कालीं श्मशानालय वासिनीम् ॥
(कालीतंत्रानुसार)


पुष्पों का आसन बनाए और मंत्र बोलकर काली विग्रह को आसन पर स्थापित करे-
ॐ सदाशिव महाप्रेताय गुप्तकाल्यासनाय नमः ।


पीठशक्ति पूजा (काली जी के विग्रह पर कुंकुम से रंगे हुए चावल एक-एक मंत्र बोलकर चढ़ाये )-
ॐ जयायै नमः । ॐ विजयायै नमः । ॐ अजितायै नमः । ॐ अपराजितायै नमः । ॐ नित्यायै नमः । ॐ विलासिन्यै नमः । ॐ दोग्ध्रूयै नमः । ॐ अघोरायै नमः । ॐ मङ्गलायै नमः ।


इसके पश्चात गुप्त काली के यंत्र अथवा काली जी के मूर्ति को तांबे के पात्र में रखकर, उसे घृत द्वारा अभ्यंग-स्नान कराएं । फिर उसके ऊपर दुग्ध-धारा तथा जल-धारा छोडकर स्वच्छ वस्त्र में लपेटे और "ॐ ह्नीं कालिका योग पीठात्मने नमः" मंत्र द्वारा पुनः पुष्पादि असान देकर, पीठ के मध्यभाग में स्थापित करे ।


गुप्त काली अठारह वर्णीय मंत्र-

।। क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं गुप्तकालीके क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।।

Kreem kreem hoom hoom hreem hreem guptakalike kreem kreem hoom hoom hreem hreem swaahaa



उक्त मंत्र मनोकामनापूरक है साधक के सभी कष्टो का हरण करने में सहाय्यक है,निर्भयता पूर्वक मंत्र का जाप नित्य 11 माला 21 दिनों तक करे तो संभव है के माँ भगवती गुप्तकाली जी के दर्शन हो सकते है । यह साधना प्रत्येक साधक को करना चाहिए ताकी उसे सभी प्रकार के साधना में सिद्धि प्राप्त हो । इस साधना के उपरांत साधक अन्य साधनाओ में सिद्धी प्राप्त करने में एक सफल साधक बन जाता है ।


बलिदान मंत्र :-
(बलिदान मंत्र साधना समाप्ति के आखरी दिन बोलकर एक अनार का बलि दे)
ऐह्येहि गुप्तकालिके मम बलि गृहण गृहण मम शत्रून् नाशय नाशय खादय खादय स्फुट स्फुट स्फुट छिन्धि सिद्धि देहि हूं फट् स्वाहा ।

कई स्थानों पर बलि के नाम पर पशुओं का बलि दिया जाता है जो बहोत दुखद है,हमेशा तंत्र शास्त्र में अनार का बलि देना सिद्धप्रद माना जाता है ।


जप समर्पण - मन्त्र जप पूरा करके उसे भगवती को समर्पण करते हुए कहें -
गुह्यति गुह्य गोप्त्री त्वं, गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि, त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥

इस प्रकार देवी के बाएँ हाथ में पुष्प के रूप में मतलब एक पुष्प चढ़ाकर जप समर्पण करे ।

नोट-जिन्हें न्यास करने में कठिनाई आती हो वह साधक विनियोग-ध्यान मंत्र बोलकर मुख्य मंत्र जाप कर सकते है ।

इस प्रकार से यह गोपनीय गुप्त काली साधना सम्पन्न किया जाता है और इस साधना से समस्त प्रकार की इच्छाओं को भी पूर्ण किया जा सकता है । साधना की सफलता साधक के विश्वास, श्रद्धा और मेहनत पर आधारित होती है,इसलिए मन के मैल को हटाकर बिना किसी किन्तु परंतु के साधना संपन्न करे ।




अपनो से अपनी बात-
हमारे देश में किसानों की आत्महत्या को एक लो-प्रोफाइल केस माना जाता है। ना तो कोई मदद करने वाला आता है ना ही मीडिया किसी कवरेज को प्राथमिकता देता है। बाकि सरकारों के पास अपना दुखड़ा रोने के लाखों बहाने होते है। सहायता के नाम पर घोषणाएं तो बहुत होती है पर इनमें से कितनी पूरी होती है ये तो हम सबको पता है। ऐसे में अग घोषणाओं के इस दौर में कोई वाकई मदद को आगे आता है वो वाकई किसी दूत से कम नहीं होता।
नाना पाटेकर साहब किसानों की आत्महत्या रोकने तथा उनकी समस्याएं दूर करने के लिए कई प्रकार की पहलें कर रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के किसानों को आर्थिक सहायता भी दी है। ऐसे महान व्यक्तित्व को मैं प्रणाम करता हूँ और आज उनका जन्मदिन भी है तो इस अवसर पर उनको जन्मदिन की बहोत बहोत शुभकामनाएं......


बड़े पर्दे पर अपनी ऐक्टिंग से लोगों का दिल जीतने वाले मशहूर थिअटर और फिल्म ऐक्टर नाना पाटेकर अब रियल लाइफ हीरो भी साबित हो गए हैं। अपने साथी और मराठी ऐक्टर मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाना ने 'नाम फाउंडेशन' की स्थापना की है।
'नाम फाउंडेशन' की स्थापना का उद्देश्य उस किसान समुदाय की मदद करना है,जिनकी परिस्थितियां काफी दुखद हैं। इसके तहत जो भी चीजें संभव हो सकेंगी, वह किसानों को मुहैया कराई जाएंगी। इसके जरिए कोशिश की जाएगी कि देश में किसानों की आत्महत्या में कमी हो।


हमने कई बार फिल्म स्टार्स की ऐसी कहानियां सुनी होंगी जो जरूरतमंद लोगों की मदद करते हैं लेकिन नाना ने अपनी कमाई का 90 फीसदी पैसा इस फाउंडेशन को डोनेट किया है और इस तरह नाना ऐसे पहले ऐक्टर हैं।
नाना को हमेशा लगता है कि राज्य में किसानों की स्थिति बेहतर होनी चाहिए और इसीलिए उन्होंने इस फाउंडेशन की शुरुआत की है। बता दें, 'नाम फाउंडेशन' एक गैर सरकारी फाउंडेशन है जो महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे सूखा प्रभावित इलाकों में किसानों की बेहतरी के लिए काम करता है ।


महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ के किसानों को खुदकुशी करता देख नाना ने उन्होंने अलग अलग इलाकों में जाकर किसानों की करीब 300 विधवाओं को 15,000-15000 रुपये की आर्थिक मदद दी। नाना पाटेकर से प्रभावित होकर बॉलीवुड के सुपरस्टार अक्षय कुमार भी आत्महत्या कर चुके किसानों के परिवारों की मदद के लिए आगे आए। अक्षय ने 180 परिवारों को 50-50 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी। अभी हाल ही में क्रिकेटर अजिक्य रहाणे ने किसानों के लिए आगे बढ़कर कदम बढ़ाते हुए सीएम देवेन्द्र फणनवीस को किसानों की मदद के लिए 5 लाख रूपये डोनेट किये।
हो सके तो आप सभी सज्जन नाना पाटेकर साहब के "नाम फाउंडेशन" में अपने योग्यता नुसार कुछ धनराशि अवश्य ही दान करे और सही मायनों में पूण्य के भागीदार बने । मैने भी किसानों के मदत हेतु एक अच्छा प्रयास किया था परंतु मैं उसमें असफल राहा, इस वर्ष मेरा एक ही संकल्प है के ज्यादा से ज्यादा सज्जन लोग "नाम फाउंडेशन" जुड़कर अपना योगदान दे ।

मातारानी आप सभी पर कृपा करें,यही नववर्ष पर कामना करता हूँ ......



आदेश......


