28 Sept 2015

सरस्वती मंत्र साधना.

सरस्वती पूजन व प्रार्थना

माँ सरस्वती हमारे जीवन की जड़ता को दूर करती हैं, सिर्फ हमें उसकी योग्य अर्थ में उपासना करनी चाहिए। सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होना चाहिए। वसंत पंचमी के दिन विद्या की
देवी सरस्वती के पूजन का भी विधान है।
कलश की स्थापना करके गणेश, सूर्य, विष्णु तथा महादेव की पूजा करने के बाद वीणावादिनी माँ सरस्वती का पूजन करना चाहिए। सुविधा के लिए माँ सरस्वती के आराधना स्तोत्र उपलब्ध हैं।
माँ सरस्वती हमारे जीवन की जड़ता को दूर करती हैं, सिर्फ हमें उसकी योग्य अर्थ में उपासना करनी चाहिए। सरस्वती का उपासक भोगों का गुलाम नहीं होना चाहिए। वसंत पंचमी के दिन विद्या की
देवी सरस्वती के पूजन का भी विधान है।

सरस्वती प्रार्थना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ 1॥

अर्थ:-

जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके,हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु
एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली माँ सरस्वती हमारी रक्षा करें॥1॥

शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां
जगद्व्यापिनीं वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्।
हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम् वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥2॥

अर्थ:-

शुक्लवर्ण वाली, संपूर्ण चराचर जगत् में व्याप्त,आदिशक्ति, परब्रह्म के विषय में किए गए विचार एवं चिंतन के सार रूप परम उत्कर्ष को धारण करने वाली,सभी भयों से भयदान देने वाली, अज्ञान के अँधेरे को
मिटाने वाली, हाथों में वीणा, पुस्तक और स्फटिक की माला धारण करने वाली और पद्मासन पर विराजमान् बुद्धि प्रदान करने वाली, सर्वोच्च ऐश्वर्य से अलंकृत, भगवती शारदा (सरस्वती देवी) की मैं वंदना करता हूँ॥2॥

ज्यादातर विद्यार्थियों कि स्मरण शक्ति कमजोर होती हैं। बच्चे को एवं उसके माता-पिता को एसा लगता हैं, कि बच्चे का मन पढाई में नहीं लगता, या बच्चे जितनी मेहनत करते हैं उन्हें उसके अनुरुप फल नहीं मिलता, परीक्षा के प्रश्न पत्र में लिखते समय उसे भय रहता हैं, बच्चे ने जो पढाई कि हैं वह परिक्षा पत्र में लिखते समय भूल जाता हैं, इत्यादी.., कारणो से बच्चे और माता-पिता हमेशा परेशान रहते हैं।
कुछ बच्चे होते हैं, जो एक या दो बार पढने पर याद कर लेते हैं, तो कुछ बच्चे वही पाठ्य सामग्री अधिक समय पढने के उपरांत भी कुछ याद नहीं रहता।
एसा क्यूं होता हैं? इस का मुख्य कारण हैं, अनुचित ढंग से कि गई पढाई या पढाई में एकाग्रता की कमी। विद्या अध्ययन में आने वाली रुकावटो एवं
विघ्न बाधाओं को दूर करने हेतु शास्त्रो में कुछ विशिष्ठ मंत्रो का उल्लेख मिलता हैं। जिसके जप से पढाई में आने वाली रुकावटे दूर होती हैं एवं कमजोर याद शक्ति इत्यादी में लाभ प्राप्त होता हैं।

सरस्वती मंत्र संग्रह:-
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सरस्वती मंत्र तन्त्रोक्तं देवी सूक्त से :

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेणसंस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

विद्या प्राप्ति के लिये सरस्वती मंत्र:

