12 May 2017

हत्थाजोड़ी:तांत्रिक वशिकरण प्रयोग (Haath jodi)


इस फोटो में हत्था जोड़ी,पाय जोड़ी,मायाजाल,इंद्रजाल और मोहिनी जाल है ।


हत्था जोड़ी तांत्रिक प्रयोगों में काम आने वाली एक दुर्लभ एवं चमत्कारिक वस्तु है | ये एक प्रकार की वनस्पति बिरवा की जड़ है, लेकिन इसे दुर्लभ माना जाता है, क्योकि ये सहज उपलब्ध नहीं होती है | अमरकंटक में अगर कोई जाए तो वहां के आसपास के जंगलों में आपको बिरवा का पौधा देखने मिल सकता है । जब यह पौधा आपको दिखे तो गलती से भी उसको छूना नही क्योके उसके पत्ते विषैले होते है,जिसको छूने से बहोत देर तक इंसान को खुजली की तकलीफ होती है । किसी धारदार लोहे के लंबे सलाख से पौधे के आसपास खुदवाई करे और ज्यादा से ज्यादा डेड-दो फ़ीट खोदने पर आपको बिरवा के जड़ में एक ऐसा जड़ दिखेगा जिसके दोनों हाथ जुड़े हुए हो और उसको जब जमीन से बाहर निकाला जाए तो वह कुछ दिनों तक सूखने के बाद थोड़े बहोत एक दूसरे से अलग होने लगते है । मतलब जुड़े हुए हाथ एक दूसरे से अलग हो जाते है और यह एक निसर्ग का संकेत माना जाता है जैसे "अब तक मैं माँ धरती से हाथ जोड़कर कामना कर रहा था के मुझे दुनिया के काम आना है और जब मुझे जमीन से बाहर निकाल दिया जाए तो मैं अपने जन्म के बाद अपनी दोनों बाहे फैलाने की कोशिश करूँगा ताकि माँ को आभार व्यक्त कर सकू" ।


निसर्ग हमे बहोत कुछ सिखाता है परंतु हम आसानी से समझ नही पाते है । जैसे अघोर तंत्र में हत्था जोड़ी का ज्यादा इस्तेमाल भगवान प्रेतेेश्वर को प्रणाम करने हेतु किया जाता है । बहोत सारे अघोरी इसके पीछे का रहस्य नही जानते है,इसका रहस्य आज आपको बता देता हूँ । स्वयं महाकाली जी का निवासस्थान स्मशान में माना जाता है और भगवान प्रेतेश्वर को अगर माँ अपने बच्चे (महाकाली साधक) के लिए प्रणाम करे तो प्रेतेश्वर भगवान को साधक की इच्छा को पूर्ण करना ही पडेगा । जब माँ ने दैत्यों का नाश किया तो स्वयं अम्बा जी ने महाकाली जी को चामुंडा नाम दिया था जो उग्र स्वरूप होकर भी अपने बच्चो के लिये ममता स्वरूपिणी है । हत्था जोड़ी में माँ चामुंडा का निवास होता है और अघोर साधक हत्था जोड़ी को अपने नाम से प्राण-प्रतिष्ठा करते है साथ मे माँ से कामना करते है "है माँ महाकाली मुझे पूर्ण सिद्धि हेतु भगवान अघोरेश्वर (प्रेतेश्वर) से आशीर्वाद चाहिए और वह आपकी बात को कभी टाल नही सकते है । तो माँ मेरे तरफ से इस हत्था जोड़ी के माध्यम से मैं अपने दोनों हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना कर रहा हु,कृपया आप मेरा प्रणाम भगवान प्रेतेश्वर स्वीकार करे ऐसी कृपा मुझे प्रदान करते हुए मेरा कार्य सिद्ध करे" । इस प्रार्थना को माँ स्वीकार करते हुए स्वयं प्रेतेश्वर भगवान से अपने बच्चे के लिए कामना करती है ।


हत्था जोड़ी का महत्व साधारण नही है,इसलिए ओरिजनल हत्था जोड़ी मिल जाये तो उसको सुरक्षित रखना चाहिए । आज के समय मे शालिग्राम शिला और हत्था जोड़ी मार्केट में सस्ते दामों पर 100% डुप्लीकेट मिल जाती है परंतु जीवन मे एक बार अगर ओरिजनल मिल जाये तो यह सौभाग्य ही माना जायेगा । किसी के भी हृदय में स्थान (वशिकरण) बनाने हेतु हत्था जोड़ी एक चमत्कारी तांत्रोक्त सामग्री मानी जाती है । कहा जाता है हत्था जोड़ी के माध्यम से किया जाने वाला वशिकरण क्रिया अचूक होता है और कई वर्षों तक वशिकरण क्रिया का असर रहेता है । जैसे अन्य वशिकरण क्रियाओ में वशिकरण का असर धीमा हो जाता है या फिर समाप्त हो जाता है । हत्था जोड़ी के माध्यम से किया जाने वाला वशिकरण प्रयोग गोपनीय होता है,जिसे सिर्फ समाज में कल्याण हेतु किया जाना चाहिए अन्यथा इसका प्रभाव देखने नही मिलता है । हवस के आदि हुये लोगो को किसी भी स्त्री या पुरूष को परेशान करने हेतु ऐसा उच्चकोटी का क्रिया नही करना चाहिए । हत्था जोड़ी धन प्राप्ति,व्यवसाय वृद्धि,कोर्ट-कचेरी,विद्या प्राप्ति,इतर योनि सिद्धि, नवार्ण मंत्र सिद्धि, महाकाली साधना,नोकरी प्राप्ति,शीघ्र विवाह हेतु,मनोवांछित वर/वधु प्राप्त करने हेतु और ऐसे कई कार्य है जिनमे सफलता प्राप्त करने हेतु आवश्यक सामग्री मानी जाती है । हत्था जोड़ी की प्राण-प्रतिष्ठा साधक के नाम से ही करनी चाहिए ताकि उसको पूर्ण लाभ मिले और साधक के प्रत्येक विशेष मनोकामना पूर्ति हेतु संकल्प लेकर ही हत्था जोड़ी को चैतन्य किया जाना चाहिए । मैने आज यहां पर हत्था जोड़ी के बारे में जितना भी लिखा है उतना अन्य कही आपको पढ़ने नही मिलेगा,हत्था जोड़ी प्रामाणिक रूप से ही साधक को प्रदान किया जाए तो देने वाला भी पूण्य का भागी होता है और अप्रामाणिक देने वालो के हाल बहोत बुरे होते है क्योके दुनिया मे जिससे चाहो उससे अप्रामाणिकता दिखा सकते हो परंतु माँ चामुंडा से डरना जरूरी है अन्यथा माँ नाराज होकर अप्रामाणिक हत्था जोड़ी देने वालो पर क्रोधित हो जाती है । मर्यादा में रहकर इंसान जो भी कार्य करता है उसे उसका शुभ फल प्राप्त होता ही है और अशुभ कार्य करने वाले ज्यादा दिनों तक जीवन का आनंद नही उठा सकते है ।




वशिकरण प्रयोग:-

दुर्गा जी के मंदिर जाइए और माँ से कामना कीजिये, फिर घर मे बैठकर शाम के समय स्फटिक माला से 21 माला मंत्र जाप 21 दिनों तक रोज कीजिये और मंत्र जाप के बाद लाल रंग के पुष्प भगवती जी के चित्र/चरणो मे चढ़ा दीजिये,कार्य पूर्ण होने के बाद पीली सरसो से १०८ आहुती हवन मे दे दीजिये ताकि वशिकरण का असर कई वर्षो तक कायम रहे । इस साधना में हत्था जोड़ी जो सिर्फ वशिकरण हेतु इस्तेमाल करना है ( जो चामुंडा बिजोक्त मंत्र से सिद्ध हो ) अन्य कार्यो के लिए नही । जिसको वश में करना है उसके फ़ोटो के साथ लाल धागे से बाँधे और लाल धागे से बांधते समय एक विशेष मंत्र का 7 बार जाप करना होता है ताकि पुर्ण कार्य सिद्ध हो सके । मेरे अनुभव के हिसाब से बिना इस क्रिया के कार्य पूर्ण नही हो सकता है क्योंके यह विशेष मंत्र जो मैं यहां नही दे रहा हु वह दोनों प्रेमियो को प्रेम के बंधन में बांध देता है , जिससे कार्य पूर्ण हो जाता है । मंत्र जाप लड़का/लड़की के फोटो को देखते हुए करना है,साथ मे प्रत्येक माला के बाद फ़ोटो पर बाँधी हुई हत्था जोड़ी को कुंकुम का तिलक करना है ।


मंत्र:-

॥ ॐ चामुंडे कुर्यम दंडे अमुक हृदय मम हृदयं मध्ये प्रवेशाय प्रवेशाय प्रवेशाय स्वाहा ॥


साधना पूर्ण होने से पहिले ही साधका का कार्य पूर्ण होते हुए अनुभव किया गया है परंतु कभी कभी साधना समाप्ति के बाद 8-10 दिनों तक इंतजार करना पड़ता है ।



आज तक सोशल नेटवर्किंग साइट पर आप लोगो को ऐसा आर्टिकल पढ़ने नही मिला होगा,आगे भी मैं प्रयासरत हु के आर्थिक बाधाओ पर विजय प्राप्त करने हेतु आर्टिकल लिखू ।
किसी व्यक्ति को हमारे पास से प्रामाणिक हत्था जोड़ी प्राप्त करना होतो वह हमें ईमेल से संपर्क कर सकते है-

Amannikhil011@gmail.com

आपको उचित दाम पर ही ओरिजनल हत्था जोड़ी उपलब्ध करवाया जाएगा ।




आदेश............

