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7 Nov 2015

चंद्रमा शाबर मंत्र.

चन्द्रमा से मनुष्य बहुत प्रभावित रहा है। जीवन के हर पहलू में चन्द्रमा को उसने स्वयं से जोड़ कर रखा। मनुष्य ने विभिन्न लक्षणों के आधार पर चन्द्रमा के बहुत से
वैकल्पिक नाम तो रखे ही, साथ ही विशिष्ट कुल-परंपरा से भी चन्द्रमा को जोड़ा।

ब्राह्मणों-क्षत्रियों के कई गोत्र होते हैं उनमें चंद्र से जुड़े कुछ गोत्र नाम हैं जैसे चंद्रवंशी। पौराणिक संदर्भों के अनुसार चंद्रमा को तपस्वी अत्रि और अनुसूया
की संतान बताया गया है जिसका नाम 'सोम' है। दक्ष प्रजापति की सत्ताईस पुत्रियां थीं जिनके नाम पर सत्ताईस नक्षत्रों के नाम पड़े हैं। ये सब चन्द्रमा को ब्याही गईं। चन्द्रमा का इनमें से रोहिणी के प्रति विशेष अनुराग था। चन्द्रमा के इस व्यवहार से अन्य पत्नियां दुखी हुईं तो दक्ष ने उसे शाप दिया कि वह क्षयग्रस्त हो जाए जिसकी
वजह से पृथ्वी की वनस्पतियां भी क्षीण हो गईं। विष्णु के बीच में पड़ने पर समुद्र मंथन से चन्द्रमा का उद्धार हुआ और क्षय की अवधि पाक्षिक हो गई। एक अन्य कथा के अनुसार चन्द्रमा ने वृहस्पति की पत्नी तारा का अपहरण किया था जिससे उसे बुध नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ जो बाद में क्षत्रियों के चंद्रवंश का प्रवर्तक हुआ। इस वंश के राजा ख़ुद को चंद्रवंशी कहते थे।

चन्द्रमा माँ का सूचक है और मनं का करक है |शास्त्र कहता है की "चंद्रमा मनसो जात:" | इसकी कर्क राशि है | कुंडली में चंद्र अशुभ होने पर। माता को किसी भी प्रकार का कष्ट या स्वास्थ्य को खतरा होता है, दूध देने वाले पशु की मृत्यु हो जाती है। स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है। घर में पानी की कमी आ जाती है या
नलकूप, कुएँ आदि सूख जाते हैं मानसिक तनाव,मन में घबराहट,तरह तरह की शंका मनं में आती है औरमनं में अनिश्चित भय व शंका रहती है और सर्दी बनी रहती है। व्यक्ति के मन में आत्महत्या करने के विचार बार-बार आते रहते हैं।

उत्तरा कालमित्रा के अनुसार, चंद्रमा के कुछ मुख्य महत्व इस प्रकार हैं –

1. बुद्धि 2. सुंगध 3. पेट में छिपे हुए नासूर वाले परेशानियां 4.महिला 5. नींद 6. खुशी 7. तरल पदार्थ 8. मलेरिया बुखार 9. माता 10. मोती 11. नमक 12. दिमाग 13. मुहुर्त या 48मिनट की अवधि 14. गौरी की पूजा 15. दही प्रेम 16. वह जो तपस्या करता है 17. रात को मजबूत 18. भोजन 19. चेहरे की चमक 20. अच्छे फल 21.मछली और अन्य जलीय प्राणी 22. कपड़े।

यह देखा गया है कि मजबूत चन्द्र उपर्युक्त चीजों में काफी अच्छा रखता है जबकि एक कमजोर चांद इन्हीं वस्तुओं में कुछ कमी भी लाता है।




आप दिये हुए मंत्र का जाप करके देखिये तो आपको बहोत लाभ प्राप्त होगा,मंत्र का जाप रात्री के समय मे सिर्फ 11 बार सोमवार से शुरू करना है l





चंद्र मंत्र:-

ll ओम गुरूजी सोमवार मनलागी सेन।निरमल काया,पाप न पुण्य अमर बरसाया।जस नजर सोमवार करे।सोमवार
अत्रि गोत्र श्वेत वर्ण ग्यारह हजार जाप। जमुना तट देश अग्नि स्थान,चतुर्थ मंडल ४ अंगुल।कर्क राशि के गुरू को नमस्कार।
सत फिरे तो वाचा फिरे,पानफूल वासना
सिंहासन धरे।तो इतरो काम सोमवार जी महाराज करे।ओम फट् स्वाहा ll








आदेश......

शुक्र शाबर मंत्र.

