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24 Jun 2019

ग्रहण और गुप्त नवरात्रि मंत्र साधना.



अब समय इतना बदल गया के एक आर्टिकल लिखना है तो बहोत ज्यादा सोच समझकर लिखना पड़ता है,इंसान जब पैदा होता है तो उसका वजन ढाई किलो के आसपास होता है और मृत्यु के बाद भी जब हड्डियों को सिमटकर जल में बहाया जाता है तब भी उसका वजन ढाई किलो के आसपास ही होता है । जब पूरी जिंदगी घिस गई कुछ ना कुछ पाने में तो अब आप ही सोचो "क्या पाया और क्या खोया",अब तो थोड़ा समय निकालकर भगवान के चिंतन में भी लगा दो,शायद तुम्हारे जीवन मे कुछ अच्छा हो ।

3 जुलाई को गुप्त नवरात्रि प्रारंभ होने वाली है और ठीक उसके एक दिन पूर्व 2 तारीख को रात्रि में पूर्ण सूर्य ग्रहण है,ग्रहण एक ब्रम्हाण्डिय घटना है इसलिए वह किसी भी देश मे हो उसका असर सम्पूर्ण पृथ्वी लोक पर होता है । आवश्यक मंत्र साधना से जीवन के कमियों को पूर्ण करने हेतु इस गुप्त नवरात्रि के पावन अवसर पर माँ भगवती जगदंबा की आराधना की जाती है । ऐसा मौका कभी कभी मिलता है के नवरात्र के एक दिन पूर्व ग्रहण काल मे मंत्र सिद्धि करे और दूसरे दिन से 9 दिनों तक मंत्र जाप करके स्वयं को जीवन मे उन्नति के ओर आगे बढ़ाए ।

साधना सामग्री-100 ग्राम कुंकुम,एक नारियल, मौली (कलावा or पंच रंगी धागा), कपूर,धूपबत्ती,मातारानी का चित्र,तील का तेल दीपक जलाने हेतु,आसन-लाल,वस्त्र-लाल ।

साधना विधि-सर्वप्रथम मातारानी का चित्र लाल वस्त्र पर किसी बाजोट पर स्थापित करे,ठीक चित्र के सामने कुंकुम की ढेरी बनाये,नारियल को छील कर सिर्फ उसका गोला रखे,गोले पर नारियल के तीन आंखे होती है जिसका हमे त्रिशक्ति के रूप में पूजन सम्पन्न करना है,पूजन करते समय हर आंख पर सिंदूर चढ़ाए,तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करे, धूपबत्ती जलाए और मौली को नारियल के गोले को बांध देना है । यह हो गयी पूजन की विधि अब आगे आपको किसी भी प्रकार के माला से नवरात्र में 11 माला जाप रात्रि के किसी भी समय करना है,मुख पच्छिम दिशा के तरफ करके जाप करे,मंत्र सिद्धि हेतु ग्रहण काल मे 21 माला मंत्र जाप करे ।


मंत्र-
( मंत्र Whatsapp पर दिया जाएगा no. है +918421522368 )


मंत्र की गोपनीयता बनाये रखना मेरे लिए सर्वोपरि कार्य है इसलिए मंत्र व्हाट्सएप पर आप प्राप्त कर सकते हो,जो निःशुल्क है ।

दसवें दिन साधना सामग्री को नदी या तालाब में विसर्जित करना है और मातारानी का चित्र,माला को आप हमेशा संभाल कर रखिए ।


साधना के लाभ-
1-मनोकामना पूर्ति
2-रोग निवारण
3-वशीकरण
4-विवाह होता है
5-नॉकरी प्राप्त होती है
6-भगवती की कृपा
7-धनलाभ.
इससे भी ज्यादा लाभ इस साधना से अवश्य प्राप्त हो सकते है,इसलिए इस साधना को अवश्य ही संपन्न करे ।


आदेश ......

4 Feb 2018

सूर्यग्रहण मंत्र साधना





16 फ़रवरी 2018 को साल का पहला सूर्य ग्रहण घटित होगा। भारतीय समयानुसार इस सूर्य ग्रहण ग्रहण की समयावधि रात्रि 00:25:51 से सुबह 04:17:08 बजे तक रहेगी,ग्रहण के समय अनुसार यह ग्रहण 15 फरवरी के रात्रि में घटित होगा। यह आंशिक सूर्य ग्रहण होगा जो भारत में नहीं दिखाई देगा। हालांकि दुनिया के अन्य क्षेत्रों जैसे- साउथ अमेरिका, पेसिफिक, अटलांटिक और अंटार्कटिका में इसकी दृश्यता रहेगी। ग्रहण चाहे दुनिया मे कही पर भी हो परंतु तंत्र साधना हेतु वह एक अच्छा समय होता है जिसमे मंत्र सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ।

यह ग्रहण हमारे देश मे तंत्र साधना हेतु फायदेमंद है क्युके जो मंत्र साधना हमे रात्रि में करना है,ठीक समयानुसार ग्रहण काल भी रात्रि में है । इसलिए हम इस बार "तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना" करेंगे, जो एक महत्वपूर्ण साधना है ।

यदि हम जीवन का गहराई से विश्लेषण करें, तो पायेंगे, कि व्यक्ति हर पल, हर क्षण, भय एवं बाधाओं से आशंकित रहता है। गहराई से विश्लेषण करने पर ऐसा ही प्रतीत होता है कि मनुष्य की शक्तियां कीलित हो गई हैं। शक्तियों का यह कीलन स्वार्थी लोगों द्वारा या उनकी स्वयं की गलतियों से भी हो सकता है। इस कारण जीवन में भय का वातावरण बना रहता है और यह भी सत्य है कि निर्भय हुए बिना जीवन का आनन्द संभव ही नहीं है।

जीवन में निर्भयता एवं बाधाओं के निवारण के लिए व्यक्ति अनेक उपाय करता ही रहता है। जिस प्रकार कांटे से कांटा निकाला जा सकता है उसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं, ऐसी समस्याएं होती हैं जिन्हें उच्च तंत्र साधनाओं द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।

आवश्यकता केवल इस बात कि है कि हम अपने जीवन का विश्लेषण करें तथा इस बात को समझें कि हमारे जीवन में जो घटित हो रहा है वह सामान्य है अथवा असामान्य। सामान्य समस्याओं का हल तो सामान्य प्रयोगों से किया जा सकता है। किन्तु असामान्य समस्याओं का हल तो विशेष तंत्र प्रयोगों से ही संभव है और इस हेतु उच्चस्तरीय तंत्र साधनाएं सम्पन्न करनी होती हैं। इस हेतु श्रेष्ठ उपाय है – ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’।

त्रिपुर भैरवी दस महाविद्याओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तीव्र शक्ति स्वरूपा हैं। इनकी कृपा से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त होेने लगती है और समस्त बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इनकी तंत्र शक्ति के माध्यम से साधक पूर्ण क्षमतावान एवं वेगवान बन सकता है।

भगवती त्रिपुर भैरवी, महाभैरव की ही शक्ति हैं, उनकी मूल शक्ति होने के कारण उनसे भी सहस्र गुणा अधिक तीव्र तथा क्रियाशील हैं। साधक जिन लाभों को भैरव साधना सम्पन्न करने से प्राप्त करता है, जैसे शत्रुबाधा निवारण, वाद-विवाद मुकदमा आदि में विजय, आकस्मिक दुर्घटना टालना, रोग निवारण आदि इस साधना के माध्यम से इन विषम स्थितियों पर भी आसानी से नियंत्रण कर सकता है।