12 Apr 2017

महालक्ष्मी साधना


वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है। भारतीय ॠषियों ने साढ़े दिनों के मुहूर्तों को सिद्ध मुहूर्त बताया है, इन मुहूर्तों में कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ किया जा सकता है। इन साढ़े तीन मुहूर्तों में नवीन वस्त्र, धन-धान्य, गृह प्रवेश, गृह निर्माण, स्थाई वस्तु का क्रय शुभ माना गया है।

ये पर्व है –
1. चैत्र नवरात्रि का प्रथम दिवस –चैत्र शुक्ल प्रतिपदा।
2. आश्विन नवरात्रि शुक्ल पक्ष दशमीं –विजयादशमी।
3. कार्तिक अमावस्या –दीपावली का प्रथम काल (आधा दिन)
4. वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया – अक्षय तृतीया।


इन चार पर्वों में भी अक्षय तृतीया शुभ कार्य अर्थात् विवाह, अस्त्र-शस्त्र, वाहन, धन, भवन-भूमि, स्वर्ण-आभूषण, युद्ध क्रिया, तीर्थ यात्रा, दान-धर्म-पुण्य, पितरेश्वर तर्पण सभी दृष्टियों से सर्वोत्तम है।

अक्षय तृतीया के दिन किये जाने वाले शुभ कार्य का फल अक्षय होता है। इस दिन दिया जाने वाला दान अक्षुण्ण रहता है। ज्योतिष की दृष्टि से भी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। अक्षय तृतीया के दिन सूर्य और चन्द्रमा अपने परमोच्च अंश पर रहते हैं।

सूर्य दस अंश पर उच्च का होता है और चन्द्रमा 33 अंश पर परमोच्च होता है। इस दिन ग्रह-नक्षत्र, मण्डल में यह स्थिति बनती है। इस कारण इस दिन किये गये मंत्र जप, साधना, दान से सूर्य और चन्द्रमा दोनों जातक के लिये बलवान होते हैं और सूर्य चन्द्रमा का आशीर्वाद मनुष्य को प्राप्त होता है। वेदों के अनुसार सूर्य को इस सकल ब्रह्माण्ड की आत्मा माना गया है और चन्द्रमा मानव मन को सर्वाधिक प्रभावित करता है। अतः इस दिन मन और आत्मा के कारक सूर्य और चन्द्रमा दोनों पूर्ण बली होते हैं। दोनों उच्च के होते हैं, इस कारण अक्षय तृतीया का दिन पूर्ण सफलता, समृद्धि एवं आंतरिक सुख अनुभूति का वाहक बन जाता है।

अक्षय तृतीया के दिन भगवान कृष्ण और सुदामा का पुनः मिलाप हुआ था। भगवान कृष्ण चन्द्र वंशीय है और इस दिन चन्द्रमा उच्च का होता है। चन्द्रमा मन का कारक है और सुदामा साक्षात् निस्वार्थ भक्ति के प्रतीक हैं। इस अर्थ में निस्वार्थ भक्ति और मन के प्रभु मिलन का यह पर्व है। भक्ति और साधना से ही ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
अक्षय तृतीया को युगादि तिथि कहा जाता है। युगादि का तात्पर्य है एक युग का प्रारम्भ और अक्षय तृतीया से त्रेता युग प्रारम्भ हुआ था। त्रेता युग में ही भगवान राम का जन्म हुआ था जो सूर्यवंशी थे। सूर्य उच्च का और परम तेजस्वी होने पर इस योग से सूर्य वंश में तेजस्वी भगवान राम का जन्म हुआ।
अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान परशुराम का जन्म हुआ था, भगवान परशुराम के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय रहित किया था। शास्त्रों में सही वर्णन है, क्षत्रिय से तात्पर्य किसी जाति से नहीं है। प्रत्येक मनुष्य में तीन गुण सत्व, रजस और तमस प्रधान होते है। भगवान परशुराम ने सत्व गुण अर्थात् ॠषि, वेद, साधना, तपस्या, यज्ञ, ज्ञान के पुनर्स्थापन के लिये रजस और तमस तत्वों का अंत किया था।
अक्षय तृतीया के दिन ही भारतवर्ष में गंगा नदी का अवतरण ब्रह्माण्ड से हुआ था। गंगा नदी को पवित्रतम् माना जाता है और भारत की प्राण धारा कहा जाता है। गंगा की सहायक नदियां यमुना, सरस्वती, कावेरी, कृष्णा, गोदावरी, ब्रह्मपुत्र हैं। अतः पतितपावनी गंगा के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिये अक्षय तृतीया को नदी, तीर्थ आदि पर स्नान सम्पन्न किया जाता है।

पाण्डवों के वनवास के दौरान पांचों पाण्डव वन-वन भटक रहे थे और उनके पास अन्न, धन-धान्य समाप्त हो गया। इस पर युधिष्ठर ने भगवान कृष्ण से इसका उपाय पूछा, भगवान कृष्ण ने कहा कि तुम सब पाण्डव धौम्य ॠषि के निर्देश में सूर्य साधना सम्पन्न करो। धौम्य ॠषि के निर्देशोनुसार पाण्डवों ने सूर्य साधना सम्पन्न की और सूर्य देव के द्वारा उन्हें अक्षय तृतीया के दिन अक्षय पात्र प्रदान किया गया । कहा जाता है कि उस अक्षय पात्र का भण्डार कभी खाली नहीं होता था और उस अक्षय पात्र के माध्यम से पाण्डवों को धन-धान्य की प्राप्ति हुई। उस धन-धान्य से वे पुनः अस्त्र-शस्त्र क्रय करने में समर्थ हो गये। इसी कारण अक्षय तृतीया के दिन अस्त्र-शस्त्र, वाहन क्रय किया जाता है। द्रौपदी के चीर हरण की घटना अक्षय तृतीया के दिन ही घटित हुई थी, इस दिन भगवान कृष्ण ने द्रौपदी के चीर को अक्षय बना दिया था।

भगवान वेद व्यास ने जब महाभारत कथा लिखने का विचार किया तो सारी कथा का विचार कर उनका धैर्य कम हो गया तब भगवान का आदेश आया कि तुम बोलते रहो और गणेश लिखते रहेंगे जिससे पूरी रचना में व्यवधान नहीं होगा। यह शुभ कार्य वेद-व्यास जी ने इसी दिन प्रारम्भ किया था और महाभारत द्वापर युग का ऐसा विवेचनात्मक ग्रंथ है, जिसमें उस काल की प्रत्येक घटना स्पष्ट है। जिससे कलियुग में मनुष्य यह जान सकें कि जीवन में उतार-चढ़ाव, लाभ-हानि, मित्रता-द्वेष, यश-अपयश क्या होता है? तथा जो व्यक्ति श्रीकृष्ण अर्थात् भगवान का ध्यान कर उनके सम्मुख नम्र रहता है, वही इस संसार चक्र में विजयी होता है।

अक्षय तृतीया के दिन ही श्रीबलराम का जन्म हुआ था जो कि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे और उनका शस्त्र ‘हल’ था। ॠषि गर्ग उनका नाम ‘राम’ रखना चाहते थे लोगों ने कहा कि भगवान राम तो त्रेता युग में हुए हैं तब ॠषि ने कहा कि इस बालक में अतुलित बल होगा इस कारण संसार में यह बलराम के नाम से जाना जायेगा। बलराम का दूसरा नाम हलअस्त्र होने के कारण ‘हलायुध’ तथा अद्भुत संगठन शक्ति के कारण ‘संकर्षण’ होगा।

बलराम को शेषनाग का अवतार भी माना गया है। इसके पीछे कथा यह है कि लक्ष्मण ने त्रेता युग में भगवान राम की बहुत सेवा की और भगवान राम ने यह वरदान दिया कि इस जन्म में तुमने मेरी बहुत सेवा की है, अगले जन्म में तुम मेरे बड़े भाई होओगे और मैं तुम्हारा छोटा भाई बनकर तुम्हारी सेवा करूंगा।

अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान शिव ने देवी लक्ष्मी को जगत् की सम्पत्ति का संरक्षक नियुक्त किया था इसीलिये भगवती लक्ष्मी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिये इस दिन स्वर्ण आभूषण, भूमि, भवन इत्यादि क्रय करने का विशेष महत्व है।
अन्नपूर्णा अन्न की देवी है और यह देवी पार्वती का अवतार हैं। इनका निवास प्रत्येक मनुष्य और देवताओं के घर में है। एक पौराणिक प्रसंग में एक भिक्षुक के वेश में भगवान शिव ने देवताओं से प्रश्न किया कि इस जगत में भिक्षुकों का पेट कौन भरेगा? तो देवताओं ने कहा – ‘भगवती पार्वती का स्वरूप अन्नपूर्णा’ जिसके घर में स्थापित रहेगी वहां किसी भी प्रकार की क्षुधा (भूख) नहीं रहेगी और खान-पान का भण्डार सदैव भरा रहेगा। उसके घर से कोई खाली पेट नहीं लौटेगा।
इस दिन भगवान शिव ने देवी लक्ष्मी को धन के रूप में स्थापित किया। अन्न और धन दोनों लक्ष्मी का स्वरूप हैं जिस घर में अन्न की पूजा अर्थात् देवी पार्वती के स्वरूप अन्नपूर्णा की पूजा और देवी लक्ष्मी के स्वरूप धन लक्ष्मी का स्थापन होता है वह गृहस्थ सद्गृहस्थ कहा जाता है और उसके निवास में सब ओर से परिपूर्णता रहती है। इसीलिये अक्षय तृतीया के दिन अन्नपूर्णा लक्ष्मी का स्थापन विशेष रूप से किया जाता है।



इस जगत में 12 प्रकार के दान श्रेष्ठतम् माने गये हैं,
ये हैं – गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण, घी, वस्त्र, धान्य, गुड़, चांदी, नमक, शहद और कन्या है।
अक्षय तृतीया इन सारी वस्तुओं को दान करने का श्रेष्ठतम पर्व है। इन वस्तुओं का दान करने से मनुष्य को विशेष फल प्राप्त होता है। इस संसार में परिपूर्णता और शांति सौभाग्य का सद्व्यवहार दान से ही प्राप्त होता है। दान से समभाव की उत्पत्ति होती है।विवाह संस्कार में कन्या दान किया जाता है। पिता अपनी पुत्री का कन्या दान संस्कार कर दूसरे घर में लक्ष्मी के रूप में भेजता है। इस कारण अक्षय तृतीया कन्या दान अर्थात् विवाह का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त है।

सार रूप में अक्षय तृतीया श्रेष्ठतम् पर्व है इस दिन साधक को शिव साधना, गुरु साधना, कुबेर साधना, अन्नपूर्णा लक्ष्मी साधना के साथ-साथ, दान-यज्ञ अवश्य ही सम्पन्न करना चाहिये। जो साधक अक्षय तृतीया के दिन भी साधना नहीं करता है। उसे दुर्भाग्यशाली ही कहा जा सकता है। उसके भाग्य को तो शिव भी ठीक नहीं कर सकते हैं। येसे महान पर्व पर 'लक्ष्मी साधना' करना ही जीवन मे योग्य है क्योंके आज के युग मे धन से संबंधित बाधाएं बहोत सारी है और धन-धान्य-ऐश्वर्य प्राप्त करता आवश्यक है ।

आज सभी के लिए एक उत्तम लक्ष्मी साधना दे रहा हू,जिसका प्रभाव जीवन मे देखने मिलता है और साधक के जीवन मे माँ लक्ष्मी जी के कृपा से धन-धान्य-ऐश्वर्य की प्राप्ती संभव है ।




साधना विधान:-

सर्वप्रथम किसी लकड़ी के बाजोट पर पीले/स्वर्णीय रंग का वस्त्र बिछाये, यहां पीले/स्वर्णीय वस्त्र का महत्व है क्योंके हमारा जीवन स्वर्ण की तरह उज्वल हो और जीवन मे धनप्राप्ती में रुकावट ना आये । बाजोट पर माँ का भव्य चित्र स्थापित करे, एक ऐसा चित्र जिसमे दो हाथी माँ पर जल वर्षाव कर रहे हो और माँ कमल पर विराजमान हो । सामने घी का दीपक लगाये और गुलाब के धूपबत्ती से वातावरण को गुलाब के सुगंध से आनंदित करे । माँ को घर पर बने हुये मीठे पदार्थ का भोग लगाएं,उनके श्री चरणों में गुलाब या कमल का पुष्प चढ़ाए । कुछ फल भी रखे जो भी मार्केट में ताजा मिल रहे हो,यह साधना कुछ कारणों वश अक्षय तृतीया के अवसर पर नही कर सके तो किसी भी शुक्ल पक्ष के शुक्रवार को कर सकते है । साधना में मंत्र जाप हेतु कमलगट्टे की माला या स्फटिक माला का ही प्रयोग करे, घर मे श्रीयंत्र हो तो उसका भी पूजन करे । आपके पास माला होना जरूरी है,अगर माला ना हो तो अपने शहर के किसी भी मार्केट से माला स्वयं खरीदे और अगर वहा किसी भी प्रकार का श्रीयंत्र मिलता हो तो वह भी खरीद लेना उत्तम कार्य है । इस ब्लॉग पर माला और यंत्र प्राण-प्रतिष्ठा विधान दिया हुआ है,उसीके माध्यम से माला और श्रीयंत्र को प्राण-प्रतिष्ठित अवश्य करे ताकि साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त हो ।