महर्षि अंगिरा के पुत्र जीव तथा महर्षि भृगु के पुत्र कवि समकालीन थे |यज्ञोपवीत संस्कार के बाद दोनों ऋषियों की सहमति से अंगिरा ने दोनों बालकों की शिक्षा का दायित्व लिया |कवि महर्षि अंगिरा के पास
ही रह कर अंगिरानंदन जीव के साथ ही विद्याध्ययन करने लगा |आरम्भ में तो सब सामान्य रहा पर बाद में अंगिरा अपने पुत्र जीव की शिक्षा कि ओर विशेष ध्यान देने लगे व कवि कि उपेक्षा करने लगे |कवि ने इस भेदभाव पूर्ण व्यवहार को जान कर अंगिरा से अध्ययन बीच में ही छोड़ कर जाने कि अनुमति ले ली और गौतम ऋषि के पास पहुंचे | गौतम ऋषि ने कवि कि सम्पूर्ण कथा सुन कर उसे महादेव कि शरण में जाने का उपदेश दिया |महर्षि गौतम के उपदेशानुसार कवि ने गोदावरी के तट पर शिव की कठिन आराधना की | स्तुति व आराधना से प्रसन्न हो कर महादेव ने कवि को देवों को भी दुर्लभ मृतसंजीवनी नामक विद्याप्रदान की तथा कहा की जिस मृत व्यक्ति पर तुम इसका प्रयोग करोगे वह जीवित हो जाएगा | साथ
ही ग्रहत्व प्रदान करते हुए भगवान शिव ने कहा कि आकाश में तुम्हारा तेज सब नक्षत्रों से अधिक होगा |तुम्हारे उदित
होने पर ही विवाह आदि शुभ कार्य आरम्भ किये जायेंगे | अपनी विद्या से पूजित होकर भृगु नंदन शुक्र दैत्यों के गुरु पद पर नियुक्त हुए | जिन अंगिरा ऋषि ने उन के साथ
उपेक्षा पूर्ण व्यवहार किया था उन्हीं के पौत्र
जीव पुत्र कच को संजीवनी विद्या देने में शुक्र ने किंचित भी संकोच नहीं किया |
ज्योतिष शास्त्र में शुक्र को शुभ ग्रह माना गया है | ग्रह मंडल में शुक्र को मंत्री पद प्राप्त है| यह वृष और तुला राशियों का स्वामी है |यह मीन राशि में उच्च का तथा कन्या राशि में नीच का माना जाता है | तुला 20 अंश तक इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है |शुक्र अपने स्थान से सातवें स्थान को पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को शुभकारक कहा गया है |जनम कुंडली में शुक्र सप्तम भाव का
कारक होता है |शुक्र की सूर्य -चन्द्र से शत्रुता , शनि – बुध से मैत्री और गुरु – मंगल से समता है | यह स्व ,मूल त्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में ,शुक्रवार में , राशि के मध्य में ,चन्द्र के साथ रहने पर ,
वक्री होने पर ,सूर्य के आगे रहने पर ,वर्गोत्तम नवमांश में , अपरान्ह काल में ,जन्मकुंडली के तीसरे ,चौथे, छटे ( वैद्यनाथ छटे भाव में शुक्र को निष्फल मानते हैं ) व बारहवें भाव में बलवान व शुभकारक होता है | शुक्र कन्या राशि में स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं तथा
इसके अतिरिक्त कुंडली में अपनी स्थिति
विशेष के कारण अथवा किसी बुरे ग्रह के प्रभाव में आकर भी शुक्र बलहीन हो जाते हैं। शुक्र पर बुरे ग्रहों का प्रबल प्रभाव जातक के वैवाहिक जीवन अथवा प्रेम संबंधों में समस्याएं पैदा कर सकता है। महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर बुरे
ग्रहों का प्रबल प्रभाव उनकी प्रजनन
प्रणाली को कमजोर कर सकता है तथा उनके ॠतुस्राव, गर्भाशय अथवा अंडाशय पर भी नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है जिसके कारण उन्हें संतान पैदा करनें में
परेशानियां आ सकतीं हैं। शुक्र शारीरिक
सुखों के भी कारक होते हैं तथा संभोग से लेकर हार्दिक प्रेम तक सब विषयों को जानने के लिए कुंडली में शुक्र की स्थिति महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। शुक्र का प्रबल प्रभाव जातक को रसिक बना देता है तथा
आम तौर पर ऐसे जातक अपने प्रेम संबंधों को लेकर संवेदनशील होते हैं। शुक्र के जातक सुंदरता और एश्वर्यों का भोग करने में शेष सभी प्रकार के जातकों से आगे होते हैं। शरीर के अंगों में शुक्र जननांगों के
कारक होते हैं तथा महिलाओं के शरीर में शुक्र प्रजनन प्रणाली का प्रतिनिधित्व भी करते हैं तथा महिलाओं की कुंडली में शुक्र पर किसी बुरे ग्रह का प्रबल प्रभाव उनकी
प्रजनन क्षमता पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है। कुंडली धारक के जीवन में पति या पत्नी का सुख देखने के लिए भी
कुंडली में शुक्र की स्थिति अवश्य देखनी चाहिए।
शुक्र को सुंदरता की देवी भी कहा जाता है और इसी कारण से सुंदरता, ऐश्वर्य तथा कला के साथ जुड़े अधिकतर क्षेत्रों के कारक शुक्र ही होते हैं, जैसे कि फैशन जगत तथा इससे जुड़े लोग, सिनेमा जगत तथा इससे जुड़े लोग, रंगमंच तथा इससे जुड़े लोग, चित्रकारी तथा चित्रकार,
नृत्य कला तथा नर्तक-नर्तकियां, इत्र तथा इससे संबंधित व्यवसाय, डिजाइनर कपड़ों का व्यवसाय, होटल व्यवसाय तथा अन्य ऐसे व्यवसाय जो सुख-सुविधा तथा ऐश्वर्य से जुड़े हैं।


