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12 Mar 2018

महाकाल स्तोत्र एवं मंत्र साधना ।







आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् । भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

अर्थात:आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।


इस स्तोत्र को भगवान् महाकाल ने खुद भैरवी को बताया था  । इसकी महिमा का जितना वर्णन किया जाये कम है। इसमें भगवान् महाकाल के विभिन्न नामों का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की गयी है । शिव भक्तों के लिए यह स्तोत्र वरदान स्वरुप है । नित्य एक बार जप भी साधक के अन्दर शक्ति तत्त्व और वीर तत्त्व जाग्रत कर देता है । मन में प्रफुल्लता आ जाती है । भगवान् शिव की साधना में यदि इसका एक बार जप कर लिया जाये तो सफलता की सम्भावना बड जाती है ।

भगवान शंकर के अनेकों नाम है। भक्त भिन्न-भिन्न नामों से इनका गुणगान करते हैं, कोई महादेव तो कोई भोलेनाथ, कोई अघोरी तो कोई शंभु। भोलेनाथ के अलग-अलग रूपों के कारण ही उनके इतने नाम हैं। इन्हें तंत्र साधना का जनक भी कहा जाता है, इसलिए कोई भी तंत्र साधना उनके बिना पूरी नहीं होती। जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से इनकी अराधना करता है, उसके जीवन से बड़े-बड़े कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान शिव का एक स्वरूप महाकाल का भी है, यानि वे मृत्यु को भी अपने वश में रखते हैं। महामृत्युंजय मंत्र के विषय में तो यह भी माना जाता है कि वह आसन्न मृत्यु को भी टाल सकता है। लेकिन बहुत ही कम महाकाल स्तोत्रं के बारे में जानते हैं, जिसे स्वयं भगवान शिव ने भैरवी को बताया था। इस स्तोत्रं में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति की गई है। धार्मिक ग्रंथों की मानें तो यह स्तोत्रं भगवान शिव के भक्तों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

प्रतिदिन बस एक बार इस स्तोत्रं का जाप भक्त के भीतर नई ऊर्जा और शक्ति का संचार कर सकता है। इस स्तोत्रं का जाप आपको सफलता के बहुत निकट लेकर जा सकता है।

स्तोत्र को महाकाल मंत्र से संपुटित करके पढ़िए तो इसका आपको शीघ्र परिणाम प्राप्त होगा । इस स्तोत्र के साथ भगवान महाकाल जी के प्रिय मंत्र का जाप 11 बार करना है, यह एक ऋषियो का भक्तों के लिए वरदान है ।



सर्वप्रथम मंत्र 11,21 या 108 बार पढ़े,फिर स्तोत्र का 1,5,7,9,11 या 108 बार पाठ करे-

मंत्र-
।।हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।।






स्तोत्र-

ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पत
महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो
महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन
महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते
भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः
रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः
सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते
सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते
यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः
सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः
सचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमः
प्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुते
प्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमः
ॐ ह्रीं माया – स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसे
स्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमः ।।


फल श्रुति
इत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवी
कीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहम।।


मंत्र-
।।हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।।




स्तोत्र पठन के बाद फिर से मंत्र का जाप करे,मंत्र का जाप उतना ही करे जितना स्तोत्र पठन से पूर्व शुरुआत में किया था ।
यह स्तोत्र तो कई पर भी किसी भी शुद्ध स्थान पर पढ़ सकते है,स्नान करने के बाद किसी भी प्रकार के वस्त्र,आसन और किसी भी दिशा में मुख करके पढ़ सकते है । जो व्यक्ति असाध्य बीमारियों से ग्रसित हो वह बेड पर या खुर्ची पर बैठकर भी कर सकते है ।

अंततः इतना ही कहूंगा के महाकाल सब जानते है,कब किसको किस समय पर क्या देना उचित है । महाकालि साधना में यह साधना प्रयोग करने से विशेष सफलता प्राप्त होती है ।

‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का,
काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का'


आदेश......

11 Feb 2018

शिव दर्शन अघोरी मंत्र साधना

हे मेरे प्रिय भोलेनाथ, आपके कृपा से मैं जीवित हु ।
हर सांस भी आपको दे दु तो,वो भी आपकी ही है,अब आपही बताए आपको क्या अर्पित कर सकता हूँ ?

यही बात है जो हर शिव भक्त अपने दिल मे रखता है,करे तो क्या करे अपने प्रिय ईष्ट भगवान शिव जी के लिए,बहोत कुछ करने की चाह होती है और मन मे एक ही स्वप्न होता है के मैं शिव जी का आशिर्वाद प्राप्त करु ।

13 फरवरी को महाशिवरात्रि का दिव्य पावन अवसर है जिसे खोना नही चाहिए अपितु अपने ईष्ट के कृपा को प्राप्त करने के लिए भक्ति, सेवा या मंत्र जाप अवश्य करना चाहिए । कोई एक बुरा आदत छोड़ ही दो इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जैसे शराब पीना,सिगरेट पीना,मास खाना,घुटका खाना या फिर तंबाकू,जो भी इसमें से किसी भी शिव भक्त को बुरा आदत हो वह अब छोड़ ही दो । शिव भक्त को त्याग करना आना चाहिए और बुरे से बुरे आदतों को त्याग कर जो भी शिव भक्त भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ता है उसे शिव कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है ।

अघोरी बड़े नशे में धुत होते है और उनका दिमाग सातवे आसमान पर बैठकर बाते करता है के "मैं ये हु-मैं वो हु,मैं ये कर सकता हु-मैं वो कर सकता हु" । हमेशा याद रखो ऐसे लोग अघोरी नही अपितु चप्पल चोर होते है और इन्हें नशा करने के अलावा कुछ नही आता है । मैंने अपने जीवन मे ऐसे अघोरी देखे है जिनको नशे की आदत नही है और कुछ तो ऐसे भी देखे के वह चाहे कितना भी शराब पिये उनको नशा होता ही नही था । सच्चा अघोरी हो या फिर सच्चा शिव भक्त हो वह सिर्फ एक ही बात समझता हैं, शिवभक्ती से बड़ा नशा इस संसार में है ही नही ।

भक्त ही समझे भक्ति का नशा,
और कौन जाने क्या होता है नशा ।

इसलिए कह रहा हु के इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिवभक्ती के नशे में डूब जाओ परंतु बेकार के चीजो से नशा मत करो और अब तक नशा करते आये हो तो उसको अब त्याग दो,तो ही आप सच्चे शिवभक्त कहलाओगे अन्यथा ढोंगी भक्तों को हर बार भगवान से भिक मांगते रहना पड़ता है और सच्चे भक्तों को भगवान कुछ भी मांगने से पहिले ही आशीर्वाद के रूप में जो चाहे वह दे देते है ।