कैसा भी वशीकरण प्रयोग करवा दिया गया हो, कैसा भी भीषण तांत्रिक प्रयोग कर दिया गया हो, दुर्भावना वश वशीकरण प्रयोग कर दिया गया हो, गृहस्थ या व्यापार बन्ध प्रयोग हुआ हो, तो तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना सम्पन्न करने पर वह बेअसर हो जाता है।



उच्च स्तरीय तंत्र प्रयोग

जब किसी व्यक्ति पर या उसके परिवार पर द्वेष वश तांत्रिक प्रयोग होता है, तो वह परिवार अत्यन्त कष्ट भोगने के लिए विवश हो जाता है। तांत्रिक बाधा के कारण उसके समस्त कार्य बाधित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में तंत्र साधना सम्पन्न करने पर व्यक्ति का जीवन निष्कंटक तथा तेजस्वी क्षमताओं से युक्त हो जाता है।



कीलन दोष क्या है?

कीलन का तात्पर्य है, एक बन्धन। जिस प्रकार एक खूंटे से बंधा पशु उस खूंटे के चारों ओर तो चक्कर लगा सकता है लेकिन वह सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता, खूंटे से गले तक की रस्सी किसी के लिए छोटी हो सकती है और किसी के लिए बड़ी, परन्तु बन्धन तो बन्धन ही है, वह एक पक्षी की भांति स्वच्छन्द विचरण तो नहीं कर सकता, इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की शक्तियों का कीलन किया हुआ है, और यह कीलन उसके कर्मों के कारण, उसके दोषों के कारण, उस पर किये गये किसी तांत्रिक प्रयोगों द्वारा आदि शक्ति के प्रभाव से हो जाता है, और जब तक यह दोष दूर नहीं हो जाता तब तक वह कितना ही प्रयास करे, उसके कार्य सफल नहीं हो पाते, उसके देखते-देखते उसके साथ वाले जीवन की दौड़ में आगे निकल जाते हैं और वह एक पशु की भांति अपने ही स्थान पर बंधा छटपटाता रहता है।



उत्कीलन क्या है?

क्या कीलन दोष का कोई उपाय है? क्या कीलन दोष ऐसा कलंक है, जिसे उतारा ही नहीं जा सकता? क्या साधक अपने भीतर अपनी शक्ति का उस स्तर तक विकास नहीं कर सकता, जिससे कीलन दोष दूर हो जाय?

ठीक यही प्रश्न तंत्र के आदि रचियता भगवान शिव से पार्वती ने किया था कि – हे प्रभु! आप तो भक्तों पर परम कृपा करने वाले हैं, आगम-निगम बीज मंत्रों के स्वरूप हैं, भक्ति मुक्ति के प्रदाता हैं फिर आपने मन्त्रों का कीलन क्यों किया? क्यों सांसारिक प्राणियों को मंत्र सिद्धि में पूर्णता प्राप्त नहीं होती?

देवों के देव महादेव ने कहा, कि जैसे-जैसे युग बदलेगा वैसे-वैसे लोगों में भक्ति-प्रीति कम होगी, राग, द्वेष, ईर्ष्या, विरोध, शत्रुता में वृद्धि होगी, एक प्राणी दूसरे प्राणी को देखकर प्रसन्न नहीं होगा, अपितु ईर्ष्या करेगा और इस ईर्ष्या के वशीभूत अपनी शक्तियों का उपयोग बुरे कार्यों में करेगा, यदि ऐसे गलत व्यक्तियों के हाथ में मंत्र सिद्धि, तंत्र सिद्धि लग गई तो वे संसार में विपत्ति की स्थिति उत्पन्न कर देंगे।



उत्कीलन महाविद्या

मनुष्य जीवन में ऐसा ही हो रहा है, कुछ स्वार्थी व्यक्तियों या स्वयं की कुछ गलतियों के कारण भी जीवन कीलित हो जाता है और उसके द्वारा किये गये कार्यों का उसे पूर्ण फल नहीं मिल पा रहा है। जीवन में उसे किसी भी प्रकार के कीलन को समाप्त करने हेतु ही ब्लॉग में विशेष ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’ दिया जा रहा है। जिससे कीलन दोष शांत करने में सफलता प्राप्त होगी, वह अपने ऊपर अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये तंत्र दूर कर सकेगा, अपने तंत्र ज्ञान को अपनी रक्षा के लिए प्रयोग कर सकेगा।



साधना विधान

यह साधना विशेष रूप से सूर्यग्रहण के समय और होली के रात्रि को 10 बजे के पश्चात् सम्पन्न करें। इस साधना हेतु आवश्यक है –एक नारियल, लाल सुपारी और काली हकीक माला आवश्यक है जो आपको पंसारी के दुकान में आसानी से मिल जाएगा । नारियल के सामने जब साधक मंत्र जप करता है तो कैसा ही कीलन प्रयोग हुआ हो वह स्वतः ही समाप्त हो जाता है क्युके नारियल स्वयं त्रिनेत्र से पूर्ण फल है,जिसे श्री फल भी कहा जाता है।

अपने सामने एक बाजोट पर लाल कपड़ा बिछा दें तथा उस लाल कपड़े पर कुंकुम से रंगे चावल और अष्टगन्ध फैला दें, उस पर एक पंक्ति में तिल तथा सरसों बराबर मात्रा में मिलाकर उनकी 11 ढेरियां बनाएं तथा प्रत्येक ढेरी पर एक-एक ‘ लाल सुपारी’ रख दें, अब इनके सामने ही ‘ नारियल ’ एक ताम्र पात्र में स्थापित कर दें। अब सर्वप्रथम विनियोग करें –


विनियोग

ॐ अस्य श्री सर्वयंत्रमंत्राणां उत्कीलनमंत्र स्तोत्रस्य मूल प्रकृतिर्ॠषिर्जगतीच्छन्दः, निरंजनी देवता क्लीं बीजं ह्रीं शक्तिः, ह्रः लौं कीलकं सप्तकोटिमन्त्रयन्त्रतन्त्रकी
लकानां संजीवन सिद्धर्थे जपे विनियोगः।


विनियोग के पश्चात् त्रिपुर भैरवी का ध्यान निम्न मंत्र का जप करते हुए करें –

उद्यद्भानु सहस्र कांति मरुणा क्षौमां शिरोमालिकाम् रक्तालिप्त पयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्र विलसद् वक्त्रार विन्द श्रियम् देवी बद्ध हिमांशु रत्न मुकुटां वन्दे – रमन्दस्तिाम्।

भगवती त्रिपुर भैरवी की देह कान्ति उदीयमान सहस्र सूर्यों की कांति के समान है। वे रक्त वर्ण के रेशमी वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके गले में मुण्ड माला तथा दोनों स्तन रक्त से लिप्त हैं। वे अपने हाथों में जप-माला, पुस्तक, अभय मुद्रा तथा वर मुद्रा धारण किए हुए हैं। उनके ललाट पर चन्द्रमा की कला शोभायमान है। रक्त कमल जैसी शोभा वाले उनके तीन नेत्र हैं। आपके मस्तक पर रत्न जटित मुकुट है तथा मुख पर मन्द मुस्कान है। आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो।