यह मंत्र आपको सभी प्रकार के लाभ जो शुक्र देव के कृपा से मिलता है देने मे तत्पर है,शुक्रवार के दिन से रात्री मे मंत्र का 11 बार जाप रोज करे तो आपको अनुभुती अवश्य प्राप्त होगा l

शुक्र मंत्र:-ll ओम गुरूजी शुक्रवार शुक्राचार।मन धरो धीर। कोई नर नारी वीर।नौ नाड़ी बहत्तर कोठा की रक्षा करे। शुक्रवार भार्गव गोत्र,श्वेत वर्ण सोलह हजार जाप,भोजकट देशपूर्व स्थान,पंचकोण मंडल ९ अंगुल वृषतुला राशि के गुरू को नमस्कार।सत फिरे तो वाचा फिरे।पानफूल वासना सिंहासन धरे।तो इतरो काम शुक्रवार जीमहाराज करे। ओमफट्स्वाहा ll






आदेश......

बुध शाबर मंत्र.

ज्योतिष में बुध ग्रह को मुख्य रूप से वाणी और बुद्धि का कारक माना जाता है। इसलिए बुध के प्रबल प्रभाव वाले जातक आम तौर पर बहुत बुद्धिमान होते हैं तथा उनका अपनी वाणी पर बहुत अच्छा नियंत्रण होता है जिसके चलते वे अपनी बुद्धि तथा वाणी कौशल के बल पर मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों को भी
अपने अनुकूल बना लेने में सक्षम होते हैं। ऐसे जातकों की वाणी तथा व्यवहार आम
तौर पर अवसर के अनुकूल ही होता है
जिसके कारण ये अपने जीवन में बहुत लाभ प्राप्त करते हैं। किसी भी व्यक्ति
से अपनी बुद्धि तथा वाणी के बल पर अपना काम निकलवा लेना ऐसे लोगों की
विशेषता होती है तथा किसी प्रकार की बातचीत, बहस या वाक प्रतियोगिता में इनसे जीत पाना अत्यंत कठिन होता है। आम तौर पर ऐसे लोग सामने वाले की शारीरिक मुद्रा तथा मनोस्थिति का
सही आंकलन कर लेने के कारण उसके द्वारा पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों के बारे में पहले से ही अनुमान लगा लेते हैं तथा
इसी कारण सामने वाले व्यक्ति के प्रश्न पूछते ही ये उसका उत्तर तुरंत दे देते हैं।
इसलिए ऐसे लोगों से बातचीत में पार पाना किसी साधारण व्यक्ति के बस की बात नहीं होती तथा ऐसे जातक अपने वाणी कौशल तथा बुद्धि के बल पर आसानी से सच को झूठ तथा झूठ को सच साबित कर देने में भी सक्षम होते हैं। अपनी इन्हीं विशेषताओं के चलते बुध आम तौर पर उन्हीं क्षेत्रों तथा उनसे जुड़े लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए चतुर वाणी, तेज गणना तथा बुद्धि
कौशल की आवश्यकता दूसरे क्षेत्रों
की अपेक्षा अधिक होती है जैसे कि वकील, पत्रकार, वित्तिय सलाहकार तथा अन्य प्रकार के सलाहकार, अनुसंधान तथा
विश्लेषणात्मक क्षेत्रों से जुड़े व्यक्ति, मार्किटिंग क्षेत्र से जुड़े लोग, व्यापार जगत से जुड़े लोग, मध्यस्थता करके मुनाफा कमाने वाले लोग, अकाउंटेंट, साफ्टवेयर
इंजीनियर, राजनीतिज्ञ, राजनयिक,
अध्यापक, लेखक, ज्योतिषि तथा ऐसे ही
अन्य व्यवसाय तथा उनसे जुड़े लोग। इस प्रकार यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि आज के इस व्यसायिक जगत में बुध ग्रह के प्रभाव वाले जातक ही सबसे अधिक सफल पाये जाते हैं।