शिव जी पर तो शिवपुराण के साथ साथ कई ग्रंथ लिखे हुए है परंतु भोले बाबा को कैसे प्रसन्न करे यह तो रावण ने इस दुनिया को सिखाया था । माँ सती  में स्वयं के जीवन को त्याग दिया तब जाकर कहा माँ पार्वती के रूप में आज भी वह भोले बाबा के साथ विराजमान है,यही बात रावण ने समझ ली और दशानन रावण अपने मुण्ड को काट कर चढ़ा रहा था,वह भी अपने जीवन को त्याग रहा था परंतू शिव जी ने उसको रोक लिया और आत्मलिंग प्रदान कर दिया ।

अब रावण तो दूसरा कोई बनना है ही नही परंतु कुछ तो त्याग करके देख ही लो और नशे का त्याग करोगे तो गारंटी के साथ बोल रहा हु मरोगे नही ।

मेरा काम था समझाना,जिसे समझना है वो समझ लेगा और इसी विश्वास के साथ आज का यह अद्वितीय मंत्र साधना दे रहा हु ।

यह मंत्र मुझे एक विचित्र अघोरी बाबा ने दिया था,इस मंत्र से बहोत सारे काम होते है परंतु मैं सिर्फ आपको शिव जी के कृपा को प्राप्त करने हेतु साधना विधान बता रहा हु,बाकी इस मंत्र से काम कैसे करने है वह गोपनीय रखना आवश्यक है ।

महाशिवरात्रि के रात्रि में अन्नग्रहण ना करे,जो भी खाना हो वह सूर्यास्त से पहिले ही खाना है । शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने एक गाय के घी का दीपक जलाएं और उस दीपक के लौ में देखते हुये 3 घंटे तक जाप करे तो अवश्य ही शिव जी का दर्शन संभव है । साधना रात्रि में 9.30 बजे के बाद कभी भी शुरू करे सिर्फ 12 बजे से पहिले शुरू करे । आसन वस्त्र किसी भी रंग का चलेगा और मंत्र जाप के समय उत्तर दिशा में मुख करके बैठना है । जलते हुए दीपक के लौ में भोले बाबा के दर्शन संभव है,ऐसा मत सोचो के सामने आकर प्रत्यक्ष होंगे क्योंके प्रत्यक्ष दर्शन हेतु कठिन तपस्या की आवश्यकता होती है । साधना में धूपबत्ति जला सकते हो परंतु साधना कक्ष में ज्यादा धुवा मत करो नही तो आंखों में जलन होगा । दीपक के लौ में त्राटक करना है इसलिए ज्यादा से ज्यादा आंखों को खुला रखो ।

अघोर मंत्र

।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।

इसमें सिर्फ शब्द है,नाही ॐ है और नाही आदेश है और नाही कोई दूहाई है फिर भी यह एक अद्वितीय अघोर मंत्र है । मंत्र जाप के समय ज्यादा गर्मी महसूस हो तो साधना में से उठ जाना उचित रहेगा क्योंके साधना जबरदस्ती संपन्न मत करो ।

आदेश
।।ॐ नमः शिवाय ।।



Shiv Darshan Aghori Mantra Saadhna

"My Dear Lord, I am alive by your grace. Every breath that I take belongs to you. What can I offer to you when everything that is mine has been given by you "

These are the thoughts of every Shiv bhakt. Every Shiv bhakt wants to do a lot for his Lord and carries the dream that one day He or She will receive the Lord's blessing. 


This year,  Mahashivratri is falling on 13th February, and it is a very auspicious time to get Lord Shiva's blessings through bhakti ( devotion), seva ( servitude)  or Mantra jap. This Mahashivratri, leave some of the bad habits that you've been carrying uptill now, like drinking alcohol, smoking cigarettes, eating meat, or even chewing tobacco. Every Shiv bhakt should learn to sacrifice, and anyone who leaves his bad habits and follows the bhakti path of Shiva always receives His blessings. 

A lot of aghoris stay intoxicated and say things like " I'm this - I'm that- I can do this- I can do that". You should know that these people are not real aghoris, they are fakes and they don't know anything except staying intoxicated. I've seen aghoris that do not take intoxicants and I've also seen aghoris who can drink huge quantities of alcohol and still not get drunk. A real shiv bhakt only knows one thing - 

 Only a devotee can understand the intoxicantation of devotion, 


No one else can understand intoxication. 

That's why I'm saying, this year get intoxicated with the love of lord but leave other intoxicants like alcohol and cigarettes. And if you've been doing so uptill now,  stop. Only then you will be seen as a true shiv bhakt. If you, then you are no different from the fake bhakts of God who have to beg Him for everything while the real ones get everything from Him without asking. 


There have been a lot of Granths written about Lord Shiva, including the Shiv puran, but it was Ravana who taught people how to impress Him. He understood that Maa Sati had to give up her life before she could get a permanent place beside the Lord. So even he was ready to cut off his head and tribute it to Him, but he was stopped by Shiva who rewarded him with the Atma-lingam. 


Learn how to sacrifice from ravana, and leave intoxicants. You won't die, I assure you. 

My work was to advise,  and that is done. Those who have wisdom will follow what has been said. Keeping that in mind, I'm giving a mantra has no double. This was given to be by an aghori baba, it is used for a lot of purposes, but only giving the vidhi to get blessing of the lord, nothing else. 

Don't eat at night on mahashivratri, eat before the sunset. Light a cow ghee lamp/diya in front of a Shivling or a photo of Lord Shiva, and stare into its flame continously while chanting the mantra for 3 hours. If done with diligence, then Darshan of the lord is definitely possible. Begin after 9:30 pm anytime but before 12 am. The asan and  clothes can be of any colour but the direction has to be North. Darshan of lord Shiv is definitely possible inside the flame of the lamp. Don't think there will be a pratyaksh darshan, that is only possible through very difficult austerities. You can light Dhoop batti but take care that the room does not get filled with smoke or your eyes will start to tear. Keep your eyes open as much as you can as you need to do tratak while staring into the flame. 


Mantra 


" ।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।


" Bum Bum Bhole, Aghor Goura Parbati, Shivji Kunwara Sang Rahe" 



There are only words in this mantra,  but it is very powerful. If you feel hot during the chant, it would be better to get up rather than forcefully trying to complete the saadhna. 

Aadhesh... 