अपने दाहिने हाथ से नारियल को स्पर्श करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्त्यै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ सर्वसागराय नमः। ॐ मणिद्विषाय नमः। ॐ चिन्तामणि गृहाय नमः। ॐ श्मशानाय नमः। ॐ पारिजाताय नमः। ॐ रत्न वेदिकायै नमः। ॐ मणिपीठाय नमः। ॐ नानामुनिभ्यो नमः। ॐ शिवेभ्यो नमः। ॐ शिवमुण्डेभ्यो नमः। ॐ बहुमांसास्थिमोदमान शिवोभ्यो नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराज्ञाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः। ॐ अवराज्ञानाय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ आनन्दकन्दाय नमः। ॐ सर्वतत्वात्मपद्माय नमः। ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः। ॐ विकारमयकेसरेभ्यो नमः। ॐ पंचाशद्वर्णढ़यकर्णिकायै नमः। ॐ अर्कमण्डलाय नमः। ॐ सोममण्डलाय नमः। ॐ महीमण्डलाय नमः। ॐ सत्वाय नमः। ॐ रजसे नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ आत्मने नमः। ॐ अन्तरात्मने नमः। ॐ परमात्मने नमः। ॐ ज्ञानात्मने नमः। ॐ क्रियायै नमः। ॐ आनन्दायै नमः। ॐ ऐं पारयै नमः। ॐ परापरायै नमः। ॐ निस्धानाय नमः। ॐ महारुद्र भैरवाय नमः॥

मंत्र उच्चारण के पश्चात् मानसिक रूप से भगवान सदाशिव का ध्यान करें तथा भगवान सदाशिव से तंत्र बाधाओं से मुक्त कराने का निवेदन करें। भगवान शिव के ध्यान के पश्चात् साधक ‘ काली हकीक माला ’ से निम्न भैरवी उत्कीलन मंत्र की एक माला जप करें।


मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं षट् पंचाक्षराणाम उत्कीलय उत्कीलय स्वाहा। ॐ जूं सर्वमन्त्र यन्त्र तन्त्राणां संजीवनं कुरु कुुरु स्वाहा॥
Om hreem hreem hreem shat panchaaksharaanaam utkilay utkilay swaahaa,om jum sarvmantra yantra tantranaam sanjivanam kuru kuru swaahaa


भैरवी उत्कीलन मंत्र पश्चात् साधक निम्न त्रिपुर भैरवी मंत्र की 31 माला मंत्र जप करें –

मंत्र
॥ह्सैं ह्सकरीं ह्सैं॥
Hasaim hasakareem hasaim


मंत्र जप की पूर्णता पर शक्ति स्वरूपा त्रिपुरा से तंत्र बाधाओं की समाप्ति की प्रार्थना करें तथा समस्त साधना सामग्री को लाल कपड़े में बांधकर होली की अग्नि में विसर्जित कर दें।

अन्य किसी मुहूर्त पर साधना प्रारम्भ करने पर सात दिन तक नित्य साधना सम्पन्न करने के पश्चात् आठवें दिन समस्त साधना सामग्री को किसी निर्जन स्थान पर जमीन में गाड़ दें। यह विशेष तांत्रोक्त प्रयोग सूर्यग्रहण और होली पर करे तो निच्छित ही सफलता मिलते हुए देखा गया है ।

आदेश......

30 Jan 2018

खग्रास चन्द्रग्रहण–31 जनवरी 2018




इस वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण 31 जनवरी 2018 को है. बता दें कि 2018 में दो चंद्र ग्रहण आएंगे, पहला 31 जनवरी को और दूसरा चंद्र ग्रहण 27-28 जुलाई 2018 को है. दोनों ही चंद्र ग्रहण भारत सहित अन्य देशों में भी दिखाई देंगे 31 जनवरी 2018 को आ रहे चंद्र ग्रहण पर 176 साल बाद पुष्य नक्षत्र का विशेष योग भी बन रहा है. अब आपको बताते हैं कि इस बार के चंद्र ग्रहण का आपके जीवन पर क्या असर पड़ने वाला है. यह ग्रहण माघ की पूर्णिमा को है जो कि कुछ लोगों के लिए बेहद शुभ है लेकिन वहीं दूसरी और कुछ लोगों के लिए अशुभ हो सकता है. भारत में चंद्र ग्रहण का समय क्या होगा? अगर आपके भी जहन में भी ये सवाल घूम रहा है तो आइए आपको इस सवाल का जवाब भी दे दें. भारत में चंद्र ग्रहण सायं 06.21 से 09.38 तक देखा जा सकेगा.


खग्रास चन्द्रग्रहण – 31 जनवरी 2018 (भूभाग में ग्रहण समय – शाम 5.17 से रात्रि 8.42 तक) (पूरे भारत में दिखेगा, नियम पालनीय ।) चन्द्रग्रहण बेध (सूतक) का समय सुबह 8.17 तक भोजन कर लें । बूढ़े, बच्चे, रोगी और गर्भवती महिला आवश्यकतानुसार दोपहर 11.30 बजे तक भोजन कर सकते हैं । रात्रि 8.42 पर ग्रहण समाप्त होने के बाद पहने हुए वस्त्रोंसहित स्नान और चन्द्रदर्शन करके भोजन आदि कर सकते हैं । ग्रहण पुण्यकाल जिन शहरों में शाम 5.17 के बाद चन्द्रोदय है वहाँ चन्द्रोदय से ग्रहण समाप्ति (रात्रि 8.42) तक पुण्यकाल है । जैसे अमदावाद का चन्द्रोदय शाम 6.21 से ग्रहण समाप्त रात्रि 8.42 तक पुण्यकाल है । शहरों का स्थान और चन्द्रोदय नीचे कुछ मुख्य शहरों का चन्द्रोदय दिया जा रहा है उसके अनुसार अपने-अपने शहरों का ग्रहण के पुण्यकाल का जानकर अवश्य लाभ लें । इलाहाबाद (शाम 5.40), अमृतसर (शाम 5.58), बैंगलुरू (शाम 6.16), भोपाल (शाम 6.02), चंडीगढ़ (शाम 5.52), चेन्नई (शाम 6.04), कटक (शाम 5.32), देहरादून (शाम 5.47), दिल्ली (शाम 5.54), गया (शाम 5.27), हरिद्वार (शाम 5.48), मुज़फ़्फ़नगर ( शाम5.56 ) जालंधर (शाम 5.56), कोलकत्ता (शाम 5.17), लखनऊ (शाम 5.41), मुजफ्फरपुर (शाम 5.23), नागपुर (शाम 5.58), नासिक (शाम 6.22), पटना (शाम 5.26), पुणे (शाम 6.23), राँची (शाम 5.28), उदयपुर (शाम 6.15), उज्जैन (शाम 6.09), वड़ोदरा (शाम 6.21), कानपुर (शाम 5.44) (इन दिये गये स्थानों के अतिरिक्तवाले अधिकांश स्थानों में पुण्यकाल का समय लगभग शाम 5.17 से रात्रि 8.42 के बीच समझें ।) ग्रहण के समय पालनीय (1) ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते । जबकि पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए । (2) सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना । यदि गंगा-जल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना फलदायी होता है । (3) ग्रहण-काल जप, दीक्षा, मंत्र-साधना (विभिन्न देवों के निमित्त) के लिए उत्तम काल है । (4) ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है।