बुध को ज्योतिष की गणनाओं के लिए ज्योतिषियों का एक वर्ग तटस्थ अथवा नपुंसक ग्रह मानता है जबकि ज्योतिषियों का दूसरा वर्ग इन्हें स्त्री ग्रह मानता है। मनुष्य के शरीर में बुध मुख्य रूप से वायु तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। कन्या
राशि में स्थित होने से बुध सर्वाधिक बलशाली हो जाते हैं जो कि इनकी अपनी
राशि है तथा इस राशि में स्थित होने पर बुध को उच्च का बुध भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त मिथुन राशि में स्थित होने से भी बुध को अतिरिक्त बल प्राप्त होता है तथा यह राशि भी बुध की अपनी राशि
है। कुंडली में बुध का प्रबल प्रभाव होने
पर कुंडली धारक सामान्यतया बहुत व्यवहार कुशल होता है तथा कठिन से कठिन अथवा उलझे से उलझे मामलों को भी कूटनीति से ही सुलझाने में विश्वास रखता है। ऐसे जातक बड़े शांत स्वभाव के होते हैं तथा प्रत्येक मामले को सुलझाने में अपनी चतुराई से ही काम लेते हैं तथा इसी कारण ऐसे जातक अपने सांसारिक जीवन में बड़े सफल होते हैं जिसके कारण कई बार इनके आस-पास के लोग इन्हें स्वार्थी तथा पैसे के पीछे भागने वाले भी कह देते हैं किन्तु ऐसे जातक अपनी धुन के बहुत पक्के होते हैं तथा लोगों की कही
बातों पर विचार न करके अपने काम में ही
लगे रहते हैं। बुध मीन राशि मे स्थित होने पर बलहीन हो जाते हैं और इसी कारण मीन राशि में स्थित बुध को नीच का बुध भी कहा जाता है।

इसके अतिरिक्त बुध किसी कुंडली में अपनी स्थिति विशेष के कारण अथवा
किसी बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण भी बलहीन हो सकते हैं जिसके कारण जातक पेट, गले या नर्वस तंत्र से संबंधित समस्याओं अथवा बिमारियों से पीडित हो सकता है। इसके अतिरिक्त बुध पर किन्हीं विशेष बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक को आंतों की बिमारी, दमा, त्वचा के रोग,
अनिद्रा, मनोवैज्ञानिक रोग तथा ऐसी ही कई अन्य बिमारियों से पीडित कर सकता है।


बुध ग्रह का शाबर मंत्र आपके जिवन मे सुख प्रदायक होगा,इसके लिये बुधवार को सवेरे 5 से 6 बजे के बीच मे रोज मंत्र का 11 बार जाप करे-


बुध मंत्र:-

ll ओम गुरूजीबुधवार बुध लेकर जूंझे।पॉंच पचीस ले घट में चढ़े। निसाण घुरावे।आवागमन मेंकदे नआवे।।बुध करो शुद्ध,घर सगत पाणी भरे,। बुधवार अत्रि गोत्र,पीत वरण चार हजार जाप मगहद देश,ईशान कोण स्थान।बाणाकारमंडल ४
अंगुल।कन्या मिथुन राशि के गुरूको नमस्कार।।सत फिरे तो वाचाफिरे।। पान फूल वासना सिंहासन धरै।तो इतरो काम बुधवार जी महाराज करे।। ओम फट् स्वाहा ll







आदेश.....

गुरू ग्रह शाबर मंत्र.

खगोल शास्त्र और ज्योतिष में सौरमंडल के नौ ग्रहों में सूर्य सहित शुक्र और बृहस्पति आते हैं। सप्ताह के सात दिनों का नामकरण में भी इन तीनों से तीन दिनों का
नाम जुडा हुआ है। परस्पर तीनों की तुलना में सूर्य सर्वाधिक प्रकाशवान हैं, सबसे बडे और सबसे भारी हैं। बृहस्पति ग्रह का एक पर्यायवाची शब्द जो प्रचलन में व्यापक देखने को मिलता है वह गुरू शब्द है। गुरू शब्द के अनेक अर्थ होते हैं जिनमें आधार भूत अर्थ जो अधंकार को मिटाये, भारी, ब़डा इत्यादि हैं। पौराणिक साहित्य में देवताओं के गुरू बृहस्पति हैं और असुरों के गुरू शुक्र शुक्राचार्य हैं। अत: इन तीनों
यथा सूर्य, बृहस्पति और शुक्र में गुरू का संबोधन सूर्य को न दिया जाकर बृहस्पति को क्यों दिया गया हैक् यह एक सहज जिज्ञासा है।