3 Feb 2018

महाशिवरात्रि साधना



ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने का मंत्रतात्मक-तंत्रात्मक मार्ग भगवान शिव का ग्रहाधिपति स्वरूप चन्द्रमौलिश्वर मंत्र  साधना है । यह साधना आनेवाले महाशिवरात्रि के अवसर पर अवश्य ही संपन्न कर प्रत्यक्ष लाभ उठाने का प्रयास करे ।

भगवान् शिव अपने ‘चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप’ द्वारा ग्रहों के दूषित प्रभावों से व्यक्ति को या साधक को छुटकारा दिलाते हैं, क्योंकि भगवान् चन्द्रमौलिश्वर देवाधिपति हैं, तंत्रेश्वर हैं, अतः समस्त मंत्र-तंत्र भी उनके अधीन हैं, ऐसे भगवान चन्द्रमौलिश्वर की साधना तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।

ग्रह का शाब्दिक अर्थ पकड़ लेना, कब्जे में कर लेना होता है। नवग्रह पृथ्वी-वासियों के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है और प्रत्येक मनुष्य नवग्रहों के प्रभाव से सन्तप्त या प्रसन्न होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य नवग्रहों के अधीन हैं। दुष्कर्म-सत्कर्म, पाप और पुण्य ग्रहों से ही संचालित होते हैं। ग्रहों के द्वारा त्रस्त होकर मनुष्य भांति-भांति के उपाय करता है, पर परिणाम आधा-अधूरा ही मिलता है। फिर मार्ग क्या है जिसके द्वारा रूष्ट ग्रह मनाए जा सकें और उनके प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त किया जा सके।

यों तो ग्रह किसी को नहीं छोड़ते चाहे वह गरीब हो या अमीर, या फिर देवता ही क्यों न हों। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं हमारे सामने, जिनसे यह ज्ञात होता है, कि ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर कितना अधिक प्रभाव पड़ता है ।भ गवान श्रीराम जी को भी शनि की दशा से ग्रस्त होकर महल को छोड़कर वन में चौदह साल तक दर-दर भटकना पड़ा, यह बात ओर है कि वाल्मीकि ने भक्ति भाव पूर्वक उस वनवास को कुछ और नाम दे दिया, किन्तु सत्य यही है कि राम को भी जीवन में ग्रहों के दूषित प्रभाव के कारण चौदह साल तक जंगलों में रहकर जीवनयापन करना पड़ा।

महात्मा बुद्ध को भी मंगल एवं राहु के दूषित प्रभाव से ग्रसित होकर, अपना राजपाट छोड़कर उन सबसे संन्यास लेना पड़ा और राजा हरिश्चन्द्र को भी शनि की साढ़े साती के प्रभाव के कारण अपना राज्य त्याग कर श्मशान में रहना पड़ा और यही नहीं, अपितु उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जब वह अपने पुत्र की लाश पर कफन भी न डाल सके, इस प्रकार की अनेकों ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इतने बड़े-बड़े महापुरुष भी ग्रहों के दूषित प्रभावों से बच नहीं पाये, भले ही इन घटनाओं को समाज ने कोई और (नाम) रूप दे दिया हो, किन्तु सत्य यही है, कि ग्रहों के प्रभाव से ही उनकी यह गति हुई।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए अवश्य ही ऐसी सत्ता के पास जाना पड़ेगा जिनके अधीन सभी ग्रह और नक्षत्र हैं, पर इससे पहले यह समझते हैं कि शास्त्र इसके विषय में क्या कहते हैं?

देवाधीनम् जगत
सर्वम् मंत्राधीनाश्च देवता –

देवताओं के अधीन समस्त जगत है, पर मंत्र के अधीन देवता हैं अर्थात् मंत्र जप द्वारा देवताओं को तुष्ट किया जा सकता है।
नवग्रहों को भी देवताओं का दर्जा दिया गया है। सूर्य जगत की आत्मा हैं, वे सौर मंडल के मुखिया हैं। चंद्रमा मन को शीतलता प्रदान करने वाले देव हैं। मंगल युद्ध (पराक्रम) के देवता हैं। बुध को व्यापार का देवता माना गया है। बृहस्पति देवताओं और शुक्र दानवों के गुरु हैं। गुरु का स्थान तो सर्वोपरि है। शनि एक अर्ध देवता हैं। राहु उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं और केतु दक्षिण चन्द्र आसंधि के देवता हैं।

ग्रह देवता स्वरूप हैं और सैद्धान्तिक रूप से मंत्रों के अधीन हैं। इसलिए ज्योतिषी आपकी जन्मपत्री का अध्ययन करके आपको ग्रहों की विपरीत दशा होने पर मंत्र जप की सलाह देते हैं और पंडित को यह कार्य देकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। पर ग्रह दशा तो दूर नहीं होती है।

ज्योतिष के अनुसार प्रमुख नौ ग्रह होते हैं – सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यों तो आकाश में सैकड़ों ग्रह हैं, किन्तु ज्योतिष विज्ञान में मुख्य ग्रह नौ ही माने जाते हैं, जिनका प्रभाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हमारे ऊपर पड़ता ही रहता है और इन्हीं के प्रभाव से हमें जीवन में सफलता-असफलता मिलती रहती है। हर ग्रह का मानव जीवन पर अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। इन नौ ग्रहों में भी पांच ग्रह ऐसे हैं, जिनका प्रभाव प्रायः व्यक्ति पर मुख्य रूप से देखने को मिलता ही है।

1. सूर्य – जन्मपत्रिका में यदि सूर्य की स्थिति व्यक्ति को विपरीत फल देने वाली हो, तो उसे समाज में बदनामी, विश्वासघात एवं कष्टप्रदायक जीवन बिताते हुए असफलताओं का शिकार होना पड़ता है।

2. मंगल – यदि मंगल की स्थिति जन्मपत्री में अच्छी न हो, तो व्यक्ति का जीवन कई प्रकार की उलझनों से ग्रस्त रहता है, जिनसे उसे जीवन भर तनाव बना रहता है, यह ग्रह व्यक्ति को जेल की यात्रा, चोर या हत्यारा आदि भी बना देता है।

3. शुक्र – स्वप्न दोष, विवाह-बाधा आदि इस ग्रह बाधा के कारण ही होते हैं।

4. शनि – जन्मपत्रिका में शनि की अच्छी स्थिति में ना होती व्यक्ति को एक-एक पैसे का मोहताज बना देती है, जिसके कारण व्यक्ति का जीवन दरिद्रता और गरीबी में बीतने पर वह शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तनावों से ग्रस्त होकर, मृत्यु तक को प्राप्त हो जाता है। इसके अलावा ऐक्सिडेन्ट, नौकरी छिन जाना, कोर्ट-कचहरी, डॉक्टरों आदि के चक्कर लगना आदि ये सब परेशानियां इस ग्रह बाधा के कारण ही मानव-मात्र को झेलनी पड़ती हैं।

5. राहु – इस ग्रह-दोष के कारण गृह कलह, आपसी मन मुटाव आदि अनेक प्रकार की समस्याओं से मनुष्य हर पल घिरा रहता है।


इस प्रकार अन्य ग्रह भी अपना दूषित प्रभाव मानव-जीवन पर डालते रहते हैं। जिनके चंगुल से बच निकलना मानव के लिए एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। कई व्यक्ति ढोंगी पण्डित-पुरोहितों के चंगुल में फंसकर उपरोक्त समस्याओं के निवारण हेतु उनके द्वारा बताए गये उपायों को आजमाते हैं, परन्तु उनसे उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता, अपने कार्यों की सिद्धि एवं सफलता के लिए वे उनसे कई प्रकार के छोटे-मोटे अनुष्ठान प्रयोग भी करवाते हैं, किन्तु फिर भी उनका अनुकूल फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, तब उनका देवताओं आदि पर से विश्वास उठने लगता है, क्योंकि वे उन समस्याओं एवं परेशानियों का कारण नहीं जान पाते, जबकि इन आपदाओं-विपदाओं का मूल कारण ‘ ग्रह-बाधा ’ ही है।



कैसे करें ग्रहों के दुष्प्रभाव का पूर्ण शमन?