यहां ग्रहण काल में जाप करने हेतु कुछ मंत्र दे रहा हु और इनमें से कोई भी एक ही मंत्र का जाप पूर्ण ग्रहण काल के अवधि में करो तो निच्छित ही आपको 12 वर्षों के लिए सिद्धि प्राप्त हो सकती है ।

मनोकामना सिद्धि-
।। ॐ ह्रीं घृणिं मनोवांछितं सिद्धये फट ।।
Om hreem ghruneem manovaancchitam siddhaye phat


सम्मोहन सिद्धि-
॥ ॐ ह्रीं सूर्य सम्मोहय ह्रीं ॐ ॥
Om hreem sury sammohay hreem om


अप्सरा सिद्धि-
।। ॐ क्लीं क्रीं अप्सरा सिद्धिं क्रीं क्लीं ॐ फट ।।
Om kleem kreem apsara siddhim kreem kleem om phat


वशीकरण सिद्धि-
।।ॐ ह्रीं क्लीं अमुकं वश्यय वश्यय मोहय मोहय क्लीं ह्रीं ॐ फट ।।
Om hreem kleem amukam vashyay vashyay mohay mohay kleem hreem om phat


रोगमुक्ति सिद्धि-
।। ॐ ह्लीं सर्व रोग नाशय नाशय ह्लीं फट स्वाहा ।।
Om hleem sarv rog naashay naashay hleem phat swaahaa


यहां पर जो 5 मंत्र है वह आपके उपयोग में आएंगे और आपका जीवन कई सारे कठिनाई से मुक्त होगा यही आशा करता हूँ ।


आदेश.....

17 Aug 2017

सूर्यग्रहण साधना



ग्रहण एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक घटना है जिसके दूरगामी दुष्प्रभाव होते हैं और अनिष्ट शक्तियां इनका लाभ उठातीं हैं ।
हम जहां रह रहे हैं यदि उस क्षेत्र में ग्रहण दिखार्इ दे रहा हो, तो सभी आध्यात्मिक सावधानियां रखना आवश्यक है । पूरे वर्ष नियमित साधना करने से ग्रहण के दुष्प्रभाव कम करने में सहायता प्राप्त होती है । साथ ही यदि कोई ग्रहण काल में तीव्र साधना करता है तो उसे इसका व्यक्तिगत सकारात्मक लाभ भी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रगति के रूप में होता है ।
चंद्र की अपेक्षा सूर्य पृथ्वी पर जीवन के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है । सूर्य को सूक्ष्म अथवा स्थूल स्तर पर अवरुद्ध करने से पृथ्वी सूक्ष्म एवं अमूर्त रूप से अधिक संवेदनशील हो जाती है जिसके कारण वातावरण अनिष्ट शक्तियों के (भूत, प्रेत, पिशाच इ.) लिए अधिक पोषक बन जाता है ।


ग्रहण काल में साधना करने से वातावरण के बढे हुए रज-तम एवं काली शक्ति के प्रभाव को निष्प्रभ किया जा सकता है । इसलिए यदि कोई व्यक्ति ग्रहण काल में तीव्र साधना करता है तो वह अवश्य ही काली शक्तियों के दुष्प्रभाव से बच सकता है । एक ग्रहण से होनेवाले दूसरे ग्रहण तक काली शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने हेतु नित्य साधना करना मूर्खता है,इसलिए ग्रहण काल मे दुष्प्रभाव से बचने हेतु साधना करे और पूर्ण लाभ उठाएं । आजकल कुछ लोगो ने दुष्प्रभाव को ग्रहो का खेल बना दिया है जिसके कारण बहोत सारे लोगो का पेट रत्न बेचने से भर रहा है परंतु हमे यहां कुछ तो समझना ही होगा के हम जीवन मे आध्यात्मिक/भौतिक प्रगति कैसे करेगे? क्युके आज के समय मे सामान्य जीवन जीना एक श्राप बन चुका है,जिसके पास धन ना हो वह हर जगह हार जाता है ।


आज मैं धन-धान्य से संबंधित साधना दे रहा हु,जिसे ग्रहण काल मे संपन्न करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक है । जो लोग ग्रहण काल को मजाक में लेते है शायद वह दुख-संकट के समय मे भी हँसते हो परंतु जिन्हें दुख-दर्द-संकट का एहसास है वह लोग इस साधना से खुशिया प्राप्त कर सकते है ।
ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होगा अतः इसका धार्मिक दृष्टिकोण से शुभाशुभ प्रभाव भी मान्य नहीं होगा। परंतु ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इसका प्रभाव संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा । ग्रहण चाहे दुनिया के किसी भी क्षेत्र में हो परंतु उसका असर सभी प्राणियों पर होता है,यह ग्रहण भारत मे दृश्य नही है तो कोई बात नही पर साधना सिद्धियों हेतु पूर्णतः एक अपेक्षाकृत योग है और इस अवसर का लाभ उठाना प्रत्येक साधक का कार्य है ।



चाणक्य ने तो स्पष्ट कहा है कि-

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
पुत्राश्च दाराश्च सुहज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुराश्रयन्ति अर्थो
हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥

निर्धन हो जाने पर मनुष्य को पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी, नौकर और हितैषी जन सभी छोड़कर चले जाते हैं और जब पुन: धन प्राप्त हो जाता है तो फिर से उसी के आश्रय में आ जाते हैं। शास्त्रों में भी ‘ धर्मार्थ काम मोक्षाणां पुरुषार्थ चतुष्टयम्’ कहकर मनुष्य की उन्नति के लिए चार प्रकार के पुरुषार्थ बतायें हैं, जिसमें सबसे पहला पुरुषार्थ धर्म, दूसरा अर्थ (लक्ष्मी प्राप्ति), तीसरा काम (सन्तान उत्पन्न करना) और चौथा मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना आदि सम्पन्न करना है ।

दरिद्रता एवं दुःख को यदि जड़ से उखाड़ फेंकना हो, तो सूर्य ग्रहण मे कमला तंत्र वर्णित लक्ष्मी के मूल स्वरूप की ‘कमला साधना’ अवश्य सम्पन्न करें। इस साधना को जो भी साधक श्रेष्ठ मुहूर्त (सूर्य ग्रहण) में पूर्ण विधि-विधान से करता है, उसके जीवन की दरिद्रता समाप्त हो जाती है और उसका दुर्भाग्य, सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।




साधना विधि-विधान:-


कमला तंत्र के अनुसार सूर्य ग्रहण से पूर्व साधक स्नान, ध्यान कर पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं और अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर लक्ष्मी चित्र स्थापित कर दें। लक्ष्मी जी के चित्र के समीप ही गुरु चित्र स्थापित कर, गुरु चित्र का पंचोपचार पूजन कर लें (जिनके गुरु ना हो वह शिव पूजन करे) । इसके पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर नवग्रहों की शांति हेतु प्रार्थना करें ।


नवग्रह प्रार्थना –

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु॥

नवग्रह प्रार्थना के पश्चात् एक थाली में नया पीला वस्त्र बिछाकर उसे बाजोट पर रख दें, कपड़े के ऊपर सिन्दूर से सोलह बिन्दियां लगावें। सबसे ऊपर चार फिर उनके नीचे चार-चार बिन्दियां चार पक्तियों में, इस प्रकार कुल 16 बिन्दियां लगा कर प्रत्येक बिन्दी पर एक-एक लौंग तथा एक-एक इलायची रख कर फिर इनका अष्टगंध से पूजन करें और हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मंत्र का उच्चारण करें –


