27 Sept 2015

पूर्ण अष्ट यक्षिणी साधना विधान.

यक्षिणी को शिव जी की दासिया भी कहा जाता है,इसलिये आर्टिकल पुरा पढे तो आपको साधना के कुछ गोपनिय पहेलुओ का ग्यान प्राप्त होगा.
यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है 'जादू की
शक्ति'.आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां थीं:- देव,दैत्य,दानव, राक्षस,यक्ष,गंधर्व,अप्सराएं, पिशाच,किन्नर, वानर, रीझ,भल्ल, किरात, नाग आदि.....ये सभी मानवों से कुछ अलग थे.इन सभी के पास रहस्यमय ताकत होती थी और ये सभी मानवों की किसी न किसी रूप में मदद करते थे.देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है.कहते हैं कि यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां नकारात्मक.बहुत से लोग यक्षिणियों को भी किसी भूत-प्रेतनी की तरह मानते हैं, लेकिन यह सच नहीं है.रावण के सौतेला
भाई कुबेर एक यक्ष थे, जबकि रावण एक राक्षस. महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की दो पत्नियां थीं इलविला और कैकसी. इलविला से कुबेर और कैकसी से रावण, विभीषण, कुंभकर्ण का जन्म हुआ.
इलविला यक्ष जाति से थीं तो कैकसी राक्षस.जिस तरह प्रमुख 33 देवता होते हैं, उसी तरह प्रमुख 64 यक्ष और यक्षिणियां भी होते हैं,गंधर्व और यक्ष जातियां देवताओं की ओर थीं तो राक्षस, दानव
आदि जातियां दैत्यों की ओर यदि आप देवताओं की साधना करने की तरह किसी यक्ष या यक्षिणियों की साधना करते हैं तो यह भी देवताओं की तरह प्रसन्न होकर आपको उचित मार्गदर्शन या फल देते हैं, उत्लेखनीय है कि जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब
एक यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात 'यक्ष प्रश्न' किए थे. उपनिषद की एक कथा अनुसार एक यक्ष ने ही अग्नि, इंद्र, वरुण और वायु का घमंड चूर-चूर कर दिया था.यक्षिणी साधक के समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर स्त्री
के रूप में प्रस्तुत होती है.किसी योग्य जानकार से पूछकर ही यक्षिणी साधना करनी चाहिए. साधक अपने विवेक से काम लें.
शास्त्रों में 'अष्ट यक्षिणी साधना' के नाम से वर्णित यह साधना प्रमुख रूप से यक्ष की श्रेष्ठ रमणियों की है.

ये प्रमुख यक्षिणियां है -
1. सुर सुन्दरी यक्षिणी,
2. मनोहारिणी यक्षिणी,
3. कनकावती यक्षिणी,
4. कामेश्वरी यक्षिणी,
5. रतिप्रिया यक्षिणी,
6. पद्मिनी यक्षिणी,
7. नटी यक्षिणी,
8.अनुरागिणी यक्षिणी सिद्ध

संशिप्त जानकारी दे रहा हू-

1-सुर सुन्दरी यक्षिणी.

यह सुडौल देहयष्टि, आकर्षक चेहरा, दिव्य आभा लिये हुए, नाजुकता से भरी हुई है. देव योनी के समान सुन्दर होने से कारण इसे सुर सुन्दरी यक्षिणी कहा गया है. सुर सुन्दरी कि विशेषता है, कि साधक उसे
जिस रूप में पाना चाहता हैं, वह प्राप्त होता ही है चाहे वह माँ का स्वरूप हो, चाहे वह बहन का या पत्नी का, या प्रेमिका का.यह यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है.

2-मनोहारिणी यक्षिणी.

अण्डाकार चेहरा, हरिण के समान नेत्र, गौर वर्णीय,चंदन कि सुगंध से आपूरित मनोहारिणी यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहन बना देती है, कि वह कोई भी,चाहे वह पुरूष
हो या स्त्री, उसके सम्मोहन पाश में बंध ही जाता है,वह साधक को धन आदि प्रदान कर उसे संतुष्ट कराती है.

3-कनकावती यक्षिणी.

रक्त वस्त्र धारण कि हुई, मुग्ध करने वाली और अनिन्द्य सौन्दर्य कि स्वामिनी, षोडश वर्षीया, बाला स्वरूपा कनकावती यक्षिणी है.कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने के पश्चात साधक में तेजस्विता तथा प्रखरता आ जाती है, फिर वह विरोधी को भी मोहित करने कि क्षमता प्राप्त कर लेता है.यह साधक की प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करने मे सहायक होती है.

4-कामेश्वरी यक्षिणी.

सदैव चंचल रहने वाली, उद्दाम यौवन युक्त, जिससे मादकता छलकती हुई बिम्बित होती है.साधक का हर क्षण मनोरंजन करती है कामेश्वरी यक्षिणी.यह साधक को पौरुष प्रदान करती है तथा पत्नी सुख कि
कामना करने पर पूर्ण पत्निवत रूप में साधक कि कामना करती है.साधक को जब भी द्रव्य कि आवश्यकता होती है,वह तत्क्षण उपलब्ध कराने में सहायक होती है

5-रति प्रिया यक्षिणी.

स्वर्ण के समान देह से युक्त, सभी मंगल आभूषणों से सुसज्जित, प्रफुल्लता प्रदान करने वाली है रतिप्रिया यक्षिणी.रति प्रिया यक्षिणी साधक को हर क्षण प्रफुल्लित रखती है तथा उसे दृढ़ता भी प्रदान करती है.साधक और साधिका यदि संयमित
होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य कि उपलब्धि होती है

6-पदमिनी यक्षिणी.

कमल के समान कोमल, श्यामवर्णा, उन्नत स्तन, अधरों पर सदैव मुस्कान खेलती रहती है, तथा इसके नेत्र अत्यधिक सुन्दर है.पद्मिनी यक्षिणी साधना साधक को अपना सान्निध्य नित्य प्रदान करती है.
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह अपने साधक में आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान कराती है तथा सदैव उसे मानसिक बल प्रदान करती हुई उन्नति कि और अग्रसर करती है.

7-नटी यक्षिणी.

नटी यक्षिणी को 'विश्वामित्र' ने भी सिद्ध
किया था.यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है तथा किसी भी प्रकार कि विपरीत परिस्थितियों में साधक को सरलता पूर्वक निष्कलंक बचाती है.

8-अनुरागिणी यक्षिणी.

अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है। साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है तथा साधक की इच्छा होने पर उसके साथ उल्लास करती है.

अष्ट यक्षिणी साधना को संपन्न करने वाले साधक को यह साधना अत्यन्त संयमित होकर करनी चाहिए.समूर्ण साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन
अनिवार्य है. साधक यह साधना करने से पूर्व यदि.
साधना काल में मांस, मदिरा का सेवन न करें .यह.साधना रात्रिकाल में ही संपन्न करें.साधनात्मक.अनुभवों की चर्चा किसी से भी नहीं करें, न ही.किसी अन्य को साधना विषय में बतायें.निश्चय ही यह साधना साधक के जीवन में भौतिक पक्ष को पूर्ण करने मे अत्यन्त सहायक होगी, क्योंकि अष्ट यक्षिणी सिद्ध साधक को जीवन में कभी भी निराशा या हार का सामना नहीं करना पड़ता है.
वह अपने क्षेत्र में अद्वितीयता प्राप्त करता ही है.

