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26 May 2016

साधना सामग्री हेतु.

यह एक महत्वपूर्ण बात है,जो सभी प्रिय साधको के लिये आवश्यक है। जिस साधक को किसी भी प्रकार का साधना सामग्री हमसे प्राप्त करना हो तो ईमेल भेजते समय अपना कोई भी एक फोटो आई.डी. भी भेजीये । अगर किसी समस्या का समाधान भी प्राप्त करना हो तो फोटो आई.डी. भेजना अनिवार्य है। फोटो आई.डी. मे आप आधार कार्ड,voting id card, driving license or pan card भी भेज सकते है ।
यह सब करना पड रहा क्युके कुछ लोग अलग-अलग नाम से हमसे प्रामाणिक साधना सामग्री प्राप्त करते है और ज्यादा धनराशि लेकर किसी दुसरे व्यक्ति को बेचते है। जैसे मुझे एक आदमी से पता चला उसने किसीसे बिर कंगन 20,000/-रुपये मे खरिदा और जब उसने हमारे साईट पर पढा तो वह हैरान होकर मुझसे पुछता है के आप 6100/- रुपये मे बिर कंगन कैसे दे रहे है ? जब मैने उससे उससे पुछा आप येसा क्यु पुछ रहे हो तो उसने मुझे बताया उसने किसी धिरज ******* नाम के व्यक्ति से 20 हजार रुपये मे खरिदा,जब मैने अपने रेकार्ड मे देखा तो मुझे भी पता चला "अब तक धिरज ******* ने मुझसे 3 बिर कंगन प्राप्त किये है।

ये सब हो गया तब मुझे येसा लगा के अब तो बहोत कुछ गड़बड़ हो चुका है क्युके कुछ लोग मुझसे प्रत्येक महिने मे बहोत सारा सामग्री मंगवाते है। परंतु अब आगेसे येसा नही होगा,हम लोगो को सामग्री बनवाने मे बहोत श्रम करना पड़ता है। येसे ही सब कुछ हवा मे निर्मित नही होता है,एक तो हमारे पास समय कम होता है और साधना करने वाले साधको का साधनाओं मे रुचि बढते जा रहा है। इसलिये आगेसे आप जब भी ईमेल से कुछ भी पुछना चाहो या साधना सामग्री प्राप्त करना चाहो तो अब आपको अपना आई.डी. कार्ड (I.D.card) भेजना जरुरी है। आई.डी. कार्ड ना भेजने वालो को किसी भी प्रकार का रिप्लाइ नहि दिया जायेंगा ।

हमारे तरह से आप सभी को ढेर सारा प्यार.....


आदेश.......

9 Feb 2016

ये टोटके चमत्कारिक है।

छोटी छोटी बाते है,जिनके बारे मे बहोत कम लोग जानते है। इस लेख को पढ़ने से आपको कुछ परेशानियों से राहत मिलना सम्भव है।



रविवार के दिन तेल मर्दन करने से ज्वर होता है-(मुहूर्तगणपति)
रविवार के दिन बाल (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से धन, बुद्धि और धर्म की हानि होती है।
-(महाभारत अनुशासनपर्व)



सोमवार के दिन तेल मर्दन करने से कान्ति बढ़ती है-(मुहूर्तगणपति)
सोमवार के दिन बाल (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से शिव भक्ति की हानि होती है। पुत्रवान पिता को तो कदापि नहीं करना चाहिये।-(महाभारत अनुशासनपर्व)



मंगलवार के दिन तेल मर्दन करने से आयु घटती है-(मुहूर्तगणपति)
मंगलवार के दिन बाल या दाढी (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से आयु घटती है।-(महाभारत अनुशासनपर्व)



बुधवार के दिन तेल मर्दन करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है-(मुहूर्तगणपति)
बुधवार के दिन बाल या दाढी (क्षौरकर्म ) अथवा नख काटने या कटवाने से धन समृद्धि बढ़ती है।-(महाभारत अनुशासनपर्व)



गुरुवार के दिन बाल या दाढी (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से लक्ष्मी और मान की हानि होती है-(महाभारत अनुशासनपर्व)
गुरूवार के दिन साबुन अथवा शैम्पू का प्रयोग न करें । धोबी को वस्त्र न दें।



शुक्रवार के दिन तेल मर्दन करने से बिघ्न बाधायें आती हैं-(मुहूर्तगणपति)
शुक्रवार के दिन बाल या दाढी (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से लाभ और यश की प्राप्ति होती है-(महाभारत अनुशासनपर्व)



शनिवार के दिन तेल मर्दन करने से सुख की प्राप्ति होती है-(मुहूर्तगणपति)
शनिवार के दिन बाल (क्षौरकर्म ) काटने या कटवाने से आयु घटती है।-(महाभारत अनुशासनपर्व)


इन नियमो को आजमाने से आपको अवश्य ही लाभ प्राप्त होगा।





आदेश.

23 Dec 2015

शिव शाबर मंत्र सिद्धि,भाग-1.

भोलेशंकर राम नाम के रसिक हैं। शमशान घाट एवं वहां जलने वाले मुर्दे की भस्म को शरीर में धारण करने वाले भोलेशंकर पूर्ण निर्विकारी हैं। उन्हें विकारी मनुष्य पसंद नहीं हैं। जब मनुष्य की मौत हो जाती है और मुर्दे को जलाया जाता है तब जलने के बाद मुर्दे की भस्म में किसी भी प्रकार का विकार नहीं रहता। मनुष्य के सारे अहंकार तन के साथ जलकर भस्म हो जाते हैं। तब भोलेनाथ उस निर्विकारी भस्म को अपने तन में लगाते हैं।

भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए भक्त जल और बेलपत्र से शिव जी का अभिषेक करते हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण है जिसका उल्लेख पुराणों में किया गया है। शिव पुराण में उल्लेख मिलता है कि सागर मंथन के समय जब हालाहल नाम का विष निकलने लग तब विष के प्रभाव से सभी देवता एवं जीव-जंतु व्याकुल होने लगे। ऐसे समय में भगवान शिव ने विष को अपनी अंजुली में लेकर पी लिया। विष के प्रभाव से स्वयं को बचाने के लिए शिव जी ने इसे अपनी कंठ में रख लिया इससे शिव जी का कंठ नीला पड़ गया और शिव जी नीलकंठ कहलाने लगे। लेकिन विष के प्रभाव से शिव जी का मस्तिष्क गर्म हो गया। ऐसे समय में देवताओं ने शिव जी के मस्तिष्क पर जल उड़लेना शुरू किया जिससे मस्तिष्क की गर्मी कम हुई। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंढ़ी होती है इसलिए शिव जी को बेलपत्र भी चढ़ाया गया। इसी समय से शिव जी की पूजा जल और बेलपत्र से शुरू हो गयी। बेलपत्र और जल से शिव जी का मस्तिष्क शीतल रहता और उन्हें शांति मिलती है। इसलिए बेलपत्र और जल से पूजा करने वाले पर शिव जी प्रसन्न होते हैं।

शिव शक्ति रहस्य राज शिवम शिव शक्ति जब कृपा करते हैं, जीव सभी पाशों से मुक्त होकर सभी धर्मों, सभी रहस्यों को देख व समझ लेता है। कहीं विरोध नहीं, किसी का अपमान नहीं, कोई धर्म छोटा नहीं, सभी देव-देवी पूजनीय हैं। शिव इस सृष्टि का परम सत्य हैं, और शिव सुंदर हैं। उनकी आराध्य त्रिपुर सुंदरी ही माता भुवनेश्वरी हैं। शिव ‘मृत्युंजय’ हैं, तो शक्ति काली, बगला, तारा, भुवनेश्वरी हैं। निराकार ब्रह्म जब साकार रूप धारण करता है, जब वह महाशून्य से प्रकट होकर सगुण रूप धारण करता है, तो शिव कहलाता है और उसकी शक्ति मां भगवती ही मूल आदि शक्ति के नाम से विख्यात है। जीव कई पाशों में बंधा है, वह आत्मदर्शन की चाह रखता है, आत्मा-परमात्मा के दर्शन की चाह रखता है, शिव और शक्ति साकार रूप धारण कर जीव का कल्याण करते हैं, उसकी अभिलाषा पूरी करते हैं।

शिव और शक्ति का संबंध

शक्ति शिव की अभिभाज्य अंग हैं। शिव नर के द्योतक हैं तो शक्ति नारी की। वे एक दुसरे के पुरक हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं।

शिव कारण हैं; शक्ति कारक।
शिव संकल्प करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी।
शक्ति जागृत अवस्था हैं; शिव सुशुप्तावस्था।
शक्ति मस्तिष्क हैं; शिव हृदय।
शिव ब्रह्मा हैं; शक्ति सरस्वती।
शिव विष्णु हैं; शक्त्ति लक्ष्मी।
शिव महादेव हैं; शक्ति पार्वती।
शिव रुद्र हैं; शक्ति महाकाली।

शिव सागर के जल के सामान हैं तथा शक्ति लहरे के सामान हैं। लहर है जल का वेग। जल के बिना लहर का क्या अस्तित्व है? और वेग बिना सागर अथवा उसके जल का? यही है शिव एवं उनकी शक्ति का संबंध।



शिव ही सर्वस्य :

शिव आदि देव है। वे महादेव हैं, सभी देवों में सर्वोच्च और महानतमें शिव को ऋग्वेद में रुद्र कहा गया है। पुराणों में उन्हें महादेव के रूप में स्वीकार किया गया है। श्वेता श्वतरोपनिषद् के अनुसार ‘सृष्टि के आदिकाल में जब सर्वत्र अंधकार ही अंधकार था। न दिन न रात्रि, न सत् न असत् तब केवल निर्विकार शिव (रुद्र) ही थे।’ शिव पुराण में इसी तथ्य को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है -

‘एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयोऽस्नि कश्चन’ सृष्टि के आरम्भ में एक ही रुद्र देव विद्यमान रहते हैं, दूसरा कोई नहीं होता। वे ही इस जगत की सृष्टि करते हैं, इसकी रक्षा करते हैं और अंत में इसका संहार करते हैं। ‘रु’ का अर्थ है-दुःख तथा ‘द्र’ का अर्थ है-द्रवित करना या हटाना अर्थात् दुःख को हरने (हटाने) वाला। शिव की सत्ता सर्वव्यापी है। प्रत्येक व्यक्ति में आत्म-रूप में शिव का निवास है-

‘अहं शिवः शिवश्चार्य, त्वं चापि शिव एव हि।
सर्व शिवमयं ब्रह्म, शिवात्परं न किञचन।।

में शिव, तू शिव सब कुछ शिव मय है। शिव से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए कहा गया है- ‘शिवोदाता, शिवोभोक्ता शिवं सर्वमिदं जगत्।