जिन व्यक्तियों पर बृहस्पतिदेव की कृपा एवं प्रभाव होता है, वे परोपकारी, कर्तव्यपरायण, संतुष्ट एवं कानून का पालन करने वाले होते हैं। बृहस्पति को धनु एवं मीन राशियों का स्वामित्व प्राप्त है यह दोनों राशियाँ बृहस्पति के दो रूपों का आरेखन करती है। धनुष-बाण से लक्ष्य साधता धनुर्धर, आत्मविश्वास, आशावाद और लक्ष्य भेदन की क्षमता का प्रतीक है, तो जल में विचरण करती मीन शांत परंतु सतत कार्यशीलता, आसानी से प्रभावित न होने एवं पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। पाराशर जी ने बृहस्पति देव का चित्रांकन एक धीर, गंभीर, चिंतक एवं ज्ञान के अतुल
भंडार के रूप में किया। चौडा ललाट अच्छे भाग्य की निशानी माना जाता है तथा उन्नत चौडा ललाट बृहस्पति देव का ही विषय क्षेत्र है। जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर बृहस्पतिदेव का अधिकार है, जैसे- शिक्षा, विवाह, संतान, धर्म, धन, परोपकार, जीवन के इन पक्षों से संतुष्ट व्यक्ति नि:संदेह भाग्यशाली होगा। एक महत्वपूर्ण ग्रंथ के श्लोक में वर्णित है कि ब्रह्मा ने कष्ट एवं दु:ख के भवसागर को
पार करने के लिए बृहस्पति और शुक्र नामक दो चप्पू बनाए। इनकी सहायता से व्यक्ति दोष रूपी समंदर को पार करके दूसरे किनारे पहुंच सकता है, जहाँ शुभ कर्म हैं अत: सात्विक गुणों के प्रदाता बृहस्पतिदेव ही हैं। भारत में गुरू को, शिक्षक को, विद्यादाता को, मंत्रदाता को, मार्गदर्शक को सर्वोच्चा श्रद्धा का अधिकारी माना गया है। जो देश, ज्ञान के पूजक हैं उन सबमें गुरू को सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। कृष्ण जगद्गुरू हैं, वेदव्यास मंत्र गुरू हैं इसलिए हम उन्हें
पूजते हैं। गुरू नानक और गोविन्द सिंह तक दस गुरू मार्गदर्शक होने के कारण पूजे जाते हैं। उनके बाद उनकी गुरू
परम्परा ग्रंथ साहेब में समाहित हुई इसलिए ग्रंथ की पूजा होती है।

वेदकाल में गुरू को सर्वाधिक बडे होने के कारण तथा बुद्धि और वाणी के अधिष्ठाता होने के कारण जो गरिमा प्राप्त हुई उसके कारण बृहस्पति नाम लोकप्रिय हो गया। यही कारण है कि अनेक ऋषियों, आचार्यो एवं ज्योतिर्विदों के नाम भी बृहस्पति पाये जाते हैं। एक आचार्य बृहस्पति ज्योतिविज्ञानी के रूप में प्रसिद्ध हैं जो खगोल, कालगणना और संवत्सरों के नामकरण के लिए भी विख्यात हैं। बार्हस्पत्य मान के अनुसार ही हम आज भी संवत्सरों के नाम विलम्बी आदि
उद्धृत करते हैं। बृहस्पति देवगुरू और शुक्राचार्य दैत्यगुरू कहे जाते हैं। दैत्यों और देवों में सदा से तनातनी रही है, विश्वयुद्ध इसी कारण होते थे। देव, दैत्यों का संहार कर देते थे पर वे पुन: फलने-फूलने लगते थे। इसका कारण माना जाता था, मृत संजीवनी विद्या, जो दैत्य गुरू शुक्राचार्य के पास थी। इस विद्या को प्राप्त करने का प्रयत्न देवगण किया करते थे। देवगुरू बृहस्पति भी इसमें मदद देते
थे। एक बार देवों ने देवगुरू बृहस्पति के पुत्र कच को किसी न किसी प्रकार से यह विद्या प्राप्त करने के लिए शुक्राचार्य के पास शिष्य बनाकर भेजा। कच मन लगाकर सैक़डों वर्षो तक अनेक विद्याओं का अध्ययन करता रहा। इस दौरान शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी को कच से प्रेम हो गया। फिर क्या हुआ- यह कथा तो महाभारत के कारण जन-जन में परिज्ञात हो ही गई है। इस पर कथाएं, काव्य आदि भी खूब लिखे गये हैं। यह अपने आपमें प्रतीक कथा है,
वह बात अलग है।

आपको गुरू ग्रह से प्राप्त लाभ एवं हानि की जानकारी अन्य साइट्स पर उपलब्ध होगी,मै यहा सिर्फ गुरू ग्रह का शाबर मंत्र दे रहा हू जिसका गुरुवार से मंत्र जाप शुरू करके,11 बार मंत्र जाप दिन के समय मे करना है l






गुरू ग्रह मंत्र:-

ll ओम गुरूजी बृहस्पतिवार मनमें बसे।पांचो इन्द्रिय बस मे करे।सो निशि घर उग्या भाण। ध्यावो बृहस्पतिवार गंगाका है
सिनान।बृहस्पतिवार अंगिरा गोत्र,पीत वरण उन्नीस हजार जाप सिन्धुदेश उत्तर
स्थान, चतुर्थ मंडल ६ अंगुल।धनु मीन राशि केगुरू को नमस्कार।सत फिरे तो
वाचा फिरे।पान फूल वासना सिहासन धरे तो इतरो काम बृहस्पतिवारजी महाराज करे। ओम फट् स्वाहा ll








आदेश......