उद्यन्मार्तण्ड-कान्ति-विगलित
कवरीं कृष्ण वस्त्रवृतांगाम्।
दण्डं लिंगं कराब्जैर्वरमथ
भुवनं सन्दधतीं त्रिनेत्राम्॥

नाना रत्नैर्विभातां स्मित-मुख
-कमलां सेवितां देव-देव-सर्वै
र्भार्यां रा ज्ञीं नमो भूत स-रवि-कल
-तनुमाश्रये ईश्वरीं त्वाम्॥


जो साधक संस्कृत पढ़े लिखे नहीं हैं, उनको चिंता नहीं करनी चाहिए और धीरे-धीरे शब्द उच्चारण करते हुए यह ध्यान मंत्र पढ़ सकते हैं।



इसके बाद दोनों हाथों में पुष्प तथा अक्षत लेकर निम्न मंत्र से अपने घर में भगवती कमला (लक्ष्मी जी का रूप) का आह्वान करते हुए चित्र  पर पुष्प, अक्षत समर्पित करें ,अब दाहिने हाथ मे थोड़ा जल लेकर विनियोग मंत्र बोले और जल को जमीन पर छोड़ दे-


विनियोग:-

ॐ ब्रह्मा ॠषये नमः शिरसि। गायत्रीश्छन्दसे नमः मुखे,श्री जगन्मातृ महालक्ष्म्यै देवतायै नमः हृदि,श्रीं बीजाय नमः गुह्ये,सर्वेष्ट सिद्धये मम धनाप्तये ममाभीष्टप्राप्तये जपे विनियोगाय नमः।


इसके बाद साधक सामने शुद्ध घृत का दीपक जलाएं, उसका पूजन करें तत्पश्चात् सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, ऐसा करने के बाद साधक चित्र पर कुंकुम समर्पित करें, पुष्प तथा पुष्प माला पहनाएं, अक्षत चढ़ावें तथा नैवेद्य का भोग लगावें, सामने ताम्बूल, फल और दक्षिणा समर्पित करें।


भगवती कमला के आह्वान और पूजन के पश्चात् इस साधना में ‘कवच’ पाठ का विधान है। इस दुर्लभ कवच का पांच बार पाठ करें, जो महत्वपूर्ण है, कवच पाठ से चित्र का साधक के प्राणों से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, और साधना सम्पन्न करने पर साधक को ओज, तेज, बल, बुद्धि तथा वैभव प्राप्त होने लग जाता है। इस कवच का उच्चारण सनत्कुमार ने भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किया था। कमला उपनिषद् में इस लघु कवच का अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोग है –



कमला कवच:-


ऐंकारी मस्तके पातु वाग्भवी सर्व सिद्धिदा।
ह्रीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षु युग्मे च शांकरी।

जिह्वायां मुख-वृत्ते च कर्णयोर्दन्तयोर्नसि।
ओष्ठाधरे दन्त पंक्तौ तालु मूले हनौ पुनः॥

पातु मां विष्णु वनिता लक्ष्मीः श्री विष्णु रूपिणी।
कर्ण-युग्मे भुज-द्वये-रतन-द्वन्द्वे च पार्वती॥

हृदये मणि-बन्धे च ग्रीवायां पार्श्वयोर्द्वयोः।
पृष्ठदेशे तथा गृह्ये वामे च दक्षिणे तथा॥

स्वधा तु-प्राण-शक्त्यां वा सीमन्ते मस्तके तथा।
सर्वांगे पातु कामेशी महादेवी समुन्नतिः॥

पुष्टिः पातु महा-माया उत्कृष्टिः सर्वदावतु।
ॠद्धिः पातु सदादेवी सर्वत्र शम्भु-वल्लभा॥

वाग्भवी सर्वदा पातु, पातु मां हर-गेहिनी।
रमा पातु महा-देवी, पातु माया स्वराट् स्वयं॥

सर्वांगे पातु मां लक्ष्मीर्विष्णु-माया सुरेश्वरी।
विजया पातु भवने जया पातु सदा मम॥

शिव-दूती सदा पातु सुन्दरी पातु सर्वदा।
भैरवी पातु सर्वत्र भैरुण्डा सर्वदावतु॥

पातु मां देव-देवी च लक्ष्मीः सर्व-समृद्धिदा।
इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्व-सिद्धये॥



वास्तव में ही यह कवच जो कि ऊपर स्पष्ट किया गया है अपने आप में महत्वपूर्ण है, यदि साधक नित्य इसके ग्यारह पाठ करता है, तो भी उसे जीवन में धन, वैभव, यश सम्मान प्राप्त होता रहता है। प्रयोग में इसके पांच पाठ करें। कमला कवच के पाठ के पश्चात् ‘ कमल गट्टा माला ’ या " स्फटिक माला " का कुंकुम, अक्षत, पुष्प इत्यादि से पूजन करें और पूजन के पश्चात् ‘ जप माला ’ से निम्न कमला मंत्र की 16 माला मंत्र जप करें।



कमला मंत्र

॥ ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं क्लीं ह्सौः जगत्प्रसूत्यै नमः॥

Om aing ing hreeng shreeng kleeng hasoum jagatprasutyai namah


जब सोलह माला मंत्र जप हो जाय तब भगवती लक्ष्मी की विधि-विधान के साथ आरती सम्पन्न करें ।


ग्रहण के बाद भी साधक को 21 दिनों तक नित्य 1 माला जाप करते रहना चाहिए और साधना काल मे साधनात्मक नियमो का भी पालन करे । मैं कुछ  साधनात्मक नियम बता देता हूं जो जरूरी है,प्रथम नियम साधना नित्य एक ही समय पर करे,दूसरा नियम स्त्री को जब राजस्वाल हो तो उस समय उनके हाथों बना भोजन ना करे और उनका स्पर्श भी ना होने दे,तीसरा नियम साधना में ब्रम्हचैर्यत्व का पालन करे,आखरी नियम मास-मदिरा का त्याग कर । जिसने भी ये चार नियम समझलिये उसका जीवन साधना के क्षेत्र में अद्वितीय हो सकता है । इस साधना के बाद आपको जीवन मे किसी भी प्रकार की कोई भी कमी ना पड़े यही संकल्प मैं इस ग्रहण में करने वाला हूँ ताकि आपका जीवन अद्वितीय बन सके ।


ग्रहण का समय:-इस बार 21 अगस्त को सूर्य ग्रहण पड़ रहा है। भारतीय समय के मुताबिक यह ग्रहण रात में 9.15 मिनट से शुरु होगा और रात में 2.34 मिनट पर खत्म होगा। भारत में इस दौरान रात रहेगी तो यहां पर कहीं भी सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा परंतु साधको के लिये यह एक साधना सिद्धि हेतु महत्वपूर्ण समय माना जायेगा ।







आदेश.........