साधना विधान-
इस साधना में आवश्यक सामग्री है -
"पारद अष्टाक्ष गुटिका"तथा अष्ट यक्षिणी सिद्ध यंत्र एवं 'यक्षिणी माला'.साधक यह साधना किसी भी शुक्रवार को प्रारम्भ कर सकता है.यह ग्याराह दिन की साधना है.लकड़ी के बजोट पर सफेद वस्त्र बिछायें
तथा उस पर कुंकुम से यंत्र बनाएं.
फिर उपरोक्त प्रकार से रेखांकित यंत्र में जहां 'ह्रीं' बीज अंकित है वहां "पारद अष्टाक्ष गुटिका" स्थापित करें.फिर अष्ट यक्षिणी का ध्यान कर गुटिका का पूजन कुंकूम, पुष्प तथा अक्षत से करें,धुप तथा दीप लगाए और गुटिका को देखते हुए मंत्र का जाप 108 बार करे "ओम ह्रीं शिव प्रिये प्रत्यक्षं दर्शय सिद्धये ह्रीं फट".फिर यक्षिणी से निम्न मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमानुसार दिए गए हुए आठों यक्षिणियों के मंत्रों की एक-एक माला जप करें.प्रत्येक यक्षिणी मंत्र की एक माला
जप करने से पूर्व तथा बाद में मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें। उदाहरणार्थ पहले मूल मंत्र की एक माला जप करें, फिर सुर-सुन्दरी यक्षिणी मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमशः प्रत्येक यक्षिणी से सम्बन्धित मंत्र का जप करना है.ऐसा ग्याराह  दिन तक नित्य करें.

मूल अष्ट यक्षिणी मंत्र-

॥ ॐ ऐं श्रीं अष्ट यक्षिणी सिद्धिं सिद्धिं देहि
नमः ॥

1-सुर सुन्दरी मंत्र-
॥ ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा ॥

2-मनोहारिणी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहारी स्वाहा ॥

3-कनकावती मंत्र
॥ ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ कनकावती स्वाहा ॥

4-कामेश्वरी मंत्र
॥ ॐ क्रीं कामेश्वरी वश्य प्रियाय क्रीं ॐ ॥

5-रति प्रिया मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ रति प्रिया स्वाहा ॥

6-पद्मिनी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥

7-नटी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ नटी स्वाहा ॥

8-अनुरागिणी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥

मंत्र जप समाप्ति पर साधक साधना कक्ष में ही सोयें। अगले दिन पुनः इसी प्रकार से साधना संपन्न करें, ग्याराह दिनो साधना सामग्री को जिस वस्त्र पर यंत्र बनाया है,उसिमे मे बाँधकर सुरक्षित रखे.
जब भी यक्षिणी से काम करवाना हो तब सिर्फ यह पूर्ण विधान एक दिन करे,असंभव कार्य भी संभव होगा.
इस साधना मे "पारद अष्टाक्ष गुटिका"का महत्व बहोत ज्यादा है,बिना गुटिका के साधना मे सफलता प्राप्त करना कठिन है,माला यंत्र नही भी हो तो ज्यादा फर्क नही पडेगा.आप चाहे तो बिना गुटिका के साधना करके देखिये तो आपको प्रमाण मिल ही जायेगा.क्युके मैने प्रत्येक बार अपने अनुभव से गोपनियता का खुलासा किया है जो प्रत्येक जानकार नही करता.

"पारद अष्टाक्ष गुटिका" निर्माण-

इस गुटिका के निर्माण के लिए जिस अष्ट
संस्कारित पारद का प्रयोग किया जाता है
उसके सभी संस्कार रसांकुश यक्ष और  यक्षिणी के मन्त्रों से होता है परन्तु ये मंत्र जप दीपनी क्रम युक्त होना चाहिए,तभी इस पारद में वो प्रभाव आएगा जो इस गुटिका के निर्माण के लिए अपेक्षित है.तत्पश्चात इसे स्वर्ण ग्रास दिया जाये और इसे मुक्ता पिष्टी के साथ खरल किया जाये,जब पारद के साथ उस पिष्टी का पूर्ण योग हो जाये तब उसे,चन्द्रिका नागक जडि रस,विशुद्ध ताम्रभस्म,सफेदधतूरे,सिंहिका,श्वेतार्क रस और ताम्बूल के स्वरस के साथ आठ घंटों तक खरल किया जाये,और खरल करते समय-

ॐ नमो आदेश गुरूजी को,सारा पारा भेद उजारा,देत ज्ञान का उजारा,दूर कर अँधियारा,शिव की शक्ति इसी घडी इसी पल आये,भीतर समाये,करे दूर अँधियारा जो ना करे तो शंकर को त्रिशूल ताडे,शक्ति को खडग गिरे,छू वाचापुरी ll

उपरोक्त मंत्र का जप करते जाये,जब भी रस सूखने लगे तो नया रस डालते जाये ,जब समयावधि पूर्ण हो जाये तो उस पिष्टी को सुखाकर शराव सम्पुट कर 2 पुट दे दे और स्वांग शीतल होने के बाद उस पिष्टी के साथ पुनः मनमालिनी मंत्र का जप करते हुए उस पिष्टी का 10 वा भाग पारद डालकर खरल करे और मूष में रख कर गरम करे और धीरे धीरे विल्वरस का चोया देते जाये,लगभग 10 गुना रस धीरे धीरे
चोया देते हुए शुष्क कर ले.अब आप इसे
पिघलाकर गुटिका का आकार दे दे,इस क्रिया में पारद अग्निस्थायी हो जाता है और गुटिका हलके श्वेत वर्ण की बनती है जो पूर्ण दैदीप्य मान होती है.यदि पारद
अग्निसह्य नहीं हुआ तो क्रिया असफल
समझो.इस गुटिका को सामने रख पुनः 3 घंटों तक रसांकुश मन्त्रों का दीपनी क्रिया के साथ जप करो और गोरख मन मुद्रा का
प्रदर्शन करो.तथा इसके बाद प्राण प्रतिष्ठा
मन्त्रों से इसे प्रतिष्ठित कर इसमें 64 यक्षिणी का स्थापन कर दो,फिर षोडशोपचार पूजन कर उस पर आप मनोवांछित यक्षिणीसिद्धी प्रयोग कर सकते हैं.इसे शिवचक्षु मंत्र से यदि 11 माला मंत्र कर सिद्ध कर लिया जाये और पूजन स्थल पर स्थापित कर दिया जाये तो ये गुटिका यक्षिणी को बाँध देती है जिससे व्यक्ति को पूर्ण सफलता की प्राप्ति होती ही है और यह आठो यक्षिणी मंत्र शिव जी ने किलित किये हुए है,जिनका किलन गुटिका के प्रभाव से समाप्त होता है और इसके लिये कोई विशेष किलन मुक्ती विधान करने की आवश्यकता नही है.

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आदेश.

देव रंजिनी गुटिका.

