7 Apr 2018

साधना ही अमूल्य है ।

यह संसार एक विचार है अगर आपने विज्ञान में छलांग लगा दी तो उसका एक अलग महत्व है अगर आपने धर्म के क्षेत्र में छलांग लगा दी उसका अपना एक अलग क्षेत्र है यह संसार रहस्यों से भरा पड़ा है। आप एक रहस्य से पदा हटाते है फिर आपके सामने दूसरे रहस्य खड़े हो जाते है जिस प्रकार आपके मन मस्तिष्क में निरंतर विचार चलते रहते है।


हम जो शब्द सुनेगे वह शाश्वत है जब हम बिल्कुल चुप होंगे तब उनके शब्द सुनाई पड़ेगें। पराम्बा से बोलना नहीं है उन्हें सिर्फ सुनना है।


कोई अल्लाह हूँ, बोल रहा है तो कोई लाहू बोल रहा है, कोई क्लींग बोल रहा है तो कोई क्लीम बोल रहा है, कोई काली बोल रहा है, कोई पराम्बा बोल रहा है ठीक उच्चारण क्या है। मुझे पता नहीं है मैं क्या करता हूँ या मैं क्या करती हूँ, तुम ही मुझे बताओ। हम ठीक उच्चारण, व्याकरण में लगे रहते है? बाल्मिकी राम-राम जपते जपते मरा-मरा कहने लगे और वह सिद्ध हो गए।


तुम्हारा मंत्र नाभि तक पहुँच जाना चाहिए जब मंत्र नाभि तक पहुँचता है। तब हम जो भी बोलते है तब वह कुछ और मंत्र होता है। और जब हम सुनते है तो वह कुछ और हो जाता है मंत्र का सीधा संबंध आपकी प्राण चेतना से है वहाँ से निकलने वाला मंत्र सीधा ईश्वर तक पहुँचता है यहीं मंत्र रहस्य है।


साधना का अर्थ यह नहीं है कि बुराई को छोड़ो और भलाई को पकड़ो, साधना का वास्तविक अर्थ है बुराई से सत्य की तरफ आगे बढ़ो उस पर विजय प्राप्त करो भलाई में भी सत्य की तरफ आगे बढ़ो दोनो के अनुभव का निचोड़ निकालो ताकि आपकी समझ गहरी हो जाए। क्योंकि बुराई और भलाई दोनो से साधक का हृदय विस्तीर्ण हो जाए, दोनो के बीच तुम्हें अपना सामजस्य बैठाना पड़ेगा तुम अपनी नाव को बहने दो और ताकि वह अपनी सही मंजिल सागर तक पहुँच सके। पाप और पुण्य तुम्हारे किनारे बन जाएँ तुम किसी को मत चुनना न पाप को और न ही पुण्य को अगर तुम पुण्य को चुनोगे तो भी किनारे पर ही रह जाओगे और अगत तुम पाप को चुनोगे तो भी किनारे पर ही रहोगेे सागर तक नहीं पहुँच पाओगे जो दोनो का सही उपयोग कर लेगा उसमें सामंजस्य स्थापित कर लेगा तुम अपनी बुराई से भी भयभीत मत होना ।

मंत्र तंत्र यंत्र यह कोई भयभीत करने हेतु नही है अपितु यह तो जीवन का वह सच है जिसे सामान्य व्यक्ति सहजता से स्वीकृति नहीं दे पाता हसि ।आप अपने जीवन को सामान्य जीवन ना बनाये और किसी भी प्रकार का मतभेद दिमाग मे नही पाले,किसी भी मंत्र तंत्र साधना हेतु जाती धर्म समाज का कोई पाबंदी नहीं है । इस संसार मे दो जातीया है "स्त्री और पुरूष" जाती,धर्म एक ही है "मानवता",जब यह सच्चाई है तो क्यो साधना से भागना,क्यों बुराई के रास्ते पर चलना? अभी समय है एकता से सब कुछ संभव करके दिखाने के लिए ।


एक छोटासा मंत्र दे रहा हु जो जीवन मे समस्त साधना में पूर्ण सफलता देने हेतू तत्पर है,मंत्र है "ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ॐ" इसका मन ही मन उठते बैठते चलते फिरते शुद्ध अवस्था मे जाप करे तो अवश्य ही आपका रुझान तंत्र साधना के लिए बढ़ेगा ।


हमने अभी कुछ दिनों पहिले अपना youtube चैनल बनाया है और वहां पर भी आप अन्य साधनाये देख सकते है ।

https://www.youtube.com/channel/UCNkYEFtLD7KzQzqiXd6QOkg


आदेश.....

23 Mar 2018

लिवर का ईलाज (Curing the Liver)



लिवर खराब होने पर शरीर की कार्य करने की क्षमता न के बराबर हो जाती है और लिवर डैमेज का सही समय पर इलाज कराना भी जरूरी होता है नहीं तो यह गंभीर समस्या बन सकती है। गलत आदतों की वजह से लीवर खराब होने की आशंका सबसे ज्यादा होती है। गलत आदते जैसे जैसे शराब का अधिक सेवन करना, धूम्रपान अधिक करना, खट्टा ज्यादा खाना, अधिक नमक सेवन आदि।

सबसे पहले लिवर खराब होने के लक्षणों को जानना बहुत जरूरी है। जिससे समय रहते आपको पता रहे और इलाज सही समय पर हो सके। भारत में दस खतरनाक रोगों में से एक है लिवर की बीमारी। हर साल तकरीब दो लाख लोग लीवर की समस्या से मरते हैं। नए शोध के अनुसार भारत में 32 फीसदी लोग लीवर की किसी न किसी समस्या से ग्रसित हैं। लेकिन इसमें से सबसे अधिक वे लोग हैं जो अधिक मात्रा में शराब का सेवन करते हैं। लिवर में बीमारी होते ही यह सिरोसिस का रूप ले लेती है जिस वजह से लिवर टाइट,गांठ या भूरा जैसे होने लगता है।

लिवर को खराब करने वाले महत्वपूर्ण कारण:-
1. दूषित मांस खाना, गंदा पानी पीना, मिर्च मसालेदार और चटपटे खाने का अधिक सेवन करना।
2. पीने वाले पानी में क्लोरीन की मात्रा का अधिक होना।
3. शरीर में विटामिन बी की कमी होना।
4. एंटीबायोटिक दवाईयों का अधिक मात्रा में सेवन करना।
5. घर की सफाई पर उचित ध्यान न देना।
6. मलेरिया, टायफायड से पीडित होना।
7. रंग लगी हुई मिठाइयों और कोल्डड्रिंक्स का प्रयोग करना।
8. सौंदर्य वाले कास्मेटिक्स का अधिक इस्तेमाल करना।
9. चाय, काफी, जंक फूड आदि का प्रयोग अधिक करना।

लिवर प्रत्यारोपण-
लिवर जब पूरी तरह से खराब हो जाता है तब इसका एक ही इलाज बचता है वह है लिवर प्रत्यारोपण। यह एक कठिन और खतरनाक आॅपरेशन होता है। इस अवस्था में पीड़ित इंसान के लिवर को हटा के नए लीवर को लगाया जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि लीवर की समस्या का शुरूआती दौर में पता चलते ही अपने खान.पान पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

मुझसे एक 68 वर्ष की महिलाके बेटे ने संपर्क किया था,महिला का लिवर 90% खराब हो चुका था और उनका परिवार उनके बीमारी पर 40 लाख खर्च कर चुके थे परंतु उनके जिंदा रहने का कोई ज्यादा समय उनके पास नही बचा था । ऐसे समय मे उनको बेटे की आपबीती सुनकर उन्हें आयुर्वेदिक दवाओं के माध्यम से 16 दिनों में पूर्ण तरह से ठीक कर दिया । आज उनके मेडिकल रिपोर्ट देखकर विश्वास करना भी डॉक्टर लोगो के लिये कठिन हो रहा है परंतु एक बात लिखना चाहुगा के आयुर्वेद में सभी बीमारियों के इलाज है और दुनिया कोई भी बीमारी 7 दिनों से लेकर 90 दिनों में खत्म की जा सकती है । मैं पिछले 15 वर्षों से लिवर का दवाई रोगियों को दे रहा हूँ और आज तक ऐसा नही हुआ के आयुर्वेदिक दवाओं से लिवर ठीक नही हुआ होगा । लिवर कम से कम 7 दिन और ज्यादा से ज्यादा 30 दिनों में ठीक किया जा सकता है,बड़े बड़े हॉस्पिटल में लाखों रुपए खर्च करने पर भी लिवर ठीक नही होता है,ये मैने बहोत सारे रोगियों से सुना है । मैं रोगियों का सबसे पहले मेडिकल टेस्ट रिपोर्ट देखता हूं जिसमे लिवर के खराब होने के बारे में लिखा होता है,उसके बाद ही लिवर का दवा उन्हें देता हूँ और उन्हें चुनौती के साथ बोलता हूँ "अगर तुम्हारा लिवर आयुर्वेदिक दवाओं से ठीक नही हुआ तो 95% पैसा रिफंड मेरे से ले लेना " । लोगो को लाखों रुपए खर्च करके भी आराम नही मिलता और यहां हम लोग सिर्फ 5 हजार रुपए लेते है,जिसमे रोगी को आराम नही मिला तो 4500 रुपया वापिस भी कर देते है ।
कौनसा हॉस्पिटल या डॉक्टर लाखो रुपये लेने के बाद 1 रुपया भी वापिस नही देता है परंतु हम लोग रिफंड दे देते है क्योंकि हमें आयुर्वेद पर 100% विश्वास है के रोगी का रोग ठीक हो सकता है । मुझे मेरे इस कार्य के वजेसे से एक संस्थान के तरफ से 10 वर्ष का सम्मानजनक अनुभव प्रमाणपत्र भी प्राप्त हुआ है और मातारानी के कृपा से लिवर के साथ किडनी का इलाज भी कर लेता हूँ । अभी तो आज सिर्फ इन दो विषय पर ही लिखा है और भविष्य में बाकी रोगों के विषय पर भी लिखूंगा जिसमे हार्ट ब्लॉकेज, कैंसर, डाईबेटिज,ब्लड प्रेशर जैसे गंभीर बीमारियों पर आवश्यकता नुसार लिखेंगे ।

लिवर और किडनी के रोगी जिन्हें अभी तक ईलाज करने पर भी आराम ना मिला हो वह लोग अवश्य संपर्क करे,डरने की कोई बात नही है । आपको सही तरह से ठीक करना और आपको स्वास्थ्य रहने हेतु सभी प्रकार के प्रयास अवश्य करूँगा ।

My whats app no.
+1 (270) 551-1006

संपर्क हेतु ई-मेल करे-
snpts1984@gmail.com



Curing the Liver

If the Liver is damaged, the body loses its capacity to function and if it is not treated well on time it can become seriously threatening to the body. Bad habits lead to Liver damage. For example, excessive drinking, excessive smoking, eating very salty food etc.

Firstly, it is important to recognise the signs of Liver damage. So that we can diagnose ourselves and get us treated on time. Every year 2 lakh people die of diseases related to Liver. According to new researchs almost 32% of Indians are afflicted by some sort of Liver disease. Most of these people are excessive drinkers. Liver damage takes the form of cirosis which can turn the Liver tight, brown or even have hard knots in it.
Main reasons for Liver diseases-

1. Having contaminated meat, drinking dirty water, eating very salty or spicy food.
2. Drinking water with excessive chlorine on it.
3. Deficiency of vitamin b
4. Having a lot of antibiotics
5. Not keeping the house clean
6. Having malaria or typhoid
7. Having coloured sweets or soda
8. Using a lot of beauty cosmetics
9. Drinking excessive coffee, tea or having too much junk food.


Liver transplant

When the Liver is damaged beyond repair, only one thing can be done. Liver transplant. It is a difficult and dangerous operation. The old Liver is removed and a new one is added. That is why if one comes to know about his Liver disease at an early stage he should keep a strict control over his diet.
I was contacted by the son of a 68 year old woman whose Liver had been damaged completely. The family hd spent 40 lakh on her treatment but it seemed nothing was working. After hearing about this from her son i treated her with ayurvedic medicines and cured her in 16 days. Even doctors find it hard to believe that she is completely cured. I would like to add that all the world's diseases can be cured with ayurveda, within 7-90 days. The Liver diseases can be cured within 7-30 days at the best. I always see my patients test report and then give them the medicine along with the challenge that if it doesn't work I'll refund 95% of your money. We take only 5000 rs for the treatment, unlike hospitals that charge lakhs of rupees, and 4500 is refunded if the patient does not feel better. No hospitals offer refund, but we do, because we have 100% faith on ayurvedic medicine. Because of this work, I have received a respectful certificate from an institute validating my 10 years of experience and by the grace of the goddess i can even treat kidneys
I've written only on two topics today, but I'll write more, including heart blockage, cancer, diabetes, blood pressure, etc.