घंटाशूलहलानि शंखमुसले चक्रं धनुः सायकं हस्ताब्जैर्दघतीं धनान्तविलसच्छीतांशु तुल्यप्रभाम्।
गौरीदेहसमुद्भवा त्रिनयनामांधारभूतां
महापूर्वामत्र सरस्वती मनुमजे शुम्भादि
दैत्यार्दिनीम्॥

अत्यंत सरल सरस्वती मंत्र प्रयोग:

प्रतिदिन सुबह स्नान इत्यादि से निवृत होने के बाद मंत्र जप आरंभ करें। अपने सामने मां सरस्वती का यंत्र या चित्र स्थापित करें । अब चित्र या यंत्र के ऊपर श्वेत चंदन, श्वेत पुष्प व अक्षत (चावल) भेंट करें और धूप-दीप जलाकर देवी की पूजा करें और अपनी मनोकामना का मन में स्मरण करके स्फटिक कीमाला से किसी भी सरस्वती मंत्र की शांत मन से एक माला फेरें।

सरस्वती मूल मंत्र:
ॐ ऎं सरस्वत्यै ऎं नमः।

सरस्वती मंत्र:
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः।

सरस्वती गायत्री मंत्र:
१ - ॐ सरस्वत्यै विधमहे, ब्रह्मपुत्रयै धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात।

२ - ॐ वाग देव्यै विधमहे काम राज्या धीमहि ।तन्नो सरस्वती: प्रचोदयात।

ज्ञान वृद्धि हेतु गायत्री मंत्र :
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

परीक्षा भय निवारण हेतु:

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वीणा पुस्तक धारिणीम् मम् भय निवारय निवारय अभयम् देहि देहि स्वाहा।

स्मरण शक्ति नियंत्रण हेतु:
ॐ ऐं स्मृत्यै नमः।

विघ्न निवारण हेतु:
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अंतरिक्ष सरस्वती परम रक्षिणी मम सर्व विघ्न बाधा निवारय निवारय स्वाहा।

स्मरण शक्ति बढा के लिए :
ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा।

परीक्षा में सफलता के लिए :
१ - ॐ नमः श्रीं श्रीं अहं वद वद वाग्वादिनी
भगवती सरस्वत्यै नमः स्वाहा विद्यां देहि मम ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा।
२ -जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी, कवि उर अजिर नचावहिं बानी।
मोरि सुधारिहिं सो सब भांती, जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥

हंसारुढा मां सरस्वती का ध्यान कर मानस-पूजा-पूर्वक निम्न मन्त्र का २१ बार जप करे-

"ॐ ऐं क्लीं सौः ह्रीं श्रीं ध्रीं वद वद वाग्-
वादिनि सौः क्लीं ऐं श्रीसरस्वत्यै नमः।”

देवी सरस्वती के अन्य प्रभावशाली मंत्र:

एकाक्षरः
“ऐ”।

द्वियक्षर:
१ “आं लृं”,।
२ “ऐं लृं”।

त्र्यक्षरः
“ऐं रुं स्वों”।
चतुर्क्षर:
"ॐ ऎं नमः।"

नवाक्षरः
“ॐ ऐं ह्रीं सरस्वत्यै नमः”।

दशाक्षरः
१ - “वद वद वाग्वादिन्यै स्वाहा”।
२ - “ह्रीं ॐ ह्सौः ॐ सरस्वत्यै नमः”।

एकादशाक्षरः
१ - “ॐ ह्रीं ऐं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।
२ - “ऐं वाचस्पते अमृते प्लुवः प्लुः”
३ - “ऐं वाचस्पतेऽमृते प्लवः प्लवः”।

एकादशाक्षर-चिन्तामणि-सरस्वतीः
“ॐ ह्रीं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः"।

एकादशाक्षर-पारिजात-सरस्वतीः
१ - “ॐ ह्रीं ह्सौं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।
२ - “ॐ ऐं ह्स्त्रैं ह्रीं ॐ सरस्वत्यै नमः”।