देव रंजिनी गुटिका दुर्लभ एवं चमत्कारिक है,ऋषि नागर्जुन ने स्वयम इस गुटिका की तारिफ की है. एक दिव्य पारद गुटिका जोकि देवताओं को भी दुर्लभ है.ये गुटिका कभी काली नहीं पड़ती मतलब हमेशा इसकी चमक एक जैसी बनी रहती है.ये
गुटिका शक्ति का पावरहाउस है.ये गुटिका इतनी दुर्लभ है कि देवता इसको उठा के ले जाते हैं.इस गुटिका के माध्यम से कुंडलिनी जागरण बहुत आसानी से संभव है.हमारा तृतीय नेत्र को ये जागृत कर देती है.हमारे शरीर की उर्जा को ये एक दम से बढ़ा देती है.अगर इस गुटिका को साथ में रख कर
साधना की जाये तो साधना में सफलता मिलने के अवसर बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं और ये देव प्रत्यक्षीकरण करवा देती है. साधना में आने वाले विघ्नों का नाश करती है ये गुटिका.इसको बनाना भी इतना आसान नहीं है.45 दिन की कड़ी मेहनत के बाद ये गुटिका तैयार होती है | इस गुटिका को अगर पानी में डाल के वो पानी पिया जाये तो शरीर की बीमारियाँ भी ठीक होने लगती है इसे मै दूसरा नाम कायाकल्प गुटिका दुगा और कुंडलिनी जागरण होने लगता है.इस गुटिका को सामने रख कर अगर इस पर त्राटक किया जाए तो सम्मोहन की शक्ति प्राप्त होती है.इस गुटिका को अगर हाथ में रख कर ध्यान किया जाए तो ध्यान की असीम गहराई में उतरा जा सकता है.
ज्योतिषी अगर इस गुटिका को साथ में रख कर अपनी प्रैक्टिस करे तो उसकी की हुई भविष्यवाणी सही उतरती है | सभी प्रकार की नेगेटिव उर्जा या शक्ति को ये दूर रखती है.यहाँ तक की अगर इसको लेकर शमशान में साधना करने चले जाए तो ये इतर योनियों के दुष्प्रभाव से भी रक्षा करती है.इसके अनगिनत प्रभाव हैं जोकि लिखना संभव नहीं है जोकि केवल स्वयं उपयोग करके ही सामने आयेंगे.इस प्रकार से यह एक बहुत ही दुर्लभ गुटिका है जोकि
अभी हमने बहुत ही कम मात्रा में तैयार की है.यह गुटिका तन्त्रोत्क मंत्रो से सिद्ध की जाती है.

Dev Ranjini-Mercury Ball.
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Very rare, and inaccessible to Devtas too. This is a small Sphere and made of purified Mercury after 10 sanskaars and after that some rituals. This Gutika never loose its brightness and if keeper of this Gutika drink the Milk after dipping
this Gutika into Milk for half an hour, than it will be helpful to awekan the Kundlini power.His/her body will Rejuvenate and if any disease in body,than this Gutika will heal that problem.All the planets will be aligned by this Gutika.no need to
wear any astrological stone if you have this Gutika in your possession. it rectifies the problems in your JanamKundali(Astrological birth
chart).No bad or negative energy can affect you.Your Aura field will be expand.If you use Reiki healing than the Healing power will be very strong. even it can grant healing power to anybody.If you gaze upon this Gutika on regular basis, you can get Hypnosis power in your eyes. Third eye also can be awaken by this Gutika.If astrologers keep this Gutika with him while doing predictions, than their predictions will be correct.Keeper of this Gutika can get deeper state of Meditation easily. This is very rare Gutika and
made by myself.Very few peoples on this Earth know about this Gutika. it can be worn in Ring also or can be kept in pocket.I can not write all
the benefits here. but if you are psychic than you can see and feel the power of this Gutika immediately.
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आदेश.....

पारद विग्रह.

पारद की महत्ता

रसतंत्र मे कहते हैं की वे लोग धन्य हैं जिन्होंने जीवन में पारद के दर्शन किए हो और जो पारदेश्वर की साधना में रत हो. क्यूंकि पारदेश्वर और पारद लक्ष्मी के माध्यम से ही जीवन की वे उचाइया हमें
प्राप्त होती हैं जिनकी चाहत हमें होती है.
पारद शिवलिंग संसार का दुर्लभ शिवलिंग होता है यदि उस दिव्य व शुभ्र प्रवाहित पारद को स्वर्ण ग्रास देकर भव्य व आबद्ध बनाया जाए और यह ग्रास देने की क्रिया ३२ बार होनी चाहिए.क्यूंकि ऐसा स्वर्ण ग्रास दिया पारद ही जीवन में भौतिकता और आध्यात्मिकता का समावेश करता
है. यहाँ पर रसतंत्र मे बहुत ही विशेष बात कही है की स्वर्ण ग्रास के बगैर पारद पूर्णता दे ही नही सकता.फिर चाहे उस निर्बीज (बिना ग्रास लिए हुए) का आप शिवलिंग या पार्देश्वरी बनाओ या फिर उसे भस्म करो क्यूंकि शास्त्र कहता है की निर्बीज पारद को भस्म करने वाला नरक गामी होता है वो शिव हत्या का दोषी होता है और यह ग्रास देने की क्रिया विजय काल से प्रारम्भ होनी चाहिए. तथा जहा पर पारद शिवलिंग स्थापित हो या निर्माणित हो रहा हो वह पर आग्नेय कोण में पार्देश्वरी स्थापित होना चाहिए.भगवान् शिव के दिव्य ३२ रूपों को तभी आबधिकरण किया जा सकता है जब उनके प्रत्येक रूप के जप द्वारा ग्रास दिया जाए. इसी प्रकार हीरक ग्रास भी ३२ बार लक्ष्मी के ३२ रूपों की स्थापना के लिए दिया जाता है और यह पूर्ण प्रक्रिया १६ घंटो में होती है प्रत्येक घंटे में २ बार शिव चैतन्य होते हैं और दो बार लक्ष्मी. इस प्रकार जो पारद प्राप्त होता है उससे
निर्माणित विग्रह अद्विय्तीय होता है पूर्णता
दायक होता है और ऐसे ही शिवलिंग और लक्ष्मी पर की गयी साधना फलीभूत होती ही है.वैसे भी जो लोग दूकान से पारद के विग्रह खरीद कर स्थापित करते हैं उन्हें कोई अनुकूलता इसी लिए नही मिलती
क्यूंकि जब पारद अष्ट संस्कार के बाद बुभुक्षित होता है तो उसे भोजन देना अनिवार्य है और आजकल पारद कम शिवलिंग मे रांगा नामक धातु का प्रमाण ज्यादा होता है.जिस पर चढाया हुआ जल ग्रहण करने से रोगो की उत्पत्ती होती ही है.आप ख़ुद ही सोचिये की जो ख़ुद भूखा हो वो आप को तृप्ति कैसे दे सकता है. और दूसरी बात दुकानों पर मिलने वाले विग्रह पारद से नही बल्कि सीसे से या जस्ते से निर्मित होते हैं जिनमे नाम मात्र का पारद
होता है , न उनमे चेतना होती है न ही कोई संस्कार.अब वो आपको पूर्णता कैसे दे सकते हैं.यह जीवन का सौभाग्य होता है की जीवित इन विग्रहों को प्राप्त कर अपने घर में स्थापित करें और ऐश्वर्य व
साधनात्मक स्तर की उच्चता की प्राप्ति करे जो होती ही है. इन ६४ दिव्य लक्ष्मी- शिव रूपों के आलावा उनमे ४ और विशिष्ट शिव रूपों की भी स्थापना होती है. इस प्रकार ६४ तंत्रों की दिव्व्य शक्तियों से यह विग्रह संयुक्त हो जाते हैं. यदि इन
प्रक्रियाओं से युक्त पारदेश्वर और पार्देश्वरी घर में स्थापित हो तब कैसा भी बुरा ग्रह प्रभाव, तंत्र प्रभाव, पूर्व जन्मकृत दोषों से साधक को मुक्ति मिलती है और ऐसा विग्रह ही आपको वो अनुकूलता और पूर्णता देता है जैसा की आप चाहते हैं. ऐसी पार्देश्वरी ही आग्नेय कोण में स्वर्णावती बनकर स्थापित होती है और खुशियों की बारिश करती हैं. ऐसे पारद शिवलिंग पर ही शैव गुरु साधना , पूर्व जन्म दर्शन साधना ,तथा सप्त लोक भेदन साधना होती है.
एक महत्वपूर्ण बात याद रखिये , ऐसे विग्रह पूर्ण शुभ्र और दैदीप्यमान होते हैं जो सम्मोहन क्षमता और दिव्व्य तेज से आपको आप्लावित कर देते हैं.
इस आर्टिकल से पहिले आर्टिकल मे मैंने अष्ट संस्कारो के बारे मे समजाया था.
आप जब भी किसिसे पारद शिवलिंग,लक्ष्मी,काली,हनुमान,गणपती,श्रीयंत्र या कुबेर यंत्र के विग्रह खरिदे तो उनसे पूछिये की इस विग्रह की क्या गारंटी है के ये काले नही पडेगे or कही इन विग्रह को चमकाने हेतु कहि नींबू तो नही रगडना पडेगा?
इस बात पर पारद विग्रह विक्रेता आपको सही जवाब नही देगा.सीधी सी बात है पारद मे रांगा मिलाया जाये तो वह विग्रह अवश्य ही कुछ महीने मे काला पडेगा.
परंतु जो विग्रह मै बनाता हु उसका गारंटी मै लेता हू "मेरे द्वारा निर्मित कोई भी पारद विग्रह काला नही पडेगा",क्युके मै शुद्ध पारद से विग्रह निर्माण करता हु और गर्व के साथ कहेता हू "मेरे द्वारा निर्माण किया हुआ पारद विग्रह काला पडे तो दस गुना विग्रह की न्यौच्छावर राशीनुसार मै राशी वापीस दे दुगा".यह है सही पारद विग्रह निर्माण क्रिया का प्रमाण,जो हर कोई नही देता.आज के समय मे पारद के नाम पर सिर्फ लुटा जाता है क्युके यह अग्यानता के कारण होता है.जिन्हे अष्ट संस्कार क्रिया के नाम भी पता नही होते है वह भी आज कल पारद विग्रह बेचकर अपना स्वार्थ पूर्ण कर रहा है.
जो साधक अष्ट-संस्कार और अठराह-संस्कार युक्त स्वर्ण ग्रास से निर्मित पारद विग्रह चाहता है वो हमसे सम्पर्क करे.

