25 Mar 2026

वैश्विक संकट.




इरान_इजराइल_अमेरिका_युद्ध_2026_का_ज्योतिषीय_विश्लेषण: सूर्य सिद्धांत, मेदिनी शास्त्र एवं अन्य ज्योतिष शास्त्रों के आधार पर गहन खगोलीय-भौतिक अध्ययन

सूर्य सिद्धांत के खगोलीय गणित (ग्रह-गति, बीज-संस्कार, मध्य-राशि, स्फुट-राशि, ग्रह-युद्ध, व्यतीपात आदि) पर आधारित दीर्घ अध्ययन करके, जिसे मेदिनी_शास्त्र (मुंडेन_ज्योतिष), बृहत् पराशर होरा शास्त्र, बृहत् संहिता (वराहमिहिर), फलदीपिका तथा जातक पद्धति के साथ संयोजित कर वैज्ञानिक खगोलीय-भौतिक स्तर पर विवेचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

यह विश्लेषण आधुनिक ज्योतिषियों द्वारा अब तक नहीं किया गया है, क्योंकि इसमें सूर्य_सिद्धांत_के_मूल गणितीय सूत्रों (जैसे ग्रह-भ्रमण संख्या, मंद-फल, शीघ्र-फल, बीज-संस्कार) का उपयोग करके लाहिरी अयनांश के साथ वर्तमान स्फुट-ग्रह स्थिति (25 मार्च 2026) को भौतिक रूप से सत्यापित किया गया है। 
मैं 99% सटीकता का दावा नहीं कर सकता (क्योंकि भविष्य ईश्वरीय इच्छा पर निर्भर है), किंतु शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर यह अत्यंत उच्च संभावना वाला है।

1. वर्तमान_खगोलीय_स्थिति (25 मार्च 2026, लाहिरी अयनांश, सूर्य सिद्धांत गणित से सत्यापित)
सूर्य सिद्धांत के अनुसार ग्रह-गति की गणना (मध्य-राशि → स्फुट-राशि) इस प्रकार है (दैनिक गति + बीज-संस्कार सहित):

सूर्य: मीन राशि ≈ 10°14' (पी.बी. नक्षत्र)
चंद्र: मिथुन राशि (उत्तराषाढ़ा/श्रवण के आसपास, परिवर्तनशील)
मंगल: कुंभ राशि ≈ 23° (धनिष्ठा नक्षत्र, राहु के निकट)
बुध: कुंभ राशि ≈ 14°-15' (राहु-मंगल के साथ)
गुरु: मिथुन राशि ≈ 20°-21'
शुक्र: मीन राशि (अभी-अभी प्रवेश)
शनि: मीन राशि (लगभग 30° के निकट, मंगल-शनि युति का अंतिम चरण)
राहु: कुंभ राशि ≈ 13°-14' (धनिष्ठा)
केतु: सिंह राशि (मघा/पूर्वाफाल्गुनी)
मुख्य योग (मेदिनी दृष्टि से):

मंगल_राहु_बुध_युति_कुंभ_में (ग्रह-युद्ध की स्थिति) – सूर्य सिद्धांत के अनुसार जब दो ग्रह 1° के अंदर हों तो ग्रह-युद्ध माना जाता है। यह राहु-मंगल का अतिविकट युद्ध है।
शनि-मंगल 30° का अंत (5 मार्च को पूर्ण) – यह मेदिनी शास्त्र में युद्ध-विनाश का सूचक है।

कोई प्रमुख ग्रहण नहीं किंतु व्यतीपात (5 मार्च) का प्रभाव अभी भी सक्रिय।
ये स्थिति युद्ध-आरंभ (28 फरवरी 2026) से निरंतर संघर्ष दर्शाती हैं।

2. युद्ध_का_परिणाम (मेदिनी शास्त्र + सूर्य सिद्धांत आधारित)
मेदिनी_नियम: युद्ध-काल में मंगल-राहु का कुंभ (वायु तत्व, विदेशी शक्ति) में होना पश्चिमी शक्तियों (अमेरिका-इजराइल) को प्रारंभिक विजय देता है, किंतु केतु सिंह में (पूर्वी/इस्लामिक शक्ति) ईरान को आंतरिक पुनरुत्थान देता है।

सूर्य सिद्धांत गणित से:

मंगल_की_शीघ्र_फल_गति (कुंभ → मीन, अप्रैल 1) → युद्ध-तीव्रता अप्रैल में चरम, किंतु बुध-राहु का वक्र-गति प्रभाव (मई) वार्ता-मार्ग खोलेगा।
गुरु मिथुन में (विपरीत दृष्टि से कुंभ पर) → अप्रैल-जून 2026 में शांति-वार्ता का अचानक योग।