शिव ही दाता हैं, शिव ही भोक्ता हैं। जो दिखाई पड़ रहा है यह सब शिव ही है। शिव का अर्थ है-जिसे सब चाहते हैं। सब चाहते हैं अखण्ड आनंद को। शिव का अर्थ है आनंद। शिव का अर्थ है-परम मेंगल, परम कल्याण।
सामान्यतः ब्रहमा को सृष्टि का रचयिता, विष्णु को पालक और शिव को संहारक माना जाता है। परन्तु मूलतः शक्ति तो एक ही है, जो तीन अलग-अलग रूपों में अलग-अलग कार्य करती है। वह मूल शक्ति शिव ही हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है-ब्रह्मा, विष्णु, शंकर (त्रिमूर्ति) की उत्पत्ति माहेश्वर अंश से ही होती है। मूल रूप में शिव ही कर्त्ता, भर्ता तथा हर्ता हैं। सृष्टि का आदि कारण शिव है। शिव ही ब्रह्म हैं। ब्रहम की परिभाषा है - ये भूत जिससे पैदा होते हैं, जन्म पाकर जिसके कारण जीवित रहते हैं और नाश होते हुए जिसमें प्रविष्ट हो जाते हैं, वही ब्रह्म है। यह परिभाषा शिव की परिभाषा है। ध्यान रहे जिसे हम शंकर कहते हैं - वह एक देवयोनि है जैसे ब्रहमा एवं विष्णु हैं। उसी प्रकार। शंकर शिव के ही अंश हैं। पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि के परिवार वाले देवता का नाम शंकर है। शिव आदि तत्त्व है, वह ब्रह्म है, वह अखण्ड, अभेद्य, अच्छेद्य, निराकार, निर्गुण तत्त्व है। वह अपरिभाषेय है, वह नेति-नेति है।
शिव की स्वतंत्र निजी शक्ति के दो शाश्वत रूप उसकी प्रापंचिक अभिव्यक्ति में प्रतीत होते हैं, जिन्हें विद्या तथा अविद्या कह सकते हैं। इस प्रापंचिक ब्रहमाण्ड व्यवस्था में परमात्मा के पारमार्थिक आनंदमय स्वरूप को प्रकट करने वाली शक्ति विद्या कहलाती है तथा परमात्मा की प्रापंचिक विभिन्ननाओं के आवरण से अवगुंठित शक्ति अविद्या कहलाती है। परमात्मा की अभिन्न शक्ति के ही दोनों रूप हैं। नाना आकारों में उसकी ही अभिव्यक्ति है। यह अभिव्यक्ति उसकी शक्ति का विलास है, लीला है। यह ब्रह्माण्ड परमात्मा की निजी शक्ति का व्यावहारिक पक्ष है। पारमार्थिक पक्ष में परमात्मा पूर्णतया एक है-एकं द्वितीयो नास्ति।’ उसके चरम सत् और चित् में कोई भेद नहीं, उसके स्वभाव में कोई द्वैत एवं सापेक्षिता नहीं। यहां वह चरम अनुभव की अवस्था में है जिसमें स्वनिर्मित ज्ञाता-ज्ञेय का कोई भेद नहीं है। परमात्मा का यह स्वरूप प्रकाश स्वरूप है।

परमात्मा की शक्ति का विमर्श पक्ष उसे व्यावहारिक स्तर पर आत्म-चेतन बना देता है। अतः विमर्श-शक्ति शिव की आत्म चेतनता पर आत्मोद्घाटन की शक्ति मानी जाती है। यहां परमात्मा ज्ञाता ज्ञेय के रूप में अपने आपको विभाजित कर लेता है। परमात्मा की यह वस्तुगत आत्म-चेतना है जो विभिन्न स्तरों के भोक्ता या भोग्य पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होती है। काल, दिक्, कारणत्व एवं सापेक्षिकता चारों परमात्मा के वस्तुगत रूप हैं। परमात्मा की विमर्श शक्ति को माया शक्ति भी कहा जाता है।

इसी तथ्य को गोरख ने ‘सिद्ध सिद्धान्त-पद्धति’ में इस प्रकार वर्णित किया है- ‘शिवस्याभ्यन्तरे शक्तिः शक्तेरभ्यन्तरेशिवः।’ शक्ति शिव में निहित है शिव शक्ति में निहित हैं। चन्द्र और चन्द्रिका के समान दोनों अभिन्न हैं। शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का शरीर। शिव को शक्ति का पारमार्थिक रूप कहा जा सकता है और शक्ति को शिव का प्रापंचिक रूप। शिव से भिन्न और स्वतंत्र शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है और शक्ति की अवहेलना की जाए तो शिव का आत्म प्रकाशन संभव नहीं है। शक्ति के कारण ही शिव स्वयं सर्व शक्ति मान, सर्वज्ञानी, सर्वानंद, सगुण परमेंश्वर, जगत का सर्जक, पालक और भोक्ता बन जाता है। निज शक्ति से रहित शिव कोई भी कार्य नहीं कर सकते, किन्तु निज शक्ति सहित वे समस्त स्तरों के अस्तित्वों के सर्जक एवं प्रकाशक बन जाते हैं। शिव एक साथ स्रष्टा एवं सृष्टि आधार और आधेय आत्मा और शरीर हैं। शक्ति एक को अनेक करती है और पुनः अनेक को एक में मिला देती है। शिव का विस्तार सृष्टि है, शिव का संकुचन प्रलय है। अतः शिव के निर्गुण एवं सगुण दोनों ही स्वरूप स्वीकार्य हैं।

जो सृष्टि में है वही पिण्ड में है। ‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे।’ समस्त शरीरों का अन्तिम आधार एक परम आध्यात्मिक शक्ति है जो अपने मूल रूप में अद्वैत परमात्मा शिव से अभिन्न एवं तद्रूप है। समस्त शरीर एक स्वतः विकासमान दिव्य शक्ति की आत्माभिव्यक्ति है। वह शक्ति अद्वैत शिव से अभिन्न है। वही आत्म चैतन्य आत्मानंद, अद्वैत परमात्मा अपने आत्म रूप में स्थित होती है तब शिव कहलाती है और जब सक्रिय होकर अपने को ब्रहमाण्ड रूप में परिणत कर लेती है, तथा दिक्, काल सीमित असंख्य पिण्डों की रचना, विकास तथा संहार में प्रवृत्त होती है, तथा अपने को अनेक रूपों में व्यक्त करती है, तब शक्ति कहलाती है। यह शक्ति पिण्ड में कुण्डलिनी के रूप में स्थित है। यही शक्ति महाकुण्डलिनी के रूप में ब्रह्माण्ड में स्थित है। इस प्रकार परमात्मा, जो परमेंश्वर हैं और स्वयं को व्यष्टि-शरीरों में विश्व रूप से प्रगट करते हैं, प्रत्येक सीमित व्यष्टि शरीर में या घट-घट में चित् स्वरूप में विराजते हैं। आकार की सीमाओं के कारण ही आत्मा, जीवआत्मा का रूप धारण कर दुःख-सुख व संताप भोगती है।