amannikhil011@gmail.com

shabarmantrascience@gmail.com

पर ई-मेल करे.शीघ्र ही आपको रिप्लाइ दिया जायेगा.


आदेश.

लक्ष्मी साधना प्रयोग.

अगर आपको अचानक पैसे रुपए की ज़रुरत पड़ जाए तो आप क्या करेंगे?
नहीं समझ आया तो हम बताते हैं।
दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा गणेश
जी के साथ की  जाती है.लेकिन अगर अचानक रूपये पैसे की तंगी हो जाये
तो लक्ष्मी माता को नहीं, बल्कि उनके पुत्रों को पुकारिये.जब लक्ष्मी जी के पुत्रों का नाम लेंगे, तो मां दौड़ी चली आयेंगी.ये ममता ही तो है, जो मां को बच्चों से जोड़ती है.गणेश जी लक्ष्मी जी के मानस पुत्र हैं. वैसे तो लक्ष्मी जी चंचला हैं, एक स्थान पर
नहीं टिकतीं,लेकिन दो स्थानों पर लक्ष्मी जी सदा निवास करती हैं.पहला वह स्थान जहां विष्णु जी का अभिषेक दक्षिणावर्ती शंख से किया जाये.दूसरा वह स्थान, जहां गणपति की आराधना की जाये और यह तीसरा उपाय है लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों का नाम जपना.वैसे तो लक्ष्मी जी वहां सदा
निवास करती हैं,जहां गणपति पूजे जाते हैं, लेकिन अचानक रुपये चाहिये तो एक नहीं, बल्कि लक्ष्मी जी के अनेक पुत्रों के नाम लेना होगा.

ऋग्वेद में लक्ष्मी जी के 4 पुत्रों का नाम इस श्लोक में आये है
-आनंद: कर्दम: श्रीदश्चिकलीत इति विश्रुता:
-ऋषय: श्रिय: पुत्राश्व मयि श्रीर्देवी
देवता (4/5/4/6)

लेकिन आकस्मिक धन पाने के लिये आपको लक्ष्मी जी के 18 वर्ग पुत्रों के नाम लेने होंगे,इसके बाद धन की व्यवस्था
स्वयं लक्ष्मी जी आकर करती हैं.

कैसे मिलेगा आकस्मिक धन?
अगर अचानक कारोबार में घाटा हो जाये, शेयर बाज़ार में पैसे डूब जायें,अच्छी भली
नौकरी चली जाये या फिर कोई प्राकृतिक आपदा आ जाये,ऐसे में धन की आवश्यकता सबको पड़ सकती है.बस ऐसी ही परिस्थिति में, लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों का नाम,शुक्रवार से जपना शुरू कर
दें और साथ मे उन्हे गुलाब का कम-से-कम एक पुष्प अर्पित करे.

लक्ष्मी जी के 18 पुत्रों के नाम,
- ॐ देवसखाय नम:
- ॐ चिक्लीताय नम:
- ॐ आनन्दाय नम:
- ॐ कर्दमाय नम:
- ॐ श्रीप्रदाय नम:
- ॐ जातवेदाय नम:
- ॐ अनुरागाय नम:
- ॐ सम्वादाय नम:
- ॐ विजयाय नम:
- ॐ वल्लभाय नम:
- ॐ मदाय नम:
- ॐ हर्षाय नम:
- ॐ बलाय नम:
- ॐ तेजसे नम:
- ॐ दमकाय नम
- ॐ सलिलाय नम:
- ॐ गुग्गुलाय नम:
- ॐ कुरूण्टकाय नम:

तो अगर आप भी किसी ऐसी परिस्थिति के शिकार हैं, जिसमें अचानक से पैसे रूपये चाहिये, तो यह उपाय शुक्रवार से आज़मायें.मां तो मां है,फिर लक्ष्मी ही क्यों न हों, बेटों के नाम पुकारेंगे तो मां दौड़ी चली
आयेगी.

अगर आपसे संभव हो तो मंत्र का जाप भी करे,"ओम नम:कमलवासिन्यै स्वाहा".
इस मंत्र का जाप आप रोजाना कर सकते है,सिर्फ मंत्र जाप हेतु शुद्धता का ध्यान रखिये.माँ आप पर कृपा बरसाये यही कामना करता हू.