11 Dec 2017

शाबर शक्ति मंत्र साधना



परेशान ना हुआ करो,किसीके बातो से........
कुछ लोग पैदा ही बकवास करने के लिए होते है ।

यह वाक्या बहोत अच्छा है जीवन मे तनावग्रस्त ना रहने के लिए । आजकल बड़ा गंदा माहौल बना हुआ है,जहां देखो वहां सिर्फ चर्चाएं चल रही है । कोई राजनीति पर,कोई फिल्मों पर तो कोई आस-पास के रहेनेवालो पर चर्चाओं से व्यस्ततम है । स्वयं के लिए भी कुछ समय निकालो और अपने आप से अपने लिये चर्चा करो,गारंटी के साथ बोल रहा हु "बहोत ज्यादा हद तक तनाव कम हो जायेगा और जीवन में कुछ करने की चाहत बढ़ेगी" । हमेशा याद रखो के मूर्खो से जितने वालो को महामूर्ख कहा जाता है,इसलिये व्यर्थ की बाते और व्यर्थ की लड़ाईया बुरे ही परिणाम देती है । पाणी बचाओ तो सभी कहेते है परंतु आनेवाले नए वर्ष में समय बचाओ का संकल्प अवश्य ही लीजिए ।


आज लिखने का विषय यही है,आप कुछ समय मंत्र जाप के लिए भी निकाल ही लो । इसमें आपको कोई नुकसान नही होगा और मातारानी ने चाहा तो फायदा ही होगा । आज एक आवश्यक साधना दे रहा हु जो किसी भी किताब में छपी नही है और मैं इस मंत्र का जाप शुभ समयो पर 14 साल से करता आरहा हु । मुझे और मेरे सभी पहेचान वालो को फायदा हुआ है,किसी को जल्द फायदा हुआ है तो किसीको देर से फायदा हुआ है परंतु फायदा सभी को हुआ है और आपको भी हो सकता है । इस साधना में साधना सामग्री बहोत सस्ती है जैसे कपूर,धूपबत्ती और माचीस । मंत्र जाप के समय कपूर बुझना नही चाहिए और सुगंधित धूपबत्ती से आपको आध्यात्मिक वातावरण बनाके रखना है । आसान कोई भी चलेगा, किसी भी रंग का चलेगा । दिशा का कोई बंधन नही,जहां चाहो वहां मुख करके बैठ सकते हो परंतु पूर्व/उत्तर दिशा मंत्र जाप हेतु अच्छा माना जाता है । साधना जाप के लिये समय का कोई पाबंदी नही है,चाहो उतना जाप करो और जब भी साधना हेतु समय दे सकते हो उसी समय जाप कर लिया करो । संसार के किसी भी शुद्ध या पवित्र स्थान पर सुखासन में बैठकर कर जाप कर सकते हो,जरूरी नही के मंत्र जाप पूजाघर में ही करना है । साधना किसी भी दिन से शुरू कर सकते हो और जब तक साधना करने की क्षमता हो तब तक तो अवश्य ही किया करे । साधारणत: मंत्र सिद्धि हेतु साधना 21 दिनों तक करे और हो सके तो निच्छित समय पर बैठकर कर उचित संख्या में जाप करे । उचित संख्या में जाप करने का अर्थ है जैसे 108 बार या 1008 बार मंत्र जाप करना ।

जिस तरह मेरे गुरुजी ने मुझे समझाया था,वैसे ही समझाने की कोशिश मैने की है और आपको इस साधना के माध्यम से श्रेष्ठ प्रकार के लाभ मिले यहां गुरुचरणों में प्रार्थना है । इस एक शक्ति साधना है,यहां शक्ति साधना का अर्थ है देवी साधना । यह मंत्र देवों के लिये नही है सिर्फ देवी से संबंधित है,इस प्रकार के अन्य भी शाबर मंत्र है जो शक्तिपूर्ण है । इस शाबर शक्ति मंत्र से आप किसी भी देवी की कृपा और सिद्धि प्राप्त कर सकते है, यह एक ग्रामीण भाषा से निर्मित मराठी मंत्र है । महाराष्ट्र में नाथ सम्प्रदाय के जनक नवनाथों में से गुरु मच्छीन्द्रनाथ, गहिनीनाथ, जालिंदारनाथ, कानिफनाथ, सिद्ध रेवणनाथ,वट सिध्द नागनाथ , भर्तुहरिनाथ भगवान की समाधिया है । गुरु गोरखनाथ और गुरु चरपटनाथ आज भी चेतना के अवस्था मे जीवित जाग्रत है,इन्होने अपना देह त्याग नही किया । इसलिए महाराष्ट्र में ग्रामीण भाषा में बोली जानेवाले भाषा के प्रकार के लाखों शाबर मंत्र है जो किताबो नही अपितु यहां रहने वाले बुजुर्गों के पास सुरक्षित है ।


मंत्र-

।। आकाश पिता,धरतरी माता,जय महाकालि माता प्रसन्न होय आता,दुहाई गुरु गोरखनाथ की ।।


इस मंत्र से महाकालि जी को प्रसन्न किया जा सकता है,ठीक इसी तरह अगर आप किसी अन्य देवी को प्रसन्न करना चाहते हो तो महाकालि जी के जगह उस देवी का नाम बोलना होगा । एक बार उदाहरण के मंत्र लिख रहा हु "आकाश पिता,धरतरी माता,जय सरस्वती माता प्रसन्न होय आता,दूहाई गुरु गोरखनाथ की",  तो इस तरह से आप अपनी इष्ट देवी को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त कर सकते हो । इसी मंत्र साधना पर एक बार ओर मैं लिखूंगा आनेवाले चंद्रग्रहण के बाद और उसमें इसी मंत्र से किस प्रकार से हमे देवी के दर्शन प्राप्त हो सकते है,यह महत्वपूर्ण साधना लिखनेवाला हू ।

आनेवाले चंद्रग्रहण तक अवश्य ही आप ज्यादा से ज्यादा इस मंत्र साधना को सम्पन्न करे,इसमे आपको मातारानी के कृपा से जीवन मे अनेको समस्याओं से राहत मिल सकती है । मैने जब यह साधारण मंत्र समझकर अपने गुरु से ग्रहण किया था,तब सोचा नही था के यह मंत्र दिव्यता से पूर्ण है । आप स्वयं साधना करे और अपने अनुभव मुझे ईमेल से भेजिए ताकि मैं आपको आगे के साधना में मार्गदर्शन कर सकू और वह मार्गदर्शन इसी मंत्र साधना से संबंधित होगा ।

ईमेल-snpts1984@gmail.com



अब तो मैने अपना E-mail I.D. बदल दिया है क्युके निखिल शिष्यो को मेरे ईमेल में निखिल नाम होने से समस्या थी,जिस कारण मुझे यह करना पड़ा क्युके मैं किसीका दिल नही दुखाना चाहता हूँ । अगर मेरे पुराने ईमेल आई. डी. में निखिल नाम होने से आपके कोमल हृदय को ठेस पहोचता था तो शायद आपको यह बात मुझे ईमेल के माध्यम से बता देना चाहिए था । मैं अपने जीवन मे किसी भी गुरु के नाम से अपना ब्लॉग चलाना उचित नही समझता हूं,किसी भी संत,महात्मा या गुरु के नाम से ओ भी बिना उनके आज्ञा के यह कार्य करना इसे मैं स्वयं अपराध मान सकता हूँ । तो साधक मित्रो यह बात आप भी स्वीकार करे के किसी भी गुरु का फोटो लगाकर या फिर उनके नाम का इस्तेमाल करके यह ब्लॉग नही चलाया जा रहा है । 20 ऑक्टोम्बर के बाद आज पोस्ट लिख रहा हु क्युके मेरे जीवन मे भी व्यस्तता है और मेरे पास इतना समय नही रहेता है के मैं सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर जाकर देखता रहू के मेरे बारे में कौन व्यक्ति बुरा या भला बोल रहा है । अब जितना भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कोई भी सज्जन मेरे बारे में अच्छा लिखे या फिर बुरा लिखे,लोग उनके लिखने के बाद वह पढ़कर ब्लॉग पढ़ते है और सभी पढ़ने वाले तारीफ ही करते है । इसी वजेसे से रोजाना ब्लॉग पढ़ने वालों की संख्या भी बढ़ रही है,यह तो आनंद की बात है । मैं बहोत दिनों से सोच रहा था के रोजाना ब्लॉग पढ़ने वालों की संख्या कैसे बढ रही है क्युके मैं नाही फ़ेसबुक पर हु और नाही मेरा कोई भी यूट्यूब चैंनल है,नाही मेरा कोई व्हाट्सएप ग्रुप है,मेरा तो इस पूरे संसार मे कोई शिष्य भी नही है जो मेरा या इस ब्लॉग का प्रचिती करे मतलब एडवरटाइजिंग करे । मेरे पास ना ब्लॉग लिखने का समय होता है ओर ना फोन उठाकर बात करणे के लिए ज्यादा समय होता है,इसलीये यह ब्लॉग कोई पैसा कमाने के लिए नही बनाया है । अगर इस ब्लॉग से पैसा कमाना होता तो एक महिने मे कम से कम मै 10-12 आर्टिकल लिखता और साथ मे इस ब्लॉग पर Google Adsense भी लगा देता जैसे बाकी वेबसाइट्स या ब्लॉग पर लगाया हुआ है । Google Adsense लगाकर पैसा कमाना तो बहोत आसान कार्य है और साथ मे अपना YouTube channel भी बनाकर पैसा कमा सकता था परंतु मैं अपने जीवन मे अपनी आमदनी से खुश हूं ।