शिव-पूजा के रूप में हम शिव-लिंग की पूजा करते हैं। इसका क्या रहस्य है? शिव पुराण, लिंग पुराण एवं स्कंद पुराण में लिंगोत्पत्ति का विस्तार से वर्णन है- स्कंद पुराण में कथा है-वर्तमान श्वेत वाराहकल्प से जब देवताओं की सृष्टि समाप्त हो गई। युग के अंत में स्थावर जंगम सब सूख गए। पशु-पक्षी, मनुष्य, राक्षस, गंधर्व सब सूर्य के ताप से जल गए। सारी सृष्टि जल मग्न हो गई। सब दिशाओं में अंधेरा छा गया। ऐसे समय में ब्रह्माजी ने भगवान विराट को नारायण रूप से क्षीर सागर में शयन करते देखा। ब्रह्माजी ने नारायण को जगाया। भगवान नारायण ने ब्रह्माजी को बेटा कह कर पुकारा। ब्रह्माजी ने क्रोधित होकर पूछा-तुम हौन हो? मुझे बेटा कहने वाले ? में तो पितामह हूँ। भगवान विष्णु ने समझाया कि हमीं सृष्टि के कर्ताधर्ता हैं तुम्हें तो मेंने ही सृष्ट किया है। इस पर दोनों में वर्षों-वर्षों तक विवाद होता रहा, युद्ध होता रहा। इसी समय उनके सामने प्रचण्ड अग्नि का एक महा स्तंभ प्रकट हुआ जो ऊपर-नीचे अनादि और आनन्त था। दोनों ने इसे ही झगड़े का निर्णायक समझा। दोनों ने निर्णय किया-ब्रह्मा स्तंभ के ऊपरी हिस्से का पता लगाएं तथा विष्णु नीचे के भाग का। ब्रह्मा ने हंस का रूप धारण किया तथा विष्णु ने बाराह का रूप धारण किया। दोनों ने हजार वर्ष तक उस ज्योति-स्तंभ का अंत पा लेने की चेष्टा की, पर पार नहीं पा सके। अन्त में हार कर उस ज्योतिर्लिंग की दोनों ने प्रार्थना की, पूजा की। भगवान शिव प्रकट हुए तथा उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र तीनों की उत्पत्ति महेश्वर के अंश से ही होती है। तीनों अभेद हैं, तीनों समान हैं। इस कथा-रूपक के कुछ तथ्य उभरे हैं:-

1. सृष्टि का अनादि तत्व शिव है। यही कारण है-सृष्टि, स्थिति एवं प्रलय का।

2. उस शिव का स्वरूप ज्योतिर्लिंग के रूप में है। इस ज्योतिर्लिंग में ही सब कुछ समाहित है।

3. लिंग की जलहरी ब्रह्माण्ड का स्वरूप है।

4. यह ब्रह्माण्ड शिव का ही साकार स्वरूप है। उसकी निज शक्ति अर्थात् माया का ही पसारा है। शिव एवं शिवा अर्थात् ब्रह्म एवम् उसकी निज शक्ति (प्रकृति) दोनों तदाकार हैं। इसीलिए शिव का एक नाम अर्द्धनारीश्वर भी है।

5. शिव का स्वरूप निराकार एवं साकार दोनों हैं।


6. लिंग का जैसा स्वरूप ब्रह्माण्ड में है वैसा ही स्वरूप पिड में भी है। हमारा यह पूरा शरीर असंख्य लिंगों एवं योनियों के समायोग से निर्मित है।

सारांश यही है - शिव ही र्स्वस्व हैं। ऐसे शिव को छोड़कर हम किसकी पूजा करें ?
कामना है - हम सब इसी शिव में ही रमण करें। इसका ही ध्यान करें और अंत में इसी में ही लय हो जाएं।


आगे के आर्टीकल मे आपको "शिव शाबर मंत्र" प्रदान कर रहा हूँ।जो अत्यंत गोपनीय है और आपको प्रदान करना यह मै शिवप्रसाद समझता हू जो आपके जिवन को बदल देगा।





आदेश.....

6 Dec 2015

महावशीकरण क्रियाये.

m.jagran.compunjabbhatinda-9180140.html




इस लिंक को आप देखिये और पढिये तो आपकी आंखे भी खुल जायेगी,फिर भी मै यहा पर लिंक मे दिया हुआ पुरा आर्टीकल यहा दे रहा हु ताकी आप किसी ठग या पाखंडी के चक्कर मे ना फसे.कुछ लोग फाल्तु के बाबाजी के चक्करो मे आकर फस जाते है जिनके वजेसे मंत्र-तंत्र का प्राचीन क्षेत्र बदनाम होता है।