All those Liver and kidney patients who haven't had relief anywhere else feel free to contact me, don't worry. I will do my best to treat you and make you healthy again.

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आदेश.....

20 Mar 2018

बाबा अघोरी साधना



आप सभी को मैं एक बाबा अघोरी की साधना दे रहा हूं, बाबा अघोरी वह है जो "जूनागढ़ में अघोरियों के बाबा कहलाते हैं" । जैसे हमने सुना है देवाधिदेव महादेव वैसे ही अघोरियों के अघोरी जिनका नाम बाबा अघोरी है , बाबा अघोरी वहा एक शक्ति के पुत्र माने जाते हैं और काल भैरव के भक्त माने जाते हैं,जो किसी भी हाल में अपने भक्तों पर अन्याय नहीं होने देते और जब भी उनके भक्तों पर अन्याय होता है तो वह अपना सोटा निकालते हैं,सोटा मतलब चाबुक (हंटर) और जब यह सोटा किसी पर पड़ता है तो अच्छे-अच्छे टूट जाते हैं सुधर जाते हैं,आज के समय में बहुत ऐसे लोग हैं जो तांत्रिक क्रियाओं की वजह से तांत्रिक बाधाओं की वजह से परेशान हैं और आज कल के कुछ बेकार तांत्रिक लोग कुछ पैसों के लिए किसी का भी बुरा कर देते हैं । हम हमारे जीवन में क्या-क्या संभाल सकते हैं? घर संभाले? परिवार को संभाले? या इन तांत्रिकों से लड़े? या दुनिया से लडे? जीवन बड़ा व्यस्त होता है और ऐसे समय में हमें ऐसे शक्ति की आवश्यकता है,जो हमारे जीवन में हमारे शत्रुओं से लड़ सके क्योंकि हमारे बहुत सारे ऐसे शत्रु होते हैं जिन्हें हम नहीं समझ पाते हैं,जिन्हें हम नहीं जान सकते हैं और जिन शत्रु को हम नहीं जान सकते हैं जिनको हम देख नहीं सकते हैं , तो ऐसे शत्रु को निपटने के लिए बाबा अघोरी साधना अत्यंत आवश्यक है । ऐसा साधना प्राप्त होना ही एक अद्वितीय बात है,जीवन में जब भी कुछ बनने की इच्छा रखो तो अद्वितीय बनने की इच्छा रखो । जितने भी आपके शत्रु है उन पर ऐसे वार करो कि उनकी अकल ठिकाने आ जाए । जिस दिन उनकी अकल ठिकाने आ जाएगी तो वह आपको बिना किसी वजह के परेशान करना छोड़ देंगे परंतु एक बात मैं बताना चाहूंगा बाबा अघोरी उसी को दंड देते हैं जो आपको बिना वजह से परेशान कर रहा है और आप किसी अच्छे इंसान को बिना वजह से परेशान करना चाहते हो तो गलती से भी बाबा अघोरी से मदत नही माँगे,नहीं तो लेने के देने पड़ जाएंगे । आप पर अन्याय हो रहा है और आप अन्याय से लड़ने के लिए तत्पर नहीं है,तो ऐसे ही समय पर बाबा अघोरी की साधना के माध्यम से आपको अपने शत्रुओं से लड़ना चाहिए। जीवन में सभी तो जी रहें और एक समय आएगा सभी की मृत्यु भी हो जाएगी परंतु अन्याय से डरना यह जिंदगी जीते हुए मृत्यु के समान होता है और ऐसा जीवन किस काम का कि हमारे शत्रु हम पर बुरी क्रियाये कर रहे हैं और हम उन क्रियाओं से निपटने के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं । हमें हमारे शत्रु को सबक सिखाना चाहिए हमें अन्याय से लढना चाहिए, हमारे देश में जितने भी महान बने हैं या जितने भी संत महात्मा ऋषि-मुनि आए हैं,उन सभी ने हमें अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पुकार लगाइ,वह हर बार हमें समझाते हैं कि अन्याय के खिलाफ लड़ो । इसी अन्याय के खिलाफ ही एक बहुत बड़ा युद्ध हुआ था,युद्ध का नाम है महाभारत और हमे कोई महाभारत तो नहीं करना है परंतु हमें हमारे शत्रु को हमें परेशान करने से भी रोकना है और इसके लिए हमें बाबा अघोरी से सहायता प्राप्त करनी है । यह साधना किसी भी कृष्ण पक्ष की अष्टमी से प्रारंभ कर सकते हैं। 


साधना 11 दिन की है , दक्षिण दिशा में मुख होना चाहिए,साधना रात्रि में 9 बजे के बाद करना है, काला आसन होना चाहिए , काले वस्त्र पहनना आवश्यक है , सिर के बाल काले वस्त्र से छुपाने हैं, जैसे हम गुरुद्वारे में जाते हैं तो हम सर पर जैसे बांधते हैं उसी तरह से बांधना है । अगर कोई महिला साधना कर रही है तो उन्हें भी काली साड़ी पहननी पड़ेगी । सामने सरसों के तेल का दीपक जलाना है , दीपक मिट्टी होना चाहिए, दीपक की ओर देखते हुए ही यह मंत्र का जाप करना है । साधना में आपको ढेर सारे अनुभव हो सकते हैं , दीपक की लौ में बाबा अघोरी का दर्शन देना भी एक अनुभव हो सकता है , बाबा जी के कृपा से आपको जीवन में धन धान्य ऐश्वर्य सुख समृद्धि मिल सकती है,हो सकता है कि आपको प्रत्यक्ष दर्शन दें और पूछें बेटा बोलो आपकी क्या कामनाएं है? आप क्या चाहते हो? ऐसे वक्त आपको आपकी कामना बोलनी है । एक काम कीजिए कि जैसे बाबा जी का दर्शन हो तो अपनी तुच्छ इच्छाओं को मत मांगे ।


मंत्र:-
।। अघोरीयो का अघोरी बाबा अघोरी,कालभैरव का भगत  दिखाओ रे अपना सोटा,जहा-जहा तेरा सोटा पड़े वहां-वहां मेरा दुश्मन टूटे,दुश्मन मेरा कौन तू ही जाने,ना जाने तो कैसा  अघोरीयो का बाबा अघोरी कहलाए ।।



साधना में बाबा अघोरी को सात्विक भोग चढ़ाए, वैसे इनको तामसिक भोग चढ़ाया जाता है परंतु यह जरूरी नही है । आप चाहे तो पाँच प्रकार का मिठाई चढ़ा सकते है,चढ़ाया हुआ भोग दूसरे दिन बच्चो में बाट दे और भोग रोज 11 दिनों तक चढ़ाना है । मंत्र जाप रुद्राक्ष माला से ही करे,नित्य कम से कम 3 माला जाप रोज करे । साधना के 11 दिन के समय मे नित्य शिव मंदिर दर्शन हेतु जाना जरूरी है और शिव जी से नित्य साधना सफलता हेतु प्रार्थना अवश्य करे ।


इस साधना को वर्ष में दो-तीन बार अवश्य किया करे ताकि आपके जीवन मे शत्रु बाधा ना रहे और आप बाबा की कृपा से जीवन मे उन्नति करते रहे,साधना से किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नही होता है इसलिए दिमाग से डर को निकाल भगाए ।



आदेश.......

19 Mar 2018

डाईन सिद्धि और रक्षा कवच


प्राय: सभी गांव में अभिचार कर्म करने वाली चार या पांच औरतें या मर्द होते हैं जो अपनी ईर्ष्या के वश मे आकर दूसरों के ऊपर षट्कर्म करती हैं, ये डाईन कहलाती हैं इनके ईष्ट "दरहा भूत" या शक्तिशाली भूत होते हैं,ये हमेशा दूसरों अपनी तंत्र क्रिया द्वारा दुख ही देती हैं,इनके कर्म को गांव मे प्रत्यक्ष रूप मे कोई नहीं जानता है । इनके कर्म का कोई सबूत नहीं होता,न ही इनके पूजा पाठ का कोई सबूत मिलता है । इनका तंत्र अत्यंत शक्तिशाली होता है, इनके परिवार वाले भी इनकी क्रियाओं को नही जानते,जैसे जैसे ये बूढ़े होते जाते हैं इनकी शक्ति बढ़ती जाती है । इनका मंत्र सिर्फ दो तीन शब्दों का होता है जिस परिवार को अत्यअधिक दुख देना हो उनके यहां अपने माहवारी कपड़े से जुक्ति बनाकर मंत्र शक्ति से उनके घर के दरवाजे मे गाड़ देती हैं जिससे वहां किसी भी देवी देवता का प्रवेश निषेध हो जाता है और उनके द्वारा लगाया गया भूत लंबे समय तक दुख देता रहता है ।

इनकी साधना बड़ी ही गोपनीय तरीके से होती है ये दीपावली के दिन अपने गांव को मंत्र से बांध कर शमसान में 8-10 के ग्रूप मे एकत्र होकर अपने गुरू डाईन के समक्ष नग्न होकर कमर में झाड़ू लपेटकर अपने मल मूत्र से जमीन को लीपकर गोल घेरे बनाकर रातभर नाचती हैं और अपनी शक्ति बढ़ाती हैं ।

पहली बार ये अनजाने में या जानबूझकर इस विद्या को सीखती हैंं,तब इनके गुरू मंत्र सिखाने के बाद सिद्धी के लिए बलि मांगती हैं वो भी इनके पति या प्रिय पुत्र की बलि,इंकार करने पर ये पागल हो जाती हैं और हां कहने पर बलि के लिए नियुक्त व्यक्ति अपने आप मर जाता है और गांव मे या परिवार मे किसी को कुछ पता भी नही चलता है इनकी सिद्धी होने के बाद ये पेड़ पौधों,पालतू जानवर,पक्षीआदि पर प्रयोग करना प्रारंभ कर देते हैं बाद मे मनुष्यों पर प्रयोग करते हैं ।

बहुत सी ( 99%) डाईन इस विद्या को सीखना नहीं चाहती हैं क्योंकि इनका भविष्य अत्यंत दुखदायी कष्टप्रद होती है ये बात गांव के सभी लोग जानते हैं किंतु जो सीनियर या बुजुर्ग डाईन होते हैं उन्हेंअपना चेला बनाना अति आवश्यक होता है स्वयं की मृत्यु से पहले चार या पांच चेला बनाना उनकी मजबूरी होती है,नहीं तो उनके ईष्ट भूत स्वयंको बहुत तंग करता है इसलिए वो ऐसे स्त्री या पुरूष को चुनती हैं जिनके अंदर ईर्ष्या की भावना बहुत ज्यादा हो या अपने ही परिवार के किसी सदस्य को चुनती हैं उन्हें अपने वश मे करके अपने साथ घुमाती फिराती हैं और चार पांच मंत्र सिखा देती हैं इस तरह से चेला बनाने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है । इसके अलावा वो कम उम्र की अपने ही परिवार की एक या दो लड़की के ऊपर शक्तिपात कर देती हैं ताकि उस लड़की जितने साल बाद भी विवाह हो उसके बाद लड़की के उपर अपने आप की गुन (विद्या) जागृत होने लगते हैं सपने में मंत्र और विधि मिलने लगती है इस तरह से डाईन बनने की प्रक्रिया होती है ।

डाईन लोगों के गुन को परमानेंट भ्रष्ट नहीं किया जा सकता है इनसे हर व्यक्ति डरता है और नफरत करता हैं इनकी मौत अत्यधिक दर्दनाक और कष्टदायी होती है इनकी आयु अत्यधिक लंबी होती है इसके अलावा ये दूसरों की उम्र चुराकर बहुत लंबी उम्र तक जीते हैं जैसे जैसे ये बूढ़ी होती है वैसे वैसे इनकी शक्ति बढ़ती जाती है इस तरह के कार्य करने वा मर्द को डईया कहा जाता है किंतु डाईन की संख्या डईया से तीगुना तक होती है डाईन अत्यधिक चालाक और शातिर होती हैं ।