अब मुझे मेरे सवालों का जवाब मिल गया है,मेरे कई पुराने शत्रु है जब मैं फ़ेसबुक पर था और आज वही लोग फ़ेसबुक पर मेरे नाम को बदनाम करते रहते है,कोई इल्जाम करता है तो कोई चुगलीया करते रहता है जिस वजेसे मेरा बिना फ़ेसबुक पर रहने के बाद भी अच्छा खासा पब्लिसिटी हो रहा है । यह तो मातारानी की कृपा है के निःशुल्क में ही लोग मन मे गंदगी रखकर मुझे प्रसिद्ध कर रहे है,इस महान कार्य हेतु मेरे शत्रुओं को धन्यवाद ।

*एक बार फिर से लिख रहा हु,मेरा YouTube पर कोई भी channel नही है,facebook पर भी कोई account नही है और कोई भी whatsapp group नही है,यहां किसी भी प्रकार का कोई भी दीक्षा नही दिया जाता है । जिसे इस बात का परीक्षा लेना हो वह सज्जन व्यक्ति अपना कीमती समय निकालकर खोज कर सकता है । ब्लॉग पर अगले वर्ष से कार्य प्रारंभ होगा और मार्गदर्शन हेतु दिए जानेवाले पुराने ईमेल आई.डी. को हटाकर नया ईमेल आई.डी. snpts1984@gmail.com डाल दिया जायेगा । इस कार्य से निखिल शिष्यो को बेहद खुशी मिलेगा,यही आशा करता हू । मातारानी आप सभी पर कृपा बनाये रखे,यही मातारानी के चरणों मे प्रार्थना है ।



आदेश.........

30 Oct 2017

दिव्य पारद शिवलिंग



पारद शिवलिंग को लेकर हमारे शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है–

केदारदोनि लिंगानि, पृथिव्यां यानि कानिचित्।
तानि दृष्ट्ंवासु यत्पुण्यतत्पुण्यं रसदर्शनात्॥

अर्थात्:-केदार आदि पवित्र तीर्थस्थलों से लेकर पृथ्वी तल पर जितने भी शिवलिंग हैं उनके दर्शन से जो पुण्य मिलता है वही पुण्य पारद निर्मित शिवलिंग से सहज में ही प्राप्त हो जाता है और भी कहा है –

स्वयंभूलिंग साहस्त्रैः, यत्फलं सम्यगार्यनात्।
तत्फलं कोटि गुणितं, रसलिंगाच्र्चनाद् भवेत्॥

अर्थात्:-जो पुण्य हजार स्वनिर्मित पार्थिव शिवलिंग के पूजन से होता है, उससे करोड़ गुना फल पारद शिवलिंग के पूजन से प्राप्त होता है। पारद के शिवलिंग को शिव का स्वयं भू प्रतीक भी माना गया है,ऐसी अद्भुत महिमा है पारद के शिवलिंग की। आप भी इसे अपने घर में स्थापित कर घर के समस्त दोषों से मुक्त हो सकते हैं।



पारद शिवलिंग का विशेष महत्व–

पारद को भगवान् शिव का स्वरूप माना गया है और ब्रह्माण्ड को जन्म देने वाले उनके वीर्य का प्रतीक भी इसे माना जाता है। धातुओं में अगर पारद को शिव का स्वरूप माना गया है तो ताम्र को मां पार्वती का स्वरूप। इन दोनों के समन्वय से शिव और शक्ति का सशक्त रूप उभरकर सामने आ जाता है। ठोस पारद के साथ ताम्र को जब उच्च तापमान पर गर्म करते हैं तो ताम्र का रंग स्वर्णमय हो जाता है। इसीलिए ऐसे शिवलिंग को सुवर्ण रसलिंग भी कहते हैं।

पारद के इस लिंग की महिमा का वर्णन कई प्राचीन ग्रंथों में जैसे कि रूद्र संहिता, पारद संहिता, रस मार्तण्ड, ब्रह्म पुराण, शिव पुराण आदि में पाया जाता है। योग शिखोपनिषद ग्रन्थ में पारद के शिवलिंग को स्वयंभू भोलेनाथ का प्रतिनिधि माना गया है। इस ग्रन्थ में इसे महालिंग की उपाधि मिली है और इसमें शिव की समस्त शक्तियों का वास मानते हुए पारद से बने शिवलिंग को सम्पूर्ण शिवालय की भी मान्यता मिली है ।

इसका पूजन करने से संसार के समस्त दोषों से मुक्ति मिल जाती है। कई जन्मों के पापों का उद्धार हो जाता है। इसके दर्शन मात्र से समस्त परेशानियों का अंत हो जाता है। ऐसे शिवलिंग को समस्त शिवलिंगों में सर्वोच्च स्थान मिला हुआ है और इसका यथाविधि पूजन करने से मानसिक, शारीरिक, तामसिक या अन्य कई विकृतियां स्वतः ही समाप्त हो जाती हैं। घर में सुख और समृद्धि बनी रहती है।

पौराणिक ग्रंथों में जैसे कि ‘ रस रत्न समुच्चय ’ में ऐसा माना गया है कि 100 अश्वमेघ यज्ञ, चारों धामों में स्नान, कई किलो स्वर्ण दान और एक लाख गौ दान से जो पुण्य मिलता है वो बस पारे के बने इस शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही उपासक को मिल जाता है।
अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आप मन एकाग्र करना चाहते है और मुक्ति भाव की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिवलिंग की उपासना करनी चाहिए।
पारद एक ऐसा शुद्ध पदार्थ माना गया है जो भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इसकी महिमा केवल शिवलिंग से ही नहीं बल्कि पारद के कई और अचूक प्रयोगों के द्वारा भी मानी गयी है।
धातुओं में सर्वोत्तम पारा अपनी चमत्कारिक और हीलिंग प्रॉपर्टीज के लिए वैज्ञानिक तौर पर भी मशहूर है। पारद के शिवलिंग को शिव का स्वयं भू प्रतीक भी माना गया है। रूद्र संहिता में रावण की शिव स्तुति के बारे में जब चर्चा होती है तो पारद के शिवलिंग का विशेष वर्णन मिलता है। रावण को रस सिद्ध योगी भी माना गया है और इसी शिवलिंग का पूजन कर उसने अपनी लंका को स्वर्ण की लंका में तब्दील कर दिया था।

कुछ ऐसा ही वर्णन बाणासुर राक्षस के लिए भी माना जाता है। उसे भी पारे के शिवलिंग की उपासना के तहत अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने का वर प्राप्त हुआ था। ऐसी अद्भुत महिमा है पारद के शिवलिंग की। आप भी इसे अपने घर में स्थापित कर घर के समस्त दोषों से मुक्त हो सकते हैं। लेकिन ध्यान अवश्य रहे कि साथ में शिव परिवार को भी रख कर पूजन करें। पारद के शिवलिंग के पूजन की महिमा तो ऐसी है कि उसे बाणलिंग से भी उत्तम माना गया है। जीवन की समस्त समस्याओं के निदान के लिए पारद के उपयोग एवं इससे सम्बंधित उपाय अत्यंत प्रभावशाली हैं। यदि इनका आप यथाविधि अभिषेक कर, पूर्ण श्रद्धा से पूजन करेंगे तो जीवन में सुख और शान्ति अवश्य पाएंगे।
पारद शिवलिंग की भक्तिभाव से पूजा-अर्चना करने से संतानहीन दंपति को भी संतानरत्न की प्राप्ति हो जाती है। 12 ज्योतिर्लिंग के पूजन से जितना पुण्यकाल प्राप्त होता है उतना पुण्य पारद शिवलिंग के दर्शन मात्र से मिल जाता है।



पारद के कुछ अचूक उपायों का विवरण निम्नलिखित है, जिन्हें आप स्वयं प्रयोग कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति कर सकते हैं:-

1. अगर आप अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहते हों, योग और ध्यान में आपका मन लगता हो और मोक्ष के प्राप्ति की इच्छा हो तो आपको पारे से बने शिवलिंग की उपासना करनी चाहिए। ऐसा करने से आपको मोक्ष की प्राप्ति भी हो जाती है।

2. अगर आपको जीवन में कष्टों से मुक्ति नहीं मिल रही हो, बीमारियों से आप ग्रस्त रहते हों, लोग आपसे विश्वासघात कर देते हों, बड़ी-बड़ी बीमारियों से ग्रस्त हों तो पारद के शिवलिंग को यथाविधि शिव परिवार के साथ पूजन करें। ऐसा करने से आपकी समस्त परेशानियां ख़त्म हो जाएंगी और बड़ी से बड़ी बीमारियों से भी मुक्ति मिल जाएगी।

3. अगर आपको धन सम्पदा की कमी बनी रहती है तो आपको पारे से बने हुए लक्ष्मी और गणपति को पूजा स्थान में स्थापित करना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जहां पारे का वास होता है वहां माँ लक्ष्मी का भी वास हमेशा रहता है। उनकी उपस्थिति मात्र से ही घर में धन लक्ष्मी का हमेशा वास रहता है।