मित्रो यह पोस्ट मैने "दैनिक जागरण"पर पढा था जिसको यहा आपके हितार्थ दे रहा हु-

तंत्र-मंत्र के नाम पर लूटने वाले तांत्रिकों के सब्जबाग रूपी दावे इतने 'हसीन' होते हैं कि न चाहते हुए भी परेशान शख्स इनके झांसे में आ जाता है। खासकर अगर पत्नी से तंग पति हो तो फिर क्या कहने, तांत्रिकों की तो जैसे 'लॉटरी' ही लग जाती है। ऐसे पति को महावशीकरण व काले जादू के फेर में ऐसे फांसा जाता है कि वह पत्नी को वश में कर क्लेश मिटाने के चक्कर में इस कदर लुटता है कि बाद में घर की बची-खुची शांति भी चली जाती है। यानी जिस क्लेश को खत्म करने गया था, वही उसका दिन का सुकून व रातों की नींद उड़ाकर रख देता है। कुछ इसी तरह 'पत्नी पीड़ित' बनकर 'दैनिक जागरण' के संवाददाता मनीष शर्मा और सतिंदर कुमार सौ फुटी रोड पर तंत्र-मंत्र के नाम पर लूट का अड्डा खोले बैठे ढोंगी तांत्रिक के पास पहुंचे। यहां 20 मिनट की बातचीत में तांत्रिक ने कैसे-कैसे दावे किए और क्या सब्जबाग दिखाए, आप भी पढि़ए.....
यहां पहुंचने पर रिसेप्शन पर एक युवती व युवक बैठे मिले। हमें देख उन्होंने कारण पूछा तो हमने पति-पत्नी अनबन बताया। 'पत्नी पीड़ित' देख वह मुस्कराए और बाबा से मिलने की फीस के एवज में हमसे 151 रुपये ले लिए। पर्ची दी और फिर थोड़ी देर में अंदर बैठे तांत्रिक के पास भेज दिया।

अंदर फिर कमोबेश पुराने वाला माहौल ही मिला। घुप्प अंधेरा, साइड में जलता लैंप, दीवारों पर टंगी तस्वीरें और थोड़ी ऊंची गद्दी पर बैठा तांत्रिक, जिसका चेहरा हलका ही नजर आ रहा था।

तां-क्या समस्या है?

जा.- पत्नी से अनबन, घर में क्लेश, सुख-शांति सब गायब।

तां-(मुस्कराते हुए) अच्छा, क्या बात है, जरा खुलकर बताओ।

जा-(बेचारगी दिखाते हुए), बाबाजी 3 वर्ष हो गए शादी को, पत्नी से हर समय झगड़ा रहता है। हर वक्त मायके की धमकी और फिर तुरंत मायके भाग जाती है।

तां- न बात मानती है न सुनती है?

जा-जी, बिल्कुल, बड़ा परेशान हूं, जिंदगी नर्क बन गई है। पता नहीं किस बुरे मुहुर्त में मैंने विवाह रचाया।

तां-(परेशानी को देख आसानी से फंसने की आस में) चिंता मत करो, अब मेरे पास आ गए तो दुख भरे दिन खत्म हो जाएंगे।

जा-लेकिन यह सब क्यों हो रहा है और कैसे खत्म होगा?

तां-(थोड़ी देर आंख बंद कर सोचने का ढोंग करने के बाद तुरंत चिर-परिचित पाशा फेंकते हुए) देखो, तुम्हारी पत्नी का किसी के साथ चक्कर है, यही बड़ी समस्या है।

जा-(चौंकने का नाटक करते हुए) चक्कर..! लेकिन कहां?, किसके साथ?, कब से?

तां-(भावनात्मक दिलासा देने का ढोंग करते हुए) मायके में किसी के साथ चक्कर है, इसलिए टिकती नहीं है। वहीं से कुछ जादू-टोना किया गया है उस पर, अगर अभी हल न हुआ तो फिर कभी नहीं होगा।

जा- कैसे ठीक होगा यह सब?

तां-इसके लिए बड़ी पूजा करनी होगी, रात को।
जा- कौन सी पूजा?

तां-महावशीकरण करना पड़ेगा, तभी आएगी पत्नी तुम्हारे वश में, तुम्हारे इशारे पर नाचेगी।

जा-(खुश होने का नाटक करते हुए) अच्छा, फिर पत्नी मेरे वश में होगी, यह तो हर शादीशुदा पुरुष की ख्वाहिश होती है।

तां-(जाल में फंसते देख) हां, यह सब संभव है महावशीकरण पूजा से। बस थोड़ा खर्चा आएगा।

जा- कितना?

तां- रात की पूजा है, काम थोड़ा लंबा है इसलिए 31 हजार रुपये लगेंगे, सब पूजा के सामान के, मेरी कोई फीस नहीं।

जा-पर..पत्नी तो मायके में है, उसे भी पूजा में लाना होगा?

तां- नहीं, इसकी जरूरत नहीं, फोटो से काम चला लेंगे और फिर पूजा के बाद उसके ऊपर काले जिन्न की छाया छोड़नी होगी।

जा- लेकिन यह कैसे होगा?

तां-वो सब मैं कर लूंगा, तु

म पूजा की राशि का बंदोबस्त करो।

जा-इलाज पक्का होना चाहिए और जल्दी।

तां- पूरी गारंटी है काम की, वैसे तो मैं 75 घंटे में काम होने का दावा करता हूं लेकिन तुम्हारा काम 7 दिन में हो जाएगा।

फिर हम जानबूझकर टालमटोल करने लगे तो तांत्रिक से फिर थोड़ी बातचीत हुई।

जा- (संकोच करने का नाटक करते हुए) मैं पहली बार ऐसा करवा रहा हूं, लोग कहते हैं कि...यह सब..सही नहीं..

तां-(बीच में टोकते हुए ) देखो, बठिंडा में कई फर्जी तांत्रिक बैठे हैं, मैं बिल्कुल सही हूं, मेरे पास रूहानी शक्तियां हैं, (हमें विश्वास में लेने की कोशिश करते हुए) कुछ समय पहले मेहना चौक पर एक तांत्रिक ने गलत हरकत की थी, लेकिन मैं वैसा नहीं।


जा-ठीक है पर..

तां-(यह समझते हुए कि हम उस पर विश्वास नहीं कर रहे) शक व यकीं पर ही दुनिया चलती है।

खैर तांत्रिक की इतनी 'कांउसलिंग' के बाद हमने भी उसके झांसे में आने का नाटक किया। फिर हमने पत्नी के प्रेमी की बात छेड़ दी..

जा- पत्नी के प्रेमी का भी तो कुछ करो

तां-हां, वो मैं कर दूंगा

जा- लेकिन क्या? वह तो तंग करेगा और अगर बठिंडा आ गया तो बदनामी अलग से..