एक वरिष्ठ डाईन के ऊपर मारण क्रिया करना बहुत ही कठिन है कोई उच्च कोटि का अघोरी ही कर सकता है क्योंकि क्योंकि इनका ईष्ट भूत चौबीस घंटा इनकी सुरक्षा करता है और इनका पिण्ड चौबीस घंटा बंधा रहता है उसपर भी ये हर पल ये सतर्क रहते हैं इसके अलावा इनके परिवार के किसी सदस्य पर भी कोई तांत्रिक क्रिया या मारण क्रिया नहीं कर सकता, चाहे कहीं भी रहें,क्योंकि इनका पिण्ड भी हमेशा बंधा रहता है इनके हर पल की खबर डाईन को ईष्ट भूत देता रहता है वह एक कर्ण पिशाचिनी की तरह कार्य करता है इसी कारण डाईन के परिवार बेफिक्र और खुशी खुशी रहते हैं उनकी खेती बाड़ी और गाय बैल सभी पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं एक डाईन दूसरे डाईन के परिवार वालों को भी दुख नहीं पहुंचा सकती,और किसी साधारण परिवार के ऊपर किया गया तांत्रिक क्रिया को बिल्कुल ठीक नहीं कर सकती है,ये सिर्फ दुख देने का काम कर सकती है ठीक करने का काम नही कर सकती है किंतु हां स्वयं के द्वारा किये गये तांत्रिक क्रिया को स्वयं अपनी इच्छा से जब चाहे तब ठीक कर सकता है किंतु ऐसा वो जब तक स्वयं पर बहुत ज्यादा दबाव न पड़े तब तक बिल्कुल नहीं करती हैं । ये उन्हीं परिवार वालों को दुख देती हैं जो धार्मिक,आध्यात्मिक और सीधे साधे हों,उनपरिवार वालों सेडरती हैं जो क्रिमनल प्रवृत्ति के हों,एक डाईन के पास परिवार को बर्बाद करने के लिए हजारों तरीके होते हैं ।

एक डाईन के तांत्रिक क्रिया का आजीवन कोई सबूत नहीं मिलता,ना ही प्रत्यक्ष कोई प्रमाण मिलता है यदि कोई किसी को डायरेक्ट डाईन कह दे तो वो बना गवाह के भी पुलिस थाने मे रिपोर्ट लिखा सकती है और कहने वाले के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्यवाही हो जाती है गांव के लोग चाहकर भी इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते,हां निरंतर किसी न किसी से चपके चुपके इनपर मारण क्रिया करवाते रहते हैं इसी उम्मीद से कि शायद किसी का कोई असर हो जाए ,कभी कभी किसी किसी का किस्मत भूले भटके साथ दे भी देता है और डाईन की मृत्यू हो जाती है ।
साधारणतया हम लोग सोंचते हैं कि डायन एक अत्यंत खतरनाक,कालीऔर कुरूप दिखने वाली बुढ़िया होगी,जैसा कि टी वी सीरियल मे हम देखते हैं जबकि हकीकत मे ऐसा कुछ नही है । डाईन तो अत्यंत सुन्दर,बदसूरत,गोरी, काली,18-20 साल की या 50-100 साल की भी हो सकती है,बी.ए. या एम.ए.पढ़ी लिखी या अनपढ़ भी हो सकती है नौकरी पेशा वाली या गृहणी भी सकती है किसी बहन, माँ, भाभी, पत्नी कोई भी हो सकती है,इनकी कोई विशेष पहचान नही होती,आज जो साधारण स्त्री है एक साल बाद डाईन बन जाएऔर किसी को पता भी न चले ऐसा भी होता है ।

डाईनों के पास मुठ मारण,भूत लगाने की विधी और सबसे खतरनाक विद्या "बान मारण" होती है बान 32 प्रकार का होता है जैसे:-चाऊर बान,सुई बान,लोहा बान सरसों बान इत्यादि । सभी एक से बान एक से बढ़कर एक खतरनाक होता है,किसी से एक पल मे लकवा मार देता है किसी से एक पल में फड़फड़ाकर वहीं पर मृत्यु हो जाती है जिसे डॉ. लोग हार्ट अटैक से मौत बता देते हैं ।

इसीलिए डईनों से उलझने से हर कोई डरता है,ये लोग कुछ भी करने में सक्षम होते हैं,जब मन किया कुत्ता या बिल्ली बनकर दूसरों के यहां सेंध मारने जाते हैं,या भूत को सांप बनाकर जिसे चाहे उसे कटवा देते हैं और उनकी मृत्यू होना निश्चत है बड़े स बड़े पेड़ को मरवा देना बाद मे जिंदा करना सामान्यतः इनका शक्ति परीक्षण होता है,विवाह के दौरान दूल्हा दूल्हन पर विशेष तौर पर भूत लगाया जाता है और पहले बच्चे के जन्म पर भी भूत लगाया जाता है कई बच्चों बचपन मे ही भूत लगाया जाता है जिसका लक्षण जवान होने पर पढ़ ना पाना,बार बार बिमार पड़ना,नौकरी न लगना,शादी न हो पाना या पागल हो जाना आदि के रूप मे दिखाई देता है कई बार डाईन लोग दूसरे डाईन के नाम से भूत लगा देते हैं ताकि स्वयं पकड़ मे नही आती और दूसरी डाईन व्यर्थ मे बदनाम होती है इस तरह ये हजारों प्रकार से दुख देते हैं जिसे पूरी तरह से फेस बुक मे व्याख्या कर पाना संभव नहीं | मेरी तरफ से संक्षेप मे ये सामान्य जानकारी है और डाईन से बचने हेतु अवश्य ही रक्षा कवच धारण करे,डाईन रक्षा कवच का निर्माण गोपनीय विधि-विधान से किया जाता है जिसमे जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है ।

जो साधक डाईन को सिद्ध करना चाहते है उनके लिए विशेष प्रकार के सामग्री का निर्माण किया जाएगा और साधक यह साधना किसी भी अमावस्या से घर पर बैठकर ही कर सकते है ।

अधिक जानकारी हेतू ईमेल से संपर्क करे-
snpts1984@gmail.com


आदेश....

14 Mar 2018

कूलदेवी/कुलदेवता पूजन पद्धती ।



समस्त ब्रह्माण्ड जिससे चालयमान है वह है शिव , और जो स्वयं शिव को चालयमान बनाती है वह है  उनकी शक्ति, आदिशक्ति । बिना आदिशक्ति के शिव भी अचल है। वह शक्ति ही है जो शिव परिपूर्ण करती है । यह आदिशक्ति भिन्न भिन्न रूपों में ब्रह्माण्ड की समस्त सजीव और निर्जीव वस्तुओं में विद्यमान है। यही शक्ति देवताओं में, असुरों में , यक्षों में , मनुष्यों में, वनस्पतियों में, जल में थल में , संसार के प्रत्येक पदार्थ में भिन्न भिन्न मात्रा में उपस्थित है। और देवताओं की शक्ति को हम उन देवो के नामों से जानते है जैसे – महेश्वर की शक्ति माहेश्वरी , विष्णु की शक्ति वैष्णवी , ब्रह्मा की शक्ति ब्रह्माणी , इंद्र की इंद्राणी , कुमार कार्तिकेय की कौमारी , इसी प्रकार हम देवों की शक्तियों को उन्ही के नाम से पूजते हैं।
कुल देवता या देवी हमारे वह सुरक्षा आवरण हैं जो किसी भी बाहरी बाधा, नकारात्मक ऊर्जा के परिवार में अथवा व्यक्ति पर प्रवेश से पहले सर्वप्रथम उससे संघर्ष करते हैं और उसे रोकते हैं, यह पारिवारिक संस्कारो और नैतिक आचरण के प्रति भी समय समय पर सचेत करते रहते हैं, यही किसी भी ईष्ट की आराधना करे वह उस ईष्ट तक नहीं पहुँचता, क्योकि सेतु कार्य करना बंद कर देता है, बाहरी बाधाये,अभिचार आदि, नकारात्मक ऊर्जा बिना बाधा व्यक्ति तक पहुँचने लगती है, कभी कभी व्यक्ति या परिवारों द्वारा दी जा रही ईष्ट की पूजा कोई अन्य बाहरी वायव्य शक्ति लेने लगती है, अर्थात पूजा न ईष्ट तक जाती है न उसका लाभ मिलता है, ऐसा कुलदेवता की निर्लिप्तता अथवा उनके कम सशक्त होने से होता है।

कुलदेवी कभी भी अपने उपासकों का अनिष्ट नहीं करती।
कुलदेवियों की पूजा ना करने पर उत्पन्न बाधाओं का कारण कुलदेवी नहीं अपितु हमारे सुरक्षा चक्र का टूटना है। देवी अथवा देवता तब शक्ति संपन्न होते हैं जब हम समय-समय पर उन्हें हवियाँ प्रदान करते हैं व नियमित रूप से उनकी उपासना करते हैं। जब हम इनकी उपासना बंद कर देते हैं तब कुलदेवी तब कुछ वर्षों तक तो कोई प्रभाव ज्ञात नहीं होता, किन्तु उसके बाद जब सुरक्षा चक्र हटता है तो परिवार में दुर्घटनाओं, नकारात्मकता ऊर्जा “वायव्य” बाधाओं का बेरोक-टोक प्रवेश शुरू हो जाता है, उन्नति रुकने लगती है, पीढ़िया अपेक्षित उन्नति नहीं कर पाती, संस्कारों का भय, नैतिक पतन, कलह, उपद्रव, अशांति शुरू हो जाती हैं, व्यक्ति कारण खोजने का प्रयास करता है कारण जल्दी नहीं पता चलता क्योंकि व्यक्ति की ग्रह स्थितियों से इनका बहुत मतलब नहीं होता है, अतः ज्योतिष आदि से इन्हें पकड़ना मुश्किल होता है, भाग्य कुछ कहता है और व्यक्ति के साथ कुछ और घटता है। कुलदेवता या देवी सम्बन्धित व्यक्ति के पारिवारिक संस्कारों के प्रति संवेदनशील होते हैं और पूजा पद्धति, उलटफेर, विधर्मीय क्रियाओं अथवा पूजाओं से रुष्ट हो सकते हैं, सामान्यतया इनकी पूजा वर्ष में एक बार अथवा दो बार निश्चित समय पर होती है।

यदि अपने कुलदेवता के स्थान पर किसी अन्य देवता का नामजप किया जाए, तो केवल उस देवता द्वारा प्रतिनिधित्व किए जानेवाले तत्त्वों का संवर्धन होगा किन्तु वह आध्यात्मिक उन्नति में प्रभावी रूप से सहायक नहीं होगा । जिस प्रकार माता-पिता से भिन्न व्यक्ति हम पर माता-पिता के समान कृपा नहीं करता उसी प्रकार अन्य देवता हम पर कृपा तो करते हैं किन्तु वह कृपा केवल उन्हीं तत्त्वों की होगी जिनका वह देवता प्रतिनिधि है। अतएव यह अपने कुलदेवता के नामजप की भांति अथवा जन्मगत धर्मानुसार देवता के नामजप की भांति प्रभावी नहीं होता । अतः किसी अन्य देवता अथवा अपने इष्ट देव की उपासना करना गलत नहीं है। परंतु इसके लिए हमें हमारी कुलदेवी की उपेक्षा नहीं करना चाहिये और नियमित रूप से पूर्ण श्रद्धा से कुलदेवी की उपासना अवश्य करते रहना चाहिए और हर समय इनका ध्यान करना चाहिए। यदि आप नहीं जानते कि आपकी कुलदेवी कौन है तो पूजा के लिए यह विधि कर सकते हैं "जिन्हें कुलदेवी की जानकारी नहीं है उनके लिए पूजा विधि"।

ऐसे लोगों के लिए हम एक पूजा-साधना प्रस्तुत कर रहे हैं। जिसके माध्यम से आप अपनी कुलदेवी की कमी को पूरा कर सकते हैं और एक सुरक्षा चक्र का निर्माण आपके परिवार के आसपास हो जाएगा | घर में क्लेश, बार-बार होने वाली बिमारियों, उन्नति में होने बलि बाधाओं इत्यादि  सभी समस्याओ के लिये कुलदेवी /कुल देवता साधना ही सर्वश्रेष्ठसाधना है। चूंकि अधिकतर कुलदेवता /कुलदेवी शिव कुल से सम्बंधित होते हैं ,अतः इस पूजा साधना में इसी प्रकार की ऊर्जा को दृष्टिगत रखते हुए साधना पद्धती अपनाई गयी है |