4. अगर आपके घर में हमेशा अशांति, क्लेश आदि बना रहता हो, अगर आप को नींद ठीक से नहीं आती हो, घर के सदस्यों में अहंकार का टकराव और वैचारिक मतभेद बना रहता हो तो आपको पारद निर्मित एक कटोरी में जल डाल कर घर के मध्य भाग में रखना चाहिए। उस जल को रोज़ बाहर किसी गमले में डाल दें। ऐसा करने से धीरे-धीरे घर में सदस्यों के बीच में प्रेम बढ़ना शुरू हो जाएगा और मानसिक शान्ति की अनुभूति भी होगी। पारद को पाश्चात्य पद्धति में उसके गुणों की वजह से Philospher's stone भी बोला जाता है। आयुर्वेद में भी इसके कई उपयोग हैं।

5. अगर आप उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, हृदय रोग से परेशान हैं, या फिर अस्थमा, डायबिटीज जैसी जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हैं तो आपको पारद से बना मणिबंध जिसे कि ब्रेसलेट भी कहते हैं, अच्छे शुभ मुहूर्त में पहननी चाहिए। ऐसा करने से आपकी बीमारियों में सुधार तो होगा ही आप शान्ति भी महसूस करेंगे और रोगमुक्त भी हो जाएंगे।



यह तो पारद का गुणगान हो गया परंतु इसके विशेष मंत्रो का ज्ञान बहोत कम लोगो के पास है,जैसे "क्लीं" बीजाक्षर पारद शिवलिंग को अपने उन शक्तियों को जाग्रत करता है जिससे आनंद ही आनंद निर्मित होता है । "ह्रीं" बीजाक्षर शक्ति तत्व को जाग्रत करके साधक को शक्तिमय बना देता है,"ऐं" बीजाक्षर तो स्वयं रासेश्वरी की शक्ति साधक के शरीर में अमृत के समान रक्त के माध्यम से बहने लगती है । "श्रीं " बीजाक्षर जाप से साधक संसार के समस्त प्रकार के साधना में किये जाने वाली उप्तत्ति के आधार से जुड़कर अपने कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सक्षम हो सकता है । "ह्रौं" यह एकमात्र ऐसा बीजाक्षर है जो मृत्यु को हरा सकता है,पारद शिवलिंग के सामने इस बीजाक्षर जाप के माध्यम से कम्पन निर्मित होते ही है,सिर्फ जाप करने का सही ज्ञान होना आवश्यक तथ्य है ।

मै शिवभक्तों को पारद शिवलिंग देना चाहता हु परंतु उनमे कुछ पात्रता होना जरुरी है,जैसे वह शक्ति साधक होना चाहिए,उसको शिव जी के प्रति दृढ़ निष्ठा होना चाहिए,वह एक ऐसा साधक होना चाहिए जो प्रदोष काल में व्रत कर सके और हर महीने यह व्रत 2 बार आता है,साधक ऐसा हो जो अमावस्या के दिन किसी भी हालात में झूठ ना बोले,उसे नित्य शिवलिंग दर्शन करना चाहिए अगर वह घर से कही दूर जाए तो उसे मन ही मन पारद शिवलिंग को दिन में एक बार याद करके ध्यान करना चाहिये । यह सब गुण तो पारद शिवलिंग के उपासको के लिए अत्यंत आवश्यक है ।
आज आपको एक गोपनीय रहस्य बता रहा हु जो मार्केट में पारद शिवलिंग बेचने वाले नहीं जानते है,"ऋग्वेद-५, सूक्त-४२, ऋचा-११" ऐसा मंत्र है जिसके तीन बार पाठ करने से एक रुद्रपाठ का फल मिलता है,यह मैं नहीं कह रहा हु,यह तो स्वयं ऋग्वेद में लिखा हुआ है और यही मंत्र अगर पारद शिवलिंग पर बोलते हुए पंचामृत अभिषेक किया जाए तो त्वरित फल की प्राप्ति होती है । यहाँ आज मैंने ऐसा रहस्य बता दिया जो सिर्फ एक शिव-शक्ति उपासक ही बता सकता है,अन्य लोगो को सिर्फ धन कमाना है,उनको उपासना से कोई मतलब नहीं है ।

मै जब शिवलिंग बनाता हूँ तब उसमें सर्वप्रथम जिसके लिए बनाना है,उस व्यक्ति के नाम से संकल्प लेकर पारद शिवलिंग कार्य निर्माण शुरू करता हु और पूर्ण क्रिया होने के बाद जब तक उसमे मतलब पारद शिवलिंग के चमक में अपना चेहरा ना देखलू तब तक वह शिवलिंग मैं साधक को नहीं देता हूँ । हां,यह सच है के पारद शिवलिंग मे हम हमारा चेहरा देख सकते है क्युके असली पारे से बने हुए शिवलिंग में वह चमक होती ही है । पारद तो एक प्रकार के आईने के समान चमकदार होता है,आप जो काले हरे नीले रंग के चश्मे पहनते हो उस पर भी पारे का इस्तेमाल होता है,इसलिए आप अपने चश्मे में अपना चेहरा देख सकते हो । चमक यह तो पारद का एक सामान्य गुणधर्म है और अगर आपके घर में पारद शिवलिंग है और उसमें चमक नहीं है तो आप समझ सकते हो की वह किस प्रकार का पारद शिवलिंग है ।

पारद शिवलिंग का साधना बीज मंत्र और शाबर मंत्रो से करना शीघ्र फलदायी माना जाता है,आप जिससे भी पारद शिवलिंग प्राप्त करेंगे उसको आप बिना भूले ऐसे मंत्र प्राप्त करे जो बीजाक्षर युक्त हो या फिर वह कोई शाबर मंत्र हो । मैं जब किसीके लिये पारद शिवलिंग बनाता हूँ और अगर वह शिवलिंग मेरे हिसाब से अच्छा नहीं बनता है तो मैं उस व्यक्ति को उसके पैसे वापिस कर देता हूं,क्युके प्रत्येक व्यक्ति को मैं एक ऐसा शिवलिंग देना चाहता हु जो उसको शिवकृपा हेतु आवश्यक हो । आप चाहो तो मैं पारद शिवलिंग के साथ उसके प्राणिकता का सर्टिफिकेट भी भेज दू,जो सरकार मान्य किसी लैबोरेट्री में टेस्टिंग किया हुआ हो,ताकि आपके मन मे किसी भी प्रकार का भ्रम जन्म ना ले सके और आप पारद शिवलिंग साधना में जीवन को समर्पित कर सके ।
मेरे पास जो पारद शिवलिंग बनते है उसका मूल्य 65 रुपये पर ग्राम है,अगर आप 100 ग्राम का शिवलिंग ले सकते हो तो उसका मूल्य 6500 रुपये होगा । दीव-दमन के खाड़ी से प्राप्त किया गया पारा महेंगा होता है और वहा का पारा शिवलिंग बनाने हेतु अच्छा है,जर्मन पारा सस्ता होता है परंतु मेरे हिसाब से वह शिवलिंग बनाने हेतु योग्य नहीं है । मार्केट में जो पारद शिवलिंग मिलते है वह ज्यादातर जर्मन पारा से बनाते है,ऐसा शिवलिंग आरोग्य लाभ हेतु ठीक नहीं है ।

शिवलिंग तो 41,110 ग्राम से लेकर जितना चाहे उतने ग्राम तक बना सकते है परंतु गृहस्थ साधक को 11 तोले का शिवलिंग मतलब 110 ग्राम का शिवलिंग उपयुक्त है और इससे आगे 51 तोले का शिवलिंग सिद्धिप्रदाय माना जाता है और 125 तोले का शिवलिंग मोक्षप्रदाय माना जाता है । पारद शिवलिंग प्राप्त करने हेतू आप ईमेल के माध्यम से संपर्क कर सकते है- snpts1984@gmail.com और जिनके पास मेरा मोबाइल नंबर है वह साधके फोन करे ।



आदेश........

25 Oct 2017

गोपनीय दुर्लभ मंत्र ।



आप ईश्वर की अनमोल कृति हैं इसलिए अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा,विचार मंथन और क्रिया सामान्यतः प्रत्येक मनुष्य अपनी समस्याओं के बारे में विचार करता रहता है और स्वयं को परेशान करता रहता है। चिन्ताओं को अपने पास आने का निमंत्रण देता रहता है। क्या आपको मालूम है आप में क्या शक्ति है और इस शक्ति का विकास कैसे संभव है? क्या आप इस प्रश्न पर विचार करते हैं?