तां- हो तो जाएगा लेकिन थोड़ा खर्चा उसका भी आएगा।

जा- खर्चा दे देंगे, बदनामी से तो यही अच्छा है

तां- ठीक है, 11 हजार की एक पूजा कर उसे ठिकाने लगा दूंगा।

जा- ठिकाने मतलब, हम पर न कोई बात आए।

तां- चिंता मत करो, वह तुम्हारी पत्नी के पास फटकेगा भी नहीं, ऐसा इलाज कर दूंगा, बाकी ज्यादा पूछताछ मत करो, बस पूजा करवाने की तैयारी शुरू कर दो।


पति-पत्नी की अनबन का यह पूरा मामला फर्जी था। तांत्रिक ने कोरी कल्पना पर आधारित इस कहानी में एकदम से पत्नी को बेवफा बना दिया और फिर 31 हजार ऐंठने के बाद प्रेमी को ठिकाने लगाने के एवज में भी 11 हजार रुपये मांग लिए। आप खुद ही सोचिए कि झूठ की बुनियाद पर खड़ी पूरी कहानी की सच्चाई जब तांत्रिक को नहीं पता तो फिर वह आपकी समस्या को कैसे दूर करेगा, बस उनकी एक ही मंशा होती है कि किसी तरह उसके पास आए शख्श की जेब खाली की जा सके..।







अब आप ये सब पढकर समज गये होगे,दुनिया मे किस प्रकार के महाठग होते है।मुजे भी कइ लोगो ने लालच दिया "आप 11,000/21,000....हजार ले लो हमसे परंतु हमारा वशीकरण का काम कर दो",परंतु मैने आज तक 10-11 वर्ष मे किसिको वशीकरण क्रिया के नाम पर ना पैसा लिया और नाही किसिसे मांगा है।इसका एक कारण है "वशीकरण साधना सिद्धि मा सरस्वती जी के आशिर्वाद से प्राप्त होता है और जो व्यक्ति इनकी क्रिपा प्राप्त नही करता उनको वशीकरण सिद्धि प्राप्त नही होती है".अब जब आपको ज्ञान के देवी से सिद्धि प्राप्त हुयी हो तो आप किसीका नुकसान नही कर सकते है।मेरा आप सभी से फिर एक बार नम्र निवेदन है और इसको स्विकार करे "मुजे जिवन मे कभी भी वशीकरण का काम करवा दो येसा बात ना करें".आप लाखो रुपया भी देगे तभी भी मै येसे काम नही करता हु।मै आपक वशीकरण मंत्र बता सकता हु जिससे माताराणी ने चाहा तो आपका काम बन जायेगा ।

मैने आज जो लिखा है वह आपका पैसा और समय बचाने हेतु योग्य मार्गदर्शन है।प्रेम पैसो से नही मिलता है। आप किसीको प्रेम दो तो वो भी आपको प्रेम ही देगा,येसा हो सके तो करीये फिर आपको वशीकरण करने का काम नही पडेगा।सब कुछ हमारे हाथो मे होता है परंतु हमारी सोच बदल जाती है जिसके कारण हमे दुख भुगतने पडते है।अब आप संकल्प लिजीये के मै अपने रुठे हुये व्यक्ती को प्रेम से प्राप करुगा और फिर भी सफल नही हुआ तो वशीकरण मंत्र का जाप करुगा,जिसमे मै पुर्ण विश्वास के साथ मेहनत करके अपने प्यार को जिवन मे वापस हासील करुगा।

गुगल पर,फेसबुक पर,रेलवे के बाथरूम मे दिये हुये विग्यापनो से बचिये क्युके इन सबकी इतनी औकात नही है जो ये फर्जी लोग आपको 72 घण्टे मे वशीकरण करवा कर दे सकते है।भोले-भाले जनता को लुटकर ही इनका घर चलता है।आज के समय हमारा यह ब्लोग ज्यादा से ज्यादा पढा जाता है और मै यही चाहता हु के "आपका और मेरा सम्बन्ध बना रहे",यहा पर दिये हुए साधना से बहोत से साधको ने शत-प्रतीशत लाभ उठाया है और आगे भी वह प्रयत्नशील रहेंगे।आपका सदैव कल्याण होता रहे,आपको सर्व सुख प्राप्त होता रहे।आपका संकल्प पुर्ण हो यही मै मंगलकामनाये करता हु।


आप सभी का अमुल्य जीवन,सही दिशा के और आगे बढ़े।





आदेश......

2 Dec 2015

स्वयं की शक्ति.

आप ईश्वर की अनमोल कृति हैं.

अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा

विचार मंथन और क्रिया

सामान्यतः प्रत्येक मनुष्य अपनी समस्याओं के बारे में विचार करता रहता है और स्वयं को परेशान करता रहता है। चिन्ताओं को अपने पास आने का निमंत्रण देता रहता है। क्या आपको मालूम है आप में क्या शक्ति है और इस शक्ति का विकास कैसे संभव है? क्या आप इस प्रश्न पर विचार करते हैं?