सामग्री :-

४ पानी वाले नारियल,लाल वस्त्र ,१० सुपारिया ,८ या १६ शृंगार कि वस्तुये ,पान के १० पत्ते , घी का दीपक,कुंकुम ,हल्दी ,सिंदूर ,मौली ,पांच प्रकार कि मिठाई ,पूरी ,हलवा ,खीर ,भिगोया चना ,बताशा ,कपूर ,जनेऊ ,पंचमेवा ।



साधना विधि :-

सर्वप्रथम एक लकड़ी के बाजोट या चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं |उस पर चार जगह रोली और हल्दी के मिश्रण से अष्टदल कमल बनाएं |अब उत्तर की ओर किनारे के अष्टदल पर सफ़ेद अक्षत बिछाएं उसके बाद दक्षिण की ओर क्रमशः पीला ,सिन्दूरी और लाल रंग से रंग हुआ चावल बिछाएं |चार नारियल में मौली लपेटें |एक नारियल को एक तरफ किनारे सफ़ेद चावल के अष्टदल पर स्थापित करें |अब तीन नारियल में से एक नारियल को पूर्ण सिंदूर से रंग दे दूसरे को हल्दी और तीसरे नारियल को कुंकुम से,फिर ३ नारियल को मौली बांधे |इस तीन नारियल को पहले वाले नारियल के बायीं और क्रमशः अष्टदल पर स्थापित करें |प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने एक पान का पत्ता और अन्य तीन नारियल के सामने तीन तीन पान के पत्ते रखें ,इस प्रकार कुल १० पान के पत्ते रखे जायेंगे |अब सभी पत्तों पर एक एक सिक्का रखें ,फिर सिक्कों पर एक एक सुपारियाँ रखें |प्रथम नारियल के सामने के एक पत्ते पर की सुपारी पर मौली लपेट कर रखें इस प्रकार की सुपारी दिखती रहे ,यह आपके कुल देवता होंगे ऐसी भावना रखें |अन्य तीन नारियल और उनके सामने के ९ पत्तों पर आपकी कुल देवी की स्थापना है | इनके सामने की सुपारियों को पूरी तरह मौली से लपेट दें |अब इनके सामने एक दीपक स्थापित कर दीजिये |

अब गुरुपूजन और गणपति पूजन संपन्न कीजिये | अब सभी नारियल और सुपारियों की चावल, कुंकुम, हल्दी ,सिंदूर, जल ,पुष्प, धुप और दीप से पूजा कीजिये | जहा सिन्दूर वाला नारियल है वहां सिर्फ सिंदूर ही चढ़े बाकि हल्दी कुंकुम नहीं |जहाँ कुमकुम से रंग नारियल है वहां सिर्फ कुमकुम चढ़े सिन्दूर नहीं |बिना रंगे नारियल पर सिन्दूर न चढ़ाएं ,हल्दी -रोली चढ़ा सकते हैं ,यहाँ जनेऊ चढ़ाएं ,जबकि अन्य जगह जनेऊ न चढ़ाए | इस प्रकार से पूजा करनी है | अब पांच प्रकार की मिठाई इनके सामने अर्पित करें | घर में बनी पूरी -हलवा -खीर इन्हें अर्पित करें |चना ,बताशा केवल रंगे नारियल के सामने अर्थात देवी को चढ़ाएं और आरती करें |साधना समाप्ति के बाद प्रसाद परिवार मे ही बाटना है,श्रृंगार पूजा मे कुलदेवी कि उपस्थिति कि भावना करते हुये श्रृंगार सामग्री तीन रंगे हुए नारियल के सामने चढा दे और माँ को स्वीकार करने की विनती कीजिये ।

इसके बाद हाथ जोड़कर इनसे अपने परिवार से हुई भूलों आदि के लिए क्षमा मांगें और प्राथना करें की हे प्रभु ,हे देवी ,हे मेरे कुलदेवता या कुल देवी आप जो भी हों हम आपको भूल चुके हैं ,किन्तु हम पुनः आपको आमंत्रित कर रहे हैं और पूजा दे रहें हैं आप इसे स्वीकार करें | हमारे कुल -परिवार की रक्षा करें |हम स्थान ,समय ,पद्धति आदि भूल चुके हैं ,अतः जितना समझ आता है उस अनुसार आपको पूजा प्रदान कर रहे हैं ,इसे स्वीकार कर हमारे कुल पर कृपा करें |

यह पूजा नवरात्र की सप्तमी -अष्टमी और नवमी तीन तिथियों में करें |इन तीन दिनों तक रोज इन्हें पूजा दें ,जबकि स्थापना एक ही दिन होगी | प्रतिदिन आरती करें ,प्रसाद घर में ही वितरित करें ,बाहरी को न दें |सामान्यतय पारंपरिक रूप से कुलदेवता /कुलदेवी की पूजा में घर की कुँवारी कन्याओं को शामिल नहीं किया जाता और उन्हें दीपक देखने तक की मनाही होती है ,किन्तु इस पद्धति में जबकि पूजा तीन दिन चलेगी कन्याएं शामिल हो सकती हैं ,अथवा इस हेतु अपने कुलगुरु अथवा किसी विद्वान् से सलाह लेना बेहतर होगा |कन्या अपने ससुराल जाकर वहां की रीती का पालन करे |इस पूजा में चाहें तो दुर्गा अथवा काली का मंत्र जप भी कर सकते हैं ,किन्तु साथ में तब शिव मंत्र का जप भी अवश्य करें |वैसे यह आवश्यक नहीं है ,क्योकि सभी लोग पढ़े लिखे हों और सही ढंग से मंत्र जप कर सकें यह जरुरी नहीं |

साधना समाप्ति के बाद सपरिवार आरती करे | इसके बाद क्षमा प्राथना करें |तत्पश्चात कुलदेवता /कुलदेवी से प्राथना करें की आप हमारे कुल की रक्षा करें हम अगले वर्ष पुनः आपको पूजा देंगे ,हमारी और परिवार की गलतियों को क्षमा करें हम आपके बच्चे हैं |तीन दिन की साधना /पूजा पूर्ण होने पर प्रथम बिना रंगे नारियल के सामने के सिक्के सुपारी को जनेऊ समेत किसी डिब्बी में सुरक्षित रख ले |तीन रंगे नारियल के सामने की नौ सुपारियों में से बीच वाली एक सुपारी और सिक्के को अलग डिब्बी में सुरक्षित करें ,जिस पर लिख लें कुलदेवी |अगले साल यही रखे जायेंगे कुलदेवी /कुलदेवता के स्थान पर |अन्य वस्तुओं में से सिक्के और पैसे रुपये किसी सात्विक ब्राह्मण को दान कर दें |प्रसाद घर वालों में बाँट दें तथा अन्य सामग्रियां बहते जल अथवा जलाशय में प्रवाहित कर दें |

                                                                  सादर आभार,
                                                           - श्री संजय शर्मा जी.
                                     


आदेश.......

12 Mar 2018

महाकाल स्तोत्र एवं मंत्र साधना ।







आकाशे तारकं लिंगं पाताले हाटकेश्वरम् । भूलोके च महाकालो लिंड्गत्रय नमोस्तु ते ॥

अर्थात:आकाश में तारक लिंग, पाताल में हाटकेश्वर लिंग तथा पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।


इस स्तोत्र को भगवान् महाकाल ने खुद भैरवी को बताया था  । इसकी महिमा का जितना वर्णन किया जाये कम है। इसमें भगवान् महाकाल के विभिन्न नामों का वर्णन करते हुए उनकी स्तुति की गयी है । शिव भक्तों के लिए यह स्तोत्र वरदान स्वरुप है । नित्य एक बार जप भी साधक के अन्दर शक्ति तत्त्व और वीर तत्त्व जाग्रत कर देता है । मन में प्रफुल्लता आ जाती है । भगवान् शिव की साधना में यदि इसका एक बार जप कर लिया जाये तो सफलता की सम्भावना बड जाती है ।

भगवान शंकर के अनेकों नाम है। भक्त भिन्न-भिन्न नामों से इनका गुणगान करते हैं, कोई महादेव तो कोई भोलेनाथ, कोई अघोरी तो कोई शंभु। भोलेनाथ के अलग-अलग रूपों के कारण ही उनके इतने नाम हैं। इन्हें तंत्र साधना का जनक भी कहा जाता है, इसलिए कोई भी तंत्र साधना उनके बिना पूरी नहीं होती। जो व्यक्ति सच्ची श्रद्धा से इनकी अराधना करता है, उसके जीवन से बड़े-बड़े कष्ट दूर हो जाते हैं। भगवान शिव का एक स्वरूप महाकाल का भी है, यानि वे मृत्यु को भी अपने वश में रखते हैं। महामृत्युंजय मंत्र के विषय में तो यह भी माना जाता है कि वह आसन्न मृत्यु को भी टाल सकता है। लेकिन बहुत ही कम महाकाल स्तोत्रं के बारे में जानते हैं, जिसे स्वयं भगवान शिव ने भैरवी को बताया था। इस स्तोत्रं में भगवान शिव के विभिन्न स्वरूपों की स्तुति की गई है। धार्मिक ग्रंथों की मानें तो यह स्तोत्रं भगवान शिव के भक्तों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

प्रतिदिन बस एक बार इस स्तोत्रं का जाप भक्त के भीतर नई ऊर्जा और शक्ति का संचार कर सकता है। इस स्तोत्रं का जाप आपको सफलता के बहुत निकट लेकर जा सकता है।

स्तोत्र को महाकाल मंत्र से संपुटित करके पढ़िए तो इसका आपको शीघ्र परिणाम प्राप्त होगा । इस स्तोत्र के साथ भगवान महाकाल जी के प्रिय मंत्र का जाप 11 बार करना है, यह एक ऋषियो का भक्तों के लिए वरदान है ।



सर्वप्रथम मंत्र 11,21 या 108 बार पढ़े,फिर स्तोत्र का 1,5,7,9,11 या 108 बार पाठ करे-

मंत्र-
।।हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।।






स्तोत्र-

ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पत
महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो
महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन
महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते
भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः
रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः
सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते
सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते
यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः
सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः
सचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमः
प्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुते
प्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमः
ॐ ह्रीं माया – स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसे
स्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमः ।।


फल श्रुति
इत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवी
कीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहम।।


मंत्र-
।।हूं हूं महाकाल प्रसीद प्रसीद ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।।




स्तोत्र पठन के बाद फिर से मंत्र का जाप करे,मंत्र का जाप उतना ही करे जितना स्तोत्र पठन से पूर्व शुरुआत में किया था ।
यह स्तोत्र तो कई पर भी किसी भी शुद्ध स्थान पर पढ़ सकते है,स्नान करने के बाद किसी भी प्रकार के वस्त्र,आसन और किसी भी दिशा में मुख करके पढ़ सकते है । जो व्यक्ति असाध्य बीमारियों से ग्रसित हो वह बेड पर या खुर्ची पर बैठकर भी कर सकते है ।

अंततः इतना ही कहूंगा के महाकाल सब जानते है,कब किसको किस समय पर क्या देना उचित है । महाकालि साधना में यह साधना प्रयोग करने से विशेष सफलता प्राप्त होती है ।

‘अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चांडाल का,
काल उसका क्या करे जो भक्त हो महाकाल का'


आदेश......