मंगल शाबर मंत्र.

मंगल ग्रह की उत्पत्ति का पौराणिक वृत्यांत स्कंद पुराण के अवंतिका खण्ड में आता है की एक समय उज्जयिनी पुरी में अंधक नाम से प्रसिद्ध दैत्य राज्य करता था | उसके महापराक्रमी पुत्र का नाम कनक दानव था | एक बार उस महाशक्तिशाली वीर ने युध्य के लिए इन्द्र को ललकारा तब इन्द्र ने क्रोधपूर्वक उसके साथ युध्य करके उसे मार गिराया |दोष एक ज्योतिषीय स्थिति है जो तब होता है यदि वैदिक ज्योतिष के जन्मांग चक्र के 1, 4, 7, 8 और 12वे घर में मंगल हो | उस दानव को मारकर वे अंधकासुर के भय से भगवान शंकर को ढूंढते हुए कैलाश पर्वत पर चले गये | वह देवताओं के स्वामी इन्द्र ने भगवान चंद्रशेखर के दर्शन करके अपनी अवस्था उन्हें बतायी और प्रार्थना की, भगवन ! मुझे अंधकासुर से अभय दीजिये | इन्द्र का वचन सुनकर शरणागत वत्सल शिव ने अभय देते हुए कहा - इन्द्र तुम अंधकासुर से भय न करो | इसके पश्च्यात भगवान शिव ने अंधकासुर को युद्ध के लिए ललकारा, युद्ध अत्यंत घमासान हुआ, और उस समय लड़ते - लड़ते भगवान शिव के मस्तक से पसीने की एक बूंद
पृथ्वी पर गिरी, उससे अंगार के सामान लाल अंग वाले भूमिपुत्र मंगल उत्पन्न हुए | अंगारक , रक्ताक्ष तथा महादेव पुत्र, इन नामो से स्तुति कर ब्राह्मणों ने उन्हें ग्रहों के
मध्य प्रतिष्ठित किया, तत्पश्चात उसी स्थान पर ब्रम्हाजी ने मंगलेश्वर नामक उत्तम शिवलिंग की स्थापना की | वर्तमान में यह स्थान मंगलनाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है, जो उज्जैन में स्थित है | मंगल देव जब बालक रूप में उत्पन्न हुए तब उनका तेज़ बहुत ज्यादा था, जिससे देवता एवं मनुष्य गण पीड़ित होने लगे, तब भगवान शिव ने उन्हें गोद में उठाया और उनसे बोले, हे बालक ! तुम मेरी ही राजस प्रकृति से उत्पन्न हुए हो, लोगो को त्रास मत दो, मै तुम्हे ग्रहों के सेनापति का पद प्रदान करता हूँ | तुम अवंतिका नगरी में निवास करो और लोगो का मंगल करो !