सर्वप्रथम हाथ जोडकर माँ का ध्यान करे-

ध्यानः-
ॐ अरुण-कमल-संस्था, तद्रजः पुञ्ज-वर्णा,
कर-कमल-धृतेष्टा, भीति-युग्माम्बुजा च।
मणि-मुकुट-विचित्रालंकृता कल्प-जालैर्भवतु-भुवन-माता सततं श्रीः श्रियै नः ।।



अब मन मे मंत्रो का उच्चारण करते हुए माँ का मानसिक पूजन करे और साथ मे मन मे यह भावना भी रखे के "मंत्रो में दिए हुए सबंधित वस्तुओं को माँ के समक्ष मानसिक रूप से चढ़ा रहे है"-

मानसिक-पूजनः-

ॐ लं पृथ्वी तत्त्वात्वकं गन्धं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।

ॐ हं आकाश तत्त्वात्वकं पुष्पं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।

ॐ यं वायु तत्त्वात्वकं धूपं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये घ्रापयामि नमः।

ॐ रं अग्नि तत्त्वात्वकं दीपं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये दर्शयामि नमः।

ॐ वं जल तत्त्वात्वकं नैवेद्यं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये निवेदयामि नमः।

ॐ सं सर्व-तत्त्वात्वकं ताम्बूलं श्रीमहालक्ष्मी-प्रीतये समर्पयामि नमः।



महालक्ष्मी मन्त्र:-

।। ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः ।।
Om shreem hreem shreem mahaalakshmyai namah




मंत्र दिखने में छोटा है परंतु यह एक उत्तम प्रभावशाली मंत्र है । इस मंत्र का कम से कम 21 माला जाप 11 दिनों तक करना एक श्रेष्ठ क्रिया है । हो सके तो 12 वे दिन "ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः स्वाहा"  मंत्र बोलते हुए अग्नी में घी की आहुतिया दे,आहूति हेतु मंत्र संख्या निच्छित होती है परंतु आप चाहे तो 108 बार मंत्र बोलकर भी आहुति दे सकते है परंतु संभव हो तो 21 माला मंत्र जाप करते हुए अवश्य ही आहुतिया दे सकते है ।




नित्य जाप समाप्ति के बाद साधक निम्न मंत्रों के साथ हाथ जोड़कर क्षमा याचना करे-


॥ क्षमा प्रार्थना॥

अपराधसहस्राणि, क्रियन्तेऽहॢनशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा, क्षमस्व परमेश्वर॥ १॥

आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि, क्षम्यतां परमेश्वर॥ २॥

मंत्रहीनं क्रियाहीनं, भक्तिहीनं सुरेश्वर।
यत्पूजितं मया देव, परिपूर्णं तदस्तु मे॥ ३॥

अपराधशतं कृत्वा, श्रीसद्गुरुञ्च यः स्मरेत्।
यां गतिं समवाप्नोति, न तां ब्रह्मादयः सुराः॥ ४॥

सापराधोऽस्मि शरणं, प्राप्तस्त्वां जगदीश्वर।
इदानीमनुकम्प्योऽहं, यथेच्छसि तथा कुरु॥ ५॥

अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या, यन्न्यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्वं क्षम्यतां देव, प्रसीद परमेश्वर॥ ६ ।।

ब्रह्मविद्याप्रदातर्वै, सच्चिदानन्दविग्रह!।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या, प्रसीद परमेश्वर॥ ७॥

गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं, गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देव, त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर॥ ८॥




आदेश...........

7 Apr 2017

पंचांगुली साधना (Panchanguli Sadhana)



दिव्य दृष्टि प्राप्त करने की अद्भुत साधना जब दृष्टि प्रभाव से भूत-भविष्य, वर्तमान का ज्ञान हो जाता है । पंचांगुली साधना केवल पांच अंगुलियों और हस्तरेखा सिद्ध करने की साधना नहीं है। पंचांगुली देवी वह शक्ति है, जो साधक के भीतर एक चैतन्य शक्ति जाग्रत करती है, साधक अपने आप में जानकार होता हुआ स्वयं के साथ-साथ, दूसरों के बारे में भी जान सकता है पंचांगुली मूलतः सम्मोहन की साधना है। भविष्य के अज्ञात रहस्यों को जानने वाली यह विद्या है, जिसे प्रत्येक ॠषि ने सिद्धि किया था। इस विद्या के प्रमुख प्रवर्तक – अंगिरस, कणाद और अत्रेय थे। आज के युग में भी इस साधना को सम्पन्न कर सिद्ध किया जा सकता है। पूज्य सद्गुरुदेव ने अपनी पुस्तक हस्तरेखा और पंचांगुली विज्ञान में इस रहस्य को स्पष्ट किया हैं ।

मनुष्य स्वभावतः इसी बात के लिए उत्सुक रहता है, कि वह अपने भविष्य को जान सके। अनेकों रहस्यमय प्रश्न उसके मानस में उठते रहते हैं – क्या ऐसी कोई शक्ति ब्रह्माण्ड मेंे है, जिसका सम्बन्ध हमसे स्थापित हो? क्या ऐसी कोई युक्ति है, जिसके माध्यम से हम अपना भूत, भविष्य और वर्तमान स्पष्ट रूप से देख सकें? ऐसे अनेकों प्रश्न उसके मानस पटल पर अंकुरित होते रहते हैं।

आज ऐसी कई पद्धतियां बन चुकी हैं, जिनके द्वारा अपने अतीत और भविष्य का आंकलन किया जा सकता है – हस्त रेखा विज्ञान, नेपोलियन थ्योरी, फलित ज्योतिष, टेरो आदि-आदि। इनमें से सबसे ज्यादा प्रचलित विधि है – ‘ हस्त रेखा विज्ञान’, जिसके माध्यम से हाथ की लकीरों का, जो देखने में तो कुछ लाइनें ही दिखाई देती हैं, किन्तु सैकड़ों सूक्ष्म तन्तुओं को अपने अन्दर समेटे रहती हैं, जिनका सूक्ष्मातिसूक्ष्म अध्ययन एक अच्छा हस्त विशेषज्ञ ही कर सकता है।
संसार में जितने भी पुरुष या स्त्रियां हैं, उनके हाथों की लकीरें कभी एक जैसी नहीं होतीं और उन लकीरों में ही उनका भूत, भविष्य और वर्तमान छिपा होता है, आवश्यकता होती है उस शक्ति के माध्यम से, उन सूक्ष्म रेखाओं को पढ़कर ब्रह्माण्ड से सम्पर्क स्थापित करने की, क्योंकि जब तक ब्रह्माण्ड में व्याप्त अणुओं से हमारी आत्म-शक्ति का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक हम कालज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते… तभी हमें पहले की, अब की और आने वाले समय की घटनाओं का पूर्णतः ज्ञान प्राप्त हो सकता है।

मंत्र और यंत्र ही ऐसी दो अक्षय निधियां हैं, जिनके माध्यम से अपने जीवन में परिवर्तन लाया जा सकता है और सुखी, सफल एवं सम्पन्नतायुक्त जीवनयापन किया जा सकता है। आज साधना और सिद्धि, कालज्ञान आदि विधाएं केवल ‘साधु-संतों’ तक ही सिमट कर नहीं रह गई हैं। कोई भी इन्हें सम्पन्न कर सफलता तक पहुंच सकता है। सभी की उत्सुकता का केन्द्र ‘भविष्य’ का ज्ञान अर्जित करने के लिए ‘ पंचांगुली साधना ’ सर्वश्रेष्ठ मानी गई है, जिसके माध्यम से अपने या किसी भी व्यक्ति के भूत, भविष्य और वर्तमान को आसानी से जाना जा सकता है।

पंचांगुली देवी कालज्ञान की देवी हैं, जिनकी साधना कर साधक को होने वाली घटनाओं व दुर्घटनाओं का पूर्वानुमान हो जाता है तथा इसी साधना के द्वारा हस्त विज्ञान में पारंगत हुआ जा सकता है और भविष्यवक्ता बना जा सकता है। प्राचीन काल के योगी, साधु, संन्यासी इस साधना को सिद्ध कर लोगों को भविष्य के बारे में बताया करते थे और यश, कीर्ति, वैभव सब कुछ प्राप्त कर लेते थे। धीरे-धीरे कुछ लोगों की चालाकी और कायरता की वजह से, जो ये समझते थे कि यदि किसी को या सभी लोगों को इस साधना की पूर्ण जानकारी हो गई, तो हमें कौन पूछेगा? इसलिए यह ज्ञान एक छोटे से दायरे में ही सिमट कर रह गया। समय ने पलटा खाया और बहुत बड़ा जन समुदाय इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हो गया, जिसके कारण इस साधना का प्रचार-प्रसार होने लगा, जो उन ढोंगी साधु-संतों पर एक तीव्र प्रहार ही था, क्योंकि वे इस विद्या का लाभ उठाकर, दूसरों को आसानी से मूर्ख बनाकर उन्हें अपने अधीन कर लेते थे। इस साधना को सम्पन्न कर ऐसे ढोंगियों पाखण्डियों का पर्दाफाश कर, स्वयं के साथ-साथ समाज का भी कल्याण किया जा सकता है।

पंचांगुली साधना के माध्यम से सामने वाले को देखकर उसका भविष्य पूर्णरूप से ज्ञात हो जाता है, वह स्वयं भी अपने आपात्कालीन संकटों का पूर्वाभास कर अपने जीवन की रक्षा आप कर सकता है, किसी भी व्यक्ति के भविष्य के प्रत्येक क्षण को अक्षरशः जान सकता है, और घटित होने वाली दुर्घटनाओं की पूर्व जानकारी देकर उन्हें सावधान कर सकता है।