उस सर्व शक्तिमान ईश्वर ने एक निश्चित उद्देश्य के लिये आपको यह सुन्दर जीवन दिया है और उस निश्चित लक्ष्य, उद्देश्य को आप ही पूरा करेंगे यह विश्वास सदैव बनाए रखें।

यह मनुष्य व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि उसके पास शक्ति तो सीमित होती है लेकिन उसकी कामनाओं की उड़ान असीमित होती है। प्रत्येक मनुष्य को प्रतिपल कुछ न कुछ क्रिया अवश्य ही करनी पड़ती है। बिना क्रिया के वह एक क्षण भी नहीं रह सकता है। साथ ही यह भी समझें कि रोज-रोज की चिन्ताओं में, परेशानियों में, तनाव में काम करते हुए वह अपने स्वयं के बारे में सबसे कम विचार कर पाता है। इस कारण वह अपनी भागती-दौड़ती जिन्दगी में एक मशीन की भांति ही काम करता रहता है। विपरीत स्थिति में, स्थिति को अनुकूल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देता है। इस प्रकार वह यंत्रवत् जीवन जीता है। प्रतिदिन अपने बारे में कम और ज्यादा से ज्यादा दूसरों के बारे में ही चिन्तन करता है, दूसरों की तुलना में अपने-आपको श्रेष्ठ साबित करने के लिये प्रयत्नशील रहता है।



अब इसमें गलती किसकी है, सोचो? हर समय दूसरों के बारे में चिन्तन करना है या अपने बारे में भी चिन्तन करना है, विचार करें –

मनुष्य का स्वभाव बड़ा ही सरल है। उसके अन्दर एक जिद्द, होड़ है। वह हर खूबसूरत, अनमोल वस्तु पर, व्यक्ति पर, स्थान पर अपना एकाधिकार बनाना चाहता है। इसके साथ ही उसके सारे प्रयास, सारे विचार इसी दिशा में होते हैं कि मैं ध्यान, सौन्दर्य, धन-बल, शरीर-बल, ऐश्वर्य सभी में प्रभावशाली बनूं। अब उसका चिन्तन दो तरफा है, एक ओर तो वह हर वस्तु पर अपना अधिकार जमाना चाहता है और दूसरा वह हर दृष्टि से प्रभावशाली बनना चाहता है। उसका चिन्तन इसी बात में उलझा रहता है कि किस प्रकार और कैसे हर समय वह स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर सके?
परन्तु हकीकत में होता क्या है? वह इसी फेर में निरन्तर उलझा रहता है। समय का चक्र भी बड़ा बलवान है। धीरे-धीरे जीवन शक्ति क्षीण होती है लेकिन कामना शक्ति, इच्छाएं बढ़ती ही जाती हैं। इस कारण मन-मस्तिष्क की शक्तियां कमजोर होती चली जाती हैं। सभी के जीवन में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसलिये ज्यादातर लोग आपको परेशान, चिन्तित दिखाई देंगे। यह उलझन तो उन्होंने स्वयं अपने जीवन में डाली है। सबसे बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य जीवन में 90% भाग पर प्रकृति अर्थात् परमसत्ता का प्रभाव है। केवल और केवल 10% प्रतिशत भाग पर मनुष्य के स्वयं के कर्म और चिन्तन का प्रभाव रहता है लेकिन मनुष्य करता क्या है? जिस बात पर उसका अधिकार ही नहीं है, परम शक्ति का प्रभाव है उसके ऊपर चिन्ता करता रहता है। कर्म और विचार उसके अधिकार में है केवल और केवल इस पक्ष को सकारात्मक बनाए। इस 10% भाग अर्थात् ‘कर्म और विचार’ को यदि आपने सकारात्मक बना लिया तो पूरा जीवन व्यवस्थित हो जाएगा।

विचार करें कि आपके हाथ में कौन-कौन सी स्थितियां हैं और कौन-कौन सी स्थितियां आपके हाथ में नहीं हैं।
कामनाएं कमजोर बनाती हैं मनुष्य की यह बड़ी कमजोरी है कि वह सबसे ज्यादा चिन्तन अपनी कामनाओं का, अपने प्रियजनों का, अपने समाज का करता रहता है। वह अपने जीवन में उन चिन्ताओं से परेशान- दुःखी, उदास, हताश, निराश होता है जो कि उसके वश में ही नहीं हैं। भविष्य की हर सोच में वह स्वयं को डरा हुआ पाता है। भविष्य की हर चिन्ता में अपना वर्तमान खराब कर देता है। इसी से तो उसकी सकारात्मक सोच, नकारात्मक बन जाती है और फिर वह एक साधारण जीवन जीने लगता है। जबकि विचार करें कि आपका मनुष्य योनि में जन्म तो आने वाले कल में स्वयं को अति सफलतम सिद्ध करने के लिये ही हुआ था। मूल आवश्यकता इस बात की है कि जिन विषय वस्तुओं पर हमारा अधिकार नहीं है, जिन विषय वस्तुओं के बारे में हमें जानकारी नहीं है या जिन विषय वस्तुओं को हम पहले से जान नहीं सकते हैं उन सब के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाएं और अपने आपको बार-बार आश्वस्त करते रहें कि आगे सब अच्छा ही होगा, तो यहीं से आपके लिए आनन्द का नया द्वार खुल जाएगा।

हमारा भारतीय दर्शन इस विषय में क्या कहता है?
भारतीय दर्शन में एक सिद्धान्त है कि मनुष्य में अलौकिक, असीम और अनन्त शक्ति का स्रोत छिपा हुआ है और इस शक्ति पर चार प्रकार के प्रमुख आवरण हैं, जिनके कारण अनेक कमियां उसके व्यक्तित्व में आ जाती हैं।

ये चार आवरण हैं – 1. काम (sex), 2. क्रोध (anger), 3. लोभ (greed) और 4. अतिमोह (delusion)

इन आवरणों के कारण ही मनुष्य अपने सुख-दुःख का जाल बुनता रहता है और उसमें फंसता रहता है, छटपटाता रहता है। जबकि वास्तविक बात यह है कि ये चारों आवरण मनुष्य ने स्वयं बनाए हैं।

काम – जीवन में निरन्तर काम का भाव, मन को अशांत और उद्वेगी बना देता है। जीतने की प्रवृत्ति के कारण बार-बार बाजी लगाता है।

क्रोध – क्रोध व्यक्ति में उसकी खुद की गलतियों को बल पूर्वक दूसरे से मनवाने का उपक्रम करता है। अपनी गलतियों को छुपाने के लिये ही व्यक्ति क्रोध करता है।