देवता मंत्रों के अधीन हैं और नवग्रह देवता स्वरूप हैं फिर भी ग्रह शांति मंत्र के लिए किया गया जप सफल क्यों नहीं होता। यही सोच रहे हैं ना आप? चलिए समझते हैं इसे-

इत्थं रूपेण कीलेन
महादेवेन कीलितम्

दुर्गा सप्तशती के कीलक अध्याय में स्पष्टतः वर्णित है कि महादेव ने मंत्रों को कीलित कर दिया। महादेव ने मंत्रों पर ताला लगा दिया है जिससे ईर्ष्या और लोभवश इन मंत्रों का दुरुपयोग नहीं किया जा सके, इस कारण मंत्र कीलित हैं।

जैसे हलवाई की दुकान पर आप विभिन्न प्रकार की मिठाईयां देखते हैं, उनकी खुशबू सूंघते हैं और क्षणिक तृप्ति का अहसास भी होता है, पर उससे आपकी भूख तो नहीं मिटेगी, क्षुधा तो तृप्त नहीं होगी क्योंकि मोल देकर आपने वह मिष्ठान खाया नहीं।

इसी तरह नवग्रह शांति हेतु पंडितों द्वारा किया मंत्र जाप क्षणिक संतोष दे सकता है, एक दिवास्वप्न की तरह, उनसे ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि मंत्र कीलित हैं और उनका जप कोई और आपके लिए कर रहा है। जब आपको भोजन खाना है तो उसे पकाना भी पड़ेगा और खाना भी आपको ही पड़ेगा।



मंत्रों का निष्कीलन कैसे होगा?

ये विद्या किसे आती है? शास्त्रानुसार यह विद्या सिर्फ गुरु को आती है। गुरु आपकी योग्यता को भांप कर आपको उसके अनुरूप मंत्र देते हैं और साथ ही शक्तिपात द्वारा आपको सार्मथ्यवान बनाते हैं कि आप सफलता पूर्वक मंत्र जप करें और आपके मनोरथ दुष्ट ग्रहों के दुष्प्रभाव से अछुते रहें। यही कारण है कि, गुरु आशीर्वाद देते हुए कहते हैं –

मंत्रार्था सफला सन्तुः
सफला सन्तुः मनोरथाः

जिस कार्य हेतु आप मंत्र जप कर रहे हैं, वह सफल हो आपके मनोरथ पूर्ण हों और जब गुरु आशीर्वाद देते हैं, तो उसके उपरांत कार्य सिद्धि अवश्यम्भावी है।

तात्त्पर्य है कि नवग्रह शान्ति हेतु निष्कीलित मंत्र गुरु आज्ञा के पश्चात् जप करें। पर ग्रह तो नव (नौ) हैं तो मंत्र भी निश्चित रूप से नौ तो होंगे ही फिर ग्रहों की दशा भी तो परिवर्तित होती रहती है, तो समयानुरूप मंत्र जप भी भिन्न -भिन्न होंगे।

एक साधे सब सधे

पर, अगर आप उस एक साधना की तलाश में हैं जो नवग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों का आमूल नाश कर सके तब आपके लिए चंद्रमौलिश्वर साधना है।

मंत्रों को कीलित किया है शिव ने, सृष्टि के केन्द्र में शिव स्थित हैं, सभी देवों से श्रेष्ठ शिव हैं, महादेव रूप में। चन्द्रमा को जब दक्ष ने क्षय का श्राप दिया तो उसे अपनी जटाओं में स्थापित कर शिव ने पुनः जीवन दिया। इसी कारण से अमावस्या के बाद प्रतिपदा से हर दिन चन्द्रमा बढ़ता है और पूर्णिमा को अपने पूर्ण यौवन को प्राप्त होता है।

शिव आदि गुरु हैं। पार ब्रह्म परमेश्वर हैं और अगर बाधाएं ग्रह-दोष के कारण जीवन में आ रही हैं, तो उनका पूर्ण निवारण सिवाय शिव के किसी के पास नहीं है। शिव का चंद्रमौलिश्वर स्वरूप बाधाओं का पूर्ण संहार कर देगा।

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शंकरे,
सर्पैभूषित कण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थ वैश्वानरे।
दन्तित्वक् कृत सुन्दराम्बर धरे त्रैलोक्य सारे हरे,
मोक्षार्थ कुरुचित्तवृत्तिमचलाम् अन्यैस्तु किं कर्मभिः॥

अर्थात् – ‘सिर पर अर्धचन्द्र को धारण किए हुए भगवान् चन्द्रमौलिश्वर, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, जिनके मस्तक से गंगा प्रवाहित हो रही है, कण्ठहार के रूप में सर्प को धारण किए हुए हैं, जिनके तृतीय नेत्र से वैश्वानर अग्नि निकल रही है, हस्ति चर्म को सुन्दर वस्त्र के रूप में धारण किए हुए तीनों लोकों में अद्वितीय भगवान् शंकर, जो अपने इस रूप-गुण के कारण ‘ चन्द्रमौलिश्वर ’ कहे जाते हैं, वे मेरे मन और बुद्धि को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए मेरे समस्त ग्रह जन्य दोषों को दूर करें।’
आप स्वयं सोचिए जब आपके बच्चे को नजर लग जाती है तब आप लाल मिर्च अग्नि में जलाकर, उसकी नजर उतारते हैं, पर जब बाधा ग्रहों के दूषित प्रभाव की हो, तब अग्नि भी तो प्रचण्ड होनी चाहिए और शिव के त्रिनेत्र की ज्वाला से विकराल कोई अग्नि नहीं है। उनके एक दृष्टिपात से विपरीत ग्रहों के दुष्प्रभाव भस्म हो जाएंगे।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को समाप्त करने की ही साधना है – 

चन्द्रमौलिश्वर साधना। इस साधना के बल पर वह व्यक्ति अपने जीवन में समस्त नौ ग्रहों के दूषित प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर उन ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने में सफल हो पाता है, और तब उसे जीवन में कभी भी किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

ग्रहों की दशा यदि सही रहे, तो व्यक्ति के जीवन में उन्नति के स्रोत हमेशा के लिए खुले रहते हैं, और वह कामयाबी की मंजिल की ओर बढ़ते हुए अपने जीवन में पूर्ण सुखी एवं सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इस साधना-शक्ति के द्वारा व्यक्ति/साधक एक बार में ही अपनी समस्त परेशानियों एवं बाधाओं से मुक्ति पा लेता है।

सामग्री – पाँच मुखी रुद्राक्ष, रुद्राक्ष माला।
दिवस – महाशिवरात्रि या किसी सोमवार के दिन।
समय – रात्रि 8 बजे के बाद से 11.30 तक।