इस साधना को सिद्ध करना जीवन की श्रेष्ठता है तथा किसी भी साधना को करने से पूर्व इस साधना को अवश्य ही कर लेना चाहिए, जिससे कि साधना के अन्तर्गत रह गई त्रुटियों और आने वाली अड़चनों को सुगमता से दूर किया जा सके।
महाभारत युद्ध में धृतराष्ट्र नेत्रहीन होने की वजह से उस युद्ध को नहीं देख सकते थे, किन्तु संजय की दिव्य दृष्टि ने उन्हें कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध का अक्षरशः विवरण कह सुनाया। लोग उसे दिव्य दृष्टि का ज्ञान कहते थे, किन्तु वास्तव में कुछ भी देख लेने की शक्ति उस दृष्टि के माध्यम से नहीं, अपितु उस शक्ति के माध्यम से प्राप्त हुई थी, जिसे उन्होंने साधना के बल पर प्राप्त किया था, क्योंकि मात्र दृष्टि के माध्यम से भूत, भविष्य एवं वर्तमान का ठीक-ठीक ज्ञान प्राप्त होना कठिन-सी प्रक्रिया है, ज्ञान तो चैतन्य शक्ति के माध्यम से ही प्राप्त होता है, जिसे अपने अन्दर से प्रस्फुटित करना पड़ता है। यदि पंचांगुली मंत्र के साथ-साथ काल ज्ञान मंत्र को भी सिद्ध कर लिया जाय, तो संजय के समान ही दिव्य दृष्टि प्राप्त की जा सकती है, फिर यह जरूरी नहीं, कि जिस व्यक्ति का भूत-भविष्य जानना हो, वह सामने हो ही। पंचांगुली साधना की उच्चतम स्थिति दिव्य दृष्टि सम्पन्न होना है। यहां प्रस्तुत वर्णन ‘पंचांगुली साधना' की उसी भावभूमि को अपने में समेटे हुए है।





साधना विधान:-

1. इस साधना को करने के लिए ‘ पंचांगुली यंत्र व कवच तथा ‘ रुद्राक्ष माला ’, जो प्राण प्रतिष्ठायुक्त एवं मंत्र-सिद्ध हो, प्रयोग करना आवश्यक होता है।

2. यह साधना शुक्ल पक्ष की किसी भी द्वितीया , पंचमी , सप्तमी या पूर्णमासी को की जा सकती है।

3. यह साधना प्रातः कालीन है, इसे ब्रह्म मुहूर्त में ही करना चाहिए।

4. इस साधना को किसी एकांत स्थल या पूजा स्थल में ही, जहां शोर न हो, सम्पन्न करना चाहिए। यह इक्कीस दिन की साधना है।

5. पीले आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख करके, पीले वस्त्र धारण कर बैठ जायें।

6. फिर एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर ‘ पंचांगुली देवी का यंत्र (ताबीज)’ भी स्थापित कर दें। यंत्र को किसी ताम्र प्लेट में रखें।

7. सबसे पहले गणपति का ध्यान करें, फिर गुरुदेव का ध्यान, स्नान, पंचोपचार पूजन सम्पन्न कर, गुरु मंत्र का जप करें।

8. गुरु पूजन के पश्चात् षोडशोपचार पूजन हेतु यंत्र पर कुंकुम से ‘ स्वस्तिक ’ का चिह्न बनायें।

9. निम्न प्रकार षोडशोपचार विधि से यंत्र का विधिवत् पूजन करें-




ध्यान:-
ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवीं ध्यायामि।

आह्वान:-
ॐ आगच्छाच्छ देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे।
क्रियमाणां मया पूजां गृहाण सुरसत्तमे॥
ॐ भूर्भुवः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्योः नमः आह्वाहनं समर्पयामि।

आसन:-
रम्यं सुशोभनं दिव्यं सर्व सौख्य करं शुभम्।
आसनञ्च मया दत्तं गृहाण परमेश्वरीं॥
ॐ भूभुर्वः स्वः श्री पंचांगुली देवताभ्यो नमः आसनं समर्पयामि।

स्नान:-
गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णी नर्मदा जलैः।
स्नापिताऽसि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे॥

पयस्नान:-
कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम्।
पावनं यज्ञ हेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम्॥

दधिस्नान:-
पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्।
दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

मधुस्नान:-
तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

घृतस्नान:-
नवनीत समुत्पन्नं सर्वसन्तोष कारकम्।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

शर्करास्नान:-
इक्षुरस समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका।
मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रति गृह्यताम्॥

वस्त्र:-
सर्वभूषाधिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे।
मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रति गृह्यताम् ।।

गन्ध:-
श्री खण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठि चन्दनं प्रति गृह्यताम्॥

अक्षत:-
अक्षताश्च सुरश्रेष्ठि कुकुम्माक्ता सुशोभिता।
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ।।

पुष्प:-
ॐ माल्यादीनि सुगंधीनि मालत्यादीनि वै विभे।
मयाहृतानि पुष्पाणि प्रीत्यर्थं प्रति गृह्यताम्॥

दीप:-
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहे॥

नैवेद्य:-
नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्तिं मे ह्यचला कुरु।
ईप्सितं मे वरं देहि परत्रेह परां गतिम्॥

दक्षिणा:-
हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तः पुण्य फलदमतः शांतिं प्रयच्छ मे॥

विशेषार्घ्य:-
नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते धरणीधरे।
नमस्ते जगदाधारे अर्घ्यं च प्रति गृह्यताम्।
वरदत्वं वरं देहि वांछितं वांछितार्थदं।
अनेन सफलार्घैण फलादऽस्तु सदा मम।
गतं पापं गतं दुःखं गतं दारिद्र्यमेव च।
आगता सुख सम्पत्तिः पुण्योऽहं तव दर्शनात्॥



10. हाथ में जल लेकर मंत्र-जप करने का संकल्प करें ।

11. निम्नलिखित पंचांगुली मंत्र का ‘ रुद्राक्ष माला ’ से इक्कीस दिन तक पाँच-पाँच माला मंत्र-जप करें।



मंत्र:-

ईं ।। ॐ नमो पंचांगुली पंचांगुली परशरी परशरी माता मयंगल वशीकरणी लोहमय दंडमणिनी चौसठ काम विहंडनी रणमध्ये राउलमध्ये शत्रुमध्ये दीवानमध्ये भूतमध्ये प्रेतमध्ये पिशाचमध्ये झोंटिंगमध्ये डाकिनीमध्ये शंखिनीमध्ये यक्षिणीमध्ये दोषिणीमध्ये शेकनीमध्ये गुणीमध्ये गरुडीमध्ये विनारीमध्ये दोषमध्ये दोषशरणमध्ये दुष्टमध्ये घोर कष्ट मुझ ऊपर बुरो जो कोई करे करावे जड़े जडावे तत चिन्ते  चिन्तावे तस माथे श्री माता श्री पंचांगुली देवी तणो वज्र निर्धार पड़े ॐ ठं ठं ठं स्वाहा ।। ईं



12. मंत्र-जप करने का समय निर्धारित होना चाहिए।

13. जप काल में ध्यान रखने योग्य बातें –
* इस साधना को तभी सम्पन्न करें, जब आप दृढ़ चित्त हों, आपका निश्चय पक्का हो और संघर्षों से जूझने की शक्ति हो।
* गृहस्थ साधना काल में स्त्री सम्पर्क न करें, ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें।
* साधना काल में असत्य भाषण न करें।
* मंत्र जप के समय बीच में उठें नहीं।
* गुरु के प्रति आस्थावान होकर, गुरु पूजन के पश्चात् ही साधना सम्पन्न करें। तामसिक भोजन से दूर रहें।
* मंत्रोच्चारण शुद्ध व स्पष्ट हो।
* यदि साधना पूरी होने पर भी सफलता न मिले, तो झुंझलावें नहीं, बार-बार प्रयत्न करें।

14. साधना-समाप्ति के पश्चात् समस्त सामग्री को किसी नदी या कुंए में विसर्जित कर दें। इस प्रकार पूर्ण विश्वास के साथ की गई साधना से मंत्र की सिद्ध होती ही है तथा उस साधक को भूत, भविष्य एवं वर्तमान की सिद्धि हो जाती है।



साधना सामग्री :- 1850/-रुपये ।
amannikhil011@gmail.com



आदेश..........

27 Mar 2017

कुंडलिनी तंत्र ज्योतिष


ग्रह दोष लक्षण:-

१. सूर्य दोष के लक्षण:- असाध्य रोगों के कारण परेशानी, सिरदर्द, बुखार, नेत्र संबंधी कष्ट, सरकार के कर विभाग से परेशानी, नौकरी में बाधा ।
२. चंद्रमा दोष के लक्षण:- जुखाम, पेट की बीमारियों से परेशानी, घर में असमय पशुओं की मत्यु की आशंका, अकारण शत्रुओं का बढ़ना, धन का हानि ।
३. मंगल दोष के लक्षण:- घर में चोरी होने का डर, घर-परिवार में लड़ाई-झगड़े की आशंका, भाई के साथ संबंधों में अनबन, दांपत्य जीवन में तनाव, अकाल मृत्यु की आशंका ।
४. बुध दोष के लक्षण: स्वभाव में चिड़चिड़ापन, जुए-सट्टे के कारण धन की बड़ी हानि, दांत से जुड़े रोगों के कारण परेशानी सिर दर्द. अधिक तनाव की स्थिति ।
५. गुरू दोष के लक्षण:- सोने की हानि, चोरी की आशंका उच्च शिक्षा की राह में बाधाएं झूठे आरोप के कारण मान-सम्मान में कमी पिता को हानि होने की आशंका ।
6. शुक्र दोष के लक्षण:- बिना किसी बीमारी के अंगूठे, त्वचा संबंधी रोगों से परेशानी, राजनीति के क्षेत्र में हानि, प्रेम व दापंत्य संबंधों में अलगाव जीवनसाथी के स्वास्थ्य को लेकर तनाव,प्रेम में असफलता ।
७. शनि दोष के लक्षण: पैतृक संपत्ति की हानि, हमेशा बीमारी से परेशानी मुकदमे के कारण परेशानी बनते हुए काम का बिगड़ जाना ।
८. राहु दोष के लक्षण: मोटापेके कारण परेशानी अचानक दुर्घटना, लड़ाई-झगड़े की आशंका हर तरह के व्यापार में घाटा ।
९. केतु दोष के लक्षण: बुरी संगत के कारण धन का हानि जोड़ों के दर्द से परेशानी संतान का भाग्योदय न होना, स्वास्थ्य के कारण तनाव ।


ग्रहों से उत्पन्न बीमारी :-

१. सूर्य : मुँह में बार-बार थूक इकट्ठा होना, झाग निकलना, धड़कन का अनियंत्रित होना, शारीरिक कमजोरी और रक्त चाप।
२. चंद्र : दिल और आँख की कमजोरी।
३. मंगल : रक्त और पेट संबंधी बीमारी, नासूर, जिगर, पित्त आमाशय, भगंदर और फोड़े होना।
४. बुध : चेचक, नाड़ियों की कमजोरी, जीभ और दाँत का रोग।
५. बृहस्पति : पेट की गैस और फेफड़े की बीमारियाँ।
६. शुक्र : त्वचा, दाद, खुजली का रोग।
७. शनि : नेत्र रोग और खाँसी की बीमारी।
८. राहु : बुखार, दिमागी की खराबियाँ, अचानक चोट, दुर्घटना आदि।
९. केतु : रीढ़, जोड़ों का दर्द, शुगर, कान, स्वप्न दोष, हार्निया, गुप्तांग संबंधी रोग आदि।