25 Feb 2018

तंत्र दोष निवारण प्रयोग (Black Magic Removel)




होली हिंदु धर्म का सबसे मुख्य त्योंहार माना जाता है जिसका शास्त्रों और ज्योतिष में भी विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष की दृष्टि से होलिका दहन विशेष सिद्धीदायी मानी जाती है .. मान्यता है कि होलिका दहन की रात्रि में किए गए सभी धार्मिक अनुष्ठान सिद्ध होते हैं और इनका उचित फल मिलता है। साथ ही ये भी मान्यता है कि होली की पवित्र अग्नि में सभी तरह के परेशानी, व्याधि और रोग-भय आदी को नाश करने की क्षमता होती है। ऐसे में आज आपको होलिका दहन के किए जाने वाले एक ऐसे ही विशेष प्रयोग के बारे में बता रहा हु,जिसके जरिए आप जीवन की सारी परेशानियों और चिंताओं से मुक्ति पा सकते हैं।

तंत्र शास्त्रों के अनुसार होली की रात्रि का विशेष महत्व होता है। इस दिन किए गए टोने-टोटके, पूजा पाठ या साधना अचूक होते हैं तथा उनका फल तुरंत मिलता है। इस दिन किसी दूसरे के द्वारा किए गए काले जादू को भी तुरंत ही समाप्त किया जा सकता है।

होलिका दहन की रात को तंत्र साधना के लिए बढि़या माना जाता है। इस दिन लोग कई समस्याओं से निजात पाने के लिए तंत्र मंत्र का सहारा लेते हैं। 1 मार्च को शाम में 7 बजकर 37 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगा इसके बाद से होलिका दहन किया जाना शुभ रहेगा। वैसे शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार इस साल होलिका दहन के लिए बहुत ही शुभ स्थिति बनी हुई है। पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा ना लगा हो। इस वर्ष होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं। धार्मिक ग्रंथ और शास्त्रों के अनुसार होलाष्टक के दिनों में किए गए व्रत और किए गए दान से जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है और ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन वस्त्र, अनाज और अपने इच्छानुसार धन का दान करना चाहिए।

आज आपको तीव्र तंत्र बाधा दोष के निवारण हेतु एक गोपनीय तांत्रिक प्रयोग बता रहा हू, जिससे भयंकर से भयंकर तांत्रिक बाधा दोष (काला जादू) समाप्त किया जा सकता है । यह एक आसान सा साधना प्रयोग है और इस प्रयोग के बाद इसका अनुभव किया जा सकता है,यह एक शीघ्र फलदायी साधना है । ऐसा प्रयोग प्राप्त होना ही जीवन मे सौभाग्य माना जाता है,आपके साथ-साथ यह प्रयोग मैं स्वयं भी संपन्न करने वाला हूँ । यह प्रयोग प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए, बड़े से बड़े तांत्रिकों से लेकर एक सामान्य व्यक्ति को भी यह प्रयोग करना आवश्यक है । इससे तांत्रिक बाधा के साथ साथ जीवन मे सफलता प्राप्ति हेतु आनेवाले बाधा का भी नाश होता है ।

साधना सामग्री-पीली सरसों  5-10 ग्राम ।

एक व्यक्ति के लिए 5-10 ग्राम पीली सरसों ठीक है परंतु अगर पुरा परिवार यह साधना करना चाहता है तो ज्यादा पीली सरसों खरीदे,पंसारी के दुकान में आपको पीली सरसों आसानी से मिल जाएगा और यह सस्ता होता है इसलिए चिंता ना करे । एक व्यक्ति का तंत्र बाधा दोष निवारण का खर्च 3-5 रुपये आता है जो ज्यादा नही है ।

साधना विधि-दाहिने हाथ मे पीली सरसों रखे,जितना आप हाथ मे ले सकते हो उतना ही लीजिए,ज्यादा लेने की आवश्यकता नही है वर्णा सरसो हाथ से मंत्र जाप के समय गिरता रहेगा ।

दाहिने हाथ मे पीली सरसों लेकर,उस पर त्राटक करते हुए मंत्र का 36 मिनट तक जाप करे । मंत्र जाप के बाद (सरसो को मुठ्ठी में बंद करे ) अपने सर से लेकर पैरो तक 7 बार मुठ्ठी में बंद पीली सरसों को उतारे और उतारने के बाद सरसो को किसी प्लेट में रख दे । फिर घर से बाहर जाकर प्लेट में रखे हुए सरसो को होलिका में डाल दे,यह प्रयोग रात्रि में 9 बजे के बाद कभी भी कर सकते है । मंत्र जाप के समय जमीन पर आसन डालकर बैठ जाये और जाप करे परंतु सरसो को उतारने के व्यक्त खड़े होकर उतारना है । दिशा,आसन, वस्त्र का कोई बंधन नही है,आपके पास किसी भी रंग की धोती या वस्त्र हो काम चल जाएगा,आसन कोई भी चलेगा और किसी भी दिशा में मुख करके साधना कर सकते हो ।



मंत्र-
।।ह्रीं ह्लीं दुं दुर्गम्च्छेदिन्यै दुं ह्लीं ह्रीं फट ।।

Hreem hleem doom durgamcchedinyai doom hleem hreem phat



मंत्र का उच्चारण साफ-साफ होना जरूरी है और इस प्रयोग के बाद इसका असर पीली सरसों को होलिका में दहन करते ही देखने मिलता है ।


आप सभी को होली के पावन अवसर की हार्दिक शुभकामनाएं



आदेश.......


Holi is considered to be one of the most important festivals of the Hindus and it also has an important place in our scriptures and astrology. According to astrology Holika dahan is considered to be an important day when one can receive Siddhis, it is believed that any saadhna done on this day becomes successful and we receive ample benefits from them. It is also believed that the pure fire of holika pyre has the power to burn away any problem or disease. Keeping this in mnd, I'm revealing a specific prayog through which you can remove all problems and obstacles in your life.

According to tantra scriptures,the night of  holi has a lot of importance. Any tona-totka, pooja or saadhna work without fail and we receive the benefits immediately. We can even remove any kind of black magic that has been done by others.
This day is used by a lot of people to free themselves of their problems through tantra mantra. On 1st March after 7:37 pm Bhadra will end and then it would be an auspicious time to burn the holika pyre. According to tantra scriptures, this year holika is going to be very auspicious. The date is a Purnima, there's Pradosh kaal, and no Bhadra. According to scriptures,  fasting done during holashtak and even donations helps to relive our life's problems and bring us closer to God. You should donate food, clothes and money according to your own capability.

Today I'm going to tell you a very strong tantra prayog, which can remove the effects of even the most powerful black magic. It is a very easy prayog, and you will experience the benefits of this very soon. Along with you even I'm going to do this prayog. Everyone, including the biggest tantriks and even the commonest of people should do this as it helps to remove the obstacles in your tantra saadhnas as well as any obstacles in your success.

What you need - yellow Mustard - 5-10 grams.

This should be enough for one person. If the whole family wants to do this saadhna, then you will have to buy more accordingly. You can get it from any local shopkeeper and it is not very costly. Only 3-5 Rs have to be spent for each person.




Saadhna vidhi

Take a fistful of yellow Mustard, don't take more than what you can handle or else it will keep falling during the mantra chant.
Take the mustard seeds in your right hand, and while doing tratak on it ( gazing without blinking your eyes), do the mantra chant. After the chant, fold your hand into a fist with the mustard inside, stand up, and then place your fist near your head, take it down to your feet and then bring it back up to your head. Do this 7 times. Place the seeds in a plate. Next, go out and throw these seeds into the holika pyre. Do this after 9 pm in the night. During the japa, sit and do the chant and also place an aasan, but, do the next step standing up. There are no rules for clothes, aasan or direction.



मंत्र-
।।ह्रीं ह्लीं दुं दुर्गम्च्छेदिन्यै दुं ह्लीं ह्रीं फट ।।

Hreem hleem doom durgamcchedinyai doom hleem hreem phat



The mantra should be pronounced clearly and this effects of this prayog are  seen the instant you throw the seeds in the pyre.
Wishing you all a happy and prosperous Holi!


Aadhesh.. 


11 Feb 2018

शिव दर्शन अघोरी मंत्र साधना

हे मेरे प्रिय भोलेनाथ, आपके कृपा से मैं जीवित हु ।
हर सांस भी आपको दे दु तो,वो भी आपकी ही है,अब आपही बताए आपको क्या अर्पित कर सकता हूँ ?

यही बात है जो हर शिव भक्त अपने दिल मे रखता है,करे तो क्या करे अपने प्रिय ईष्ट भगवान शिव जी के लिए,बहोत कुछ करने की चाह होती है और मन मे एक ही स्वप्न होता है के मैं शिव जी का आशिर्वाद प्राप्त करु ।

13 फरवरी को महाशिवरात्रि का दिव्य पावन अवसर है जिसे खोना नही चाहिए अपितु अपने ईष्ट के कृपा को प्राप्त करने के लिए भक्ति, सेवा या मंत्र जाप अवश्य करना चाहिए । कोई एक बुरा आदत छोड़ ही दो इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जैसे शराब पीना,सिगरेट पीना,मास खाना,घुटका खाना या फिर तंबाकू,जो भी इसमें से किसी भी शिव भक्त को बुरा आदत हो वह अब छोड़ ही दो । शिव भक्त को त्याग करना आना चाहिए और बुरे से बुरे आदतों को त्याग कर जो भी शिव भक्त भक्तिमार्ग पर आगे बढ़ता है उसे शिव कृपा अवश्य ही प्राप्त होती है ।

अघोरी बड़े नशे में धुत होते है और उनका दिमाग सातवे आसमान पर बैठकर बाते करता है के "मैं ये हु-मैं वो हु,मैं ये कर सकता हु-मैं वो कर सकता हु" । हमेशा याद रखो ऐसे लोग अघोरी नही अपितु चप्पल चोर होते है और इन्हें नशा करने के अलावा कुछ नही आता है । मैंने अपने जीवन मे ऐसे अघोरी देखे है जिनको नशे की आदत नही है और कुछ तो ऐसे भी देखे के वह चाहे कितना भी शराब पिये उनको नशा होता ही नही था । सच्चा अघोरी हो या फिर सच्चा शिव भक्त हो वह सिर्फ एक ही बात समझता हैं, शिवभक्ती से बड़ा नशा इस संसार में है ही नही ।

भक्त ही समझे भक्ति का नशा,
और कौन जाने क्या होता है नशा ।

इसलिए कह रहा हु के इस महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर शिवभक्ती के नशे में डूब जाओ परंतु बेकार के चीजो से नशा मत करो और अब तक नशा करते आये हो तो उसको अब त्याग दो,तो ही आप सच्चे शिवभक्त कहलाओगे अन्यथा ढोंगी भक्तों को हर बार भगवान से भिक मांगते रहना पड़ता है और सच्चे भक्तों को भगवान कुछ भी मांगने से पहिले ही आशीर्वाद के रूप में जो चाहे वह दे देते है ।

शिव जी पर तो शिवपुराण के साथ साथ कई ग्रंथ लिखे हुए है परंतु भोले बाबा को कैसे प्रसन्न करे यह तो रावण ने इस दुनिया को सिखाया था । माँ सती  में स्वयं के जीवन को त्याग दिया तब जाकर कहा माँ पार्वती के रूप में आज भी वह भोले बाबा के साथ विराजमान है,यही बात रावण ने समझ ली और दशानन रावण अपने मुण्ड को काट कर चढ़ा रहा था,वह भी अपने जीवन को त्याग रहा था परंतू शिव जी ने उसको रोक लिया और आत्मलिंग प्रदान कर दिया ।

अब रावण तो दूसरा कोई बनना है ही नही परंतु कुछ तो त्याग करके देख ही लो और नशे का त्याग करोगे तो गारंटी के साथ बोल रहा हु मरोगे नही ।

मेरा काम था समझाना,जिसे समझना है वो समझ लेगा और इसी विश्वास के साथ आज का यह अद्वितीय मंत्र साधना दे रहा हु ।

यह मंत्र मुझे एक विचित्र अघोरी बाबा ने दिया था,इस मंत्र से बहोत सारे काम होते है परंतु मैं सिर्फ आपको शिव जी के कृपा को प्राप्त करने हेतु साधना विधान बता रहा हु,बाकी इस मंत्र से काम कैसे करने है वह गोपनीय रखना आवश्यक है ।

महाशिवरात्रि के रात्रि में अन्नग्रहण ना करे,जो भी खाना हो वह सूर्यास्त से पहिले ही खाना है । शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने एक गाय के घी का दीपक जलाएं और उस दीपक के लौ में देखते हुये 3 घंटे तक जाप करे तो अवश्य ही शिव जी का दर्शन संभव है । साधना रात्रि में 9.30 बजे के बाद कभी भी शुरू करे सिर्फ 12 बजे से पहिले शुरू करे । आसन वस्त्र किसी भी रंग का चलेगा और मंत्र जाप के समय उत्तर दिशा में मुख करके बैठना है । जलते हुए दीपक के लौ में भोले बाबा के दर्शन संभव है,ऐसा मत सोचो के सामने आकर प्रत्यक्ष होंगे क्योंके प्रत्यक्ष दर्शन हेतु कठिन तपस्या की आवश्यकता होती है । साधना में धूपबत्ति जला सकते हो परंतु साधना कक्ष में ज्यादा धुवा मत करो नही तो आंखों में जलन होगा । दीपक के लौ में त्राटक करना है इसलिए ज्यादा से ज्यादा आंखों को खुला रखो ।

अघोर मंत्र

।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।

इसमें सिर्फ शब्द है,नाही ॐ है और नाही आदेश है और नाही कोई दूहाई है फिर भी यह एक अद्वितीय अघोर मंत्र है । मंत्र जाप के समय ज्यादा गर्मी महसूस हो तो साधना में से उठ जाना उचित रहेगा क्योंके साधना जबरदस्ती संपन्न मत करो ।

आदेश
।।ॐ नमः शिवाय ।।



Shiv Darshan Aghori Mantra Saadhna

"My Dear Lord, I am alive by your grace. Every breath that I take belongs to you. What can I offer to you when everything that is mine has been given by you "

These are the thoughts of every Shiv bhakt. Every Shiv bhakt wants to do a lot for his Lord and carries the dream that one day He or She will receive the Lord's blessing. 