उस सर्व शक्तिमान ईश्वर ने एक निश्चित उद्देश्य के लिये आपको यह सुन्दर जीवन दिया है और उस निश्चित लक्ष्य, उद्देश्य को आप ही पूरा करेंगे यह विश्वास सदैव बनाए रखें।

यह मनुष्य व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसके पास शक्ति तो सीमित होती है लेकिन उसकी कामनाओं की उड़ान असीमित होती है। प्रत्येक मनुष्य को प्रतिपल कुछ न कुछ क्रिया अवश्य ही करनी पड़ती है। बिना क्रिया के वह एक क्षण भी नहीं रह सकता है। साथ ही यह भी समझें कि रोज-रोज की चिन्ताओं में, परेशानियों में, तनाव में काम करते हुए वह अपने स्वयं के बारे में सबसे कम विचार कर पाता है। इस कारण वह अपनी भागती-दौड़ती जिन्दगी में एक मशीन की भांति ही काम करता रहता है। विपरीत स्थिति में, स्थिति को अनुकूल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। इस प्रकार वह यंत्रवत् जीवन जीता है। प्रतिदिन अपने बारे में कम और ज्यादा से ज्यादा दूसरों के बारे में ही चिन्तन करता है, दूसरों की तुलना में अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये प्रयत्नशील रहता है।

अब इसमें गलती किसकी है, सोचो? हर समय दूसरों के बारे में चिन्तन करना है या अपने बारे में भी चिन्तन करना है, विचार करें – मनुष्य का स्वभाव बड़ा ही सरल है। उसके अन्दर एक जिद्द, होड़ है। वह हर खूबसूरत, अनमोल वस्तु पर, व्यक्ति पर, स्थान पर अपना एकाधिकार बनाना चाहता है। इसके साथ ही उसके सारे प्रयास, सारे विचार इसी दिशा में होते हैं कि मैं ध्यान, सौन्दर्य, धन-बल, शरीर-बल, ऐश्वर्य सभी में प्रभावशाली बनूं। अब उसका चिन्तन दो तरफा है, एक ओर तो वह हर वस्तु पर अपना अधिकार जमाना चाहता है और दूसरा वह हर दृष्टि से प्रभावशाली बनना चाहता है। उसका चिन्तन इसी बात में उलझा रहता है कि किस प्रकार और कैसे हर समय वह स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर सके?

परन्तु हकीकत में होता क्या है? वह इसी फेर में निरन्तर उलझा रहता है। समय का चक्र भी बड़ा बलवान है। धीरे-धीरे जीवन शक्ति क्षीण होती है लेकिन कामना शक्ति, इच्छाएं बढ़ती ही जाती हैं। इस कारण मन-मस्तिष्क की शक्तियां कमजोर होती चली जाती हैं। सभी के जीवन में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसलिये ज्यादातर लोग आपको परेशान, चिन्तित दिखाई देंगे। यह उलझन तो उन्होंने स्वयं अपने जीवन में डाली है। सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य जीवन में 90% भाग पर प्रकृति अर्थात् परमसत्ता का प्रभाव है। केवल और केवल 10% प्रतिशत भाग पर मनुष्य के स्वयं के कर्म और चिन्तन का प्रभाव रहता है लेकिन मनुष्य करता क्या है? जिस बात पर उसका अधिकार ही नहीं है, परम शक्ति का प्रभाव है उसके ऊपर चिन्ता करता रहता है। कर्म और विचार उसके अधिकार में है केवल और केवल इस पक्ष को सकारात्मक बनाए। इस 10% भाग अर्थात् ‘कर्म और विचार’ को यदि आपने सकारात्मक बना लिया तो पूरा जीवन व्यवस्थित हो जाएगा।

विचार करें कि आपके हाथ में कौन-कौन सी स्थितियां हैं और कौन-कौन सी स्थितियां आपके हाथ में नहीं हैं।

कामनाएं कमजोर बनाती हैं,मनुष्य की यह बड़ी कमजोरी है कि वह सबसे ज्यादा चिन्तन अपनी कामनाओं का, अपने प्रियजनों का, अपने समाज का करता रहता है। वह अपने जीवन में उन चिन्ताओं से परेशान- दुःखी, उदास, हताश, निराश होता है जो कि उसके वश में ही नहीं हैं। भविष्य की हर सोच में वह स्वयं को डरा हुआ पाता है। भविष्य की हर चिन्ता में अपना वर्तमान खराब कर देता है। इसी से तो उसकी सकारात्मक सोच, नकारात्मक बन जाती है और फिर वह एक साधारण जीवन जीने लगता है। जबकि विचार करें कि आपका मनुष्य योनि में जन्म तो आने वाले कल में स्वयं को अति सफलतम सिद्ध करने के लिये ही हुआ था। मूल आवश्यकता इस बात की है कि जिन विषय वस्तुओं पर हमारा अधिकार नहीं है, जिन विषय वस्तुओं के बारे में हमें जानकारी नहीं है या जिन विषय वस्तुओं को हम पहले से जान नहीं सकते हैं उन सब के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाएं और अपने आपको बार-बार आश्वस्त करते रहें कि आगे सब अच्छा ही होगा, तो यहीं से आपके लिए आनन्द का नया द्वार खुल जाएगा।


हमारा भारतीय दर्शन इस विषय में क्या कहता है?
भारतीय दर्शन में एक सिद्धान्त है कि मनुष्य में अलौकिक, असीम और अनन्त शक्ति का स्रोत छिपा हुआ है और इस शक्ति पर चार प्रकार के प्रमुख आवरण हैं, जिनके कारण अनेक कमियां उसके व्यक्तित्व में आ जाती हैं।

ये चार आवरण हैं – 1. काम (sex), 2. क्रोध (anger), 3. लोभ (greed) और 4. अतिमोह (delusion)

इन आवरणों के कारण ही मनुष्य अपने सुख-दुःख का जाल बुनता रहता है और उसमें फंसता रहता है, छटपटाता रहता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि ये चारों आवरण मनुष्य ने स्वयं बनाए हैं।

*काम – जीवन में निरन्तर काम का भाव, मन को अशांत और उद्वेगी बना देता है। जीतने की प्रवृत्ति के कारण बार-बार बाजी लगाता है।

*क्रोध – क्रोध व्यक्ति में उसकी खुद की गलतियों को बल पूर्वक दूसरे से मनवाने का उपक्रम करता है। अपनी गलतियों को छुपाने के लिये ही व्यक्ति क्रोध करता है।

*लोभ – निरन्तर लोभ का भाव, हर अच्छी चीज को प्राप्त करने का, हड़पने का भाव देता है।

*अतिमोह – अतिमोह ऐसा जाल है कि वह मनुष्य में यह भावना पैदा करता रहता है कि ‘ मैं ही सबको पालने वाला और आश्रय देने वाला हूं, सबकी व्यवस्था करने से पहले मैं हार नहीं जाऊं, समाप्त नहीं हो जाऊं। ’



इन चारों कारणों से मनुष्य अपनी वास्तविक शक्ति का परिचय नहीं दे पाता है, अपनी वास्तविक शक्ति को नहीं पहचान सकता है। मनुष्य जीवन के लिए ऊपर वाले चारों उपक्रम आवश्यक हैं लेकिन ये चारों आवरण एक सीमा तक ही होने चाहिए। इतने कठोर नहीं होने चाहिए कि आप उन्हें तोड़ नहीं सकें। इनमें से किसी की भी अधिकता नहीं होनी चाहिए। ये सारी क्रियाएं करें लेकिन इनमें पूरी तरह से लिप्त न हों।
यह सिद्ध है कि मनुष्य में अनन्त शक्तियां हैं लेकिन स्वयं की शक्ति के आंकलन की कमी और विचारों में अस्थिरता के कारण वह इसे पहचान नहीं पाता है। मनुष्य के हाथ में है कि वह अपनी वैचारिक शक्ति के द्वारा हर प्रकार की उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। कोई व्यक्ति जन्म से महापुरुष नहीं होता, महापुरुष वही बनता है जिन्होंने अपने आप पर नियन्त्रण किया और अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत किया। ईश्वर ने सबको समान शक्ति प्रदान की है, बस इस शक्ति को संरक्षित करना आना चाहिए तो इसके लिये एक ही उपाय है कि आप अपनी स्वयं की शक्तियों को अपने चिन्तन का आधार प्रदान करें और यह संकल्प लें कि प्रत्येक वह आवरण जो काम-क्रोध-लोभ-मोह कहलाता है उसकी सीमा कितनी हो? उसकी सीमा निर्धारित करें और स्वयं को एकाग्र कर, स्वयं को जाग्रत करने का प्रयत्न प्रारम्भ कर दें।