लग्न स्थान से उत्पन्न रोग :-

* मेष लग्न के लिए एलर्जी, त्वचा रोग, सफेद दाग, स्पीच डिसऑर्डर, नर्वस सिस्टम की तकलीफ आदि रोग संभावित हो सकते हैं।
* वृषभ लग्न के लिए हार्मोनल प्रॉब्लम, मूत्र विकार, कफ की अधिकता, पेट व लीवर की तकलीफ और कानों की तकलीफ सामान्य रोग है।
* मिथुन लग्न के लिए रक्तचाप (लो या हाई), चोट-चपेट का भय, फोड़े-फुँसी, ह्रदय की तकलीफ संभावित होती है।
* कर्क लग्न के लिए पेट के रोग, लीवर की खराबी, मति भ्रष्ट होना, कफजन्य रोग होने की संभावना होती है।
* सिंह लग्न के लिए मानसिक तनाव से उत्पन्न परेशानियाँ, चोट-चपेट का भय, ब्रेन में तकलीफ, एलर्जी, वाणी के दोष आदि परेशानी देते हैं।
* कन्या लग्न के लिए सिरदर्द, कफ की तकलीफ, ज्वर, इन्फेक्शन, शरीर के दर्द और वजन बढ़ाने की समस्या रहती है।
* तुला लग्न के लिए कान की तकलीफ, कफजन्य रोग, सिर दर्द, पेट की तकलीफ, पैरों में दर्द आदि बने रहते हैं।
* वृश्चिक लग्न के लिए रक्तचाप, थॉयराइड, एलर्जी, फोड़े-फुँसी, सिर दर्द आदि की समस्या हो सकती हैं।
* धनु लग्न के लिए मूत्र विकार, हार्मोनल प्रॉब्लम, मधुमेह, कफजन्य रोग व एलर्जी की संभावना होती है।
* मकर लग्न के लिए पेट की तकलीफ, वोकल-कॉड की तकलीफ, दुर्घटना भय, पैरों में तकलीफ, रक्तचाप, नर्वस सिस्टम से संबंधित परेशानियाँ हो सकती हैं।
* कुंभ लग्न के लिए कफजन्य रोग, दाँत और कानों की समस्या, पेट के विकार, वजन बढ़ना, ज्वर आदि की संभावना हो सकती है।
* मीन लग्न के लिए आँखों की समस्या, सिर दर्द, मानसिक समस्या, कमर दर्द, आलस्य आदि की समस्या बनी रह सकती है।


नवग्रहों को एक साथ प्रसन्न करना थोड़ा मुश्किल है। आप अपनी कुंडली के कमजोर ग्रहों को पहले प्रसन्न कीजिए । कुंडली में नवग्रहों से सम्बंधित उपाय करते रहने से तुम्हारी जिंदगी उपाय करने में निकल जाएगी । इससे अच्छा तो हमें वह मंत्र पता होना चाहिए जो हमारे जीवन के सभी सुखों को प्रदान करे और इसके लिए हमें पता होना चाहिये के "कौनसा ऐसा ग्रह है जो जीवन में हमें पूर्ण रूप से साहय्यक हो" । मेरा एक ही मानना है ,लग्न स्थान को मजबूत करो ताकी तुम्हे जीवन में कोई भी ग्रह परेशान ना कर सके । ज्योतिष शास्त्र में अगर तंत्र को जोड़ दिया जाये तो सही परिणाम प्राप्त हो सकते है और सिर्फ ग्रहों से संबंधित जाप करने से ही अगर ग्रहों का प्रसन्न होकर फल देना संभव होता तो आज भारत में सभी ज्योतिषी उच्च पद पर होते । मेरे 12 वर्ष की आयु में  कुंडली को देखकर एक ज्योतिषी महाराज ने कुछ ऐसा फलकथन कर दिया था जिसे सुनकर मेरा जीने का उद्देश्य ही ख़त्म हो गया था और उनकी तो ज्यादातर बाते मेरे 19 साल के उम्र तक 80-90% सही थी । परंतु एक समय येसा भी आया जब जीवन में गुरु मिले,उनसे ज्ञान मिला और तबसे अब तक का जीवन सफलता पूर्वक व्यतीत हो रहा है । मुझे जो कुछ चाहिए वह मैं ग्रह देवता से मांगता हूं क्योंके अन्य देवी /देवताओ को देने में समय ज्यादा लगता है परंतु ग्रहदेवताओ का कार्य "तुरंत दान,तुरंत फल" जैसा है । पुराणों के नुसार तो देवी/देवताओ के भी ग्रह है और ग्रहों ने उन्हें भी पीड़ित किया है,तो हमारे जैसे साधारण मनुष्यो की तो खैर नहीं है ।
रत्न विज्ञान को मैं सही मानता हूं परंतु आज के समय में उचित रत्न बड़े महेंगे है,हर कोई व्यक्ति महेंगे रत्न धारण नहीं कर सकता है । "यथा पिंडे,तथा ब्रम्हांडे" यह शास्त्रोक्त कथन है और इसका अर्थ है जो हमारे शरीर में है वही ब्रम्हांड में है । अगर शरीर में किसी भी प्रकार की ऊर्जा कम हो जाए तो विपरीत परिस्थिति का जीवन में सामना करना पड़ता है । हमें कई प्रकार की ऊर्जा ब्रम्हांड से प्राप्त होती है और यह ऊर्जा पूर्ण रूप से प्राप्त ना होती हो तो हमारे ऋषिओ ने इसके लिए कुछ मंन्त्रो ज्ञान प्रदान किया है । यह वह बिजोक्त मंत्र है जो कुंडलिनी शक्ति से सबंधीत है और इन मंत्रों का संपुट किसी शक्ति मंत्र में किया जाए तो वह बिज मंत्र अत्यंत शक्तिशाली हो जाते है । इस प्रकार के मंत्र जाप से नवग्रह अपना फल अच्छा ही देते है इसमें कोई संशय नहीं है,सिर्फ हमें पता होना जरुरी है के हमें किस ग्रह का जाप करने से जीवन में अनुकूल परिणाम प्राप्त हो सकते है । रत्न रुद्राक्ष और उपायो से बहोत समय लग जाता है परंतु मंत्र के माध्यम से शीघ्र अनुकूल परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।

जो व्यक्ति अपनी कुंडली दिखवाना चाहता है उन्हें अवश्य ही विधि-विधान के साथ "कुंडलिनी शक्ति बिज मंत्र से संपुटित देवी जगदम्बा जी" का मंत्र दिया जाएगा । यह गोपनीय मंत्र है जो अवश्य ही जीवन में सहायता करता है ,विशेष ग्रह संबंधित मंत्रो के माध्यम से हमें अनुकूल परिणाम प्राप्त होते है । आपके कुंडली का अध्ययन करने बाद ही आपको विशेष ग्रह का मंत्र विधान दिया जाएगा,निशुल्क में कुंडली देखी नहीं जायेगी,इसके लिए 1150/-रुपये का न्यौछावर राशि लिया जाएगा । निशुल्क में आज से 2 वर्ष पहिले मै कुंडली देखता था परंतु अब यह संभव नहीं है क्योके निशुल्क में चाहे मै कितना भी अध्ययन करके मंत्र विधान दे दू तो लोगो को उसकी कोई कीमत नहीं है इसलिए आगे भी कोई व्यक्ति मुझे अपनी कुंडली निशुल्क में देखने हेतु विनती ना करे । आपसे प्राप्त धनराशि को मातारानी के मंदिर में गुप्तदान स्वरूप में समर्पित किया जायेगा ताकी आपका भविष्य उज्वल हो और आप को कितना भी कहा जाए "मंदिर में गुप्तदान किया करो,तो आप करोगे नहीं",इसलिए मेरे हिसाब से यह तरिका सही है ।


कुंडली में विशेष ग्रह से संबंधित मंत्र विधान प्राप्त करने हेतु मेरे ई-मेल पर संपर्क करे -amannikhil011@gmail.com ।
आप चाहो तो न्यौछावर राशि PAYTM से भी भेज सकते है या फिर बैंक से भी जमा करवा सकते है ।

"Paytm no. 8421522368"

Paytm से न्यौछावर राशि भेजने के बाद तुरंत ई-मेल से संपर्क करे और साथ में अपना जन्म विवरण भी भेजे । जिन्हें अपना जन्म विवरण पता ना हो वह व्यक्ति अपने दाहिने हाथ का फोटो निकालकर भेजे ।


आदेश..........

24 Mar 2017

विर-वेताल प्रत्यक्षिकरण साधना


शाबर मंत्रो की विशेष रचना है,जो सिद्ध नवनाथों द्वारा है । ये मंत्र पढ़ने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती है एवं एक सामान्य साधक भी इन मंत्रों से लाभ उठा सकता है । आज पापमोचनी एकादशी के शुभ मुहूर्त पर मैं यह मंत्र और इससे संबंधित जानकारी आपको देना चाहता हूँ । 100 करोड़ शाबर मंत्रो की रचना सिद्ध नवनाथ भगवान ने किया हुआ है परंतु आज हमें बड़े मुश्किल से 10 हजार मंत्र भी देखने नहीं मिलते है । इस दुर्भाग्य को मिटाना अब तो असंभव है,फिर भी हमें प्रयास करना चाहिए ताकि कुछ मंत्रो को प्राप्त करके हमें इस कलयुग में प्रत्यक्ष लाभ हो । वैदिक और तांत्रोत्क मंत्रों के जाप से सब कुछ संभव तो है फिर उन्हें सिद्ध करने में वर्षो लग जाता है,इसलिए शाबर मंत्र का जाप करके लाभ उठाना उचित है ।
आज का यह साधना विर-वैताल के प्रत्यक्षिकरण से है,वेताल को प्रत्यक्ष करके उनसे कई प्रकार के कार्य पूर्ण करवाये जा सकते है । वेताल एक प्रकार से भूतो का राजा माना जाता है,हमारे देश में कई ऐसे साधक है जो वेताल को सिद्ध किये हुए है परंतु वह लोग दुनिया के सामने आकर लोककल्याण करना उचित नहीं समजते है । मुझे बहोत ख़ुशी है इस बात की,के आनेवाले समय में इस ब्लॉग के पाठकों में से किसी ना किसी पाठक के पास या कह सकते है किसी साधक के पास अवश्य ही वेताल सिद्धि संभव हो सकती है ।

वेताल एक प्रचंड शक्ति है जो संसार के समस्त प्रकार के भय का नाश करने हेतु एक महान सिद्धि है । इसके माध्यम से षटकर्म भी संभव है,समस्त प्रकार के रोगों का निवारण वेताल से संभव है । यह मंत्र विधान संसार के किसी भी किताब में आपको देखने नहीं मिलेगा,यह मंत्र विधान गोपनीय है और आज भी गाँव के लोगो के पास सुरक्षित है । मेरा ध्येय है के इस मंत्र विधान से आपको भी परिचित होना चाहिए और हो सके तो जनकल्याण हेतु आगे आना चाहिये ।