This year,  Mahashivratri is falling on 13th February, and it is a very auspicious time to get Lord Shiva's blessings through bhakti ( devotion), seva ( servitude)  or Mantra jap. This Mahashivratri, leave some of the bad habits that you've been carrying uptill now, like drinking alcohol, smoking cigarettes, eating meat, or even chewing tobacco. Every Shiv bhakt should learn to sacrifice, and anyone who leaves his bad habits and follows the bhakti path of Shiva always receives His blessings. 

A lot of aghoris stay intoxicated and say things like " I'm this - I'm that- I can do this- I can do that". You should know that these people are not real aghoris, they are fakes and they don't know anything except staying intoxicated. I've seen aghoris that do not take intoxicants and I've also seen aghoris who can drink huge quantities of alcohol and still not get drunk. A real shiv bhakt only knows one thing - 

 Only a devotee can understand the intoxicantation of devotion, 


No one else can understand intoxication. 

That's why I'm saying, this year get intoxicated with the love of lord but leave other intoxicants like alcohol and cigarettes. And if you've been doing so uptill now,  stop. Only then you will be seen as a true shiv bhakt. If you, then you are no different from the fake bhakts of God who have to beg Him for everything while the real ones get everything from Him without asking. 


There have been a lot of Granths written about Lord Shiva, including the Shiv puran, but it was Ravana who taught people how to impress Him. He understood that Maa Sati had to give up her life before she could get a permanent place beside the Lord. So even he was ready to cut off his head and tribute it to Him, but he was stopped by Shiva who rewarded him with the Atma-lingam. 


Learn how to sacrifice from ravana, and leave intoxicants. You won't die, I assure you. 

My work was to advise,  and that is done. Those who have wisdom will follow what has been said. Keeping that in mind, I'm giving a mantra has no double. This was given to be by an aghori baba, it is used for a lot of purposes, but only giving the vidhi to get blessing of the lord, nothing else. 

Don't eat at night on mahashivratri, eat before the sunset. Light a cow ghee lamp/diya in front of a Shivling or a photo of Lord Shiva, and stare into its flame continously while chanting the mantra for 3 hours. If done with diligence, then Darshan of the lord is definitely possible. Begin after 9:30 pm anytime but before 12 am. The asan and  clothes can be of any colour but the direction has to be North. Darshan of lord Shiv is definitely possible inside the flame of the lamp. Don't think there will be a pratyaksh darshan, that is only possible through very difficult austerities. You can light Dhoop batti but take care that the room does not get filled with smoke or your eyes will start to tear. Keep your eyes open as much as you can as you need to do tratak while staring into the flame. 


Mantra 


" ।। बम बम भोले,अघोर गौरा पारबती,शिवजी कुँवारा संग रहे ।।


" Bum Bum Bhole, Aghor Goura Parbati, Shivji Kunwara Sang Rahe" 



There are only words in this mantra,  but it is very powerful. If you feel hot during the chant, it would be better to get up rather than forcefully trying to complete the saadhna. 

Aadhesh... 


4 Feb 2018

सूर्यग्रहण मंत्र साधना





16 फ़रवरी 2018 को साल का पहला सूर्य ग्रहण घटित होगा। भारतीय समयानुसार इस सूर्य ग्रहण ग्रहण की समयावधि रात्रि 00:25:51 से सुबह 04:17:08 बजे तक रहेगी,ग्रहण के समय अनुसार यह ग्रहण 15 फरवरी के रात्रि में घटित होगा। यह आंशिक सूर्य ग्रहण होगा जो भारत में नहीं दिखाई देगा। हालांकि दुनिया के अन्य क्षेत्रों जैसे- साउथ अमेरिका, पेसिफिक, अटलांटिक और अंटार्कटिका में इसकी दृश्यता रहेगी। ग्रहण चाहे दुनिया मे कही पर भी हो परंतु तंत्र साधना हेतु वह एक अच्छा समय होता है जिसमे मंत्र सिद्धि प्राप्त की जा सकती है ।

यह ग्रहण हमारे देश मे तंत्र साधना हेतु फायदेमंद है क्युके जो मंत्र साधना हमे रात्रि में करना है,ठीक समयानुसार ग्रहण काल भी रात्रि में है । इसलिए हम इस बार "तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना" करेंगे, जो एक महत्वपूर्ण साधना है ।

यदि हम जीवन का गहराई से विश्लेषण करें, तो पायेंगे, कि व्यक्ति हर पल, हर क्षण, भय एवं बाधाओं से आशंकित रहता है। गहराई से विश्लेषण करने पर ऐसा ही प्रतीत होता है कि मनुष्य की शक्तियां कीलित हो गई हैं। शक्तियों का यह कीलन स्वार्थी लोगों द्वारा या उनकी स्वयं की गलतियों से भी हो सकता है। इस कारण जीवन में भय का वातावरण बना रहता है और यह भी सत्य है कि निर्भय हुए बिना जीवन का आनन्द संभव ही नहीं है।

जीवन में निर्भयता एवं बाधाओं के निवारण के लिए व्यक्ति अनेक उपाय करता ही रहता है। जिस प्रकार कांटे से कांटा निकाला जा सकता है उसी प्रकार जीवन में कुछ ऐसी बाधाएं, ऐसी समस्याएं होती हैं जिन्हें उच्च तंत्र साधनाओं द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है।

आवश्यकता केवल इस बात कि है कि हम अपने जीवन का विश्लेषण करें तथा इस बात को समझें कि हमारे जीवन में जो घटित हो रहा है वह सामान्य है अथवा असामान्य। सामान्य समस्याओं का हल तो सामान्य प्रयोगों से किया जा सकता है। किन्तु असामान्य समस्याओं का हल तो विशेष तंत्र प्रयोगों से ही संभव है और इस हेतु उच्चस्तरीय तंत्र साधनाएं सम्पन्न करनी होती हैं। इस हेतु श्रेष्ठ उपाय है – ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’।

त्रिपुर भैरवी दस महाविद्याओं में अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तीव्र शक्ति स्वरूपा हैं। इनकी कृपा से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुरक्षा प्राप्त होेने लगती है और समस्त बाधाएं समाप्त हो जाती हैं। इनकी तंत्र शक्ति के माध्यम से साधक पूर्ण क्षमतावान एवं वेगवान बन सकता है।

भगवती त्रिपुर भैरवी, महाभैरव की ही शक्ति हैं, उनकी मूल शक्ति होने के कारण उनसे भी सहस्र गुणा अधिक तीव्र तथा क्रियाशील हैं। साधक जिन लाभों को भैरव साधना सम्पन्न करने से प्राप्त करता है, जैसे शत्रुबाधा निवारण, वाद-विवाद मुकदमा आदि में विजय, आकस्मिक दुर्घटना टालना, रोग निवारण आदि इस साधना के माध्यम से इन विषम स्थितियों पर भी आसानी से नियंत्रण कर सकता है।

कैसा भी वशीकरण प्रयोग करवा दिया गया हो, कैसा भी भीषण तांत्रिक प्रयोग कर दिया गया हो, दुर्भावना वश वशीकरण प्रयोग कर दिया गया हो, गृहस्थ या व्यापार बन्ध प्रयोग हुआ हो, तो तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना सम्पन्न करने पर वह बेअसर हो जाता है।



उच्च स्तरीय तंत्र प्रयोग

जब किसी व्यक्ति पर या उसके परिवार पर द्वेष वश तांत्रिक प्रयोग होता है, तो वह परिवार अत्यन्त कष्ट भोगने के लिए विवश हो जाता है। तांत्रिक बाधा के कारण उसके समस्त कार्य बाधित हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में तंत्र साधना सम्पन्न करने पर व्यक्ति का जीवन निष्कंटक तथा तेजस्वी क्षमताओं से युक्त हो जाता है।



कीलन दोष क्या है?

कीलन का तात्पर्य है, एक बन्धन। जिस प्रकार एक खूंटे से बंधा पशु उस खूंटे के चारों ओर तो चक्कर लगा सकता है लेकिन वह सीमा से आगे नहीं बढ़ सकता, खूंटे से गले तक की रस्सी किसी के लिए छोटी हो सकती है और किसी के लिए बड़ी, परन्तु बन्धन तो बन्धन ही है, वह एक पक्षी की भांति स्वच्छन्द विचरण तो नहीं कर सकता, इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की शक्तियों का कीलन किया हुआ है, और यह कीलन उसके कर्मों के कारण, उसके दोषों के कारण, उस पर किये गये किसी तांत्रिक प्रयोगों द्वारा आदि शक्ति के प्रभाव से हो जाता है, और जब तक यह दोष दूर नहीं हो जाता तब तक वह कितना ही प्रयास करे, उसके कार्य सफल नहीं हो पाते, उसके देखते-देखते उसके साथ वाले जीवन की दौड़ में आगे निकल जाते हैं और वह एक पशु की भांति अपने ही स्थान पर बंधा छटपटाता रहता है।



उत्कीलन क्या है?

क्या कीलन दोष का कोई उपाय है? क्या कीलन दोष ऐसा कलंक है, जिसे उतारा ही नहीं जा सकता? क्या साधक अपने भीतर अपनी शक्ति का उस स्तर तक विकास नहीं कर सकता, जिससे कीलन दोष दूर हो जाय?

ठीक यही प्रश्न तंत्र के आदि रचियता भगवान शिव से पार्वती ने किया था कि – हे प्रभु! आप तो भक्तों पर परम कृपा करने वाले हैं, आगम-निगम बीज मंत्रों के स्वरूप हैं, भक्ति मुक्ति के प्रदाता हैं फिर आपने मन्त्रों का कीलन क्यों किया? क्यों सांसारिक प्राणियों को मंत्र सिद्धि में पूर्णता प्राप्त नहीं होती?