द्वादशाक्षरः
“ह्रीं वद वद वाग्-वादिनि स्वाहा ह्रीं”
अन्तरिक्ष-सरस्वतीः
“ऐं ह्रीं अन्तरिक्ष-सरस्वती स्वाहा”।
षोडशाक्षरः
“ऐं नमः भगवति वद वद वाग्देवि स्वाहा”।

अन्य मंत्र
• ॐ नमः पद्मासने शब्द रुपे ऎं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्दादिनि स्वाहा।
• “ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा”।
• “ऐंह्रींश्रींक्लींसौं क्लींह्रींऐंब्लूंस्त्रीं नील-तारे सरस्वति द्रांह्रींक्लींब्लूंसःऐं ह्रींश्रींक्लीं सौं: सौं: ह्रीं स्वाहा”।
• “ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वाग्वादिनि भगवती अर्हन्मुख- निवासिनि सरस्वति ममास्ये प्रकाशं कुरु कुरु स्वाहा ऐं नमः”।
• ॐ पंचनद्यः सरस्वतीमयपिबंति सस्त्रोतः सरस्वती तु पंचद्या सो देशे भवत्सरित्।

उपरोक्त आवश्यक मंत्र का प्रतिदिन जाप करने से विद्या की प्राप्ति होती है।

मंत्र साधना विधान:-
स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ कपडे पहन कर मंत्र का जप प्रतिदिन एक माला करें। ब्राह्म मुहूर्त मे किये गए मंत्र का जप अधिक फलदायी होता हैं। इस्से अतिरीक्त अपनी सुविधाके अनुशार खाली में मंत्र का जप कर सकते हैं। मंत्र जप उत्तर या पूर्व की ओर मुख करके करें। जप करते समय शरीर का सीधा संपर्क जमीन से न हो इस लिए ऊन के आसन पर बैठकर जप करें। जमीन के संपर्क में रहकर जप करने से जप प्रभाव हीन होते हैं।

आदेश.

27 Sept 2015

दिव्य अष्टलक्ष्मी मंत्र साधना.

हिंदू देवी-देवताओं में श्री लक्ष्मीजी को धन की देवी माना जाता हैं.इस लिये जिन लोगो पर देवी लक्ष्मी की कृपा हो जाती हैं, उन्हें जीवन में कभी किसी तरह के अभावो या
कमीयों का सामना नहीं करना पड़ता.
व्यक्ति का जीवन सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य से भरा होता हैं. विद्वानो के मतानुशार शास्त्रों में लक्ष्मीजी के आठ रूपो का उल्लेख मिलता हैं.इस लिये जिन लोगो पर
अष्ट लक्ष्मी की कृपा हो जाती है. उनका जीवन सभी प्रकार के सुख-समृद्धि-ऎश्चर्य एवं संपन्नता से युक्त रहता हैं.ऎसा शास्त्रोक्त विधान हैं, इस में लेस मात्र संशय नहीं हैं.
यदि मनुष्य को जीवन में लक्ष्मी को प्राप्त करना है तो अष्टलक्ष्मी रहस्य जानना
आवश्यक है और इनकी उपासना करना आवश्यक है.इसका शास्त्रों में वर्णन एवं मंत्र निम्नलिखित रूप में प्राप्त होते हैं:

1. धन लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की आराधना करने से रूपये पैसे के रूप में
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है तथा स्थिति ऐसी बनती है कि रूपये पैसे का आगमन होता है तथा इस रूपये पैसे में बरकत होती है
व्यर्थ में व्यय नहीं होता है.

2. यश लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति को समाज में सम्मान, यश, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, इनकी आराधना करने से व्यक्ति में विद्वत्ता, विनम्रता आती है,अन्य लोग जो शत्रुता
रखते हो उनका भी व्यवहार प्रेममय हो जाता है.