अपने जीवन के इस शक्ति संकलन में ये संकल्प बार-बार दोहराते रहें –

1. अपने आपको छोटा और बेचारा नहीं मानें। आप ईश्वर की अनमोल कृति हैं और उस सर्व शक्तिमान ईश्वर ने एक निश्चित उद्देश्य के लिये आपको यह सुन्दर जीवन दिया है और उस निश्चित लक्ष्य, उद्देश्य को आप ही पूरा करेंगे यह विश्वास सदैव बनाए रखें।

2. दूसरों की आलोचना से आपकी स्वयं की शक्ति का ह्रास होता है, दूसरों की कमियों की व्याख्या में अपना समय व्यर्थ न गंवाएं अन्यथा आप स्वयं नकारात्मक भाव पकड़ने लग जाएंगे।

3. जीवन में जिन कार्यों और परिस्थितियों पर आपका वश नहीं है, उनके प्रति स्वयं को सकारात्मक रखें। अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा, ऐसा विचार करने से नये-नये मार्ग अवश्य दृष्टिगत होंगे।

4. अपनी शक्ति के चिन्तन में स्वयं को लगाएं, ध्यान के साधन द्वारा जैसा आप स्वयं चाहते हैं वैसा शक्ति सम्पन्न बनने का मानसिक संकल्प दोहराते रहें।

5. अतीत की सोच और भविष्य की सोच दोनों से दूरी बना लें, क्योंकि आपको वर्तमान में कर्म करना है। ‘ वर्तमान के ही कर्म का चिन्तन करें’।

6. अतीत के दुःख और भविष्य के भय को सकारात्मक सोच दें। उन्हें कष्ट का कारण न मानें क्योंकि अतीत और भविष्य दोनों ही प्रश्नवाचक हैं। क्या हो गया, कैसे हो गया, अब क्या होगा, अब कैसे होगा? ये सारे प्रश्न प्रश्नवाचक हैं जबकि आपका वर्तमान क्रियावाचक है – ‘ मैं यह कर रहा हूं ’ यही मुख्य बात है।

7. स्वयं को समयबद्ध तरीके से कार्य में लगाएं, समय-समय पर अपना स्वयं का आंकलन करते रहें और उसी के अनुसार अपनी कार्यशैली, कृतित्व (creation ) आदि में परिवर्तन करते हैं। यदि कोई नया आदर्श स्थापित करना है तो उसे भी स्थापित करते रहें।

8. मनुष्य के पास समय कम है और कामनाएं अनन्त हैं। ऐसे में अपने मन और मस्तिष्क पर पूर्ण नियन्त्रण करते हुए उसे अपने संकल्प की ओर ही दिशा देते रहें और अपने संकल्प का आंकलन करते रहें।

9. हर सुन्दर और मूल्यवान वस्तु हमारी हो, हर ज्ञान, सुन्दरता, बल, तप, यश में हम ही श्रेष्ठ हों। यह दौड़ छोड़ दें। बल्कि यह आंकलन करें कि हमारे अन्दर भी अनन्त गुण हैं और इन गुणों के द्वारा ही हम सर्वश्रेष्ठ होंगे।
अपने लक्ष्यों को बिल्कुल साफ और स्पष्ट रखें। जैसे ही आप अपने लक्ष्य से हटे तो आपका जीवन स्वयं हार मान लेगा। इस कारण अपने लक्ष्य निश्चित, स्पष्ट रखें।

10. आपका सत् संकल्प, आपके भीतर का नम्रता का भाव ही आपकी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है और इसी का विकास करना है और यहीं से आपके शक्ति सम्पन्न होने का अध्याय शुरू हो सकता है।



कुछ ऐसा करके तो देखो के जीवन के सभी दुख,पीडा,कष्ट और दुर्भाग्य आपके सामने हाथ जोड़कर क्षमा की भीख मांगे । यह एक युद्ध है,जिस पर आपको स्वयं विजय प्राप्त करना है,रो-रोकर जिंदगी खराब मत करो,अब उठ भी जाओ और सामना करो जीवन के कठिन परिस्थितियों को संभालने के लिए । अपने आपको पहेचानो,आप सभी  लोग एक दिव्य शक्ति से संग्रहित हो,चाहे वह किसी भी धर्म का हो या फिर किसी भी जाती का हो । अपने अंदरूनी शक्ति के जागरण हेतु नित्य 30-40 मिनटो तक

"ॐ ऐं ह्रीं क्लीं मम प्राण देह रोम प्रतिरोम आत्मशक्ति चैतन्य शीघ्र जाग्रय जाग्रय क्लीं ह्रीं ऐं ॐ नम:"

मंत्र का जाप किया करे । इस मंत्र के बीज अक्षर का ध्वनि "ग" होना चाहिए जैसे ह्रीं-Hreeng,यह मंत्र साधना में त्वरित सिद्धि देता है और कुंडलिनी शक्ति को जगाने में सहायक है,चाहे तो 15-20 दिनों तक जाप करके आजमाके देख लो । मंत्र जाप के समय ध्यानस्थ होना जरूरी है और शुद्धता का भी आचरण करे , मंत्र जाप एकांत में करो । आसन माला दिशा वस्त्र का कोई नियम नही है क्योंकि आप स्वयं ही इस साधना में सब कुछ हो । दिया लगाना है या धूप जलानी है तो जलाओ और नाही कर सको तो भी कोई नुकसान नही होगा । कुछ दिन मंत्र जाप करने से समझ जाओगे के शरीर किस तरह से अपने आप मे शक्तियुक्त बन रहा है,हिमालय के बर्फीले स्थान पर भी 2-3 घंटे तक इस मंत्र का प्रामाणिकता से जाप करोगे तो पसीना निकलने लगेगा । यह साधना विश्वास के साथ करो और अपने जीवन को स्वयं बदल डालो, यही है "स्वयं की शक्ति" जिसके माध्यम से आप जो चाहो वह प्राप्त कर सकते हो । इसमें कोई भी बात या शब्द आपको नही समझ मे आया हो तो अवश्य ही मुझे ईमेल के माध्यम से आप संपर्क करें, मेरा ईमेल i.d. है -snpts1984@gmail.com |





आदेश.......

30 Sept 2017

दिपावाली तांत्रोक्त मंत्र साधना


पंचदशी यंत्र



दिवाली नजदीक आरही है और सभी को दिवाली का इंतजार होता है,इंतेजार सिर्फ यही ज्यादा से ज्यादा होता है के इस पावन अवसर पर कुछ ऐसा किया जाए "जिससे एक वर्ष तक धन-धान्य की कोई कमी ना पड़े और यह आनेवाला वर्ष सुख-समृद्धि से भरपूर रहे" । शायद आज तक तो ऐसा हुआ नही होगा परंतु अब इस दिवाली में साधना करो तो ऐसा ही कुछ होगा जो आप लोगो ने सोचा है ।


आनेवाले दिवाली के अवसर पर आप पंन्ध्रिया यंत्र साधना अवश्य कर लो तो आपके जीवन के समस्त आर्थिक परेशानी से आपको राहत मिल सकती है । पिछले वर्ष 19 ऑक्टोम्बर को करवा चौथ था,उस समय महिलाओं ने अपने पति के उत्तम जीवन हेतु व्रत रखा था और इस वर्ष 19 ऑक्टोम्बर को दिवाली है,जिसमे सभी लोग आनंद लेंगे । मुझे पिछले वर्ष का बात इसलिये स्मरण रहा क्योंकि 19 ऑक्टोम्बर मेरा जन्मदिवस है और मैं चाहता हूँ के "मुझे किसीसे गिफ्ट नही लेना चाहिए परंतु सभी को ऐसा गिफ्ट देना जरूरी है,जिससे सभी का आर्थिक समस्याओं से जुड़ा जीवन अच्छा हो" । मुझे यह क्रिया नही आता है के मै आप सभी का रोग,दरिद्रता, बाधा,समस्याये अपने ऊपर ले सकू,मातारानी की कसम बोल रहा हूँ अगर मुझे यह क्रिया आता तो मैं अब तक सभी का दुख अपने ऊपर ले लेता और आपको जीवन मे कोई भी किसी भी प्रकार का दुख ना हो यही कार्य करता । इसलिए एक ऐसा साधना दे रहा हूँ,जिससे आपके जीवन मे सुधार आयेगा । यह एक प्रामाणिक साधना है जिसका लाभ मैंने स्वयं उठाया है,मुझे पूर्ण विश्वास है के दिवाली के दिन आप यह साधना करो और आपको सफलता ना मिले यह संभव नही है । आज तक सभी लोगो को सिर्फ पंन्ध्रिया यंत्र के बारे में पता था परंतु बहोत कम लोग ही इस साधना के विषय मे जानते है । जैसे पंन्ध्रिया यंत्र का विनियोग,ध्यान और मंत्र,यह तिनो गोपनीय है  इन्हें कोई भी व्यक्ति लिखना नही चाहता है,सभी का अपना-अपना एक स्वार्थ है । पंन्ध्रिया यंत्र को 9 प्रकार से लेकर 64 प्रकार तक हम बना सकते है,यहां आज एक ऐसा प्रकार लिख रहा हूँ जो 64 प्रकारों में श्रेष्ठ है ।