ज्योतिष के अनुसार मंगल की चार भुजाएँ है | इनके शारीर के रोए लाल है तथा इनके हाथो में अभय मुद्रा, त्रिशूल, गदा और वर मुद्रा है | इन्होने लाल माला और लाल वस्त्र धारण कर रखे है | इनके मस्तक पर स्वर्ण मुकुट है तथा ये मेष ( मेंढा ) के वहां पर स्वर है | ज्योतिष में मंगल को क्रूर ग्रह माना गया है जिसका अर्थ अग्नि के समान लाल है, इसलिए इसे
अंगारक भी कहते है | वे स्वतंत्र प्रकृति के तथा अनुशासन प्रिय है | इस ग्रह से प्रभावित जातक सेनाध्यक्ष या राजदूत आदि होते है या उच्च पदों पर कार्य करते है | उनमे नेतृत्व शक्ति विशेष होती है | वे निडर होते है, किसी भी प्रकार का जोखिम ले सकते है | खिलाडी, वायुसेना, थलसेना, नौसेना के अध्यक्ष तथा उच्च पदों पर आसीन राजनीतिज्ञ मंगल से प्रभावित माने जाते है | मंगल को भौम, कुज आदि नामो से भी जाना जाता है | नवग्रहों में मंगल को सेनापति की संज्ञा दी गई है | शारीरिक
तौर पर मंगल प्रभावित जातक स्वस्थ और माध्यम लम्बे कद के होते है | कमर पतली, छाती चौड़ी, बाल घुंगराले और आँखे लाल होती है | उनके चेहरे पर तेज होता है | मंगल मेष एवं वृशिक राशी के स्वामी है | मृगशिरा, चित्रा और घनिष्ठा नक्षत्रो का स्वामित्व भी मंगल को ही प्राप्त है | मंगल तृतीय एवं षष्ठ भाव के कारक ग्रह है | कर्क एवं सिंह लग्न की कुंडली में ऐ विशेष कारक माने जाते है एवं मिथुन और कन्या लग्न की कुंडली में यह विशेष अकारक ग्रह बन जाते है | मंगल मकर राशि में उच्च एवं कर्क राशि में नीच के होते है | जन्म-कुंडली में मंगल जिस भाव में स्थित होते है, उस भाव से सम्बंधित कार्य को अपनी स्थिति के अनुसार सुदृढ़ करते है | शुभ मंगल, मंगलकारी और अशुभ मंगल, अमंगलकारी कार्य करवाते है | मंगल शक्ति, साहस, क्रोध, युद्ध, दुर्घटना, षड़यंत्र, बीमारियों, विवाद, भूमि सम्बन्धी आदि कार्यो का कारक ग्रह है | मंगल तांबे, खनिज पदार्थो , सोने, मूंगे, हथियार, भूमि आदि का प्रतिनिधित्व करता है | मंगल शिराओं व धमनियों की टूट-फूट, अस्थि मज्जा के रोग, रक्त्रस्राव, गर्भपात, मासिक धर्म में अनियमितता, सुजाक गठिया
और दुर्घटना तथा जलना का प्रतिक है | अशुभ मंगल अमंगलकारी हो जाता है | जिसके प्रभाव से जातक आतंकवादी, दुराचारी, षड्यंत्रकारी और विद्रोही बनता है | मंगल की क्रूरता के कारण ही वर-वधु
की कुंडली में मंगल का मिलान आवश्यक
होता है | दांपत्य जीवन सुखमय हो इसके लिए वर -वधु दोनों की कुंडली में मंगल ग्रह
की स्थिति देखकर मिलान किया जाना चाहिए एवं मंगल शांति अवश्य करवाना चाहिये | मंगल ग्रह की शांति के लिए शिव उपासना एवं मूंगा रत्ना धारण करने का भी विधान है |

आज के समय मे मंगल शाबर मंत्र सबसे ज्यादा लाभ देने मे तत्पर है,सिर्फ मेरे ही साइट पर आपको ग्रहो के शाबर मंत्र प्राप्त हो रहे जो अन्य साइट्स पर नही है l शाबर मंत्रो मे बहोत शक्ती होता है इसलिये इनका ज्यादा जाप करना जरुरी नही है l इस मंत्र का दिन के समय मे सिर्फ 10 बार मंत्र जाप करे तो अवश्य लाभ मिलेगा और आप चाहे तो 10 हजार मंत्र जाप भी कर सकते है l



मंगलनाथ मंत्र:-

ll ओम गुरूजी मंगलवार मन कर बन्दा,जन्ममरण का कट जावे फन्दा।जन्म मरण का भागे कार।तो गुरू पावूं मंगलवार। मंगलवार भारद्वाज गोत्र,रक्त वर्ण दस हजार जाप अवन्तिदेश।दक्षिण स्थान त्रिकोण मंडल तीन अंगुल,वृश्चिक
मेष राशि के गुरू को नमस्कार।सत फिरे तो वाचा फिरे।पान फूल वासना सिंहासन धरै।तो इतरो काम मंगलवार जी महाराज करे। ओम फट् स्वाहा ll







आदेश....

सूर्य शाबर मंत्र.

वैदिक और पौराणिक आख्यानों के अनुसार भगवान श्री सूर्य समस्त जीव-जगत के आत्मस्वरूप हैं। ये ही अखिल सृष्टि के आदि कारण हैं। इन्हीं से सब
की उत्पत्ति हुई है। पौराणिक सन्दर्भ में सूर्यदेव की उत्पत्ति के अनेक प्रसंग प्राप्त होते हैं। यद्यपि उनमें वर्णित घटनाक्रमों में अन्तर है, किन्तु कई प्रसंग परस्पर मिलते-जुलते हैं। सर्वाधिक प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान सूर्य महर्षि कश्यप के पुत्र हैं। वे महर्षि कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए। अदिति के पुत्र होने के कारण ही उनका एक नाम आदित्य हुआ। पैतृक नाम के आधार पर वे काश्यप प्रसिद्ध हुए। संक्षेप में यह कथा इस प्रकार है- एक बार दैत्य-दानवों ने मिलकर देवताओं को पराजित कर दिया। देवता घोर संकट में पड़कर इधर-उधर भटकने लगे। देव-माता अदिति इस हार से दु:खी होकर भगवान सूर्य की उपासना करने लगीं। भगवान सूर्य प्रसन्न होकर अदिति के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने अदिति से कहा- देवि! तुम चिन्ता का त्याग कर दो। मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा तथा अपने हज़ारवें अंश से तुम्हारे उदर से प्रकट होकर तेरे पुत्रों की रक्षा करूँगा।' इतना कहकर भगवान सूर्य अन्तर्धान हो गये।