3. आयु लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से व्यक्ति दीर्घायु को प्राप्त करता है और रोगो से बचाव होता है.यदि व्यक्ति सदैव रोगग्रस्त या मानसिक रूप से परेशान हो तो उसे इस लक्ष्मी की आराधना अवश्य करनी चाहिये.

4. वाहन लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस रूप की पूजा करने से व्यक्ति के घर में वाहन इत्यादि रखने की इच्छा पूर्ण होती है.
इसी के साथ-साथ इन वाहनों का समुचित प्रयोग भी होता है क्योंकि कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि घर में वाहन तो है पर उनका प्रयोग नहीं हो पाता है.

5. स्थिर लक्ष्मी: लक्ष्मी के इस स्वरूप
की पूजा करने से घर धन-धान्य से भरा रहता है. वास्तव में यह अन्नपूर्णा देवी की घर में स्थाई निवास की पद्धति है.

6. सत्य लक्ष्मी :लक्ष्मी के इस स्वरूप की पूजा करने से मनोनुकूल पत्नी की प्राप्ति होती है या यदि पत्नी पूर्व से हो तो वह व्यक्ति के मनोनुकूल हो जाती है और वह मित्र, सलाहकार बनकर जीवन में पूर्ण सहयोग देती है.

7. संतान लक्ष्मी: इस लक्ष्मी की पूजा करने से संतानहीन दंपत्ति को संतान की प्राप्ति
होती है.इसी के साथ-साथ यदि पूर्व से
संतान हो पर वह दुष्ट, अशिक्षित, परेशान करने वाली हो तो सुधर जाती है.

8. गृह लक्ष्मी: इस लक्ष्मी की पूजा करने से जिनके पास अपने स्वयं के घर न हो
उनको घर की प्राप्ति होती है या घर हो
पर उसमे रह न पा रहे हों या उनके निर्माण में कठिनाई हो रही हो इससे मुक्ति मिलती है.

शुक्रवार के दिन इन आठों लक्ष्मी की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करते हुये प्रत्येक लक्ष्मी मंत्र के 108 पाठ कमलगट्टे की माला से करें.अष्टलक्ष्मी की कृपा वर्ष भर बनी रहेगी.

ॐ धनलक्ष्म्यै नम:
ॐ यशलक्ष्म्यै नम:
ॐ आयुलक्ष्म्यै नम:
ॐ वाहनलक्ष्म्यै नम:
ॐ स्थिरक्ष्म्यै नम:
ॐ सत्यलक्ष्म्यै नम:
ॐ संतानक्ष्म्यै नम:
ॐ गृहक्ष्म्यै नम:

साधना सामग्री:-

1.सिद्ध श्रीयंत्र ,पाट,पीला वस्त्र ,ताम्बे की थाली, गाय के घी के ९(नौ) दीपक, गुलाब
अगरबत्ती, लाल/पीले फूलो की माला, पीली बर्फी,शुद्ध अष्टगंध.

2.माला:-स्फटिक/कमलगट्टा.
जप संख्या रोज 11 माला जाप 21 दिन करे.
3.आसन:-पीला,वस्त्र पीले,समय शुक्रवार रात नौ बजे के बाद कभी भी.
4.दिशा:-उत्तराभिमुख होकर बैठे.

दिव्य अष्टमंत्र मंत्र:-

ll ॐ ह्रीं स्थिर अष्टलक्ष्मै स्वाहा ll

5.विधान :-बाजोट पर पिला वस्त्र बिछा कर उस पर सिद्ध श्री यन्त्र स्थापित करे,पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर बैठे श्री यन्त्र पर अष्टगंध का छीट्काव कर खुद अस्ट्गंध का तिलक करे उसके बाद ताम्बे की थाली में गाय के घी से नौ दीपक जलाये,गुलाब अगरबत्ती लगाये,प्रस्साद में पीली बर्फी रखे श्री यन्त्र पर फूल माला चढ़ाये उसके बाद मन्त्र जप करे.और माँ की कृपा को प्राप्त करे ...
माँ भगवती आप सभी को सुख समृद्धि
से पूर्ण करे..और मंत्र का नित्य जीवन मे 1,3,5,7,9 या 11 बार रोज जाप करते रहे.