बहोत सारे लोग अपने इस अमूल्य जीवन मे निंदा करने में समय खराब कर देते है,तो कोई किसीको बदनाम करने में अपना 100% देता है । ऐसा कर्म करने से शायद खुशी मिलता होगा परंतु यह दोनों कर्म मनुष्य को शत्रुत्व औऱ संकट को बुलाने हेतु किया गया हुआ आवाहन होता है । आज थोड़ा बहोत कुछ ऐसा लिख रहा हूं जिससे आपको अच्छा लग सकता है या फिर तकलीफ भी हो सकती है । यही बस एक कहानी है और कुछ भी नही और इस कहानी का अध्यात्म से कोई लेना देना नही है-


         एक बार राजा के दरबार मै एक फ़कीर गाना गाने जाता है,
          फ़कीर बहुत अच्छा गाना गाता है।
          राजा कहते हैं इसे खूब सारा सोना दे दो।
          फ़कीर और अच्छा गाता है।
          राजा कहते हैं इसे हीरे जवाहरात भी दे दो।
          फकीर और अच्छा गाता है।
          राजा कहते हैं इसे असरफियाँ भी दे दो।
           फ़कीर और अच्छा गाता है।
           राजा कहते हैं इसे खूब सारी ज़मीन भी दे दो।
           फ़कीर गाना गा कर घर चला जाता है।
           और
           अपने बीबी बच्चों से कहता है,, 
           आज  हमारे राजा जी ने गाने का खूब सारा इनाम दिया।
           हीरे,जवाहरात,सोना,ज़मीन, असरफियाँ बहुत कुछ दिया।

          सब बहुत खुश होते हैं
          कुछ दिन बीते

          फ़कीर को अभी तक मिलने वाला इनाम नही पहुँचा था...
          फ़कीरे दरवार में फिर पहुँचा...
कहने लगा....
        ​"राजा जी आप के द्वारा दिया गया इनाम मुझे अभी तक नहीं मिला।"​?

        राजा कहते हैं ..,,,
           अरे फ़कीर ये लेन देन की बात क्या करता है।
          ​"तू मेरे कानो को खुश करता रहा"...​

           और

           मैं तेरे कानों को खुश करता रहा।




यह एक कहानी है,जिसे हमारे राजनेता हमे सुनाते है और हम फकीर के तरहा सुनकर खुश हो जाते है । अगले चुनाव में फिर कोई नई कहानी सुनाई जाती है,परंतु इस 5 वर्ष में हमे हमारे जिम्मेदारी को पूर्ण करना होता । यह काम सिर्फ हमे करना होता है,कोई राजनेता आकर हमारे जिम्मेदारी को पूर्ण नही कर सकता है,इसलिए आपको यह आर्टिकल पढ़ते समय यह संकल्प लेना के इस वर्ष दिवाली पर यह साधना करुगा और समस्त जिम्मेदारी को पूर्ण तरहा से नीभाऊंगा ।


हो सके तो दिवाली से पूर्व ही इस साधना का प्रिंट आउट निकालकर कुछ पहचान वाले या फिर अनजान लोगों को एखाद प्रिंट आउट दे देना क्युके ज्ञान दान से बड़ा कोई भी दान नही है और जिसे यह साधना दे रहे हो,शायद वह साधना सम्पन्न कर लेगा जिससे उसका आर्थिक परेशानी कम हो सकता है ।
इस साधना से जीवन में निरंतर उन्नति होती है और जीवन के समस्त लक्ष्य कुछ ही समय/माह/वर्षो में पूर्ण होते है । यहा समय मतलब छोटी इच्छा, माह मतलब जिसे पूर्ण होने में लगने वाला समय और वर्ष का अर्थ है के तुमने साधना करके वह मांग लिया जिसे तुम एक अपना स्वप्न समझते हो ।


आज के समय मे मेरा बहोत लोग विरोध कर रहे है क्युके मैं लोगो को ज्यादा समय नही दे सकता हूं परंतु एक दिन में 20-25 फोन रोज उठाता हूँ और यह कार्य मैं पिछले 10 वर्षों से कर रहा हूँ । मेरे तरफ से सभी क्रियाये निःशुल्क होती है सिर्फ साधना सामग्री का न्यौछावर राशि ही लेता हूँ क्युके मुझे सामग्री का खर्च भी व्यय करना होता है ताकि आपको साधना में सफलता मिल सके ।


आज तक जिन्होंने भी भी मुझसे सामग्री प्राप्त की है उनमें से 80-90 प्रतिशत लोगो को सफलता प्राप्त हुआ है । यह सब तो मातारानी जो का कृपा से हुआ है,अतः आखिर इस जीवन मे उन्होंने जो दिया वही सही है ।

यह पंन्ध्रिया यंत्र साधना जो पंचदशी यंत्र नाम से तंत्र के जगत में सर्वोत्तम मानी जाती है वही आपको दे रहा हूँ,आप चाहो तो कॉपी-पेस्ट करके जहा चाहो वहां पोस्ट कर सकते हो परंतु इसको ज्यादा-से-ज्यादा लोगो तक पहोचा दो ।





साधना सामग्री-स्फटिक माला,भोजपत्र,अनार की कलम,एक ताबीज,लाल रंग का मजबूत धागा,माँ लक्ष्मी जी का चित्र और प्रसाद जो भी आप चढ़ा सकते हो । 


(सामग्रि आपको किसी भी पंसारी के दुकान में मिल जाएगा,इसमे चिंता का कोई बात नही है । अगर आपको भोजपत्र ना मिले तो सफेद रंग का कागज आप इस्तेमाल कर सकते है और अनार का कलम ना मिले तो लाल रंग के स्याही वाले बॉलपेन से भी यँत्र बना सकते है)

साधना का समय-यह साधना आपको दिवाली के रात्रि में सिंह लग्न में करना है या फिर महानिशिता काल मे साधना संपन्न करे, इस वर्ष महानिशिता का 23.33 से 24.23 बजे का है । यह 50 मिनटों का समय आपके जीवन को बदल देगा ।


साधना के नियम-मन को शांत रखे,अपने अनुभव शेयर ना करे,साधना को करते समय बुरे विचारों को दूर रखें, जो भी मनोकामना हो उस पर ध्यान केंद्रित रहे,साधना में पवित्रता ओर शुद्धता आवश्यक है,पिले रंग का आसन ओर वस्त्र भी हों,इस दिन प्याज और लहसुन का हो सके तो सिर्फ एक दिन के लिये त्याग करें ।




साधना विधि-


अनार के कलम से और अष्टगंध के स्याही से आपको भोजपत्र पर पंचदशी यंत्र बनाना है,यहां आज यंत्र बनाने की विधि बता रहा हूँ - यंत्र लिखते समय सबसे छोटा अंक पहिले लिखे जैसे पंचदशी यंत्र में सबसे छोटा अंक 1 है तो एक लिखने के बाद यँत्र में दिए हुए स्थान के हिसाब से फिर दो लिखना है,इस तरह से पंचदशी यँत्र में 1 से लेकर 9 तक अंक लिखने है । मैं यहां पंचदशी यँत्र का फोटो भी दे रहा हूं ।
यंत्र को निर्माण करने के बाद प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र बोलकर यँत्र पर कुंकुम से रंगे हुए चावल चढ़ाये ।



प्राण प्रतिष्ठा मंत्र-


ॐ आं ह्रीँ क्रौँ यं रं लं वं शं षं सं हं सः सोऽहम् पंचदशी यंत्रस्य प्राणा इह प्राणाः।

ॐ आं ह्रीँ क्रौँ यं रं लं वं शं षं सं हं सः पंचदशी यंत्रस्य जीव इह जीव स्थितः।

ॐ आं ह्रीँ क्रौँ यं रं लं वं शं षं सं हं सः पंचदशी यंत्रस्य सर्वेंद्रियाणि इह सर्वेंद्रियाणि।
वाङ्मनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण वाक्प्राण पाद्पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा।



सिर्फ इतना ही मंत्र बोलना काफी है और अगर साधक चाहे तो यह मंत्र 15 बार बोलकर यँत्र पर चावल चढ़ा सकता है ।





दाहिने हाथ मे जल लेकर विनियोग मंत्र बोलकर जल को जमीन पर छोड़ दे ।

 विनियोग:-

अस्य श्री पंचदशी मंत्रस्य दक्षिणा मूर्ति ऋषि: पंक्ति: छन्दा: त्रिपुरा देवतामम्हं जन्मानि कामना सिद्धये एतावत्संख्याकयंत्र पूजनपूर्वक जपे विनियोग : ।।