आज के समय में कई तांत्रिको ने मंत्र बेचकर विद्या का नाश किया है,जिससे कई प्रकार के मंत्र आज शक्तिहीन होते जा रहे है । मंत्रो को जाग्रत रखना आज के समय का आवश्यक कर्म है,आज अगर हम मंत्र विद्या को संभालकर रखे तो भविष्य में यह विद्या कई पीढ़ियों के काम आयेगी । एक डर है आजके साधक वर्ग में जिसे निकालना जरुरी है,सभी साधक मित्रो को लगता है के मैं आज से मंत्र जाप प्रारंभ करु और 11 दिन के साधना में 11 वे दिन ही शक्ति सामने प्रगट हो और जब वह शक्ति साधक के सामने प्रत्यक्ष नहीं होती है तो साधक वह साधना छोड़ देता है । उसे लगता है अगर मैं फिर से साधना करु और मुझे साधना में सफलता नहीं मिले तो मैं क्या करूँ,यही तो एक प्रकार का डर है जो एक साधक को साधना में सफल नहीं होने देता है । जैसे मैंने कहा है के बिर-कंगन 21 दिनों में जाग्रत होता है परंतु ना हो तो क्या करे? क्या साधना करना छोड़ दिया जाये । यह मूर्खता है,जब हम किसी साधना को प्रारम्भ करके कुछ दिनों बाद असफलता के कारण छोड़ देते है । बहोत से साधक को 21 दिनों में सफलता मिला है,हो सकता है किसिको कुछ समय ज्यादा साधना करनी पड़े तो हमेशा मेहनत करने का तय्यारी करना जरुरी है ।
।। बिस्मिल्लाह रहेमाने राहीम अहमद जागे महम्मद जागे,पीर सुल्तान जागे दिल्ली का बादशाह जागे,उलटा बिर हनुमान जागे,×××××××जिंन-जिन्नातो को जगाने के लिए जागे,×××××××××××× देश ××××× का इल्म सच्चा,मेरी भक्ति गुरु की शक्ति,चलो मंत्र ईश्वरी वाचा ।।
जैसे यह एक मंत्र है जिससे जिन सिद्ध होता है,यह मंत्र 41 दिनों तक जाप करने से संभव है,परंतु इतना तिष्ण मंत्र जाप करने के बाद भी जिन 41 दिनों में ना आये तो क्या किया जाए? इसमे कोई भी दूसरा विकल्प नहीं है,सिर्फ एक ही रास्ता है "साधना पुनः करना है और मेहनत करना जरुरी है,अवश्य ही सिद्धि प्राप्त होना संभव है"। साधना सिद्धि हेतु दीवानगी जरुरी है,वो मोहब्बत होनी ही चाहिये कुछ पाने की के हम सब कुछ प्राप्त कर सके ।

एक किसान गेहू का बीज जमींन में डालता है और आनेवाले चार महीनो तक खेत में मेहनत करता है तब जाकर कहा उसको अपने खेत में फसल देखने मिलती है,अच्छी फसल देखने के लिए उसको रोज खेत में जाकर 6-7 घंटे तक मेहनत करना पड़ता है । कभी कभी नैसर्गिक कारणों के वजेसे उसकी फसल भी बेकार हो जाती है परंतु वह हारता नहीं है ।अगर इस वर्ष अच्छी फसल नहीं हुयी तो अगले वर्ष अच्छी फसल प्राप्त करने की उम्मीद में वह फिर से अच्छेसे मेहनत करता ही है । परंतु हमारे साधक मित्र 11 दिनों में कुछ मुश्किल से 1-2 घंटे तक जाप करते है और जब सफलता ना मिले तो साधना,मंत्र,तंत्र,यन्त्र ओर गुरु के प्रती भी अविश्वास रखते हुए मन में दिल से गालिया देते है या फिर सब क्रिया को पाखंड मानते है ।

सबसे से पहिला बात ये दिमाग में डाल दो,खुद को साधक या तांत्रिक समझकर साधना करने से अच्छा तो खुद को किसान समझकर मंत्र साधना विधान किया करो । मेहनत और लगन से किया जाने वाला कोई भी कर्म निष्फल नहीं होता है,1-2 घंटे मंत्र जाप करने से अच्छा 3-4 घंटे जाप करने का कोशिश किया जाए तो बेहतर है । किसान की एक वर्ष की फसल तो उसको कुछ पैसा देती है,जिससे उसका 1-2 वर्ष तक घर चल जाता होगा परंतु आप अगर किसी भी एक साधना में पूर्ण सफलता प्राप्त करलो तो आपका पूर्ण जीवन अच्छा हो जायेगा । फेसबुक-यू-ट्यूब-व्हॉट्स अप के अघोरी तांत्रिक बाबा लोगो के नखरे झेलने से अच्छा तो स्वयं मेहनत करो और जीवन को सुखमयी बनाते हुए समाजकल्याण के ओर एक कदम आगे बढ़ाओ । मैंने भी आज लिखने में मेहनत किया है और मुझे लग रहा है के आप यह आर्टिकल पढ़ने के बाद मेरा ये छोटासा मेहनत बेकार नहीं जायेगा ।



साधना विधान:-

यह साधना किसी भी सोमवार से प्रारंभ कर सकते है और यह साधना सिर्फ रात्री में ही किया जाता है । साधना में एकांत का आवश्यकता है,रुद्राक्ष माला से जाप करना है ।आसन और वस्त्र लाल रंग के हो या काले रंग के हो,साधना से पूर्व शिव जी का पूजन अवश्य करे,तेल का दिया ही लगाए, तेल कोई भी चलेगा,उग्र सुगंध से युक्त अगरबत्ती का इस्तेमाल करे,रोज रात्री में 11 माला जाप 21 दिनों तक करने का विधान है,यह दक्षिणमुखी साधना है इसलिए दक्षिण दिशा में मुख करके जाप करे,साधना काल में वेताल के दर्शन हेतु रोज एक गुलाब का फूल अपने पास रखे और जब वेताल का दर्शन हो तो वह फूल उसे भेट करे ।



वेताल मंत्र:-

।। ॐ नमो आदेश गुरूजी को,मसान में रमता रात में जगता भूतो का राजा मेरे गुरु के विद्या से चलके आना,ना आये तो राजा तेरा हुकूम ना चले,दुहाई गुरु गोरखनाथ की,मेरी भक्ति गुरु ××××× की शक्ति,चलो मंत्र ईश्वरी वाचा ।।


मैंने इस मंत्र में एक शब्द गोपनीय रखा है और वह शब्द योग्य साधक को मै देने का वचन देता हूं परंतु किसी भी अयोग्य साधक को यह मंत्र नहीं दिया जाएगा । जब भी किसी योग्य साधक को मुझसे मंत्र प्राप्त करना हो तो मुझे ई-मेल करे amannikhil011@gmail.com पर,मैं साधक को एक छोटासा प्रश्न पुछूगा जिसका जवाब देते ही उसको गोपनीय शब्द बता दिया जायेगा । मैं इस गोपनीय शब्द को बताने के लिए आपसे कोई एक पैसा नहीं ले रहा हूँ । इसलिए चिंता ना करे और सवाल कोई ज्यादा कठिन नहीं है ।





आदेश............

21 Mar 2017

रोगमुक्ती साधना-माँ भद्रकाली


बहोत दिनोसे चाहता था,माँ भद्रकाली जी का मंत्र साधना विधान लिखा जाए । भद्रकाली जी प्रचंड शक्तियुक्त देवी मानी जाती है,उनका कोई भी साधना विधान कभी भी खाली नही जाता । अन्य साधनाओं में भले ही सफलता मिले या ना मिले परंतु काली जी के इस रूप के साधना में सफलता अवश्य ही मिलता है । जहां माँ भद्रकाली अपने बच्चो को ममतामयी नजरो से देखती है , ठीक उसी तरहां भक्तो के समस्त शत्रुओं को दंडित करती है ।

आज जो साधना दे रहा हू इससे समस्त प्रकार के रोगों से मुक्ती प्राप्त होता है । जब तक शरीर रोगों से मुक्त ना हो जाए तब तक जीवन में सब कुछ होकर भी कुछ नही रहेता है । यह साधना विधान आपके समस्त रोगों का स्तंभन करने हेतु आवश्यक है, पहला सुख निरोगी काया -अर्थात स्वस्थ्य शरीर ही जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति है और उसी से आप अन्य सुखों का उपभोग कर सकते हैं तथा साधना में आसन की दृढ़ता को प्राप्त कर सकते हैं ।

यह साधना किसी भी शनिवार से शुरू करे,आसन और वस्त्र लाल रंग के हो,मंत्र जाप के समय उत्तर दिशा में हो,मंत्र जाप करने हेतु रुद्राक्ष का माला उत्तम है । साधना के समय गाय के घी का ही दीपक प्रज्वलित करे,धुपबत्ती कोई भी ले सकते है परंतु गुग्गल का धूपबत्ती जलाया जाये तो अतिउत्तम । यह साधना ग्यारह दिनों तक किया जाए तो आरोग्य प्राप्त होता रहेगा और रोगों से मुक्ति मिलता रहेगा । 11 माला जाप करने का विधान है परंतु आप आवश्यता नुसार 21,51,101 माला भी जाप कर सकते है । कोई रोगी व्यक्ति जाप ना कर सके तो किसी योग्य व्यक्ति से स्वयं के लिए जाप करवा सकते हैं ।


मंत्र-

।। ॐ क्रीं क्रीं क्रीं भद्रकाली सर्वरोगबाधा स्तंभय स्तंभय स्वाहा ।।
Om kreem kreem kreem bhadrakali sarvarogbaadhaa stambhay stambhay swaahaa


11,21.....दिनों का साधना पूर्ण होने के बाद संभव होतो काले तिल और शुध्द घी से हवन में आहूति देना उचित होगा । हवन करना जरुरी नहीं है फिर भी साधक पूर्ण सिद्धि हेतु चाहे तो हवन कर सकता है ।



आदेश ...........

6 Mar 2017

महारुद्र शिव मंत्र साधना

महारुद्र शिव यह नाम ही काफी है समस्त बाधाओं को समाप्त करने के लिए । शिव जी को एक तरफ जहां उनके भोलेपन के कारण भोलेनाथ के नाम से जाना जाता हैं वहीं शिव जी का महारुद्र रूप सभी देवी देवताओं और राक्षसों के हृदय को कम्पित कर देता हैं। उनका रुद्र रूप महा प्रलय कारी होता हैं। ब्रह्मा जी को जन्म देने वाला, विष्णु जी को पालन करने वाला और महादेव को संहारक के रूप में जाना जाता हैं। शिव जी एक मात्र ऐसे देव हैं जिन्होने राक्षस एवं देव को उनकी दुष्टता के कारण नाश किया हैं।

1- प्रजापति दक्ष का नाश– शिव पुराण के अनुसार सती द्वारा यज्ञ में कूदकर अपने प्राणों की आहुती देने से क्रोधित महादेव के क्रोध से उत्पन्न हुआ वीरभद्र दक्ष के यज्ञ को नष्ट करता हुआ जब दक्ष के समक्ष खडा हुआ तो तीनों लोकों में किसी में भी इतना साहस न था की वे दक्ष की रक्षा कर सके। भगवान शिव जी के उस महारुद्र स्वरूप ने एक ही झटके में दक्ष का मस्तिष्क उसी के हवन कुंड में काट कर अर्पित कर दिया।