आदेश.....

26 Sept 2015

मृगाक्षी अप्सरा (किन्नरी साधना)

"शरीर निरोग हो साथ ही यौवन से छलकता हुआ देह का कायाकल्प संभव है महान ऋषि "धन्वन्तरी" रचित साधना से".
धन्वन्तरी महान,ऋषि,योग विद्या से परिपूर्ण,सब प्रकार के रोगो का निदान करने मे समर्थ,लेकिन एक चिंता उन्हे खायी जा रही थी,अवस्था के साथ-साथ जीवन आगे बढ रहा था.यौवन बीत गया था और वृद्धावस्था अपनी दस्तक दे रही थी.इसलिये जीवन मे रस नही आ रहा था,वे रसायन शास्त्री औषध शास्त्री बन गये लेकिन "रस-शास्त्री" नही बने एक दिन निराश होकर निढाल बैठे थे चिंता मे ही मगन थे,थके शरीर मे तन्द्रा आ गइ और निंद मे स्वप्न मे भगवान सदाशिव का आदेश आया.मै रसेश्वर हू तुम्हे रस से परिपूर्ण होना है और तुम्हे रस से परिपूर्ण कर सकती है "मृगाक्षी रुप गर्विता किन्नरी" अचानक नींद खुली और सब कुछ स्पष्ट हो गया,संपन्न अद्वितीय साधना बस प्रारंभ हो गयी चिर यौवन प्राप्ति यात्रा.
यह साधना पूर्ण होते-होते कमरे मे सुगंध बढती दिख सकती है या मानो प्रकाश बढता दिख सकता है या नुपुर ध्वनी आरंभ हो जाती है और ठिक यही समय है मृगाक्षी से वचन लेने का,उसे जीवन भर अपनी प्रेमिका और अपनी सहचरी बना रखने का.
इस प्रकार यह जीवन की परीवर्तनकारी साधना संपन्न होती है और आधार बन जाती है पूर्ण सम्मोहन एवं सौन्दर्य प्राप्ति का.इस साधना से जहा शरीर का सौन्दर्य बढता है वही चेहरे पर विशेष आकर्षण शक्ती निर्मित होती है जिसे देखकर कोई भी पुरुष/स्त्री आकर्षित होते है.
इस साधना मे "अष्ट किन्नरी यंत्र" और "मृगाक्षी गुटिका" की जरुरत होती है.
अद्वितीय आचार्य धन्वन्तरी द्वारा रचित एवं अनुभूत यह पद्धती सौ टंच खरी तथा प्रामानिक है ही.
आप इस अद्वितीय साधना का लाभ उठाये और जीवन मे खुश रहे यही कामना करता हू.

आदेश.

बिर कंगन.


बहोत सारे लोग है जो सिर्फ बाते करते है बिर कंगन के बारे मे परंतु यहा मै आपको इसका प्रामानीक महत्व बता रहा हू क्युके मेरे पास बिर कंगन है.बिर कंगन क्या है?
अगर ये बात सुशील नरोले आपको नही
बतायेगा तो कौन बतायेगा,सही है ना. बिर कंगन 3 प्रकार के होते है.

1-52 बिर-64 जोगिनी.
2-51 बिर 52 जोगिनी.
3-21 बिर 24 जोगिनी.

मुख्यता इन तीनो कंगन मे सबसे अच्छा कंगन 51 बिर-52 जोगिनी वाला माना जाता है क्युके एक पर एक भारी शक्ती वाला कंगन अच्छे-बुरे काम कर सकता है. बिर कंगन के माध्यम से बिरो से जो चाहो वह कार्य उनसे करवा सकते है परंतु बात येसा है के बिरो से वही काम करवाने कहो जो हम नही कर सकते है क्युके प्रत्येक कार्य को करने के बाद बिर बदलेमे कुछ ना कुछ तो माँगता ही है और अगर हमने उसकी डिमांन्ड पुरी नही की तो जब बिरो को अगला काम दे तो वह उस कार्य को पुरा नही करता है.या आसान भाषा मे कहा जाये तो बिर कार्य करने के बाद उर्जाहीन होने लगता है और उसके पसंद का चिज
उसको मिलतेही वह फिर से शक्तीशाली बन जाता है.बिर कंगन के माध्यम से षटकर्म कार्य आसानी से किये जाते है और
आजकल लोग बिरो से काम करवाते है और मोटा पैसा कमाते है जब के बिरो से येसे काम नही करवाने चाहिये जिससे सिर्फ धनार्जन हो बल्की कुछ जनकल्याण करके पिडित व्यक्ती का साहय्यता करके उनसे
आशीर्वाद भी प्राप्त करना चाहिये.बिर कंगन का आसान सा अर्थ है कंगन मे बिरो का स्थापना और साथ मे जोगिनी का स्थापना.जैसे बराटी का अर्थ है बिर और बराटी विद्या का अर्थ है "बिरो का विद्या" और जिसने बिरो का जागरण कर दिया समझलो उसने बराटी विद्या को सिद्ध कर लिया. मेरे पास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बिर कंगन है जो मुझे मेरे दादाजी से प्राप्त हुआ,इससे मुझे एक फायदा हुआ के कोई भी नया कंगन मै जागरत कर सकता हू परंतु मै सर्वप्रथम जिनके लिये कंगन बनाता हू उनको ही साधना विधि विधान संपन्न करने के निर्देश देता हू,कुछ लोगो ने प्रैक्टिकल अनुभुतिया की है.बिरो से कोई भी काम करवाना संभव है परंतु बिरो को
खुश रखना भी जरुरी है अन्यथा बिर समय पर कार्य नही करते है,बिरो को कैसे खुश रखना है यही इसमे मुख्य सुत्र होता है.जैसे मैने बताया बिर कंगन तीन प्रकार होते है और उन्हे बनाने मे पंचधातु,अष्टधातु,नवधातु का इस्तेमाल होता है.पंचधातु मे स्वर्ण,रजत,कास्य,तांबा और पित्तल होता है,इनको स्थिर लग्न
शुभ मुहूर्त मे खरिदकर कंगन बनाने से अधिक लाभ प्राप्त होते है और स्वर्ण को गुरुवार रजत को शुक्रवार कास्य को
शनीवार तांबा को रविवार पित्तल को सोमवार को खरिदना चाहिये.कंगन बनाते समय शरीर पर कोई भी वस्त्र नही होना चाहिये और कंगन बनाते समय वहा से उठकर अन्य कोई भी कार्य करना वर्जित माना जाता है.यह सब कुछ होने के बाद मंत्र साधना 7,11 या 21 दिनो तक की जाति है परंतु साधना मे योग्य सफलता प्राप्ति के लिये प्रामानीक विधि विधान का ग्यान होना आवश्यक है जो किताबो से नही मिलता है इसके लिये योग्य व्यक्ती का मार्गदर्शन प्राप्त होना चाहिये.जो व्यक्ती बिर कंगन बनाना चाहता है वह मुझसे सम्पर्क करे,मै आपको वचन देता हू आपको प्रामानिक मार्गदर्शन करुगा और आपके लिये योग्य बिर कंगन का निर्माण करके दुगा क्युके प्रत्येक तांत्रिक का एक स्वप्न होता है "उसको बिर कंगन जैसा दुर्लभ वस्तु प्राप्त हो.सिद्ध नवनाथ भगवान
भगवान को बिर कंगन बहोत प्रिय है यह बात सभी जानते है और समजते है.आपके कल्याण हेतु मै यह संकल्प ले रहा हू बिर कंगन के माध्यम से आप श्रेश्ट तांत्रिक बने,समाज मे जनकल्याण करके अपने नाम को रोशन करे और साथ थोडा बहोत धनार्जन भी करे.मुख्य बात यह है की पाखन्ड़ से बचे जैसे जब भी आपको किसी से बिर कंगन लेना हो तो सर्वप्रथम उसको बिर कंगन का फोटो दिखाने का आग्राह करे अन्यथा वह आपको बिर कंगन के नाम पर कोई भी कंगन दे देगा.
मेरा सम्पर्क:-
amannikhil011@gmail.com
पर मुझे आप इमेल करे और बिर कंगन को प्राप्त करे.