लोभ – निरन्तर लोभ का भाव, हर अच्छी चीज को प्राप्त करने का, हड़पने का भाव देता है।

अतिमोह – अतिमोह ऐसा जाल है कि वह मनुष्य में यह भावना पैदा करता रहता है कि ‘ मैं ही सबको पालने वाला और आश्रय देने वाला हूं, सबकी व्यवस्था करने से पहले मैं हार नहीं जाऊं, समाप्त नहीं हो जाऊं। ’
इन चारों कारणों से मनुष्य अपनी वास्तविक शक्ति का परिचय नहीं दे पाता है, अपनी वास्तविक शक्ति को नहीं पहचान सकता है। मनुष्य जीवन के लिए ऊपर वाले चारों उपक्रम आवश्यक हैं लेकिन ये चारों आवरण एक सीमा तक ही होने चाहिए। इतने कठोर नहीं होने चाहिए कि आप उन्हें तोड़ नहीं सकें। इनमें से किसी की भी अधिकता नहीं होनी चाहिए। ये सारी क्रियाएं करें लेकिन इनमें पूरी तरह से लिप्त न हों।

यह सिद्ध है कि मनुष्य में अनन्त शक्तियां हैं लेकिन स्वयं की शक्ति के आंकलन की कमी और विचारों में अस्थिरता के कारण वह इसे पहचान नहीं पाता है। मनुष्य के हाथ में है कि वह अपनी वैचारिक शक्ति के द्वारा हर प्रकार की उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। कोई व्यक्ति जन्म से महापुरुष नहीं होता, महापुरुष वही बनता है जिन्होंने अपने आप पर नियन्त्रण किया और अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत किया। ईश्वर ने सबको समान शक्ति प्रदान की है, बस इस शक्ति को संरक्षित करना आना चाहिए तो इसके लिये एक ही उपाय है कि आप अपनी स्वयं की शक्तियों को अपने चिन्तन का आधार प्रदान करें और यह संकल्प लें कि प्रत्येक वह आवरण जो काम-क्रोध-लोभ-मोह कहलाता है उसकी सीमा कितनी हो? उसकी सीमा निर्धारित करें और स्वयं को एकाग्र कर, स्वयं को जाग्रत करने का प्रयत्न प्रारम्भ कर दें।



अपने जीवन के इस शक्ति संकलन में ये संकल्प बार-बार दोहराते रहें –

1. अपने आपको छोटा और बेचारा नहीं मानें। आप ईश्वर की अनमोल कृति हैं और उस सर्व शक्तिमान ईश्वर ने एक निश्चित उद्देश्य के लिये आपको यह सुन्दर जीवन दिया है और उस निश्चित लक्ष्य, उद्देश्य को आप ही पूरा करेंगे यह विश्वास सदैव बनाए रखें।

2. दूसरों की आलोचना से आपकी स्वयं की शक्ति का ह्रास होता है, दूसरों की कमियों की व्याख्या में अपना समय व्यर्थ न गंवाएं अन्यथा आप स्वयं नकारात्मक भाव पकड़ने लग जाएंगे।

3. जीवन में जिन कार्यों और परिस्थितियों पर आपका वश नहीं है, उनके प्रति स्वयं को सकारात्मक रखें। अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा – अच्छा ही होगा, ऐसा विचार करने से नये-नये मार्ग अवश्य दृष्टिगत होंगे।

4. अपनी शक्ति के चिन्तन में स्वयं को लगाएं, ध्यान के साधन द्वारा जैसा आप स्वयं चाहते हैं वैसा शक्ति सम्पन्न बनने का मानसिक संकल्प दोहराते रहें।

5. अतीत की सोच और भविष्य की सोच दोनों से दूरी बना लें, क्योंकि आपको वर्तमान में कर्म करना है। ‘ वर्तमान के ही कर्म का चिन्तन करें’।

6. अतीत के दुःख औरभविष्य के भय को सकारात्मक सोच दें। उन्हें कष्ट का कारण न मानें क्योंकि अतीत और भविष्य दोनों ही प्रश्नवाचक हैं। क्या हो गया, कैसे हो गया, अब क्या होगा, अब कैसे होगा? ये सारे प्रश्न प्रश्नवाचकहैं जबकि आपका वर्तमान क्रियावाचक है  – ‘मैं यह कर रहा हूं’ यही मुख्य बात है।

7. स्वयं को समयबद्ध तरीके से कार्य में लगाएं, समय-समय पर अपना स्वयं का आंकलन करते रहें और उसी के अनुसार अपनी कार्यशैली, कृतित्व (creation) आदि मेंपरिवर्तन करते हैं। यदि कोई नया आदर्श स्थापित करना है तो उसे भी स्थापित करते रहें।

8. मनुष्य के पास समय कम है और कामनाएं अनन्त हैं। ऐसे में अपने मन और मस्तिष्क पर पूर्ण नियन्त्रण करते हुए उसे अपने संकल्प की ओर ही दिशा देते रहें और अपने संकल्प का आंकलन करते रहें।

9. हर सुन्दर और मूल्यवान वस्तु हमारी हो, हर ज्ञान,सुन्दरता, बल, तप, यश में हम ही श्रेष्ठ हों। यह दौड़ छोड़ दें। बल्कि यह आंकलन करें कि हमारे अन्दर भी अनन्त गुण हैं और इन गुणों के द्वारा ही हम सर्वश्रेष्ठहोंगे।अपने लक्ष्यों को बिल्कुल साफ और स्पष्ट रखें। जैसेही आप अपने लक्ष्य से हटे तो आपका जीवन स्वयं हार मान लेगा। इस कारण अपने लक्ष्य निश्चित, स्पष्ट रखें।

10. आपका सत् संकल्प, आपके भीतर का नम्रता का भाव ही आपकी शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है और इसी का विकास करना है और यहीं सेआपके शक्ति सम्पन्न होने का अध्याय शुरू हो सकता है।







आदेश......