2- कामदेव का भस्म होना- माता सती के शरीर त्यागने के पश्चात महादेव कई वर्षो तक समाधी में लीन रहे। कुछ वर्षो के उपरांत तारकासुर नामका एक राक्षस उत्पन्न हुआ, वह अमर के समान था, उसे वरदान प्राप्त था कि उसकी मृत्यु शिव के पुत्र के हाथों ही होगी। तारकासुर जानता था की शिव जी को जगाने का दुस्साहस कोई नही कर सकता। उसने देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया, उसके आतंक से सम्पूर्ण जगत में त्राही-त्राही होने लगी। भगवान शिव जी की तपस्या भंग करने का कार्य देवताओं ने कामदेव को सौपा, कामदेव जानते थे की शिव जी की तपस्या भंग होने के उपरांत उनका नाश होना तय है, लेकिन जगत का कल्याण जानकर उन्होने शिव जी की तपस्या अपने पांच कामरूपी बाणों से भंग कर दी। भगवान शिव जी अपनी तपस्या भंग होने के कारण इतने क्रोधित हुये की उनके तीसरे नैत्र से निकली प्रचंड अग्नि कामदेव को तत्क्षण भस्म कर गई। बाद में शिव जी ने उनकी पत्नि को आश्वसान दिया की ये कृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेकर पुन: अपने शरीर को प्राप्त करेंगे।

3- भगवान गणेश का मस्तिष्क छेदन- पार्वती माता के मानसिक पुत्र ने जब अपनी माता के आदेश पर पहरा देकर किसी को भी अंदर न आने की अनुमति का पालन करते हुये जब शिव जी को रोका तो शिव जी अत्यधिक क्रोधी हुये तथा बालक को कई बार समझाने पर भी जब गणेश ने उन्हे अंदर प्रवेश नही करने दिया तब शिव जी को विवश होकर बालक से युद्ध करना पडा, इस युद्ध में भगवान शिव जी ने बालक का मस्तिष्क छिन्न कर दिया। बाद में पार्वती के अत्यधिक क्रोधित स्वरूप को शांत करने पर बालक को पुन: जीवीत किया गया।

4- ब्रह्मा जी का अहंकार और भैरव रूप में उनकी गर्दन का खंडन- पुराणों के अनुसार शिव जी के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई थी। उन्होने शिव जी की निंदा करने वाले ब्रह्मा के पांचवें मुख को अपने नख से छेदन कर दिया था। कथा प्रसंग के अनुसार ब्रह्मा और नरायण में इस बात को लेकर विवाद चल रहा था की सर्वश्रेष्ट कौन है। वेदों ने जब शिव जी का नाम लेकर उन्हे सर्वश्रेष्ट माना तब ब्रह्मा ने अहंकार वश शिव जी का अपमान करना शुरु कर दिया। तब भैरव रूप में शिव जी ने ब्रह्मा को दंड दिया था।

शिव जी ने जो कूछ क्रियाए की है ,उनसे साफ पता चलता है के शिव भक्तों को उनके शरण में रहते हुऐ जीवन के समस्त कष्ट ,बाधा ,पीड़ाए ,दोष और दर्द से राहत मिल सकता है । सिर्फ आवश्यकता है महारुद्र शिव मंत्र की ,जिसके जाप करने से शिव साधक को शिव कृपा के साथ साथ अनेको परेशानियों से राहत मिले ।

इस साधना के प्रत्यक्ष लाभ-

1-किसी भी प्रकार की बाधा और कमजोरी दूर कर सकते है । कमजोरी का अर्थ धन, धान्य, शारीरिक, मानसिक से भी सम्बंधित है ।

2-सभी प्रकार के समस्या से मुक्ति हेतु आवश्यक तांत्रोक्त मंत्र है ।

3-समस्त प्रकार का शत्रु पीड़ा से राहत होगा । यहाँ शत्रु का अर्थ कोई व्यक्ति हो ऐसा नहीं,हमारे कई सारे शत्रु है,जैसे रोग , दुःख ,दारिद्रता ,असफलता ।

4-प्रत्येक मनोकामना पूर्ति हेत एवं प्रतियोगी परीक्षा में सफलता हेतु भी यह मंत्र साधना आवश्यक है ।

5-काला जादू या दूसरी भाषा में तंत्र बाधा दोष निवारण हेतु यह साधना आवश्यक है ।

मैं चाहता था के इस वर्ष होली के पावन अवसर पर आप सभी को एक ऐसा साधना विधान दिया जाए ,जिससे आपको जीवन में सहायता मिले । आपका जीवन अद्वितीय हो यही मैं शिव जी से प्रार्थना करता हूँ । आपके प्रत्येक दुःख में मैं हमेशा आपके साथ हूं, मुझसे जितना हो सके उतना मार्गदर्शन मैं आपको करता रहुँगा । आप अवश्य ही होली के रात में 8 बजे के बाद से ही मंत्र का जाप प्रारम्भ करे , जितना ज्यादा मंत्र जाप करना चाहते हो ,कर ही लो । साधना में रुद्राक्ष माला का उपयोग करे,आसान और वस्त्र जो भी आपके पास हो ,उसीका उपयोग करे । साधना में दिशा का कोई भी बंधन नही है,किसी भी दिशा में मुख करके जाप कर सकते हो । जितना ज्यादा आपको परेशानी है उतना ही ज्यादा जाप करे । होली के बाद भी मंत्र का जाप करते रहना है, उठते-बैठते चलते -फिरते मन ही मन भी मंत्र का जाप चालु ही रखे ।

यह साधना कलयुग में एक प्रचंड प्रहार है हम सभी के समस्याओ पर,इससे हम सभी को नवचेतना प्राप्त होगी और जीवन आनंद पूर्वक सफल होगा ।

बिजोक्त महारुद्र शिव मंत्र-

।। ॐ ह्लौं ह्लीं भ्रं भ्रं ह्लीं ह्लौं फट् ।।

OM HLOUM HLEEM BHRAM BHRAM HLEEM HLOUM PHAT

मुझे विश्वास हैं, आप सभी इस साधना से प्रत्यक्ष लाभ उठाएंगे ।





आदेश.........

10 Feb 2017

महाशिवरात्रि:कालसर्प दोष निवारण.

(महाशिवरात्रि 24/02/2017,विशेष शिवपुजन समय  रात्री मे 12.47 से 1.16 तक)

कालसर्प, अर्थात् सर्प और काल, इसमें भी सर्प योनी के बारे में हमारे शास्त्रों में बहुत वर्णन आया है। गीता में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने कहा है कि पृथ्वी पर मनुष्य की उत्पत्ति (जन्म) केवल विषय-वासना के कारण ही हुई है। जीव रूपी मनुष्य जैसा कर्म करता है उसी के अनुरूप उसे फल मिलता हैं। विषय -वासना के कारण ही काम-क्रोध, मद-लोभ और अहंकार का जन्म होता है इन विकारों को भोगने के कारण ही जीव को सर्प योनी प्राप्त होती है। कर्मों के फलस्वरूप आने वाली पीढ़ियों पर पड़ने वाले अशुभ प्रभाव को कालसर्प दोष कहा जाता है।

कालसर्प योग

कुंडली में जब सारे ग्रह राहू और केतु के बीच में आ जाते हैं तब कालसर्प योग बनता हैं। ज्योतिष में इस योग को अशुभ माना गया है लेकिन कभी-कभी यह योग शुभ फल भी देता है। ज्योतिष में राहु को काल तथा केतु को सर्प माना गया है राहु को सर्प का मुख तथा केतु को सर्प का पूंछ कहा गया है। वैदिक ज्योतिष में राहु और केतु को छाया ग्रह की संज्ञा दी गई है, राहु का जन्म भरणी नक्षत्र में तथा केतु का जन्म अश्लेषा नक्षत्र में हुआ है। जिसके देवता काल एवं सूर्य है । राहु को शनि का रूप और केतु को मंगल ग्रह का रूप कहा गया है, राहु मिथुन राशि में उच्च तथा धनु राशि में नीच होता है, राहु के नक्षत्र आर्द्रा, स्वाति और शतभिषा है, राहु प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम, द्वादस भावों में किसी भी राशि का विशेषकर नीच का बैठा हो, तो निश्चित ही आर्थिक, मानसिक, भौतिक पीड़ायें अपनी महादशा अन्तरदशा में देता हैं। मनुष्य को अपने पूर्व दुष्कर्मों के फलस्वरूप कालसर्प दोष लगता है। उसके जन्म जन्मान्तर के पापकर्म के अनुसार ही यह दोष पीढ़ी दर पीढ़ी चला आता है

कालसर्प दोष

कालसर्प योग मुख्य रूप से 12 प्रकार के होते है जो मनुष्य जीवन को बहुत अधिक प्रभावित करते हैं। इन सभी योगों का शुभ और अशुभ प्रभाव मनुष्य के जीवन को प्रभावित करता है। ये निम्न प्रकार के है –

अनंत कालसर्प योग –

जब लग्न में राहु और सप्तम भाव में केतु हो और उनके बीच समस्त अन्य ग्रह हों तो अनंत कालसर्प योग बनता है । इस अनंत कालसर्प योग के कारण जातक को जीवन भर मानसिक शांति नहीं मिलती । वह सदैव अशान्त क्षुब्ध परेशान तथा अस्थिर रहता है, बुद्धिहीन हो जाता है। मस्तिष्क संबंधी रोग भी परेशानी पैदा करते हैं।

कुलिक कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के द्वितीय भाव में राहु और अष्टम भाव में केतु हो तथा समस्त ग्रह उनके बीच हों, तो यह योग कुलिक कालसर्प योग कहलाता है।

वासुकि कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के तीसरे भाव में राहु और नवम भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग वासुकीकालसर्प योग कहलाता है।

शंखपाल कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के चौथे भाव में राहु और दसवे भाव में केतु हो और उनके बीच सारे ग्रह हों तो यह योग शंखपाल कालसर्प योग कहलाता है।

पद्म कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के पांचवें भाव में राहु और ग्याहरवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच हों तो यह योग पद्म कालसर्प योग कहलाता है।

महापद्म कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु हो और समस्त ग्रह इनके बीच कैद हों तो यह योग महापद्म कालसर्प योग कहलाता है।

तक्षक कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के सातवें भाव में राहु और केतु लग्न में हो तथा बाकी के सारे इनकी कैद मे हों तो इनसे बनने वाले योग को तक्षक कालसर्प योग कहते है।

कर्कोटक कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के अष्टम भाव में राहु और दूसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को कर्कोटक कालसर्प योग कहते हैं।

शंखनाद कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के नवम भाव में राहु और तीसरे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शंखनाद कालसर्प योग कहते हैं।

पातक कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के दसवें भाव में राहु और चौथे भाव में केतु हो और सभी सातों ग्रह इनके मध्य में अटके हों तो यह पातक कालसर्प योग कहलाता है।

विषाक्तर कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के ग्याहरवें भाव में राहु और पांचवें भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य में अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को विषाक्तर कालसर्प योग कहते हैं।

शेषनाग कालसर्प योग –

जब जन्मकुंडली के बारहवें भाव में राहु और छठे भाव में केतु हो और सारे ग्रह इनके मध्य मे अटके हों तो इनसे बनने वाले योग को शेषनाग कालसर्प योग कहते हैं।

आप निम्न प्रकार से स्वयं अपनी कुण्डली जांचकर कालसर्प योग की जांच कर सकते हैं। इसी प्रकार यदि सूर्य के साथ राहू की युति बनती है तो पितृदोष बनता है। इन दोषों का प्रभाव जीवन में स्पष्ट दिखाई देता है। ऐसे व्यक्ति प्रयत्न करने पर भी जीवन में सफलता प्राप्त नहीं कर पाते हैं।