देवों के देव महादेव ने कहा, कि जैसे-जैसे युग बदलेगा वैसे-वैसे लोगों में भक्ति-प्रीति कम होगी, राग, द्वेष, ईर्ष्या, विरोध, शत्रुता में वृद्धि होगी, एक प्राणी दूसरे प्राणी को देखकर प्रसन्न नहीं होगा, अपितु ईर्ष्या करेगा और इस ईर्ष्या के वशीभूत अपनी शक्तियों का उपयोग बुरे कार्यों में करेगा, यदि ऐसे गलत व्यक्तियों के हाथ में मंत्र सिद्धि, तंत्र सिद्धि लग गई तो वे संसार में विपत्ति की स्थिति उत्पन्न कर देंगे।



उत्कीलन महाविद्या

मनुष्य जीवन में ऐसा ही हो रहा है, कुछ स्वार्थी व्यक्तियों या स्वयं की कुछ गलतियों के कारण भी जीवन कीलित हो जाता है और उसके द्वारा किये गये कार्यों का उसे पूर्ण फल नहीं मिल पा रहा है। जीवन में उसे किसी भी प्रकार के कीलन को समाप्त करने हेतु ही ब्लॉग में विशेष ‘ तंत्र उत्कीलन त्रिपुरा साधना ’ दिया जा रहा है। जिससे कीलन दोष शांत करने में सफलता प्राप्त होगी, वह अपने ऊपर अन्य व्यक्तियों द्वारा किये गये तंत्र दूर कर सकेगा, अपने तंत्र ज्ञान को अपनी रक्षा के लिए प्रयोग कर सकेगा।



साधना विधान

यह साधना विशेष रूप से सूर्यग्रहण के समय और होली के रात्रि को 10 बजे के पश्चात् सम्पन्न करें। इस साधना हेतु आवश्यक है –एक नारियल, लाल सुपारी और काली हकीक माला आवश्यक है जो आपको पंसारी के दुकान में आसानी से मिल जाएगा । नारियल के सामने जब साधक मंत्र जप करता है तो कैसा ही कीलन प्रयोग हुआ हो वह स्वतः ही समाप्त हो जाता है क्युके नारियल स्वयं त्रिनेत्र से पूर्ण फल है,जिसे श्री फल भी कहा जाता है।

अपने सामने एक बाजोट पर लाल कपड़ा बिछा दें तथा उस लाल कपड़े पर कुंकुम से रंगे चावल और अष्टगन्ध फैला दें, उस पर एक पंक्ति में तिल तथा सरसों बराबर मात्रा में मिलाकर उनकी 11 ढेरियां बनाएं तथा प्रत्येक ढेरी पर एक-एक ‘ लाल सुपारी’ रख दें, अब इनके सामने ही ‘ नारियल ’ एक ताम्र पात्र में स्थापित कर दें। अब सर्वप्रथम विनियोग करें –


विनियोग

ॐ अस्य श्री सर्वयंत्रमंत्राणां उत्कीलनमंत्र स्तोत्रस्य मूल प्रकृतिर्ॠषिर्जगतीच्छन्दः, निरंजनी देवता क्लीं बीजं ह्रीं शक्तिः, ह्रः लौं कीलकं सप्तकोटिमन्त्रयन्त्रतन्त्रकी
लकानां संजीवन सिद्धर्थे जपे विनियोगः।


विनियोग के पश्चात् त्रिपुर भैरवी का ध्यान निम्न मंत्र का जप करते हुए करें –

उद्यद्भानु सहस्र कांति मरुणा क्षौमां शिरोमालिकाम् रक्तालिप्त पयोधरां जपपटीं विद्यामभीतिं वरम् हस्ताब्जैर्दधतीं त्रिनेत्र विलसद् वक्त्रार विन्द श्रियम् देवी बद्ध हिमांशु रत्न मुकुटां वन्दे – रमन्दस्तिाम्।

भगवती त्रिपुर भैरवी की देह कान्ति उदीयमान सहस्र सूर्यों की कांति के समान है। वे रक्त वर्ण के रेशमी वस्त्र धारण किए हुए हैं। उनके गले में मुण्ड माला तथा दोनों स्तन रक्त से लिप्त हैं। वे अपने हाथों में जप-माला, पुस्तक, अभय मुद्रा तथा वर मुद्रा धारण किए हुए हैं। उनके ललाट पर चन्द्रमा की कला शोभायमान है। रक्त कमल जैसी शोभा वाले उनके तीन नेत्र हैं। आपके मस्तक पर रत्न जटित मुकुट है तथा मुख पर मन्द मुस्कान है। आपको मेरा प्रणाम स्वीकार हो।



अपने दाहिने हाथ से नारियल को स्पर्श करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –

ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्त्यै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ अनन्ताय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ सर्वसागराय नमः। ॐ मणिद्विषाय नमः। ॐ चिन्तामणि गृहाय नमः। ॐ श्मशानाय नमः। ॐ पारिजाताय नमः। ॐ रत्न वेदिकायै नमः। ॐ मणिपीठाय नमः। ॐ नानामुनिभ्यो नमः। ॐ शिवेभ्यो नमः। ॐ शिवमुण्डेभ्यो नमः। ॐ बहुमांसास्थिमोदमान शिवोभ्यो नमः। ॐ धर्माय नमः। ॐ ज्ञानाय नमः। ॐ वैराज्ञाय नमः। ॐ ऐश्वर्याय नमः। ॐ अधर्माय नमः। ॐ अज्ञानाय नमः। ॐ अवराज्ञानाय नमः। ॐ अनैश्वर्याय नमः। ॐ आनन्दकन्दाय नमः। ॐ सर्वतत्वात्मपद्माय नमः। ॐ प्रकृतिमयपत्रेभ्यो नमः। ॐ विकारमयकेसरेभ्यो नमः। ॐ पंचाशद्वर्णढ़यकर्णिकायै नमः। ॐ अर्कमण्डलाय नमः। ॐ सोममण्डलाय नमः। ॐ महीमण्डलाय नमः। ॐ सत्वाय नमः। ॐ रजसे नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ आत्मने नमः। ॐ अन्तरात्मने नमः। ॐ परमात्मने नमः। ॐ ज्ञानात्मने नमः। ॐ क्रियायै नमः। ॐ आनन्दायै नमः। ॐ ऐं पारयै नमः। ॐ परापरायै नमः। ॐ निस्धानाय नमः। ॐ महारुद्र भैरवाय नमः॥

मंत्र उच्चारण के पश्चात् मानसिक रूप से भगवान सदाशिव का ध्यान करें तथा भगवान सदाशिव से तंत्र बाधाओं से मुक्त कराने का निवेदन करें। भगवान शिव के ध्यान के पश्चात् साधक ‘ काली हकीक माला ’ से निम्न भैरवी उत्कीलन मंत्र की एक माला जप करें।


मंत्र
ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं षट् पंचाक्षराणाम उत्कीलय उत्कीलय स्वाहा। ॐ जूं सर्वमन्त्र यन्त्र तन्त्राणां संजीवनं कुरु कुुरु स्वाहा॥
Om hreem hreem hreem shat panchaaksharaanaam utkilay utkilay swaahaa,om jum sarvmantra yantra tantranaam sanjivanam kuru kuru swaahaa


भैरवी उत्कीलन मंत्र पश्चात् साधक निम्न त्रिपुर भैरवी मंत्र की 31 माला मंत्र जप करें –

मंत्र
॥ह्सैं ह्सकरीं ह्सैं॥
Hasaim hasakareem hasaim


मंत्र जप की पूर्णता पर शक्ति स्वरूपा त्रिपुरा से तंत्र बाधाओं की समाप्ति की प्रार्थना करें तथा समस्त साधना सामग्री को लाल कपड़े में बांधकर होली की अग्नि में विसर्जित कर दें।

अन्य किसी मुहूर्त पर साधना प्रारम्भ करने पर सात दिन तक नित्य साधना सम्पन्न करने के पश्चात् आठवें दिन समस्त साधना सामग्री को किसी निर्जन स्थान पर जमीन में गाड़ दें। यह विशेष तांत्रोक्त प्रयोग सूर्यग्रहण और होली पर करे तो निच्छित ही सफलता मिलते हुए देखा गया है ।

आदेश......

3 Feb 2018

महाशिवरात्रि साधना



ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त करने का मंत्रतात्मक-तंत्रात्मक मार्ग भगवान शिव का ग्रहाधिपति स्वरूप चन्द्रमौलिश्वर मंत्र  साधना है । यह साधना आनेवाले महाशिवरात्रि के अवसर पर अवश्य ही संपन्न कर प्रत्यक्ष लाभ उठाने का प्रयास करे ।

भगवान् शिव अपने ‘चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप’ द्वारा ग्रहों के दूषित प्रभावों से व्यक्ति को या साधक को छुटकारा दिलाते हैं, क्योंकि भगवान् चन्द्रमौलिश्वर देवाधिपति हैं, तंत्रेश्वर हैं, अतः समस्त मंत्र-तंत्र भी उनके अधीन हैं, ऐसे भगवान चन्द्रमौलिश्वर की साधना तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।

ग्रह का शाब्दिक अर्थ पकड़ लेना, कब्जे में कर लेना होता है। नवग्रह पृथ्वी-वासियों के लिए एक ब्रह्माण्डीय प्रभाव है और प्रत्येक मनुष्य नवग्रहों के प्रभाव से सन्तप्त या प्रसन्न होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मनुष्य नवग्रहों के अधीन हैं। दुष्कर्म-सत्कर्म, पाप और पुण्य ग्रहों से ही संचालित होते हैं। ग्रहों के द्वारा त्रस्त होकर मनुष्य भांति-भांति के उपाय करता है, पर परिणाम आधा-अधूरा ही मिलता है। फिर मार्ग क्या है जिसके द्वारा रूष्ट ग्रह मनाए जा सकें और उनके प्रतिकूल प्रभावों को समाप्त किया जा सके।

यों तो ग्रह किसी को नहीं छोड़ते चाहे वह गरीब हो या अमीर, या फिर देवता ही क्यों न हों। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं हमारे सामने, जिनसे यह ज्ञात होता है, कि ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर कितना अधिक प्रभाव पड़ता है ।भ गवान श्रीराम जी को भी शनि की दशा से ग्रस्त होकर महल को छोड़कर वन में चौदह साल तक दर-दर भटकना पड़ा, यह बात ओर है कि वाल्मीकि ने भक्ति भाव पूर्वक उस वनवास को कुछ और नाम दे दिया, किन्तु सत्य यही है कि राम को भी जीवन में ग्रहों के दूषित प्रभाव के कारण चौदह साल तक जंगलों में रहकर जीवनयापन करना पड़ा।

महात्मा बुद्ध को भी मंगल एवं राहु के दूषित प्रभाव से ग्रसित होकर, अपना राजपाट छोड़कर उन सबसे संन्यास लेना पड़ा और राजा हरिश्चन्द्र को भी शनि की साढ़े साती के प्रभाव के कारण अपना राज्य त्याग कर श्मशान में रहना पड़ा और यही नहीं, अपितु उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया, जब वह अपने पुत्र की लाश पर कफन भी न डाल सके, इस प्रकार की अनेकों ऐसी घटनाएं हैं, जिनसे यह सिद्ध होता है कि इतने बड़े-बड़े महापुरुष भी ग्रहों के दूषित प्रभावों से बच नहीं पाये, भले ही इन घटनाओं को समाज ने कोई और (नाम) रूप दे दिया हो, किन्तु सत्य यही है, कि ग्रहों के प्रभाव से ही उनकी यह गति हुई।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को दूर करने के लिए अवश्य ही ऐसी सत्ता के पास जाना पड़ेगा जिनके अधीन सभी ग्रह और नक्षत्र हैं, पर इससे पहले यह समझते हैं कि शास्त्र इसके विषय में क्या कहते हैं?

देवाधीनम् जगत
सर्वम् मंत्राधीनाश्च देवता

देवताओं के अधीन समस्त जगत है, पर मंत्र के अधीन देवता हैं अर्थात् मंत्र जप द्वारा देवताओं को तुष्ट किया जा सकता है।
नवग्रहों को भी देवताओं का दर्जा दिया गया है। सूर्य जगत की आत्मा हैं, वे सौर मंडल के मुखिया हैं। चंद्रमा मन को शीतलता प्रदान करने वाले देव हैं। मंगल युद्ध (पराक्रम) के देवता हैं। बुध को व्यापार का देवता माना गया है। बृहस्पति देवताओं और शुक्र दानवों के गुरु हैं। गुरु का स्थान तो सर्वोपरि है। शनि एक अर्ध देवता हैं। राहु उत्तर चंद्र आसंधि के देवता हैं और केतु दक्षिण चन्द्र आसंधि के देवता हैं।

ग्रह देवता स्वरूप हैं और सैद्धान्तिक रूप से मंत्रों के अधीन हैं। इसलिए ज्योतिषी आपकी जन्मपत्री का अध्ययन करके आपको ग्रहों की विपरीत दशा होने पर मंत्र जप की सलाह देते हैं और पंडित को यह कार्य देकर आप निश्चिंत हो जाते हैं। पर ग्रह दशा तो दूर नहीं होती है।

ज्योतिष के अनुसार प्रमुख नौ ग्रह होते हैं – सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु। यों तो आकाश में सैकड़ों ग्रह हैं, किन्तु ज्योतिष विज्ञान में मुख्य ग्रह नौ ही माने जाते हैं, जिनका प्रभाव जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे हमारे ऊपर पड़ता ही रहता है और इन्हीं के प्रभाव से हमें जीवन में सफलता-असफलता मिलती रहती है। हर ग्रह का मानव जीवन पर अपना अलग-अलग प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ जाता है। इन नौ ग्रहों में भी पांच ग्रह ऐसे हैं, जिनका प्रभाव प्रायः व्यक्ति पर मुख्य रूप से देखने को मिलता ही है।