साधना-विधान

रात्रिकालीन इस साधना में बैठने से पहले साधक स्नानादि करके पूर्णतया शुद्ध होकर, पीली धोती धारण कर अपने सामने किसी लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें और फिर आसन पर शांतचित्त होकर बैठ जाएं, इसके पश्चात् तीन बार ‘ ॐ ’ की ध्वनि का उच्चारण करने के बाद 5 मिनट तक गुरु का ध्यान करें और प्रार्थना करें कि मुझे समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त हो, ऐसा कहकर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें, जिन्हें गुरु ना हो वह साधक शिव जी का ही ध्यान करे तत्पश्चात् किसी प्लेट में कुंकुम से ‘ॐ’ लिखकर, उसमें ‘पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ को स्थापित कर दें, फिर कुंकुम का तिलक करके उस पर ‘ ॐ चन्द्रमौलिश्वराय नमः ’ मंत्र बोलते हुए 11 बार थोड़े-थोड़े चावल चढ़ाएं, तथा 11 बार इसी मंत्र से काले तिल, काली सरसों, काली मिर्च अलग-अलग चढ़ाएं, और धूप या अगरबत्ती जलाकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, ध्यान रहे कि पूरे साधना काल में दीपक प्रज्वलित रहे।
फिर साधक मन ही मन शिव के ‘ चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप ’ को नमस्कार कर ‘ रुद्राक्ष माला ’ से निम्न मंत्र का 9 माला मंत्र जप करें।


मंत्र

॥ॐ शं चं चन्द्रमौलिश्वराय नमः॥
Om sham cham chandramoulishwaraay namah


जप-समाप्ति के बाद शिव-आरती करें, फिर ‘ पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ पर अर्पित सामग्रियों को रात्रि के समय पूरे घर व दुकान तथा जो भी अपके आवासीय या व्यापारिक संस्थान हैं, सब जगह छिड़क दें, जिससे दुष्ट ग्रहों का प्रभाव दूर हो सके तथा भविष्य में भी उन ग्रह-दोषों का प्रभाव न हो, इसके पश्चात् रुद्राक्ष तथा माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।

यह साधना पूर्ण सफलतादायक है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और लगन से करने की आवश्यकता है, तभी साधक को इससे निश्चित लाभ की प्राप्ति संभव है।



आदेश......
।।ॐ नमः शिवाय ।।

13 Feb 2016

शिवप्रसाद कैसे प्राप्त करें ?

भगवान कार्तिकेय कृत शिव स्तुति



नमः शिवायास्तु निरामयाय,नमः शिवायास्तु मनोमयाय ।

नमः शिवायास्तु सुरार्चिताय तुभ्यं सदा भक्त कृपापराय ।।1।।



नमो भवायस्तु भवोद्भवाय नमोस्तु ते ध्वस्त मनोभावय । 

नमोस्तु ते गूढ़महाव्रताय नमोस्तु मायागहनाश्रयाय ।।2।।



नमोस्तु शर्वाय नमः शिवाय नमोस्तु सिद्धाय पुरातनाय । 

नमोस्तु कालाय नमः कलाय नमोस्तु ते कालकलातिगाय ।।3।।



नमो निसर्गात्मकभूतिकाय नामोस्त्वमेयोक्षमहर्धिकाय ।

नमः शरण्याय नमोगुणाय नमोस्तु ते भीमगुणानुगाय ।।4।।



नमोस्तु नाना भुवनाधिकात्रे नमोस्तु भक्ताभिमतप्रदात्रे । 

नमोस्तु कर्मप्रसवाय धात्रे नमः सदा ते भगवन्सुकत्रे ।।5।।



अनंतरूपाय सदैव तुभ्यमसह्योकोपाय सदैव तुभ्यं । 

अमेयमानाय नमोस्तु तुभ्यं वृषेन्द्रयानाय नमोस्तु तुभ्यम ।।6।।



नमः प्रसिद्धाय महौषधाय नमोस्तु ते व्याधिगणापहाय ।

चराचरायाथ विचारदाय कुमारनाथाय नमः शिवाय ।।7।।



ममेश भूतेश महेश्वरोसि कामेश वागीश बलेश धीश ।

क्रोधेश मोहेश परापरेश नमोस्तु मोक्षेश गुहशयेश ।।8।।



।। कार्तिकेय रचित शिवस्तुति सम्पुर्ण ।।






जो शिवभक्त सुबह और शाम को भक्तिपूर्वक इस स्तुति से शिव जी का स्तवन करेंगे ,उन्हें सभी रोगो से मुक्ति मिलेगी,धन-धान्य की प्राप्ति होगी और कभी जिवन मे दुख नही आयेगे । शिव दर्शन प्राप्त कर शिव धाम प्राप्त होंगा। इससे शिव भत्को को सभी कर्मो मे पुर्ण सफलता भी प्राप्त होता है। यह स्तुति कलयुग मे स्वयं शिवप्रसाद है,जिसके पठन से सभी पापो से मुक्ति प्राप्त होती है। दिन मे एक बार (सवेरे) पठन करने से 15 पाप,दिन मे दो बार (सायं काल और सवेरे) पठन करने से 50 पाप और तिनो समय (सायं काल,रात्री और सवेरे) पठन करने से 100 पाप माफ होते है । शिव जी का जल अभिषेक करने के बाद जो व्यक्ति इस स्तुति का पाठ करता है उसके 1000 पाप माफ होते है और महाशिवरात्रि को पाठ करने से शिघ्र शिवप्रसाद प्राप्त होता है।




आदेश.......

15 Jan 2016

तांत्रोत्क शिव मंत्र साधना.

शिवरात्रि पर सच्चा उपवास यही है कि हम परमात्मा शिव से बुद्धि योग लगाकर उनके समीप रहे । उपवास का अर्थ ही है समीप रहना,जागरण का सच्चा अर्थ भी काम, क्रोध आदि पांच विकारों के वशीभूत होकर अज्ञान रूपी कुम्भकरण की निद्रा में सो जाने से स्वयं को सदा बचाए रखना है ।

शिवरात्रि के पर्व पर जागरण का विशेष महत्व है । पौराणिक कथा है कि एक बार पार्वतीजी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?'

उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का उपाय बताया-

चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं. अत: ज्योतिष शास्त्रों में इसे परम शुभफलदायी कहा गया है । वैसे तो शिवरात्रि हर महीने में आती है परंतु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को ही महाशिवरात्रि कहा गया है । ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य देव भी इस समय तक उत्तरायण में आ चुके होते हैं तथा ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यन्त शुभ कहा गया है । शिव का अर्थ है कल्याण, शिव सबका कल्याण करने वाले हैं अत: महाशिवरात्रि पर तंत्र साधना करने से ही इच्छित सुख की प्राप्ति होती है ।

ज्योतिषीय गणित के अनुसार चतुर्दशी तिथि को चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जाते हैं, जिस कारण बलहीन चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा देने में असमर्थ हो जाते हैं। चंद्रमा का सीधा संबंध मन से कहा गया है,अब मन कमजोर होने पर भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं तथा विषाद की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे कष्टों का सामना करना पड़ता है । चंद्रमा शिव के मस्तक पर सुशोभित है, इसलिए चंद्रदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए भगवान शिव का आश्रय लिया जाता है ।