आदेश......

19 Sept 2015

हाजरात मंत्र सिद्धी

हाजरात सिद्धी हिंदू धर्म मे भी है और लोग सोचते है के मुस्लिम धर्म मे है.
हाजरात एक क्रिया है,जिसके माध्यम से हम भूत भविष्य की घटना देख सकते है और अदृश्य शक्तियोको भी देख सकते है. बहोत से ऐसे कार्य होते है जिनमे हमे
भूतकाल और भविषयकाल मे होनेवाली घटना का ज्ञान होना आवश्यक होता है परंतु हम नही जान सकते है.इसलिये हाजरात साधना से हमे मदत प्राप्त हो सकती है.यह साधना 7 दिन मे सिद्ध होता है और इसमे ज्यादा समय नही लगता.
आज कल लोगो ने हाजरात के नाम पर लूटना शुरू कर दिया है, और जिनको सिद्ध हुवा है उनकी तो रोजी रोटी बन गया है.यह विधान यह विषय उत्तम है इसे अन्य भाषा मे " कजली लगाना " कहते है, कुछ लोग " अंजन " भी बोलते है.पर यह विधान हाजरात नाम से प्रचलित है,इस क्रिया से आप स्वयम अपने आँखों मे या अंगूठे पर काजल लगाकर देख सकते है और देवता का आवाहन भी कर सकते है,ताकि आपकी परेशानिया दूर हो.
मैने स्वयम हाजरात सिद्धी प्राप्त की है जिसमे मुझे 7 दिन मे सफलता प्राप्त हुयी.मै किसी भी 12 वर्ष से कम उम्र के बालक के अँगूठे मे हाजरत लगाता हू तो मुझे हर बार सफलता प्राप्त हुयी.
मै यहा पर जो गोपनिय विधान दे रहा हु उससे हाजरात सिद्धी मे सफलता मिलती है क्युके यह हाजरात मेरू मंत्र विद्या है.जिससे किसी भी प्रकार के हाजरात सिद्धी मे पूर्ण सफलता प्राप्त होती है
हाजरात मेरु मंत्र :-
॥ ओम ह्रीं श्रीं क्लीं हाजरात
सिद्धि कुरू कुरू स्वाहा ॥
किसी भी शुक्ल पक्ष के पंचमी तिथि मे 11 माला जाप करने से यह मंत्र सिद्ध होता है और इस मंत्र को सिद्ध करने के बाद "हाजरात सिद्धी" मे सफलता प्राप्त होता है.
"www.ssd-sadhnaye.blogspot.com"
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मै आप लोगो को वह विधान दे सकता हू जिससे आप किसी भी 12 वर्ष से कम उम्र के बालक के अँगूठे मे हाजरात लगा सकते,जिससे उस बालक को सब कुछ साफ-साफ दिखायी देगा और आप जो भी प्रश्न पुछेगे उसका जवाब बालक को हाजरात से प्राप्त होगा.इस तरहा से आप अपने जीवन मे आनेवाले दुखो से राहत पा सकते है.
इस मंत्र को सिद्ध करने हेतु "जिन्दा काजल" और "हाजरत सिद्धी यंत्र" की जरुरत होती है.जिन्दा काजल विशेष प्रकार के जडि-बुटियो से बनता है.
हाजरत सिद्धी यंत्र शुक्रवार के दिन जो भी चंद्र का शुभ मुहूर्त हो उसमे ही बनाया जाता है,जिससे सफलता जल्दी मिलती है.
इस साधना को मैने बहोत वर्षो से गोपनिय रखा हुआ है ताकी गलत हाथ मे ना लगे.इस साधना की सामग्री और उसका पूर्ण विधि-विधान आपको मुझसे प्राप्त होगा.जब तक आप साधना पूर्ण सफल नही होते है तब तक मै आपका मार्गदर्शन करता रहुगा.
आपको आश्वासन देता हू "आपको इस साधना मे पूर्ण सफलता प्राप्त होगी"
सामग्री और मंत्र विधान हेतु सम्पर्क करे,इसके लिये आपको मुझे ई-मेल amannikhil011@gmail.com पर करना होगा.
आदेश......

9 Sept 2015

वचन सिद्धी प्रयोग.

जो बोलेगे वह सत्य होगा क्युके वचन सिद्धी एक प्रकार की वाणी सिद्धी हि
है.13 तारिख से साधना प्रारंभ करना है,माला रुद्राक्ष का हो,आसन वस्त्र कोई भी चलेगे परंतु लाल रंग के रहे तो ठिक
है,दिशा उत्तर के तरफ़ मुख हो जाप के समय.साधना की शुरूवात ग्रहण से करे और उसके बाद रात्री मे 9 बजे के बाद करे.साधना सूर्यग्रहण से चंद्रग्रहण तक करिये तो यह सिद्धी पूर्ण जीवन काल तक रहेगी.


मंत्र:-
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ll काली काली महाकाली,इंद्र की बेटी ब्रम्हा की साली,तीन सौ पैसठ काम
श्रीराजा रामचंद्र के,लंका नाशय के मेरी बाचा सिद्ध करके लावे तो सच्ची काली
महाकाली कहावे,मेरी भक्ति गुरू की
शक्ती,फुरो मंत्र ईश्वरीय वाचा ll


विधि:-
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एक पान का बिडा सिर्फ सूर्यग्रहण मे महाकाली जी को चढाये बाकी दिन नही
और साथ मे एक नारियल,चढाइ हुयी
सामग्री दूसरे दिन सुबह निर्जन स्थान पर रखे.मंत्र को 108 बार सिर्फ ग्रहण काल मे
पढीये,बाकी दिन मंत्र 21 बार पढके एक
ग्लास पानी मे 3 फुंक लगाकर 16 दिन पिये.यह साधना महत्वपूर्ण है.
आदेश

8 Sept 2015

अप्सरा सिद्धी (Apsara Siddhi).