आदेश.

पूर्ण अष्ट यक्षिणी साधना विधान.

यक्षिणी को शिव जी की दासिया भी कहा जाता है,इसलिये आर्टिकल पुरा पढे तो आपको साधना के कुछ गोपनिय पहेलुओ का ग्यान प्राप्त होगा.
यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है 'जादू की
शक्ति'.आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां थीं:- देव,दैत्य,दानव, राक्षस,यक्ष,गंधर्व,अप्सराएं, पिशाच,किन्नर, वानर, रीझ,भल्ल, किरात, नाग आदि.....ये सभी मानवों से कुछ अलग थे.इन सभी के पास रहस्यमय ताकत होती थी और ये सभी मानवों की किसी न किसी रूप में मदद करते थे.देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है.कहते हैं कि यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां नकारात्मक.बहुत से लोग यक्षिणियों को भी किसी भूत-प्रेतनी की तरह मानते हैं, लेकिन यह सच नहीं है.रावण के सौतेला
भाई कुबेर एक यक्ष थे, जबकि रावण एक राक्षस. महर्षि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की दो पत्नियां थीं इलविला और कैकसी. इलविला से कुबेर और कैकसी से रावण, विभीषण, कुंभकर्ण का जन्म हुआ.
इलविला यक्ष जाति से थीं तो कैकसी राक्षस.जिस तरह प्रमुख 33 देवता होते हैं, उसी तरह प्रमुख 64 यक्ष और यक्षिणियां भी होते हैं,गंधर्व और यक्ष जातियां देवताओं की ओर थीं तो राक्षस, दानव
आदि जातियां दैत्यों की ओर यदि आप देवताओं की साधना करने की तरह किसी यक्ष या यक्षिणियों की साधना करते हैं तो यह भी देवताओं की तरह प्रसन्न होकर आपको उचित मार्गदर्शन या फल देते हैं, उत्लेखनीय है कि जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब
एक यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात 'यक्ष प्रश्न' किए थे. उपनिषद की एक कथा अनुसार एक यक्ष ने ही अग्नि, इंद्र, वरुण और वायु का घमंड चूर-चूर कर दिया था.यक्षिणी साधक के समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर स्त्री
के रूप में प्रस्तुत होती है.किसी योग्य जानकार से पूछकर ही यक्षिणी साधना करनी चाहिए. साधक अपने विवेक से काम लें.
शास्त्रों में 'अष्ट यक्षिणी साधना' के नाम से वर्णित यह साधना प्रमुख रूप से यक्ष की श्रेष्ठ रमणियों की है.

ये प्रमुख यक्षिणियां है -
1. सुर सुन्दरी यक्षिणी,
2. मनोहारिणी यक्षिणी,
3. कनकावती यक्षिणी,
4. कामेश्वरी यक्षिणी,
5. रतिप्रिया यक्षिणी,
6. पद्मिनी यक्षिणी,
7. नटी यक्षिणी,
8.अनुरागिणी यक्षिणी सिद्ध

संशिप्त जानकारी दे रहा हू-

1-सुर सुन्दरी यक्षिणी.

यह सुडौल देहयष्टि, आकर्षक चेहरा, दिव्य आभा लिये हुए, नाजुकता से भरी हुई है. देव योनी के समान सुन्दर होने से कारण इसे सुर सुन्दरी यक्षिणी कहा गया है. सुर सुन्दरी कि विशेषता है, कि साधक उसे
जिस रूप में पाना चाहता हैं, वह प्राप्त होता ही है चाहे वह माँ का स्वरूप हो, चाहे वह बहन का या पत्नी का, या प्रेमिका का.यह यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक को ऐश्वर्य, धन, संपत्ति आदि प्रदान करती है.