एक कथा यह भी बताती है कि महाशिवरात्रि शिव की प्रिय तिथि है, इसलिए प्राय: ज्योतिषी शिवरात्रि को शिव अराधना कर कष्टों से मुक्ति पाने का सुझाव देते हैं । शिव आदि-अनादि है,सृष्टि के विनाश और पुन:स्थापन के बीच की कड़ी हैं । ज्योतिष में शिव को सुखों का आधार मान कर महाशिवरात्रि पर अनेक प्रकार के अनुष्ठान करने की महत्ता कही गई है ।

महाशिवरात्रि का यह दिन भगवान शंकर का सबसे प्रिय दिन है । यह अपनी आत्मा को पुनीत करने का महाव्रत है, इस व्रत को करने से सब पापों का नाश हो जाता है। हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती है, निरीह जीवों के प्रति आपके मन में दया भाव उपजता है । महाशिवरात्रि को दिन-रात पूजा का विधान है,चार पहर दिन में शिवालयों में जाकर शिवलिंग पर जलाभिषेक कर बेलपत्र चढ़ाने से शिव की अनंत कृपा प्राप्त होती है । साथ ही चार पहर रात्रि में वेदमंत्र संहिता, रुद्राष्टा ध्यायी पाठ ब्राह्मणों के मुख से सुनना चाहिए और मंत्र जाप करना चाहिए।

शास्त्रों के अनुसार, शिव को महादेव इसलिए कहा गया है कि वे देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, किन्नर, गंधर्व पशु-पक्षी व समस्त वनस्पति जगत के भी स्वामी हैं। शिव का एक अर्थ कल्याणकारी भी है,शिव की अराधना से संपूर्ण सृष्टि में अनुशासन, समन्वय और प्रेम भक्ति का संचार होने लगता है । इसीलिए, स्तुति गान कहता है- मैं आपकी अनंत शक्ति को भला क्या समझ सकता हूं. अतः हे शिव, आप जिस रूप में भी हों उसी रूप को मेरा आपको प्रणाम ।

शिव और शक्ति का सम्मिलित स्वरूप हमारी संस्कृति के विभिन्न आयामों का प्रदर्शक है। हमारे अधिकांश पर्व शिव-पार्वती को समर्पित हैं,शिव औघड़दानी हैं और दूसरों पर सहज कृपा करना उनका सहज स्वभाव है।
'शिव' शब्द का अर्थ है ‘कल्याण करने वाला’, शिव ही शंकर हैं. शिव के 'शं' का अर्थ है कल्याण और 'कर' का अर्थ है करने वाला. शिव, अद्वैत, कल्याण- ये सारे शब्द एक ही अर्थ के बोधक हैं. शिव ही ब्रह्मा हैं, ब्रह्मा ही शिव हैं,ब्रह्मा जगत के जन्मादि के कारण हैं ।
गरुड़, स्कंद, अग्नि, शिव तथा पद्म पुराणों में महाशिवरात्रि का वर्णन मिलता है । यद्यपि सर्वत्र एक ही प्रकार की कथा नहीं है, परंतु सभी कथाओं की रूपरेखा लगभग एक समान है । सभी जगह इस पर्व के महत्व को रेखांकित किया गया है और यह बताया गया है कि इस दिन व्रत-उपवास रखकर बेलपत्र से शिव की पूजा-अर्चना की जानी चाहिए ।

आज हम एक विशेष साधना के बारे मे बात करेगे,जिसे महाशिवरात्रि के पर्व पर करने से पुर्ण शिवप्रसाद प्राप्त होता है। जैसे शास्त्र मे कहा जाता है-


धारयत्यखिलं दैवत्यं विष्णु विरंचि शक्तिसंयुतम् । जगदस्तित्वं यंत्रमंत्रं नमामि तंत्रात्मकं शिवम् ।।


अर्थात् विविध शक्तियाँ, विष्णु एवं ब्रह्मा जिसके कारण देवी एवं देवता के रूप में विराजमान हैं, जिसके कारण जगत का अस्तित्व है, जो यंत्र हैं, मंत्र हैं। ऐसे तंत्र के रूप में विराजमान भगवान शिव को नमस्कार है।

इसीलिये मै यहा इस श्लोक को समझते हुए एवं समझाते हुए आपको विशेष शिव तंत्र से सबंधित मंत्र साधना दे रहा हूं।



साधना विधि-विधान:-

साधना महाशिवरात्रि के दिन शाम के समय से प्रारंभ करनी है। ईशान्य दिशा के तरफ मुख करके बैठे,आसन वस्त्र का कोइ बंधन नही है फिर भी सफेद रंग के हो तो उत्तम समझें । घी का दिपक प्रज्वलित करे,सुगंधित धूप जलाये,साधना मे किसी भी प्रकार के शिवलिंग को स्थापित कर सकते है। मंत्र जाप सिर्फ रुद्राक्ष माला से ही करना है और अन्य प्रकार का माला प्रयोग वर्जित है। कम से कम ग्यारह माला जाप करना होगा और जिनमें ज्यादा मंत्र जाप करने का क्षमता हो वह साधक 21, 51, 108 माला भी मंत्र का जाप करे तो अतिउत्तम होगा। साधना मे आप शिव जी का अभिषेक पुजन ईत्यादी मंत्र जाप से पुर्व ही सम्पन्न कर लिजीये ।सर्वप्रथम शिव जी का ध्यान मंत्र हाथ जोडकर बोले और अपना मनोकामना बोलते हुए एक सफेद रंग का पुष्प शिवलिंग पर अर्पित करे।



शिव ध्यान मंत्र व अर्थ-

ध्याये नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारूचंद्रां वतंसं।
रत्नाकल्पोज्ज्वलांगं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।।
पद्मासीनं समंतात् स्तुततममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं।
विश्वाद्यं विश्वबद्यं निखिलभय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्।।

सरल शब्दों में मतलब है कि पञ्चमुखी, त्रिनेत्रधारी, चांदी की तरह तेजोमयी, चंद्र को सिर पर धारण करने वाले, जिनके अंग-अंग रत्न-आभूषणों से दमक रहे हैं, चार हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा है। मुखमण्डल पर आनंद प्रकट होता है, पद्मासन पर विराजित हैं, सारे देव, जिनकी वंदना करते हैं, बाघ की खाल धारण करने वाले ऐसे सृष्टि के मूल, रचनाकार महेश्वर का मैं ध्यान करता हूं।




ध्यान मंत्र के बाद "तांत्रोत्क शिव मंत्र" का जाप करे।


मंत्र:-

।। ह्रीं ॐ हौं शं नमो भगवते सदाशिवाय ।।

(hreem om hroum sham namo bhagawate sadaashivaay)





मंत्र तिष्ण है,इसलिए मंत्र जाप के समय शरीर मे उर्जा  का अनुभूति होगा और एकदम से शरीर मे गर्मी बढेगा परंतु चिंता का कोइ बात नही,येसा होने पर अपने पुरे शरीर का ध्यान करते हुए शिव जी से रक्षा हेतु प्रार्थना करे। साधना पुर्ण होते ही शिव आरती सम्पन्न करे और जो भी प्रसाद स्वरुप मे भोग चढाया हो उसे परिवार मे बाट दिजीये ।

महाशिवरात्रि के महापर्व की आप सभी को शुभकामनाएं.....