अप्सरा सिद्धी के बारे मे कई ग्रंथो मे बहोत कुछ प्रामनिकता के साथ लिखा हुआ है परंतु उसके सिद्धी के बारे मे ज्यादा कुछ लिखा नही गया.
आज मै आपको बता दू के अप्सरा को सिर्फ नक्षत्र,चंद्र बल,ताराबल और कुंडली मे शुक्र ग्रह के स्थिति को देखकर ही सिद्ध किया जा सकता है.
नक्षत्र-इससे अप्सरा सिद्धी का पूर्ण आधार माना जा सकता है क्युके अप्सरा नक्षत्र के हिसाब से साधक पर कृपा करती है और प्रत्यक्ष होती है.प्रत्येक अप्सरा का एक विशेष नक्षत्र है जिस पर उसे आकर्षित किया जा सकता है और अगर उसी नक्षत्र पर साधना पूर्ण किया जाये तो अप्सरा का प्रत्यक्षीकरन असंभव नही है.नक्षत्र और अप्सरा का संबंध एक दूसरे को जोडता है जिससे साधक सफल होता है.
चंद्र बल-इससे साधक मे उस्ताह निर्मित होता है जिससे साधक चैतन्यता के साथ साधना मे सफल होता ही है और उसकी मानसिकता साधना मे योग्य निर्देश प्रदान करती है.बिना उस्ताह और उमंग के कोई भी साधक सफलता प्राप्त नही कर सकता है येसा साधना सुत्र है.
तारा बल-यह भी आवश्यक माना जाता है जिससे आप स्वयम को उर्जावान बनाने मे सक्षम रहेते है.
शुक्र ग्रह-जिससे साधक मे आकर्षण और सम्मोहन होता है.भोग और विलास के ग्रह की कृपा से आज इंद्र देव सकल समृद्ध माने जाते है,येसी दिव्य कृपा उन्हे महालक्ष्मी जी के कृपा से प्राप्त हुयी और आज भी वह देवराज इंद्र कहेलाते है.उनकी तपस्या से उन्होने यह वैभव प्राप्त किया और दैत्यगुरू शुक्राचार्य जी की भी कृपा प्राप्त करके सभी प्रकार के आनंद को प्राप्त करने का लाभ उठाया.देवगुरू बृहस्पती के मार्गदर्शन मे उन्होने सभी देवताओ को अपने कार्यो हेतु अपने दरबार मे स्थान दिया हुआ है.
इसी तराहा अप्सराओ के नृत्य से उन्हे आनंद मिलता है और अप्सरा का कार्य ही यह है की "आनंद प्रदान करना",जिसके लिये वह श्रुन्गार करती है नृत्य करती है और इंद्र सभा को खुश रखती है.अप्सरा मे येसी क्षमता है जिससे वह समस्त प्रकार के दुखो का नाश करदे.
अब कुछ लोग कहेते है भगवान कृष्ण जी ने कहा है "जिसको पुजोगे उसिको प्राप्त हो जाओगे,जैसे भुतो को पुजोगे तो भुतयोनी मे ही जाओगे"तो क्या यह गलत है के आप अप्सरा को प्राप्त करे और अप्सरा मे जाओगे.यह तो अच्छा है आप भी दूसरो के दुख*दर्द को समाप्त करने की क्षमता प्राप्त करोगे.कोई ये क्यू नही कहेता भगवान कृष्ण ने ये भी कहा है "तुम चाहे जिसकी भी पुजा करो अंत: वो मुझे ही प्राप्त होती है",एक बात समझ लो "चाहे जल कैसे भी बहे अंत: वह समुद्र मे ही मिलता है.जब सब कुछ भगवान कृष्ण मे ही समाहित होगा और उन्हे ही प्राप्त होगा तो वही आपको फल देगे.अब इसमे डरने जैसी कोई बात नही है की "अप्सरा साधना करोगे तो अप्सरा योनी को प्राप्त हो जाओगे".
सबसे पहिले अपने विकारो को दुर करो और गुरूकृपा से अप्सरा साधना करो,साथ मे किसी भी अप्सरा साधना से पूर्व गुरूमंत्र का अनुश्ठान जरुर किजिये.आपको सफलता प्राप्त होगी और जीवन मे खुश रहेने का मार्ग मिलेगा.यह साधना कोई भी कर सकता है.
आदेश.

17 Aug 2015

बंगाल मोहिनी महाविद्या (प्रत्यक्षिकरण साधना).


जीवन मे आकर्षण है तो सब कुछ है

जीवन मे सौन्दर्य है तो सब कुछ है

जीवन मे सम्मोहन है तो सब कुछ है

जीवन मे वशीकरण है तो सब कुछ है

इसलिये महत्व है इस विशेष विद्या का जिसे कहा गया है

"मोहिनी माहाविद्या".

मोहिनी जो पत्थर को भी मोहित करने मे समर्थ हो,वह है "बंगाल मोहिनी" जिसे प्रत्यक्ष करना संभव है.जिसके प्रत्यक्षीकरण से तीन वचन प्राप्त किये जा सकते है.मोहिनी भगवान विष्नु जी का एक सुंदर एवं मोहित करने वाला रुप है जो समुद्र मंथन के समय मे उन्होने धारण किया था.मोहिनी ने भगवान शिव जी को इस तराहा से मोहित कर दिया था की उन्हे मोहिनी से प्रेम हो गया.शाबर मंत्रो मे "बंगाल मोहिनी" मंत्र का बडा महत्व है और मोहिनी को प्रत्यक्ष करके जो लाभ मिलते है वह सिर्फ साधना करने से नही मिलते.मोहिनी सिद्धी से किसी को भी वश किया जा सकता है और इसके लिये कुछ खाने-पीने मे मंत्र अभीमंत्रीत करने की आवश्यकता नही है.जब साधक की मोहिनी सिद्ध हो जाये तो वह बैठे जगहा से ही व्यक्ती विशेष को अपने वश मे कर सकता है.मोहिनी को प्रत्यक्ष करने से वह जीवन भर साथ देती है और प्रत्येक कार्य को स्ययं संभव कर देती है.मोहिनी ही संपूर्ण जीवन का आधार है,मोहिनी सिद्धी से देवि/देवता तक वश मे हो जाते है तो सामान्य व्यक्ती को वश मे करना कोई कठिन कार्य नही है.स्वयम अनुभव करे और चिंतन करने का प्रयास करे फिर सोचिये "जीवन मे मोहिनी सिद्धी की कितनी आवश्यकता है".यह आर्टिकल पढने के बाद बहोत सारे लोग चुराकर अपने सोशल नेटवर्किंग साईट पर डाल देगे या अन्य वेबसाईट पर डालेगे परंतु वह लोग आपको "बंगाल मोहिनी का प्रत्यक्षीकरण मंत्र" बताने मे असमर्थ है.हमारे साइट पर दीये गये सभी आर्टिकल का अपना एक अलग महत्व है.यहा सिर्फ प्रामानिक मंत्र साधना दी जाती है ताकी जनकल्याण हो सके. मै यह साधना कभी देना नही चाहता था परंतु आज हमारे महाराष्ट्र के किसान भाइ आत्महत्या के मार्ग पर चल रहे है जिसका मुख्य कारण है कर्ज और खराब फसल,तो उनके मदत हेतु हमारी संस्था कार्य कर रहि है.हम चाहते है आप भी उनकी कुछ मदत करे और पुण्य के भागी बने क्युके जब अन्नदाता ही नही रहेगा तो कोई भी व्यक्ती जीवन नही जी पायेगा.इसलिये हमने इस साधना के "मंत्र विधि-विधान" न्यौच्छावर राशी रखी हुयी है और न्यौच्छावर राशी आपके तरफ से मिलते ही आपको हमारी संस्था की और से उसकी रसीद भी प्राप्त होगी.यह रसीद आपको income tax मे छुट प्राप्त करने हेतु काम मे आयेगी और मोहिनी महाविद्या भी आपको प्रत्यक्ष सिद्ध होगी परंतु यह सब कुछ आपके विश्वास पर आधारित है.सफलता मिलना आसान उनके लिये होता है जिनमे धैर्य हो,साहस हो,जिद हो,मेहनत करने की तय्यारी हो और पूर्ण विश्वास हो तो येसे साधक के लिये कुछ भी असंभव नही है.जो व्यक्ती दान स्वरुप न्यौच्छावर राशी देगा उन्हेही "बंगाल मोहिनी" का मंत्र एवं गोपनिय विधान उपहार स्वरुप प्राप्त होगा.साधना आसान है परंतु किसिका अहित करने हेतु साधना ना करे,हा जीवन की आवश्यकताये पूर्ण करने हेतु साधना अवश्य करे.