1. सूर्य – जन्मपत्रिका में यदि सूर्य की स्थिति व्यक्ति को विपरीत फल देने वाली हो, तो उसे समाज में बदनामी, विश्वासघात एवं कष्टप्रदायक जीवन बिताते हुए असफलताओं का शिकार होना पड़ता है।

2. मंगल – यदि मंगल की स्थिति जन्मपत्री में अच्छी न हो, तो व्यक्ति का जीवन कई प्रकार की उलझनों से ग्रस्त रहता है, जिनसे उसे जीवन भर तनाव बना रहता है, यह ग्रह व्यक्ति को जेल की यात्रा, चोर या हत्यारा आदि भी बना देता है।

3. शुक्र – स्वप्न दोष, विवाह-बाधा आदि इस ग्रह बाधा के कारण ही होते हैं।

4. शनि – जन्मपत्रिका में शनि की अच्छी स्थिति में ना होती व्यक्ति को एक-एक पैसे का मोहताज बना देती है, जिसके कारण व्यक्ति का जीवन दरिद्रता और गरीबी में बीतने पर वह शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तनावों से ग्रस्त होकर, मृत्यु तक को प्राप्त हो जाता है। इसके अलावा ऐक्सिडेन्ट, नौकरी छिन जाना, कोर्ट-कचहरी, डॉक्टरों आदि के चक्कर लगना आदि ये सब परेशानियां इस ग्रह बाधा के कारण ही मानव-मात्र को झेलनी पड़ती हैं।

5. राहु – इस ग्रह-दोष के कारण गृह कलह, आपसी मन मुटाव आदि अनेक प्रकार की समस्याओं से मनुष्य हर पल घिरा रहता है।


इस प्रकार अन्य ग्रह भी अपना दूषित प्रभाव मानव-जीवन पर डालते रहते हैं। जिनके चंगुल से बच निकलना मानव के लिए एक दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। कई व्यक्ति ढोंगी पण्डित-पुरोहितों के चंगुल में फंसकर उपरोक्त समस्याओं के निवारण हेतु उनके द्वारा बताए गये उपायों को आजमाते हैं, परन्तु उनसे उन्हें कोई लाभ नहीं मिल पाता, अपने कार्यों की सिद्धि एवं सफलता के लिए वे उनसे कई प्रकार के छोटे-मोटे अनुष्ठान प्रयोग भी करवाते हैं, किन्तु फिर भी उनका अनुकूल फल उन्हें प्राप्त नहीं होता, तब उनका देवताओं आदि पर से विश्वास उठने लगता है, क्योंकि वे उन समस्याओं एवं परेशानियों का कारण नहीं जान पाते, जबकि इन आपदाओं-विपदाओं का मूल कारण ‘ ग्रह-बाधा ’ ही है।



कैसे करें ग्रहों के दुष्प्रभाव का पूर्ण शमन?

देवता मंत्रों के अधीन हैं और नवग्रह देवता स्वरूप हैं फिर भी ग्रह शांति मंत्र के लिए किया गया जप सफल क्यों नहीं होता। यही सोच रहे हैं ना आप? चलिए समझते हैं इसे-

इत्थं रूपेण कीलेन
महादेवेन कीलितम्

दुर्गा सप्तशती के कीलक अध्याय में स्पष्टतः वर्णित है कि महादेव ने मंत्रों को कीलित कर दिया। महादेव ने मंत्रों पर ताला लगा दिया है जिससे ईर्ष्या और लोभवश इन मंत्रों का दुरुपयोग नहीं किया जा सके, इस कारण मंत्र कीलित हैं।

जैसे हलवाई की दुकान पर आप विभिन्न प्रकार की मिठाईयां देखते हैं, उनकी खुशबू सूंघते हैं और क्षणिक तृप्ति का अहसास भी होता है, पर उससे आपकी भूख तो नहीं मिटेगी, क्षुधा तो तृप्त नहीं होगी क्योंकि मोल देकर आपने वह मिष्ठान खाया नहीं।

इसी तरह नवग्रह शांति हेतु पंडितों द्वारा किया मंत्र जाप क्षणिक संतोष दे सकता है, एक दिवास्वप्न की तरह, उनसे ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त नहीं होगी क्योंकि मंत्र कीलित हैं और उनका जप कोई और आपके लिए कर रहा है। जब आपको भोजन खाना है तो उसे पकाना भी पड़ेगा और खाना भी आपको ही पड़ेगा।



मंत्रों का निष्कीलन कैसे होगा?

ये विद्या किसे आती है? शास्त्रानुसार यह विद्या सिर्फ गुरु को आती है। गुरु आपकी योग्यता को भांप कर आपको उसके अनुरूप मंत्र देते हैं और साथ ही शक्तिपात द्वारा आपको सार्मथ्यवान बनाते हैं कि आप सफलता पूर्वक मंत्र जप करें और आपके मनोरथ दुष्ट ग्रहों के दुष्प्रभाव से अछुते रहें। यही कारण है कि, गुरु आशीर्वाद देते हुए कहते हैं –

मंत्रार्था सफला सन्तुः
सफला सन्तुः मनोरथाः

जिस कार्य हेतु आप मंत्र जप कर रहे हैं, वह सफल हो आपके मनोरथ पूर्ण हों और जब गुरु आशीर्वाद देते हैं, तो उसके उपरांत कार्य सिद्धि अवश्यम्भावी है।

तात्त्पर्य है कि नवग्रह शान्ति हेतु निष्कीलित मंत्र गुरु आज्ञा के पश्चात् जप करें। पर ग्रह तो नव (नौ) हैं तो मंत्र भी निश्चित रूप से नौ तो होंगे ही फिर ग्रहों की दशा भी तो परिवर्तित होती रहती है, तो समयानुरूप मंत्र जप भी भिन्न -भिन्न होंगे।

एक साधे सब सधे

पर, अगर आप उस एक साधना की तलाश में हैं जो नवग्रहों के प्रतिकूल प्रभावों का आमूल नाश कर सके तब आपके लिए चंद्रमौलिश्वर साधना है।

मंत्रों को कीलित किया है शिव ने, सृष्टि के केन्द्र में शिव स्थित हैं, सभी देवों से श्रेष्ठ शिव हैं, महादेव रूप में। चन्द्रमा को जब दक्ष ने क्षय का श्राप दिया तो उसे अपनी जटाओं में स्थापित कर शिव ने पुनः जीवन दिया। इसी कारण से अमावस्या के बाद प्रतिपदा से हर दिन चन्द्रमा बढ़ता है और पूर्णिमा को अपने पूर्ण यौवन को प्राप्त होता है।

शिव आदि गुरु हैं। पार ब्रह्म परमेश्वर हैं और अगर बाधाएं ग्रह-दोष के कारण जीवन में आ रही हैं, तो उनका पूर्ण निवारण सिवाय शिव के किसी के पास नहीं है। शिव का चंद्रमौलिश्वर स्वरूप बाधाओं का पूर्ण संहार कर देगा।

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गंगाधरे शंकरे,
सर्पैभूषित कण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थ वैश्वानरे।
दन्तित्वक् कृत सुन्दराम्बर धरे त्रैलोक्य सारे हरे,
मोक्षार्थ कुरुचित्तवृत्तिमचलाम् अन्यैस्तु किं कर्मभिः॥

अर्थात् – ‘सिर पर अर्धचन्द्र को धारण किए हुए भगवान् चन्द्रमौलिश्वर, जो कामदेव को भस्म करने वाले हैं, जिनके मस्तक से गंगा प्रवाहित हो रही है, कण्ठहार के रूप में सर्प को धारण किए हुए हैं, जिनके तृतीय नेत्र से वैश्वानर अग्नि निकल रही है, हस्ति चर्म को सुन्दर वस्त्र के रूप में धारण किए हुए तीनों लोकों में अद्वितीय भगवान् शंकर, जो अपने इस रूप-गुण के कारण ‘ चन्द्रमौलिश्वर ’ कहे जाते हैं, वे मेरे मन और बुद्धि को मोक्ष मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए मेरे समस्त ग्रह जन्य दोषों को दूर करें।’
आप स्वयं सोचिए जब आपके बच्चे को नजर लग जाती है तब आप लाल मिर्च अग्नि में जलाकर, उसकी नजर उतारते हैं, पर जब बाधा ग्रहों के दूषित प्रभाव की हो, तब अग्नि भी तो प्रचण्ड होनी चाहिए और शिव के त्रिनेत्र की ज्वाला से विकराल कोई अग्नि नहीं है। उनके एक दृष्टिपात से विपरीत ग्रहों के दुष्प्रभाव भस्म हो जाएंगे।

ग्रहों के दुष्प्रभाव को समाप्त करने की ही साधना है – 

चन्द्रमौलिश्वर साधना। इस साधना के बल पर वह व्यक्ति अपने जीवन में समस्त नौ ग्रहों के दूषित प्रभावों से मुक्ति प्राप्त कर उन ग्रहों को अपने अनुकूल बनाने में सफल हो पाता है, और तब उसे जीवन में कभी भी किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं भोगना पड़ता।

ग्रहों की दशा यदि सही रहे, तो व्यक्ति के जीवन में उन्नति के स्रोत हमेशा के लिए खुले रहते हैं, और वह कामयाबी की मंजिल की ओर बढ़ते हुए अपने जीवन में पूर्ण सुखी एवं सम्पन्न हो जाता है, क्योंकि इस साधना-शक्ति के द्वारा व्यक्ति/साधक एक बार में ही अपनी समस्त परेशानियों एवं बाधाओं से मुक्ति पा लेता है।

सामग्री – पाँच मुखी रुद्राक्ष, रुद्राक्ष माला।
दिवस – महाशिवरात्रि या किसी सोमवार के दिन।
समय – रात्रि 8 बजे के बाद से 11.30 तक।


साधना-विधान

रात्रिकालीन इस साधना में बैठने से पहले साधक स्नानादि करके पूर्णतया शुद्ध होकर, पीली धोती धारण कर अपने सामने किसी लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछा दें और फिर आसन पर शांतचित्त होकर बैठ जाएं, इसके पश्चात् तीन बार ‘ ॐ ’ की ध्वनि का उच्चारण करने के बाद 5 मिनट तक गुरु का ध्यान करें और प्रार्थना करें कि मुझे समस्त परेशानियों से मुक्ति प्राप्त हो, ऐसा कहकर उनसे आशीर्वाद ग्रहण करें, जिन्हें गुरु ना हो वह साधक शिव जी का ही ध्यान करे तत्पश्चात् किसी प्लेट में कुंकुम से ‘ॐ’ लिखकर, उसमें ‘पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ को स्थापित कर दें, फिर कुंकुम का तिलक करके उस पर ‘ ॐ चन्द्रमौलिश्वराय नमः ’ मंत्र बोलते हुए 11 बार थोड़े-थोड़े चावल चढ़ाएं, तथा 11 बार इसी मंत्र से काले तिल, काली सरसों, काली मिर्च अलग-अलग चढ़ाएं, और धूप या अगरबत्ती जलाकर सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, ध्यान रहे कि पूरे साधना काल में दीपक प्रज्वलित रहे।
फिर साधक मन ही मन शिव के ‘ चन्द्रमौलिश्वर स्वरूप ’ को नमस्कार कर ‘ रुद्राक्ष माला ’ से निम्न मंत्र का 9 माला मंत्र जप करें।


मंत्र

॥ॐ शं चं चन्द्रमौलिश्वराय नमः॥
Om sham cham chandramoulishwaraay namah


जप-समाप्ति के बाद शिव-आरती करें, फिर ‘ पाँच मुखी रुद्राक्ष ’ पर अर्पित सामग्रियों को रात्रि के समय पूरे घर व दुकान तथा जो भी अपके आवासीय या व्यापारिक संस्थान हैं, सब जगह छिड़क दें, जिससे दुष्ट ग्रहों का प्रभाव दूर हो सके तथा भविष्य में भी उन ग्रह-दोषों का प्रभाव न हो, इसके पश्चात् रुद्राक्ष तथा माला को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें।

यह साधना पूर्ण सफलतादायक है, जिसे पूर्ण श्रद्धा और लगन से करने की आवश्यकता है, तभी साधक को इससे निश्चित लाभ की प्राप्ति संभव है।



आदेश......
।।ॐ नमः शिवाय ।।