Tantrotk Shiva Mantra meditation.

Shivaratri true fast is that we use the wisdom of God Shiva of them are close. Fasting is a means of drawing near, the true meaning of awakening, anger etc. succumbs to five disorders of ignorance of Kumbkrn always is to prevent themselves from being asleep.

Vigil on the occasion of Shivaratri is of particular importance. Legend has it that Lord Shiv Shankar Parwatiji once asked, "So what is the best and simple fast-worship, the dead creature naturally receive your grace?"

In response to Shiva Parvati 'Shivaratri' vow told measure

Lord Shiva chaturdasi date. Since astrology is stated in the scriptures, the ultimate Shubfldayi. Well Shivaratri comes in every month but falgun chaturdasi Krishna said the Maha Shivaratri. According to astrological calculations Sun. solstice arrived in this time of climate change occur and said it was very good. Shiva means welfare, the welfare of all Shiva therefore Mahashivarathri to practice on the system leads to the desired happiness.

According to astrological calculations on chaturdasi reach the Moon in its Kshinsth stage, causing serious trouble and moon are unable to creation energy. Moon stated directly from the mind, so the mind is weak physical pain and nostalgia of being encircling situation occurs, which has suffered. Shiva's forehead is adorned on the moon, so pleased to receive Chandradeo taken shelter of Lord Shiva.

It tells a story that is a date dear to Shiva Maha Shivaratri, so often astrologer can worship Shiva Ratri suggest liberation from suffering. Shiva etc.-is eternal, creative destruction and restoration of the link between. Astrology Shiva Maha Shivaratri pleasures are based on the value the importance of various ritual is said.

This day is the day of Shivaratri most beloved of Lord Shiva. It is your soul Mahavrats to Puneet, this vow is to destroy all sins. Violent trend is changed, in your mind of innocent beings leads to compassion. Maha Shivaratri day-night prayer legislation, four o'clock in the day, go to Shiwalyon infinite grace of Shiva lingam Jalabhishek receive than to give the Belptr. Code Vedmntr four o'clock in the night, Rudraashta Dyayi text Brahmins mouth should hear and chanting.

According to the scriptures, so that they Mahadev Shiva god, monster, man, snake, Trans, demigod who own animals and all fauna. Shiva is also a sense of welfare, worship of Shiva in the entire universe discipline, coordination and communication of love, devotion seems to be. Therefore, hymns says: I can understand your infinite power to do good. Therefore, O Siva, you are the same as well as my bow to you.

Shiva and Shakti showed various aspects of our culture is the nature of the insert. Most of us are dedicated to Shiva and Parvati festival, Shiva and others Awgddani spontaneous favor is their innate nature.

'Shiva' word 'wellness habits ", Shiva Shankar. Shiva 'Shan' means good and "doing", which means. Siva, Advaita, Kalyan These words are symptomatic of the same meaning. Shiva are Brahma, Shiva, Brahma, the Brahma of the world are due to Jnmadi.

Garuda, Skanda, fire, and Padma Puranas, Shiva Maha Shivaratri is described. Although the story is not the same everywhere, but the outline of the story is almost identical. The festival has underlined the importance of the place and it has been reported that the day of fasting, fasting Belptr Shiva worship should be placed.

Today we will talk about a particular practice, on the occasion of Maha Shivaratri, which is derived from the Shiv absolutely. As is called in Scripture

Dharytykiln Dawatyn Virnci Sktisnyutm Vishnu. Jagdastitvan Yantramntrn Nmami Tntratmkan Shivam ..

Namely various powers, Vishnu and Brahma, which sits as the goddess and god, which is the existence of the universe, which are instruments, mantra. As such mechanism is present to greet Shiva.

So here I understand this verse and explaining the mechanisms relating to Shiva Mantra meditation am giving you special.

Silence legislation: -

Sadhana Maha Shivaratri is the day to start the evening. Ishany direction by the home side sitting posture of clothing is not any binding excellent understanding even if white. Deepak fuel to ignite, burn incense, meditation can install on any type Shivling. Rudraksha beads have only just chanting beads and use of other types is forbidden. At least eleven beads and chanting which is the ability to recite the mantra seeker 21, 51, 108 beads to chant will then also excellent. In practice Shiva anoint you Pujn Ityadi chanting performed by the pre tax Liziye Ksrwprtham attention of Shiva mantra chanted and linked arms your wishes Speaking to a white floral tributes at the lingam.

Shiva mantra meditation and lit.

Dyaye Nityn Maheshn Rjtgirinibn Watnsn Caruchandran.

Ratnaklpozzwlangan Prshumrigvrabitihstn Prasnnm ..

Pdmasinan Smntat Vsanan Shuttmmrgnarwyagrkrittin.

Biswadyn Biswbdyn Nikilby Hrn Trinetrm Ptrchvktrn ..

In simple terms that means Ptrchmuki, Trinetrdhari, Tejomayi like silver, lunar holding the head, from which the Body of glowing gems and jewelery, four hands halberd, antelope, bridesmaid and Abbey currency. Mukmndl Anand appears to sit on lotus, in god, whose Vandana, the tiger skin holding the core of the universe, creator of Maheshwar meditate.

After meditation mantra "Tantrotk Shiva mantra" to chant.

mantra:-

Hreem om hroum sham namo bhagawate sadaashivaay

Tishn mantra, so chanting and suddenly the feeling of energy in the body will increase body heat on any matter of concern, but not, your whole body's attention on Yesa from the Shiva to protect pray. Silence has absolutely done prayers to Shiva and enjoyment in whatever form offerings to be winched Unlock move forward in her family.

Best wishes to all of you ..... Mahashivarathri mahaparva



आदेश.......

29 Sept 2015

शिव मंत्र -इच्चापुर्ती साधना.