हो सके तो कृपया लिंक शेयर करे परंतु आर्टिकल अपने स्वार्थ हेतु चोरी ना करे क्युकी यह गरीब किसानो के साथ धोका होगा.

मंत्र साधना हेतु हमसे सम्पर्क करिये और  मार्गदर्शन प्राप्त करे.मोहिनी विद्या अत्यन्त प्राचीन विद्या मे से एक है.प्रत्येक देवि/देवता,साधू-सन्यासी ने मोहिनी विद्या को सिद्ध किया है ताकी सबका आकर्षण तत्व बना रहे और अपने भक्तो के साथ वह सम्पर्क मे रहे.नवनाथ भत्कीसार नामक प्राचीन ग्रंथ मे एक किस्सा है जो मै यहा लिखना चाहुगा. एक बार गोरखनाथ जी और कानिफनाथ जी किसी वन प्रदेश मे बैठे थे,उस समय दोनो मे एक-दूसरे के ग्यान को जानने की जिग्यासा हुयी तो उस समय कानिफनाथ जी ने मोहिनी शक्ती का आवाहन किया और आकर्षण अस्त्र के प्रयोग से कुछ दूरी पर आम का पेड था,तो उसके आम आकर्षण शक्ती से तोडकर गोरखनाथ जी के सामने रख दिये,वो भी बिना आम को स्पर्श किये उन्होने यह कार्य किया था.

तो इस प्रकार से मोहिनी शक्ती से कई महान सिद्धो ने कार्य संपन्न किये है.
मोहिनी विद्या सिखने से आकर्षण,मोहन और वशीकरण जैसे कार्य संपन्न कर सकते है.
जो साधक मोहिनी विद्या सिखना चाहते है वह व्यक्ति मुझे इमेल से सम्पर्क किजिये.

इस विद्या मे पूर्ण सफलता मिलता है,सिर्फ आवश्यकता है तो अचुक मार्गदर्शन का जो मै आपको अवश्य ही करुगा.जीवन मे कई कठीनायिया आती है जिसमे आकर्षण शक्ती से आपको सहाय्यता मिल सकती है.
मै जानता हु मेरे सारे आर्टिकल आप अच्छेसे पढते है परंतु इस बार यह आर्टिकल आपके जीवन को बदलने मे पूर्ण सहाय्यक है.यह आर्टिकल सिर्फ इसी ब्लोग पर आपको पढने मिलेगा और किसी अन्य जगह यह पोस्ट होता है तो इसका कोई महत्व नही है क्युके मै सिर्फ ब्लोग पर लिखता हु फेसबुक पर नही.
इसिके साथ यह कामना करता हु,आप सभी को मोहिनी विद्या सिद्ध हो और आपका प्रत्येक कार्य सफल हो जाये.




आदेश.

11 Feb 2015

बिर मुद्रिका

   
बहोत दिनो से इस विशय पर खोज चल रहा है कुछ ने तो मंत्र तक छाप दीये किताबो मे परंतु जब उनको पूछो इसको जगाने का विधि क्या है तो फोन काट देगे.जब पता नही कुछ तो क्यू छाप देना मंत्रो को सिर्फ खुद का नाम चलाने के लिये? बिर मुद्रिका बिर कंगन जैसे कार्य करता है सिर्फ फर्क इतना है बिर कंगन मे 52 बिर 64 जोगिनी बाँध सकते है तो कुछ कंगन 51-52 बाँध सकते है और बिर मुद्रिका मे 1-2 या सिर्फ 1 बिर बाँध सकते है.बिर कंगन साथ मे लेकर घूमना खतरे से खाली नही और मुद्रिका पहेन कर घुम सकते है.बिर कंगन मे अष्ट या नव धातु और बिर मुद्रिका सिर्फ एक धातु से बनता है.कंगन कई से काम ले सकते है मुद्रिका से
सीमित कार्य होते है.मैने कुछ ज्योतिषी देखे जो बिर मुद्रिका पहेनकर बिना कुंडली देखे सारी बाते
बता देते है परंतु उन्होने मेहनत नही की है मुद्रिका बनाने मे ये बात वो मानते है.जैसे "कान्होर्या बिर" इसको कुछ भी पूछो ये हर खबर बताता है और ये आज तक चाँनल से भी आगे है,ये भूत भविश्य भी बता देता है और बदलेमे कुछ नही माँगता.जब फूंक लगाओ तब जागता है और बाकी समय भगवान जाने कहा होता है.इस
मुद्रिका को पूर्वषाढा नक्षत्र मे बना सकते है क्युके यह नक्षत्र अद्रुश्य शक्ती को वश करने मे साहाय्यक
है.काले घोडे के नाल को शनी अमवस्या के दिन प्राप्त करे और इस नाल को 7 बार शंख की ध्वनि सुनाये.जब अच्छे योग हो तो चन्द्र बल देखकर नाल से मुद्रिका निर्माण करे.जिस दिन मुद्रिका बनाओ उसी दिन उतरण और आपटा के पौधे को निमंत्रण देकर आये,निमंत्रण देते समय ये कहेना है "मि आलो तुया कामासाठी,तू चाल
माया कामासाठी" और येसा कहेकर दूसरे दिन दोनो पौधो को उखाड़कर लाये.दोनो पौधो के जड
को घर लाने के बाद छाव मे सुखाये और सुखाने के बाद शनिवार को रात्री मे पंचाम्रुत से स्नान कराये और
हनुमानजी के मंदिर जाकर उनके चरणो मे रख दे,दूसरे दिन सवेरे सूर्य निकलने से पहिले उन्हे घर पर लाकर
सम्भाल कर रखे.जब पूर्वषाढा नक्षत्र हो उस रात मे दोनो जड से (एक हाथ से जल निकाले कुवे से
या हैंडपम्प से) जल डालते रहे मुद्रिका पर और मंत्र जाप करते रहे,जाप करते समय गुर्र गुर्र
गुर्र....येसा ध्वनि सुनायी देगा तो डरना नही मंत्र जाप करते रहे कुछ समय बाद आवाज
आयेगा "क्या चाहते हो मुझसे"तब मंत्र जाप बंद करदे और कान्होर्या बिर को मुद्रिका मे स्थापित होने
का प्रार्थना करे और उसे वचन माँगे "जब मै तुम्हेजगाउन्गा तब बिना शर्त तुम मुझे साहय्यता करना",तब
वो वचन देकर चला जायेगा. यह बिर मुद्रिका जिन्हे प्राप्त करना हो वह साधक मुझसे सम्पर्क करे.
amannikhil011@gmail.com

आदेश.