7 Jul 2017

चंद्रग्रहण साधना

आज का ये पोस्ट उन सभी के लिए है जो अपना भविष्य बेहतर बनाना चाहते है । सभी को स्वयं के भविष्य का चिंता होना चाहिए ताकि जीवन मे दुख और दर्द कम हो । मैने जीवन मे ऐसे कई बेकार साधक देखे है जो सिर्फ निंदा करने में तो कोई बुराइया करने में अपना समय बर्बाद कर देता है और ये सब कुछ एक अच्छे साधक के लक्षण नही होते है । कुछ मूर्ख किसी अच्छे गुरु से दीक्षा प्राप्त करके स्वयं को विशेष समझने लगते है और दूसरों की बुराइया करने में अपने गुरु के महानता को दाग लगा देते है । मैं ये बात अच्छेसे जानता हूं व्हाट्सएप जैसे तांत्रिक ग्रुपो में मेरे आर्टिकल लोग अपने नाम से चला रहे है,कोई बात नही । ये भी एक अच्छा ही कार्य है परंतु कम से कम इतना तो याद रखो "जिस दिन उस आर्टिकल पर तुमसे कोई सवाल पूछे तो उसे क्या जवाब दोगे?",इतना तुम्हे समझ होता तो तुम लोग चोरी ही क्यों करते ।

मेरे ईमेल आई.डी. में "निखिल" नाम लिखा हुआ है तो इसमें भी लोगो को समस्या है । आज तक इसका जवाब मुझे किसी से नही मिला के इन लोगो को निखिल नाम ईमेल आई.डी. में रखने में क्या समस्या है । यहां पर निखिल नाम से कुछ भी नही लिखा जाता है और नाही इस ब्लॉग पर निखिल नाम के प्रोडक्ट बेचे जाते है । निखिल नाम के प्रोडक्ट फेसबुक पर बेचने वालों की कोई कमी नहीं है और निखिल नाम पर दीक्षा देने वाले भी फेसबुक पर आझाद घूम रहे है,आजकल तो कुछ लोग निखिल नाम पर साधना शिबिर भी ले रहे है । शिबिर लेने का हक सिर्फ जोधपुर में सुरक्षित है परंतु आज उनके शिष्य ही गुरु बन गए है,मैं आज फिर से एक बार इस ब्लॉग के माध्यम से लिखना चाहता हूँ "बुरी नजर वाले तेरा मुह काला",वैसे तो ये ट्रक पर ज्यादा लिखा जाता है परंतु कुछ मूर्खो ने अपने नाम को इज्जत देने के लिये मेरे नाम का इस्तेमाल करके बुराइया करने का संकल्प लिया है । माताराणी से प्रार्थना करता हु के तुम्हारा संकल्प पूर्ण होता रहे और तुम्हे इतनी तो बुद्धि मीले के तुम लोग मेरा चिंतन भगवान से ज्यादा ना करो ।

कई लोग मुझे कहते है,हमे आपसे गुरुदीक्षा लेना है परंतु साधक मित्रो मैं यह बात आज साफ साफ लिख देता हूं "मैं गुरुदीक्षा नही देता हूँ,मुझे गुरु बनने का कोई लालच नही है" । मेरा आज तक कोई भी एक शिष्य नही है,जब भी मुझे दीक्षा हेतु फोन आते है तो मैं उन्हें यही कहेता हु "ये रहा गुरुमंत्र और आज से तुम्हारे गुरु जो है वह गोरखनाथ जी है" , यह कार्य निशुल्क होता है । मेरे बारे में मूर्खो ने कही सारे वहम पाल के रखे है जो सही नही है,ये बात मैं उन लोगो को समझा रहा हु जो गलत सोच रखते है और सुबह-शाम फेसबुक की सेवा करते है । कुछ पालना ही है तो मेरे नाम से कुत्ता ही पालो,मुझे सही में अच्छा महसूस होगा परंतु वहम मत पालो । ये वहम पालने वाले लोग हाथ मे चूड़ियां पहनकर चुगलियां करते रहते है और स्वयं को तंत्र की कुछ किताबे पढकर प्रकांड तांत्रिक समजते है । चलिये अब गधो पर बात करने से अच्छा आगे बढ़ते हुए हम लोग साधना पर बात करते है ।

यह साधना ग्रहण काल मे शुरू करने से सफलता निच्छित मानी जाती है । इस साधना को प्रामाणिकता से करो तो तुम्हारा जीवन वर्तमान जीवन से बेहतर हो जाएगा, आज मैं सभी को चुनौती देकर बोल रहा हु "यह सरस्वती साधना है,इसको संपन्न कर ही लो तो बहोत कुछ अच्छा होगा " ।

साधना के फायदे भी लिख देता हूं,नही तो चंद्रग्रहण के अवसर पर यह साधना आप लोग नही करोगे । इस साधना से स्मरणशक्ति बढ़ती है,व्यवसाय में वृद्धि होती है,जिन्हें सरकारी नोकरी चाहिए उनके लिये यह साधना अमृत है,इस साधना से स्वयं का भूत-भविष्य-वर्तमान भी देखा जा सकता है और माताराणी ने चाहा तो दूसरो का भी देख सकते हो । यह साधना मैं अपने मानसपुत्र सागर मशरू से करवाना चाहता था परंतु वो अभी बच्चा है 16 वर्ष का और चमत्कार के पीछे पागल है । जब के इसी साधना के भरोसे उसने दसवीं कक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किये परंतु वह इस साधना के फायदों से अब तक अनजान था,अब नही रहेगा और साथ मे एक और व्यक्ति वीर राजपूत ये साधना कर ले तो अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा । शायद ये दोनों यह साधना पढ़े तो मुझे खुशी होगी,इन दोनों के साथ-साथ आप सभी यह साधना संपन्न करें ।

मैं गारंटी के साथ बोल रहा हूं,यह साधना जो भी करेगा उसको फायदा ही हो सकता है और किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नही हो सकता है । इस साधना से इच्छाएं भी पुर्ण हो सकती है साथ मे वशिकरण क्रिया भी संभव है मेरे प्यारे प्रेम के रोगियों । वैसे तो मैं वशिकरण क्रिया के खिलाफ हु परंतु क्या करे प्रेमवीरो का दिल भी रखना पड़ता है,जिस दिन आज ये प्रेम के रोगी किसी को वश में करके विवाह करना चाहते है,भविष्य में इनके ही लड़की/लड़के को कोई भी वश कर सकता है और वह लड़का/लड़की बुरे भी हो सकते है । शायद इन्हें तब ये क्रिया बुरी लग सकती है,आज तो सभी प्रेमरोगी/प्रेमवीर प्यार के नशे में पागल हो चुके है तो कुछ लोग अपने अय्याशी के लिए किसी को वश में करना चाहते है । ये सब कुछ अच्छा नही है,सबके पास निर्णय लेने का हक है अब अगर आपका पार्टनर ब्रेक अप कर रहा है तो ये उसकी आझादी है । आप उसको वशिकरण क्रिया से बंदी बनाकर क्या करोगे,कोई इससे ख़ुश नही रह सकता है । हा, मैं मानता हूं "आपको इसमे दर्द हुआ तकलीफ हुई परंतु जबरदस्ती करके क्या हासिल करोगे,प्यार?",जबरदस्ती प्रेम को प्राप्त करना फायदेमंद साबित नही होता है । अगर आपका पार्टनर आपसे भटक गया होतो वशिकरण क्रिया अवश्य करना ही चाहिए,यह अच्छी बात है ।