जो साधक मनोकामनाओं की पूर्ति करने के लिये भगवान शिव की साधना पूर्ण भक्ति भाव से करते हैं उन्हे इस साधना के द्वारा अनन्य लाभ की प्राप्ति होती है l जीवन में अनेक प्रकार की समस्यायें होती हैं। समाज के अलग-अलग वर्ग की अलग-अलग आवश्यकतायें होती हैं किन्तु जिस
प्रकार से भगवान शिव का परिवार सभी विरोधाभाषों को समेटे एक सम्पूर्णता का प्रतीक है उसी प्रकार की यह साधना जीवन की विभिन्न विरोधाभाषी स्थितियों का निदान करने में समर्थ हैं। उदाहरण के लिये परिवार का मुखिया विभिन्न जिम्मेदारियों के साथ आय प्राप्ति के लिये चिन्तित रहता हैं। पत्नी अपने अक्ष्क्षुण सौभाग्य की कामना करती है, किशोर आयु वर्ग के बालक-बालिकाओं
को विद्या प्राप्ति की समस्या होती हैं,वहीं युवा वर्ग के साथ विवाह की सुखद गृहस्थ जीवन, शत्रु नाश, राज्य सम्मानइत्यादि
स्थितियों का समाधान भी इसी से प्राप्त होता हैं।
भगवान शिव का स्वरुप शक्ति युक्त होने के कारण सर्वाधिक प्रभावशाली और साधक की मनोकामना को पूर्ण करने वाला हैं। इसी से जहॉ छोटे से छोटे गॉव में शिवालय की स्थापना मिलती है। उस शिवालय में कोई भी स्त्री गौरा- पार्वती की आराधना करके अपने जीवन की सफलता को प्राप्त कर सकती हैं। पुरुष यदि कामना करता हैं। कि उसका पुत्र भगवान श्री गणपति के समान बल बुद्धी से युक्त हो तो वहीं स्त्री की कामना रहती है कि उसका पुत्र कार्तिकेय जैसा सौन्दर्यवान और वीर हो। जहॉ शिव है वहीं शक्ति है ठीक उसी प्रकार जहॉ श्री गणपति हैं, वहीं लक्ष्मी है, जहॉ
श्री कार्तिकेय हैं, वहीं भगवती सरस्वती हैं, इसी से इस साधना को सम्पूर्ण साधना कहा गया हैं। भगवान शिव की साधना के लिये सामान्य रुप से निम्न सामग्री की आवश्यकता होती है।

यथा :- (1) आसन (2) ताम्र-पात्र जल हेतु (3) गंगाजल (4) स्टी की प्लेट (5) रौली
(6) चावल (7) केसर (8) पुष्प व पुष्पमाला-6 (9) वेल-पत्र (10) पंच्चामृत (11) नारियल (12) यज्ञोपवीत (13) अबीर-गुलाल (14) अगरबत्ती (15) कपूर (16) घी का दीपक (17) नैवेद्य (18) पॉच प्रकार के फल (19) लौग-इलायची (20) ताम्बूल (21) चन्दन लाल व श्वेत (22) रुद्राक्ष
की माला।

इसके अलावा पंचपात्र, अध्र्यपात्र, घण्टी, इत्यादि की व्यवस्था भी रहनी चाहियें।

साधना विधि :- सर्वप्रथम स्नान कर शुद्ध सफेद धोती पहनकर पूर्व की ओर मुंह कर
आसन पर बैठ जाय, यदि सम्भव हो तो जोडे से बैठे जोडे में अपनी पत्नी को दाहिने हाथ की ओर आसन पर बैठाना चाहिये। इसके बाद अपनी चोटी में गॉठलगा लेनी चाहिये इसके बाद बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने पूरे
शरीर पर निम्न प्रोक्षण बोलते हुये अपने
शरीर पर जल छिडकना चाहिये , जिससे शरीर पवित्र हो जाय।

llअपवित्र पवित्रो वा सर्वावस्था गतोपिवा।
य: स्मेरत पुण्डरीकाक्षं स वाहृयाभ्यन्तर शुचि: ll

तत्पश्चात अपने सामने जल का कलश चावलों की ढेरी पर रख दें और कलश के चारों ओर रोली या केसर चन्दन से चारों दिशाओं में स्वास्तिक बना देना चाहिये और निम्न मंत्र पढ़तें हुयें कलश में जल भरें-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जले स्मिन सन्निध कुरु ।।
पुष्कराद्यानि तीर्थानि गंगाद्यास्सकरतस्तथा ।
आगच्छन्तु पवित्राणि पूजाकाले सदा मम।।

फिर उस कलश में स हाथ मे जल लेकर संकल्प करे -

ll ओम र्विष्णु र्विष्णु श्रीमद भगवतो मापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य
अद्य श्री ब्रहण: द्वितीय परार्धे श्वेतवाराह
कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्ट र्विशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बुद्वीपे भारत वर्षे (अपने शहर का नाम ले) नगरे अमुक (माह का नाम )  मासे अमुक (दिन का नाम) वासरे मम (अपना नाम व -कामनाओं का नाम ले) अमुक (कामना बोलिये ) कामना सिद्यर्थे साधना करिष्ये।

हाथ मे लिया हुआ जल जमीन पर छोड दे



इसमें जिन जिन कार्यो की पूर्ति का विवरण दिया गया है या आपकी जो भी इच्छा है, उसका उच्चारण कर सकते हैं या मन में बोल सकते हैं।

सर्व प्रथम गणेश जी का पूजन करना चाहिये शिव परिवार में स्थापित गणेश जी सर्व प्रथम जन चढाना चाहिये तत्पश्चात केसर युक्त चन्दन का तिलक लगाना चाहिये नैवेद्य तथा फल अर्पण करके पुष्प चढ़ाना चाहियें और निम्न मन्त्र से गणेश जी का ध्यान करना चाहिये ।

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णक:।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायक: ।।
ध्रूमकेतुर्गणाध्यक्षो भाल चन्द्रो गजानन: ।
द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छाणुयादपि ।।
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्राम संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।

फिर शुद्ध जल में थोडा सा कच्चा दूध और गंगाजल मिलाकर "ओम नम: शिवाय" मन्त्र का उच्चारण करते हुये सभी शिव परिवार देवताओं पर पतली धार गभग दस मिनट तक जल चढाना चाहिये उसके बाद पंच्चामृत से स्नान कराने के बाद शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिये। तत्पश्चात सभी देवों के निम्न मन्त्र से केशर और कुंकुम का तिलक लगावें।

नमस्सुगन्धदेहाय हय्वन्ध्य फल दायिने ।
तुम्य गन्धं प्रदास्यामि चान्धकासुरभन्जन ।।

इसके पश्चात भगवान शिव पर और अन्य देवताओं पर अबीर, गुलाल और अक्षत तथा पुष्प और पुष्पमाला अर्पण करना चाहिये । अगरबत्ती और दीपक जला कर नैवेद्य तथा फल चढ़ाना चाहिये और श्रद्धायुक्त दोनों हाथ जोड़ कर निम्न स्तुति का पाठ करें।

वन्दे देव उमापति सुरगुरु वन्दे जगत्कारणम ।
वन्दे पन्नग भूषणा मृगधर वन्दे पशुनापतिम् ।।
वन्दे सूर्य शशांक वहि नयनं वन्दे मुकुन्द प्रियम ।
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिव शंकरम् ।।

इसके बाद रुद्राक्ष की माला से जप करना चाहिये रुद्राक्ष की माला के अलावा स्फटिक माला मूंगा की माला अपनी मनोकामना के अनुसार ली जाती हैं । लेकिन उक्त माला अभिमन्त्रित होनी चाहिये । अभिमन्त्रित माला से ही जप का पूर्ण लाभ प्राप्त होता हैं। जाप में कम से
कम ग्यारह मालाओं का जाप 11 दिनो तक करना आवश्यक है और मंत्र का जाप सोमवार से प्रारंभ करे ।

गोपनिय शिव मंत्र-

ll ओम ऐं साम्ब सदाशिवाय नम: ll

(om aim saamb sadaashivaay namah)

मंत्र जाप के बाद शिव जी की आरती करे और चढाया हुआ प्रसाद परिवार मे वितरित कर दे.


आदेश.