2-मनोहारिणी यक्षिणी.

अण्डाकार चेहरा, हरिण के समान नेत्र, गौर वर्णीय,चंदन कि सुगंध से आपूरित मनोहारिणी यक्षिणी सिद्ध होने के पश्चात साधक के व्यक्तित्व को ऐसा सम्मोहन बना देती है, कि वह कोई भी,चाहे वह पुरूष
हो या स्त्री, उसके सम्मोहन पाश में बंध ही जाता है,वह साधक को धन आदि प्रदान कर उसे संतुष्ट कराती है.

3-कनकावती यक्षिणी.

रक्त वस्त्र धारण कि हुई, मुग्ध करने वाली और अनिन्द्य सौन्दर्य कि स्वामिनी, षोडश वर्षीया, बाला स्वरूपा कनकावती यक्षिणी है.कनकावती यक्षिणी को सिद्ध करने के पश्चात साधक में तेजस्विता तथा प्रखरता आ जाती है, फिर वह विरोधी को भी मोहित करने कि क्षमता प्राप्त कर लेता है.यह साधक की प्रत्येक मनोकामना को पूर्ण करने मे सहायक होती है.

4-कामेश्वरी यक्षिणी.

सदैव चंचल रहने वाली, उद्दाम यौवन युक्त, जिससे मादकता छलकती हुई बिम्बित होती है.साधक का हर क्षण मनोरंजन करती है कामेश्वरी यक्षिणी.यह साधक को पौरुष प्रदान करती है तथा पत्नी सुख कि
कामना करने पर पूर्ण पत्निवत रूप में साधक कि कामना करती है.साधक को जब भी द्रव्य कि आवश्यकता होती है,वह तत्क्षण उपलब्ध कराने में सहायक होती है

5-रति प्रिया यक्षिणी.

स्वर्ण के समान देह से युक्त, सभी मंगल आभूषणों से सुसज्जित, प्रफुल्लता प्रदान करने वाली है रतिप्रिया यक्षिणी.रति प्रिया यक्षिणी साधक को हर क्षण प्रफुल्लित रखती है तथा उसे दृढ़ता भी प्रदान करती है.साधक और साधिका यदि संयमित
होकर इस साधना को संपन्न कर लें तो निश्चय ही उन्हें कामदेव और रति के समान सौन्दर्य कि उपलब्धि होती है

6-पदमिनी यक्षिणी.

कमल के समान कोमल, श्यामवर्णा, उन्नत स्तन, अधरों पर सदैव मुस्कान खेलती रहती है, तथा इसके नेत्र अत्यधिक सुन्दर है.पद्मिनी यक्षिणी साधना साधक को अपना सान्निध्य नित्य प्रदान करती है.
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह अपने साधक में आत्मविश्वास व स्थिरता प्रदान कराती है तथा सदैव उसे मानसिक बल प्रदान करती हुई उन्नति कि और अग्रसर करती है.

7-नटी यक्षिणी.

नटी यक्षिणी को 'विश्वामित्र' ने भी सिद्ध
किया था.यह अपने साधक कि पूर्ण रूप से सुरक्षा करती है तथा किसी भी प्रकार कि विपरीत परिस्थितियों में साधक को सरलता पूर्वक निष्कलंक बचाती है.

8-अनुरागिणी यक्षिणी.

अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है। साधक पर प्रसन्न होने पर उसे नित्य धन, मान, यश आदि प्रदान करती है तथा साधक की इच्छा होने पर उसके साथ उल्लास करती है.