शायद अब ज्ञान की बाते बहोत हो गयी,अब सिर्फ साधानात्मक चिंतन होना चाहिए और मेरा भी चिंतन ना करो । 7 ऑगस्ट को चंद्र ग्रहण है जो हमारे देश मे दिखेगा,यह खंडच्छाया युक्त ग्रहण है परन्तु इसका भी महत्व माना जायेगा । ग्रहण रात्रि में 9.20 मिनट पर शुरू होगा और 2.20 मिनट पर समाप्त होगा,मतलब यह ग्रहण 5 घंटे तक का है । चंद्रग्रहण पर एक बार मंत्र जाप करने का अर्थ है एक लाख बार जाप करना,तो इसीलिए हम जो भी मंत्र साधना का आवश्यकता हो वह मंत्र जाप कर लेना चाहिए ।

मंत्र:-

।। ॐ श्रीं ह्रीं हसौ: हूं फट निलसरस्वत्यै स्वाहा ।।
Om shreem hreem hasouh hoom phat nilasaraswatyai swaahaa

ग्रहण काल मे मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जाप करे,दिशा उत्तर,आसन-वस्त्र सफेद या नीले रंग के हो,माला स्फटिक या नीले हकीक का हो और माला नही हो तो भी बिना गिनती किये जाप कर सकते हो ।
ग्रहण साधना के बाद नित्य 21 दिनों तक रात्री में 9 बजे के बाद 11 माला जाप या फिर 30 मिनट जाप किया करे ।

हो सके तो इस आर्टिकल के लिंक को अपने व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप या प्रोफाइल पर शेयर करे ताकि चंद्रग्रहण के उच्चतम समय का और इस साधना का सभी लाभ उठा सके । यह आर्टिकल जनकल्याण हेतु है और इसको आप शेयर करके सभी लोगो की मदत करेगे यही मैं आप सभी से उम्मीद रखता हूं । जिन लोगो को लिंक शेयर करने में शर्म आता है वह इसमें ना पड़े,आगे आपकी मर्जी.......

आदेश.........

15 Dec 2015

सुर्य/चंद्र ग्रहण-2016.

ग्रहण का धार्मिक महत्व:-

ग्रहण काल में सूतक के नियम लगने के कारण ग्रहण के बाद ही शुभ कर्म जेसे पूजा, अनुष्ठान, दान आदि कार्य करने लाभदायक होते हैं। सूतक काल की अवधि में मंत्र , जप, तप इत्यादी सिद्धि के कार्य किये जाते हैं। परंतु आजके भौतिकता वादी वैज्ञानिक युग में आधुनिकता कि दौड में अंधि दौड लगाने वाले व्यक्ति ग्रहण काल के प्रभाव को नकार देते हैं।ग्रहण काल मे मंत्र जाप करने से निच्शित सिद्धियां प्राप्त होती है क्युके ग्रहण काल मे किये जाने वाले मंत्र जाप का फल कम से कम 100 गुणा ज्यादा प्राप्त होता है।

कोइ भी शाबर मंत्र जगाना हो या सिद्ध् करना हो तो ग्रहण काल से अधिक शुभ सिद्धिप्रद समय दुसरा कोइ नही होता है। जो साधक ग्रहण काल मे साधना नही करता है उसे स्वयं को साधक नही मानना चाहिये।हम जितने भी मंत्रो का जाप एक वर्ष मे करते है और उनमे सफलता प्राप्त करते है,उन मंत्रो का जाप ग्रहण काल मे किया जाये तो वह मंत्र कइ वर्षों तक चैतन्य रहेते है।


मैने 15 वर्षों मे ग्रहण काल मे अब तक 70 से ज्यादा मंत्रो को सिद्ध किया है और उनका अचुक प्रभाव भी मैने कइ बार देखा है।ग्रहण काल मे किये जानेवाला मंत्रसिद्धि कभी विफल नही होता है और शिघ्र लाभप्रद होता है।यह अवसर बहोत कम आता है इसलिये येसे महान अवसर का सभी को लाभ उठाना आवश्यक है।


यहा पर 2016 मे होनेवाले ग्रहण काल का समय दे रहा हु जिसे जानना आपके लिये आवश्यक है।



सुर्यग्रहण-9 मार्च 2016

8/9 मार्च 2016 को सूर्य ग्रहण भारत में समेत यह ग्रह दक्षिणी पूर्वी एशिया, थाइलैण्ड, इण्डोनेशिया, दक्षीणी कोरिया, जपान, सिंगापुर और आस्ट्रेलिआ में दिखाई देगा. साथ ही इस ग्रह का सम्पूर्ण घटनाक्रम सुमार्ता बोरनियो, इण्डोनेशिया और उत्तर प्रशांत महासागर में दिखाई देगा.


इस ग्रहण का स्पर्श प्रातः 5:39 मिनट पर मध्यकाल 6:05 तथा इसका मोक्ष प्रातः 6:52 मिनट पर होगा । इस ग्रहण का पर्वकाल 01:13 मिनट रहेगा । इस ग्रहण का सूतक 8 मार्च 2015 को सायंकाल 05:10 से लगेगा ।



चंद्रग्रहण-23 मार्च 2016

प्रच्छाया में कोई ग्रहण नहीं है।
चन्द्रोदय के बाद उपच्छाया ग्रहण खाली आँख से नहीं दिखेगा।
चन्द्रोदय - 18:36 बजे होगा।
उपच्छाया से पहला स्पर्श - 15:11
परमग्रास चन्द्र ग्रहण - 17:17
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श - 19:24
उपच्छाया की अवधि - 04 घण्टे 13 मिनट्स तक होगा।




सुर्यग्रहण-1 सितंबर 2016

इस ग्रहण का स्पर्श प्रातः 6:13 मिनट पर मध्यकाल  09:01 मिनट तथा इसका मोक्ष प्रातः 11:58 मिनट पर होगा । इस ग्रहण का पर्वकाल 5:45 मिनट रहेगा । इस ग्रहण का सूतक 8 मार्च 2015 को सायंकाल 05:10 से लगेगा ।

ग्रहण दर्शनीय नहीं होगा।
1 सितंबर 2016 को लगने वाला कंकण सूर्य ग्रहण भारत में नहीं देखा जा सकेगा.यह ग्रहण केवल दक्षिणी एशिया के देशों, पूर्वी आस्ट्रेलिया, अफ्रीका के देशों, एटलांटिक और अंटार्टिका में दिखाई देगा.