अब दोनो हाथ जोडकर ध्यान मंत्र बोलना है ओर एक पुष्प यंत्र पर रख दे।

 ध्यान मंत्र:-

बालार्कायुंत तेजसं त्रिनयना रक्ताम्ब रोल्लासिनों।
नानालंक ति राजमानवपुशं बोलडुराट शेखराम्।।
हस्तैरिक्षुधनु: सृणिं सुमशरं पाशं मुदा विभृती।
श्रीचक्र स्थित सुंदरीं त्रिजगता माधारभूता स्मरेत्।।




यह पंचदशी मंत्र है,इसका कम से कम 11 माला जाप करे ।

पंचदशी मंत्र

।। ॐ श्रीं ऐं ह्रीं पंचदश्यै स्वाहा ।।

Om shreem aim hreem panchdashyai swaha 



दूसरे दिन सुबह स्नान के बाद यँत्र को ताबीज में डालकर पहन लीजिए और हो सके तो यँत्र धारण करने के बाद भी मंत्र का एक माला जाप कार्तिक पौर्णिमा तक अवश्य करे । माला को संभाल कर रखे ताकि अन्य साधनाओ में उसका इस्तेमाल हो सके ।


आप सभी को दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं.....



आदेश.......


11 Sept 2017

शाबर दुर्गा मंत्र साधना ।



बहोत सारे ज्ञानी-महाज्ञानी कहेते है सकारात्मक सोचो,मुझे एक बात कहनी है के सकारात्मक सोच तो ठीक है परंतु क्या सिर्फ सकारात्मक सोच रखने से ही जीवन बदल जायेगा ? मैं इतना ही कहूंगा के स्वयं पर विश्वास रखो और फिर सकारात्मक सोचो तो जो कार्य अब तक आप जीवन मे नही कर सके हो वह 100% कर सकते हो । अब नवरात्रि आरही है और सभी मातारानी के भक्त उनके सेवा में समर्पित हो रहे है,यहां बुरा मत मानना क्योंकी एक सवाल पूछना है आप लोगो से "क्या आप मातारानी को जानते हो या फिर मातारानी आपको जानती है?",एक बात तो मैं मानता हूँ के "जिस माँ ने आपको जन्म दिया है वो आपको अच्छेसे जानती है फिर चाहे आप शायद उन्हें अच्छेसे जानते हो या नही ये मुझे नही पता" ।
नवरात्रि में तो मातारानी के प्रति जो भक्ति दिखाते हो कृपया वैसे ही कुछ भक्ति जन्म देने वाली माँ के प्रति भी रखो ताकि जीवन मे मातारानी का आशीर्वाद आपको मिल सके ।

माँ के बिना तो स्वयं तीनो लोको के स्वामी भी किसी काम के नही और वह स्वयं कहेते है अगर माँ आदिमाया की शक्ति की कृपा हमे प्राप्त ना होती तो हम भी सामान्य होते । इसलिए आप सभी महान अद्वितीय साधक मित्रो से मेरा निवेदन है "जिस माँ ने जन्म दिया है उनकी ही ज्यादा सेवा करो",स्वयं माँ जगदंबा बिना आवाहन किये आपके सामने प्रत्यक्ष हो जाएगी । ये मेरा वहम नही है मित्रो,यह मुझे पूर्ण विश्वास है और कृपया जिन व्यक्तियों ने अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया है उन सभीके मैं पैर पकडर उनसे विनती करता हूँ के "उन्हें अपने घर पर वापिस लाओ और उनकी सेवा करो" । माता-पिता जब वृध्द हो जाते है तो वह बोझ नही बनते है,वह तो हमे स्ययं की सेवा के माध्यम से ऋण उतारने का मौका देते है और उनका ऋण इस जन्म में हम नही उतार पाते है ।

माँ शब्द ही अपने आप मे सभी पापो से पीड़ाओं से मुक्ति दिला सकता है,इस संसार के सभी ऋषि-मुनियों से मैं इस बात पर द्वंद भी करना चाहूंगा के "माँ" इस पवित्र शब्द से बड़ा ना कोई मंत्र है और ना कोई सिद्धि है । सिर्फ माँ कहेने से नही होगा,हमे उस माता को भी समझना पड़ेगा जिसे हम माँ कहेते है,यार नवरात्रिया तो आते-जाते रहेगी परंतु जिन्होंने जन्म दिया है वो तो बस इस जन्म में एक ही बार अपने स्वयं के आखरी साँस तक साथ रहेगी । माँ की सेवा करो तो मातारानी बिना किसी भी प्रकार के सेवा से प्रसन्न हो जाएगी । आप नवरात्रि में वैसे भी मातारानी से क्या मांगेंगे धन-धान्य-ऐश्वर्य-पत्नी-प्रियसी-रोगमुक्ति या ओर भी कुछ जो सिर्फ आपका स्वार्थ ही होगा परंतू इस बार कुछ विशेष मांगो "है माँ भगवती मेरे प्रिय माता-पिता को स्वस्थ जीवन,चिन्तामुक्ति,सुख और मेरे हाथो उनकी सेवा प्रदान करो,मैं सदैव आपका ऋणी बनकर रहुगा" ।

यह मातारानी से की जाने वाली प्रार्थना ही आपके जीवन को बदल सकती है,येसा ही मुझे पूर्ण विश्वास है । इसी प्रार्थना के साथ आज आपको एक विशेष मंत्र भी दे रहा हूँ जो अत्यंत गोपनीय है परंतु आज इस मंत्र के गोपनीय रखना मुझे उचित नही लग रहा है । मेरे तो कई सारे शत्रु है जो सिर्फ मेरे पिट-पीछे बात करते है,उनमे शायद इतनी हिम्मत नही है के वह मेरे सामने आकर मुझसे बात करे । आजकल मेरे प्रिय शत्रुओ ने कई सारे ग्रुप बनाए हुये है जहां मेरी स्तुति चलती रहती है और स्तुति में बुराई ही होती है ओर तो नया कुछ होता नही है ।

मैने अपने प्राण-प्रिय मूर्ख शत्रुओ का ज़िक्र आज इसलिये किया क्युके उन्हें लगता है के मैं स्वयं मंत्र बनाता हूँ और अपने ब्लॉग पर पोस्ट करता हूँ । मेरे आठ गुरु है,जिसमे सात गुरु नाथ साम्प्रदायिक है और उन्हें शाबर मंत्रों के उच्चकोटि के ज्ञान से सिद्धिया प्राप्त है । उनके पास जो भी कुछ मंत्रविद्या है वह तो गोपनीय ही है,उनसे प्राप्त मंत्र दुनिया के किसी भी किताब में देखने मिलते नही है । उन्होने ने कठिन तपस्या के माध्यम से मंत्रो को शक्तिशाली बनाए रखा है और मेरे जैसे कई शिष्यों को थोड़े बहोत संख्या में जाप करने के माध्यम से सफलता दिलवायी है । अब मेरे शत्रुओं को यही समस्या है के जो शाबर मंत्र मैं देता हूँ वह किताबो में क्यों नही मिलते है?,मेरे विद्वान शत्रुओ तुम लोग कब तक किताबी कीड़े बनकर इस धरा पर रेंगते रहोगे,मैं तो चाहता हूँ के इस नवरात्रि के पावन अवसर पर संकल्प लो के "हमे मंत्रविद्या का उच्चकोटि का ज्ञान मिले और हम जीवन मे कुछ प्रैक्टिकल भी कर सके",यार तुम लोग कब तक किताबें पढ़ते रहोगे? । कुछ तो प्रैक्टिकल करना भी सिख लो और मातारानी से प्रार्थना करो के तुम्हारे अंदर का अज्ञान समाप्त हो जाये ।






मंत्र-


ॐ नमो आदेश गुरु को,दुर्गा माई सत्य की सवाई,आगे चले हनुमंत बीर पीछे चले भैरुनाथ,अष्टभुजी अम्बारानी शत्रु आवे त्रिशूल चलाये,रोग आये सुदर्शन चलाये,बाधा आये तलवार चलाये,जादू आये बाण चलाये,बालक पर कृपा बनाये,इतना मंत्र चौरासी लाख सिद्धो को गोरख ने सुनाया,मेरी भक्ति गुरु की शक्ति,फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा ।।






(नवरात्रि से पूर्व इस मंत्र का साधना विधान पोस्ट कर दिया जायेगा,तब तक आप यह अद्वितीय शाबर मंत्र याद करके रखे क्युके प्रत्येक शाबर मंत्र बिना कंठस्थ किये सफलता नही दे सकता है)


आदेश..........