अष्ट यक्षिणी साधना को संपन्न करने वाले साधक को यह साधना अत्यन्त संयमित होकर करनी चाहिए.समूर्ण साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन
अनिवार्य है. साधक यह साधना करने से पूर्व यदि.
साधना काल में मांस, मदिरा का सेवन न करें .यह.साधना रात्रिकाल में ही संपन्न करें.साधनात्मक.अनुभवों की चर्चा किसी से भी नहीं करें, न ही.किसी अन्य को साधना विषय में बतायें.निश्चय ही यह साधना साधक के जीवन में भौतिक पक्ष को पूर्ण करने मे अत्यन्त सहायक होगी, क्योंकि अष्ट यक्षिणी सिद्ध साधक को जीवन में कभी भी निराशा या हार का सामना नहीं करना पड़ता है.
वह अपने क्षेत्र में अद्वितीयता प्राप्त करता ही है.

साधना विधान-
इस साधना में आवश्यक सामग्री है -
"पारद अष्टाक्ष गुटिका"तथा अष्ट यक्षिणी सिद्ध यंत्र एवं 'यक्षिणी माला'.साधक यह साधना किसी भी शुक्रवार को प्रारम्भ कर सकता है.यह ग्याराह दिन की साधना है.लकड़ी के बजोट पर सफेद वस्त्र बिछायें
तथा उस पर कुंकुम से यंत्र बनाएं.
फिर उपरोक्त प्रकार से रेखांकित यंत्र में जहां 'ह्रीं' बीज अंकित है वहां "पारद अष्टाक्ष गुटिका" स्थापित करें.फिर अष्ट यक्षिणी का ध्यान कर गुटिका का पूजन कुंकूम, पुष्प तथा अक्षत से करें,धुप तथा दीप लगाए और गुटिका को देखते हुए मंत्र का जाप 108 बार करे "ओम ह्रीं शिव प्रिये प्रत्यक्षं दर्शय सिद्धये ह्रीं फट".फिर यक्षिणी से निम्न मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमानुसार दिए गए हुए आठों यक्षिणियों के मंत्रों की एक-एक माला जप करें.प्रत्येक यक्षिणी मंत्र की एक माला
जप करने से पूर्व तथा बाद में मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें। उदाहरणार्थ पहले मूल मंत्र की एक माला जप करें, फिर सुर-सुन्दरी यक्षिणी मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर मूल मंत्र की एक माला मंत्र जप करें, फिर क्रमशः प्रत्येक यक्षिणी से सम्बन्धित मंत्र का जप करना है.ऐसा ग्याराह  दिन तक नित्य करें.

मूल अष्ट यक्षिणी मंत्र-

॥ ॐ ऐं श्रीं अष्ट यक्षिणी सिद्धिं सिद्धिं देहि
नमः ॥

1-सुर सुन्दरी मंत्र-
॥ ॐ ऐं ह्रीं आगच्छ सुर सुन्दरी स्वाहा ॥

2-मनोहारिणी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ मनोहारी स्वाहा ॥

3-कनकावती मंत्र
॥ ॐ ह्रीं हूं रक्ष कर्मणि आगच्छ कनकावती स्वाहा ॥

4-कामेश्वरी मंत्र
॥ ॐ क्रीं कामेश्वरी वश्य प्रियाय क्रीं ॐ ॥

5-रति प्रिया मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ रति प्रिया स्वाहा ॥

6-पद्मिनी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ पद्मिनी स्वाहा ॥

7-नटी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं आगच्छ आगच्छ नटी स्वाहा ॥

8-अनुरागिणी मंत्र
॥ ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥

मंत्र जप समाप्ति पर साधक साधना कक्ष में ही सोयें। अगले दिन पुनः इसी प्रकार से साधना संपन्न करें, ग्याराह दिनो साधना सामग्री को जिस वस्त्र पर यंत्र बनाया है,उसिमे मे बाँधकर सुरक्षित रखे.
जब भी यक्षिणी से काम करवाना हो तब सिर्फ यह पूर्ण विधान एक दिन करे,असंभव कार्य भी संभव होगा.
इस साधना मे "पारद अष्टाक्ष गुटिका"का महत्व बहोत ज्यादा है,बिना गुटिका के साधना मे सफलता प्राप्त करना कठिन है,माला यंत्र नही भी हो तो ज्यादा फर्क नही पडेगा.आप चाहे तो बिना गुटिका के साधना करके देखिये तो आपको प्रमाण मिल ही जायेगा.क्युके मैने प्रत्येक बार अपने अनुभव से गोपनियता का खुलासा किया है जो प्रत्येक जानकार नही करता.