आंशिक कालसर्प योग –

जन्म कुण्डली में राहु और केतु के मध्य अन्य सातों ग्रह स्थित होने से पूर्ण कालसर्प दोष होता है। कुछ व्यक्तियों के जन्म चक्र में राहु और केतु के मध्य शेष सातों ग्रह न होकर एक या दो ग्रह बाहर होते है। इस स्थिति में यह आंशिक कालसर्प दोष कहलाता है। इसका प्रभाव भी उतना ही खतरनाक होता है जितना पूर्ण कालसर्प दोष का होता है। यह ध्यान रहे कि यदि शनि, शुक्र और बुध तीनों में से एक भी ग्रह राहु और केतु चक्र से अलग है तो बड़ा ही विचित्र शमनक दोष हो जाता हैं यह दोष भी पितृदोष, कालदोष कहा गया है।


राहु और कालसर्प योग

राहु के गुण -अवगुण शनि जैसे हैं, राहु जिस स्थान में जिस ग्रह के योग में होता है उसका व शनि का फल देता है। शनि आध्यात्मिक चिंतन, विचार, गणित के साथ आगे बढ़ने का गुण अपने पास रखता है, यही गुण राहु के हैं।
राहु का योग जिस ग्रह के साथ है वह किस स्थान का स्वामी है यह भी अवश्य देखना चाहिए। राहु मिथुन राशि में उच्च, धनु राशि में नीच और कन्या राशि में स्वगृही होता है। राहु के मित्र ग्रह – शनि, बुध और शुक्र हैं। राहु के शत्रु ग्रह – सूर्य, मंगल और केतु हैं। चन्द्र, बुध, गुरु उसके समग्रह हैं। कालसर्प योग जिस व्यक्ति की जन्म कुण्डली में है, उसे जीवन में बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। इच्छित फल प्राप्ति और कार्यों में बाधाएं आती हैं, बहुत ही मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक कष्ट उठाने पड़ते हैं।

कालसर्प योग से पीड़ित जातक का भाग्य प्रवाह राहु, केतु अवरुद्ध करते हैं। जिसके परिणाम स्वरूप जातक की प्रगति नहीं होती। उसे जीविका चलाने का साधन नहीं मिलता, अगर मिलता है तो उसमें अनेक समस्याएं पैदा होती हैं। जिससे उसको जीविका चलानी मुश्किल हो जाती है। विवाह नहीं हो पाता। विवाह हो भी जाए तो संतान-सुख में बाधाएं आती हैं।

कालसर्प योग के प्रभाव

कालसर्प योग व्यक्ति के जीवन में भाग्य के प्रवाह को बाधित कर देते हैं, जिसके फलस्वरूप उसके इस जन्म में और पूर्व जन्म में किये गये पाप कर्मों का प्रभाव बढ़ जाता है। एक प्रकार से कालसर्प योग व्यक्ति के जीवन में दुर्भाग्य को बढ़ाता है। मुख्यत ये दुर्भाग्य चार प्रकार के होते हैं –

1. व्यक्ति को उसके परिश्रम का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता, उसके जीवन में निरन्तर धन का अभाव बना रहता है।

2. शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल बना रहता है। उत्साह की कमी के कारण जीवन बोझ सा व्यतीत होता है।

3. संतान पक्ष से भी कष्ट भोगने पड़ते हैं।

4. गृहस्थ जीवन बहुत अस्त-व्यस्त हो जाता है, पति एवं पत्नि में निरन्तर कलह होता रहता है।

अतः प्रत्येक व्यक्ति को कालसर्प दोष निवारण साधना, मंत्र जप, अभिषेक, तर्पण-दान, पितृदोष मुक्ति, क्रिया एवं शमन क्रिया अवश्य ही सम्पन्न करनी चाहिए।

शास्त्रों में यह भी लिखा है कि यदि आपको अपनी कुण्डली तथा परिवार के सदस्यों की कुण्डली की जानकारी नहीं है तो भी एक बार तो कालसर्प दोष निवारण पूजन अभिषेक परिवार के सभी सदस्यों के लिए अवश्य ही करना चाहिए।


(विशेष:अपना पुर्ण नाम और नया फोटो मेरे ई-मेल amannikhil011@gmail.com पर भेजीये,आपको निशुल्क मे कालसर्प दोष निवारण दीक्षा दिया जायेगा । दीक्षा प्राप्त करने के दुसरे दिन दक्षिणा के रुप मे किसी भी गरीब व्यक्ति को कुछ रुपये अपने योग्यता अनुसार दान मे दे दिजीये । अवश्य ही आपको कालसर्प दोष निवारण हेतु शिव जी के आशिर्वाद से मुक्ति मिल सकता है। फोटो आज से लेकर 22/02/2017 तक ही भेजने हैं क्युके 24/02/2017 को महाशिवरात्रि के रात्री मे आपको दीक्षा प्रदान कर दिया जायेगा।)







Are you getting continuous obstacles in your life? Are your children always ill?
Is your family life not peaceful? Do you encounter failure while climbing on steps for success? Is your body always full of diseases and your mind always full of tension?

Kalsarpa, i.e a malefic combination of snake and time; has been described in detail in our holy scriptures. In the Gita, Lord Krishna himself has stated that the origin (birth) of man on earth occurred only because of human sexuality. A person gets the fruits as per the actions which he performs in his life. Yearning-anger, pride-greed and ego are born out of lust-desire, and the creature gets Snake Yoni to experience these vices. Kaalsarp Dosh is the malefic impact on future generations due to flawed actions.


Kalsarpa Yoga

The Kalsarpa Yog is created when all the planets in the horoscope come between Rahu and Ketu. This planetary combination is considered inauspicious in astrology but sometimes it also proves auspicious. In astrology, Rahu is considered as Kaal (Time or Death) and Ketu is considered as a serpant, Rahu is called the mouth and Ketu is called the tail of the serpant. Vedic astrology describes Rahu and Ketu as shadowy planets, Rahu originated in Bharani Nakshatra and Ketu in Ashlesha Nakshatra. The presiding Gods are Kaal and Sun. Rahu has been termed as a form of Saturn planet and Ketu as a form of Mars planet, Rahu is benevolent in Gemini and malevolent in Sagittarius. The constellations of Rahu are Aadra, Swati and Shatbhisha. If Rahu is placed in 1, 2, 4, 5, 7, 8, 9 houses, especially as malefic in any Rashi, then it surely provides economic, mental and physical problems in its Mahadasha Antardasha. A person gets afflicted with Kaalsarp Dosha due to the misdeeds of his past lives. This affliction continues across generations due to his sins in various lives.


Kalsarpa Dosha

There are primarily 12 types of Kalsarpa Yoga which cause a great impact to the person. The Good and bad effects of these formulations affects human life. These types are –

Anant Kalsarpa Yoga-

When Rahu is Lagna and Ketu is in 8 house and all the other planets are between them, then Anant Kalsarpa Yoga gets created. The person doesn’t get any mental peace throughout his life due to Anant Kalsarpa Yoga. He is always upset, distressed, dismayed and disturbed and becomes fatuous. The Neurological diseases also disturb him.

Kulik Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 2 house and Ketu in 8 house and all the other planets are between them, then Kulik Kalsarpa Yoga gets created.

Vasuki Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 3 house and Ketu in 9 house and all the other planets are between them, then Vasuki Kalsarpa Yoga gets created.

Sankhpal Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 4 house and Ketu in 10 house and all the other planets are between them, then Sankhpal Kalsarpa Yoga gets created.

Padma Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 5 house and Ketu in 11 house and all the other planets are between them, then Padma Kalsarpa Yoga gets created.

Mahapadma Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 6 house and Ketu in 12 house and all the other planets are enclosed between them, then Mahapadma Kalsarpa Yoga gets created.

Takshak Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 8 house and Ketu is in the Lagna and all the other planets are imprisoned between them, then Takshak Kalsarpa Yoga gets created.

Karkotaka Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 8 house and Ketu in 2 house and all the other planets are struck between them, then Karkotaka Kalsarpa Yoga gets created.

Shankhnaad Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 9 house and Ketu in 3 house and all the other planets are struck between them, then Shankhnaad Kalsarpa Yoga gets created.

Paatak Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 10 house and Ketu in 4 house and all the other planets are between them, then Paatak Kalsarpa Yoga gets created.

Vishaktr Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 11 house and Ketu in 5 house and all the other planets are struck between them, then Vishaktr Kalsarpa Yoga gets created.

Sheshnaag Kalsarpa Yoga –

When Rahu is in 12 house and Ketu in 6 house and all the other planets are between them, then Sheshnaag Kalsarpa Yoga gets created.

Thus you can yourself check your horoscope to ascertain about Kaalsarpa Yoga. Similarly if Sun gets paired with Rahu then Pitridosh gets created. The effect of these defects is fully visible in the life. Such persons cannot achieve success inspite of various endeavors.

Partial Kalsarpa Yoga –

The location of other seven planets between Rahu and Ketu cause complete Kalsarpa Dosh. In some individuals, instead of all seven, 1 or 2 planets are outside the Rahu-Ketu combination. In this case it is called partial Kalsarpa Dosha. Its impact is as dangerous as that of full Kalsarpa Dosha. Note that if even one of the Saturn, Venus and Mercury, are outside the Rahu-Ketu combination, then this causes a very bizarre destructive defect. This Dosha is also called as Pitridosh Kaaldosh.


Rahu and Kalsarpa Yoga

The properties of Rahu are similar to those of Shani (Saturn); the location and planetary combination of Rahu provides appropriate results like Saturn. Saturn controls spiritual contemplation, consideration, quantitative capabilities, Rahu has similar properties.
One should also consider the fact that Rahu is combined with which planet, and which house is it Lord of. Rahu is benefic in Gemini, malefic in Sagittarius and normal in Virgo. The friendly planets of Rahu are Saturn, Mercury and Venus. The enemy planets of Rahu are Sun, Mars and Ketu. Moon, Mercury and Jupiter are its neutral planets. The person afflicted with Kalsarpa yoga in his horoscope has to undergo tremendous suffering in his life. He gets obstacles in achieving his desired results and actions. He has to undergo very grave mental, physical and economic hardship.

Rahu and Ketu block the fate of a Kalsarpa yoga afflicted native. This results in stoppage of growth and progress of native. He does not obtain any job, even if he gets a job, then multiple problems develop in meeting his livelihood. This makes it very difficult to live his life. Marriage does not take place. If marriage does take place then problems arise in children.

Effects of Kalsarpa Yoga

Kalsarpa yoga blocks the flow of destiny in person’s life, which consequently increases the effects of his sins in this and prior lives. Kalsarpa Yoga thus increases misfortune in person’s life. These misfortunes are of four types –

1. The person does not enjoy the full fruits of his labor in full, there is constant lack of money in his life.

2. The person remains physically and mentally weak. The lack of enthusiasm make life a burden.

3. The person has to bear suffering from the children’s side.

4. The domestic life of the person becomes a mess, there is constant squabble and bickering between the husband and wife.

So each person should definitely accomplish Kalsarpa Dosh Nivarann Sadhana, Mantra-Chanting, Abhishek, Tarpan-Daan, Pitridosh Mukti Kriya and Shaman Kriya.
The holy scriptures even mention that if you are not aware of your and your family members’ horoscope; even then you should definitely accomplish Kalsarp Dosh Nivarann Poojan Abhishek at least once for all family members.







आदेश..........