चंद्रग्रहण-17 सितंबर 2016

प्रच्छाया में कोई ग्रहण नहीं है।
उपच्छाया ग्रहण खाली आँख से नहीं दिखेगा।
उपच्छाया से पहला स्पर्श - 22:27 - 16th, सितम्बर को
परमग्रास चन्द्र ग्रहण - 00:25
उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श - 02:24
उपच्छाया की अवधि - 03 घण्टे 56 मिनट्स तक होगा।





आध्यात्मिक दृ्ष्टिकोण:-

यह तो स्पष्ट है कि सूर्य/चंद्र में अद्भुत शक्तियाँ निहित हैं और ग्रहण काल में सूर्य/चंद्र अपनी पूर्ण क्षमता से इन शक्तियों को, इन रश्मियों को विकीर्ण करता है, जिसे ध्यान-मनन के प्रयोगों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है,किन्तु उतना ही जितना हमारे शरीर में क्षमता है। ग्रहण का शाब्दिक अर्थ ही लेना, अंगीकार या स्वीकार करना है। हमारे श्रृषि मुनियों नें इतना ज्ञान हमारे सम्मुख रखा है जिसका अनुमान लगाना,अर्थात ज्ञान से ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन की सार्थकता है। अपने भीतर के अन्धकार को मिटाने के लिए दैविक आराधना,पूजा अर्चना इत्यादि विशेष पर्वों पर करते रहने का विधान है।

जैसा कि ग्रहण काल में उत्तम यौगिक क्रिया,पूजा अनुष्ठान,मन्त्र सिद्धि,तीर्थ स्नान,जप दान आदि का अपना एक विशेष महत्व है। इसके प्रमाण शास्त्रों में विधमान हैं। बहुत से बुद्धिजीवी लोग कहते है कि ग्रहण काल में ध्यान मनन,जाप,उपवास इत्यादि निरा अन्धविश्वास है, इन सब का कोई औचित्य नहीं। भई मान लेते हैं कि इन सब से कुछ नहीं होता। अब यदि कोई व्यक्ति इसी बहाने (चाहे भयवश ही) कुछ समय ध्यान,जाप,पूजा पाठ आदि का आश्रय ले लेता है तो उसमें हर्ज भी क्या है? यदि कुछ नहीं भी होने वाला तो कम से कम कुछ क्षण के लिए ही सही किसी अच्छे काम में तो लगेगा। हालाँकि इस सन्दर्भ में मेरे पास कोई प्रमाण नहीं हैं किन्तु फिर भी मेरा इस विषय में निजी मत ये है कि ग्रहण का प्रभाव पृ्थ्वी के समस्त जीव-जंतुओं,पशु पक्षियों,वनस्पति इत्यादि पर अवश्य पडता है। क्यों कि ग्रहण काल में देखने को मिलता है कि अनायास जानवर उत्तेजित हो उठते हैं,पक्षी अपने घोंसलों में दुबक जाते हैं और कईं प्रकार के फूल अपनी पंखुडियाँ समेट लेते हैं।

इस वर्ष मे मै आपको सही समय पर अद्वितीय शाबर मंत्र साधनाये दे रहा हू,ताकी आपका अमुल्य जिवन सार्थक हो सके।






आदेश.....

23 Apr 2013

अंगुलाल्प ग्रहण साधना


निर्णयसिंधु नामक ग्रंथ मे कहा गया है “जो ग्रहण अंगुला से कम दिखता हो उसे अंगुलाल्प ग्रहण कहते है”,चंद्रग्रहण मे भगवान चंद्रमा के षोडशांश भाग से कम भाग मे ग्रहण लगता हो तो वह ग्रहण जादा प्रभावशाली नहीं होता है,परंतु क्या हम ग्रहण को प्रभावशाली नहीं बना सकते?
100% बना सकते है सिर्फ आवश्यकता है तिष्ण से भी तिष्ण साधनाओ की,कलयुग मे हनुमान जी का साधना अत्यधिक प्रभावशाली होता है और ग्रहण योग मे वही साधना की जाये तो फिर साधना तो तिष्ण से भी तिष्ण हो जाएगा,इस साधना से विपरीत तंत्र शक्ति का प्रभाव समाप्त होता है,वास्तुदोष जो आजकल एक प्रसिद्ध दोष है “किसी भी ज्योतिष के पास जाओ तो ग्रह दोष निकलेगा और उपाय करने के बाद भी फायदा ना हो तो ज्योतिष महाराज का आखरी उपाय वास्तुदोष शांति ही होता है”इस साधना से ग्रह दोष,नक्षत्र दोष,कालसर्प दोष,पितु दोष,ऋण दोष और वस्तु दोष का समाप्ती होता है,यह साधना रोग मुक्ति के लिए अचूक है,स्वप्न दोष एवं नजर दोष भी समाप्त होते है॰इस साधना से इच्छाये पूर्ण की जा सकती है॰

साधना सामग्री- 


             पांच मुखी रुद्राक्ष,मूंगा/लाल हकीक माला,लाल आसन एवं वस्त्र,गुड और चने का भोग,सिंदूर॰


साधना विधि:


             ग्रहण रात्री मे महाराष्ट्र के समय नुसार 1:22 से 1:53 तक है,हनुमान जयंती के दिन सुबह ६ बजे से पहिले स्नान करने के बाद किसी नजदीक के पीपल के वृक्ष के पास जाये,पीपल के वृक्ष को पानि चढ़ाये और सामान्य पूजन करे,रुद्राक्ष को ज्यादा से ज्यादा मात्रा मे सिंदूर लगाये,सिंधुर सूखा या गीला भी लगा सकते है,सिंदूर लगाने के बाद रुद्राक्ष को किसी लाल वस्त्र मे बांधकर पीपल के वृक्ष के किसी डाली को बांध दे और दक्षिणा के साथ गुड चने का भोग चढ़ा दीजिये,शाम को फिर से उसी पीपल के वृक्ष के पास जाकर फिर से जल चढ़ाये और सामान्य पूजन करके रुद्राक्ष को अपने साथ ले जाने की अनुमति मांगे,उसी वस्त्र मे रुद्राक्ष को साथ लेकर घ मे किसी येसे जगह रखे जहा स्त्री की छाव न पड़े,रात्रि मे ग्रहण के समय साधना कक्ष या पुजाघर मे जहा भी आप साधना कराते हो,लाल वस्त्र की गाठ खोलकर रुद्राक्ष भाहर निकालकर किसी अन्य लाल वस्त्र पर स्थापित करे,रुद्राक्ष के ऊपर चढ़ाया हुये सिंदूर से माथे पे अंगूठे से तिलक करे,गुरुमंत्र का आवश्यकता नुसार मंत्र जाप करे और सदगुरुजी से साधना सफलता की कामना करे,रुद्राक्ष को पंचमुखी हनुमान मानते हुये सामान्य पूजन करे और निम्न मंत्र का २१ माला मंत्र जाप करे॰



मंत्र-


            ॥ ॐ हूं हूं हनुमतये हूं हूं फट ॥



                                 Om hum hum hanumataye hum hum phat



साधना मे मंत्र जाप करते समय आपको रुद्राक्ष की और ध्यान केन्द्रित करना आवश्यक है,इस समय मे रुद्राक्ष हिले या गोल घूमने लगे तो डरीये मत सदगुरुजी का स्मरण कराते रहे,मंत्र जाप के बाद रुद्राक्ष का जल से शुद्धिकरण करे और किसी लाल धागे मे रुद्राक्ष धारण कर लीजिये या फिर घर मे किसी पवित्र स्थान पर लाल धागे मे बांध दीजिये,हो सके तो मंत्र का जाप नित्य २१ दिन तक ३ माला करे ताकि आपको हनुमाना जी के सौम्य रूप मे दर्शन प्राप्त हो,जब किसी पीड़ित को ठिक करना हो चाहे वह रोग हो या टोना टोटका हो,तंत्र बाधा हो,भूत-प्रेत-पिशाच बाधा हो तो एक ग्लास शुद्ध जल मे १०८ बार मंत्र बोलकर जल मे ३ बार फुक मारे और पीड़ित को जल पीला दे तो पीड़ित व्यक्ति को ज्यादा से ज्यादा २ घंटे के अंदर मे ही आराम मिलता है॰


यह अचूक और प्रभावशाली साधना है




श्री-सदगुरुजीचरनार्पणमस्तू...................