"पारद अष्टाक्ष गुटिका" निर्माण-

इस गुटिका के निर्माण के लिए जिस अष्ट
संस्कारित पारद का प्रयोग किया जाता है
उसके सभी संस्कार रसांकुश यक्ष और  यक्षिणी के मन्त्रों से होता है परन्तु ये मंत्र जप दीपनी क्रम युक्त होना चाहिए,तभी इस पारद में वो प्रभाव आएगा जो इस गुटिका के निर्माण के लिए अपेक्षित है.तत्पश्चात इसे स्वर्ण ग्रास दिया जाये और इसे मुक्ता पिष्टी के साथ खरल किया जाये,जब पारद के साथ उस पिष्टी का पूर्ण योग हो जाये तब उसे,चन्द्रिका नागक जडि रस,विशुद्ध ताम्रभस्म,सफेदधतूरे,सिंहिका,श्वेतार्क रस और ताम्बूल के स्वरस के साथ आठ घंटों तक खरल किया जाये,और खरल करते समय-

ॐ नमो आदेश गुरूजी को,सारा पारा भेद उजारा,देत ज्ञान का उजारा,दूर कर अँधियारा,शिव की शक्ति इसी घडी इसी पल आये,भीतर समाये,करे दूर अँधियारा जो ना करे तो शंकर को त्रिशूल ताडे,शक्ति को खडग गिरे,छू वाचापुरी ll

उपरोक्त मंत्र का जप करते जाये,जब भी रस सूखने लगे तो नया रस डालते जाये ,जब समयावधि पूर्ण हो जाये तो उस पिष्टी को सुखाकर शराव सम्पुट कर 2 पुट दे दे और स्वांग शीतल होने के बाद उस पिष्टी के साथ पुनः मनमालिनी मंत्र का जप करते हुए उस पिष्टी का 10 वा भाग पारद डालकर खरल करे और मूष में रख कर गरम करे और धीरे धीरे विल्वरस का चोया देते जाये,लगभग 10 गुना रस धीरे धीरे
चोया देते हुए शुष्क कर ले.अब आप इसे
पिघलाकर गुटिका का आकार दे दे,इस क्रिया में पारद अग्निस्थायी हो जाता है और गुटिका हलके श्वेत वर्ण की बनती है जो पूर्ण दैदीप्य मान होती है.यदि पारद
अग्निसह्य नहीं हुआ तो क्रिया असफल
समझो.इस गुटिका को सामने रख पुनः 3 घंटों तक रसांकुश मन्त्रों का दीपनी क्रिया के साथ जप करो और गोरख मन मुद्रा का
प्रदर्शन करो.तथा इसके बाद प्राण प्रतिष्ठा
मन्त्रों से इसे प्रतिष्ठित कर इसमें 64 यक्षिणी का स्थापन कर दो,फिर षोडशोपचार पूजन कर उस पर आप मनोवांछित यक्षिणीसिद्धी प्रयोग कर सकते हैं.इसे शिवचक्षु मंत्र से यदि 11 माला मंत्र कर सिद्ध कर लिया जाये और पूजन स्थल पर स्थापित कर दिया जाये तो ये गुटिका यक्षिणी को बाँध देती है जिससे व्यक्ति को पूर्ण सफलता की प्राप्ति होती ही है और यह आठो यक्षिणी मंत्र शिव जी ने किलित किये हुए है,जिनका किलन गुटिका के प्रभाव से समाप्त होता है और इसके लिये कोई विशेष किलन मुक्ती विधान करने की आवश्यकता नही है.

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