कुछ समय के उपरान्त देवी अदिति गर्भवती हुईं। संतान के प्रति मोह और मंगल-कामना से अदिति अनेक प्रकार के व्रत-उपवास करने लगीं। महर्षि कश्यप ने कहा- 'अदिति! तुम गर्भवती हो, तुम्हें अपने
शरीर को सुखी और पुष्ट रखना चाहिये, परन्तु यह तुम्हारा कैसा विवेक है कि तुम व्रत-उपवास के द्वारा अपने गर्भाण्ड को ही नष्ट करने पर तुली हो। अदिति ने कहा- 'स्वामी! आप चिन्ता न करें। मेरा गर्भ साक्षात सूर्य शक्ति का प्रसाद है। यह सदा
अविनाशी है।' समय आने पर अदिति के गर्भ से भगवान सूर्य का प्राकट्य हुआ और बाद में वे देवताओं के नायक बने। उन्होंने देवशत्रु असुरों का संहार किया। भगवान सूर्य के परिवार की विस्तृत कथा भविष्य पुराण , मत्स्य पुराण , पद्म पुराण , ब्रह्म पुराण, मार्कण्डेय पुराण तथा साम्बपुराण में वर्णित है। ब्रह्मा, विष्णु , महेश आदि देवगणों का बिना साधना एवं भगवत्कृपा के प्रत्यक्ष दर्शन होना सम्भव नहीं है। शास्त्र के आज्ञानुसार केवल भावना के द्वारा ही ध्यान और समाधि में उनका अनुभव हो पाता है, किन्तु भगवान सूर्य नित्य सबको
प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं। इसलिये प्रत्यक्ष देव भगवान सूर्य की नित्य उपासना करनी
चाहिये।

ज्योतिष में सर्वाधिक शक्तिशाली ग्रह के रूप में मान्यता प्राप्त सूर्य की महिमा जगविदित है । नवें भाव एवम् पिता का कारक सूर्य कुंडली में जरा भी बिगङा हो तो इन दोनो भावों तहस नहस कर डालता है । एक रोचक बात पर ध्यान दे कि मंगल और सूर्य प्रधान व्यक्ति दोनों गुस्सेल प्रकृति के होते है लेकिन जहाँ मंगल प्रधान को निरीह पर क्रोध आता है वही सूर्य प्रधान व्यक्ति को निरीह को सताते देखकर गुस्सा आता है । सूर्य के बिगङने की स्थिति में मोटापा और ह्रदय रोग और रक्तचाप की शिकायत हो जाती है । इससे ज्यादा ज्योतिष के जलवे क्या होंगे कि रक्तचाप बिगङने पर जहाँ चिकित्सक नमक कम करने की सलाह देता है वही हम ज्योतिषी रविवार को व्रत करने और बिना नमक का एक समय खाना खाने की सलाह देते है । पिता के साथ संबंध सूर्य की स्थिति पर निर्भर करते है । मेष राशि में उच्च का सूर्य करिश्मा कर देता है वही नीच का या विपरीत सूर्य जीवन को कभी एक स्तर ऊपर नही उठने देता । सूर्य शनि से बिगङता है , दोनों की एक दूसरे पर गलत स्थानों से दृष्टि हो तो जीवन में उठा पटक रूकने का नाम नही लेती । शनि के अंतर सूर्य या सूर्य के अन्तर्गत शनि की अन्तर्दशा परेशानी पैदा करती है ।


यहा आज मै सूर्य शाबर मंत्र दे रहा हू जिसका लाभ साधक उठा सकते है,इस मंत्र के जाप का समय सवेरे 7 से 7:30 के बीच मे ही करना उपयुक्त है l मंत्र जाप का संख्या सिर्फ 15 मंत्र जिसमे आपको 10 मिनिट लगेगा और मंत्र साधना रविवार से शुरू करना है अन्य दिनो पर नही l





सूर्य शाबर मंत्र:-

ll ओम गुरूजी दीत दीत महादीत।दूत सिमरू दसो द्वार।घट मे राखे घेघट पार
तो गुरू पावूं दीतवार।दीतवार कश्यप
गोत्र,रक्त वर्ण जाप सात हजार कलिंग देश मध्य स्थान वर्तुलाकार मंडल १२ अंगुल सिंह राशि के गुरू को नमस्कार।सत फिरे
तो वाचा फिरे,पीन फूल वासना सिंहासन
धरे, तो इतरो काम दीतवार जी महाराज
करेओम फट् स्वाहा








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