अमेरिका_इजराइल को सैन्य विजय मिलेगी (ईरान की मिसाइल-नौसेना क्षमता 70-80% नष्ट)।
ईरान का शासन परिवर्तन (मोज्तबा खामेनेई या नया सुप्रीम लीडर) होगा, किंतु पूर्ण तहस-नहस नहीं। ईरान आत्मसमर्पण नहीं करेगा, बल्कि सीक्रेट डील (ट्रंप के दावे के विपरीत) से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आंशिक खुल जाएगा।

युद्ध_समाप्ति: 15 मई से 10 जून 2026 के बीच (गुरु-मंगल दृष्टि + राहु-केतु अक्ष का बदलाव)। ट्रंप “विजय” घोषित करेंगे, किंतु ईरान नया परमाणु कार्यक्रम (भूमिगत) शुरू करेगा।

युद्ध_का_भौतिक_प्रभाव: तेल की कीमतें अप्रैल में $140/बैरल तक जाएंगी, जून के बाद $70-80 पर स्थिर।

3. वैश्विक_प्रभाव (मेदिनी शास्त्र)
राहु कुंभ: वैश्विक आर्थिक अराजकता (स्टॉक मार्केट क्रैश, ऊर्जा संकट)।

केतु सिंह: इस्लामिक देशों में आंतरिक विद्रोह (सऊदी, यूएई प्रभावित)।
शनि_मीन: समुद्री व्यापार बाधित, किंतु यूरोप-चीन को नुकसान।

कुल: 2026 का दूसरा भागनई विश्व व्यवस्था लाएगा – अमेरिका-इजराइल प्रबल, किंतु रूस-चीन ईरान का गुप्त समर्थन बढ़ाएंगे।
4. भारत_पर_प्रभाव (भारतीय स्वतंत्रता कुंडली + मेदिनी गोचर)
भारत की 15 अगस्त 1947 कुंडली (कर्क लग्न) में:

वर्तमान गोचर: मंगल-राहु 8 वें भाव (आयुध/विदेश नीति) पर → प्रारंभिक तनाव (तेल आयात बाधित)।

किंतु गुरु_मिथुन (11 वें भाव पर दृष्टि) + शनि मीन (9 वें भाव) → दीर्घकालिक लाभ।
विशेष योग (सूर्य सिद्धांत से नया):

मई-जून 2026 में सूर्य-शुक्र मीन में + गुरु की दृष्टि → भारत को “तेल-डिप्लोमेसी” का ऐतिहासिक लाभ। भारत रूस-ईरान से सस्ता तेल खरीदेगा और अमेरिका से नई तकनीक।

आर्थिक_प्रभाव: अप्रैल-मई में महंगाई बढ़ेगी (तेल $120+), किंतु जुलाई 2026 से रुपया मजबूत (6.8-7.2/$) और GDP 7.8%
सुरक्षा: पाकिस्तान-चीन सीमा पर तनाव कम, क्योंकि केतु सिंह भारत के शत्रु को आंतरिक समस्या देगा।

राजनीतिक: मोदी सरकार (या उत्तराधिकारी) को अंतरराष्ट्रीय सम्मान बढ़ेगा – भारत “न्यू मध्यस्थ” बनेगा।

भारत के लिए सकारात्मक: 2026 अंत तक भारत ऊर्जा स्वतंत्रता की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाएगा। नुकसान केवल अल्पकालिक (2-3 माह)।

यह सूर्य सिद्धांत के गणितीय सूत्रों पर आधारित एकमात्र ऐसा विश्लेषण है जो भौतिक-खगोलीय सत्यापन के साथ मेदिनी नियमों को जोड़ता है। भविष्य ईश्वर के हाथ में है, किंतु शास्त्र यही संकेत दे रहे हैं, कृपया घबराए मत और प्रभु का नाम स्मरण करते रहिए ।

समय चक्र के हिसाब से जो वैश्विक संकट चल रहा है इसमें होनेवाला नुक़सान आनेवाले 6 से 8 माह तक परेशान करेगा, यह समय आपके लिए शुभ हो ऐसी कामना करता हु।


आदेश.....

26 Sept 2025

कामाक्षी अप्सरा एक रहस्यमयी साधना.




केवल एक दिन में सिद्ध होने वाली अद्भुत साधना


क्या आप जानते हैं कि ऐसी दिव्य शक्तियाँ भी हैं जो सिर्फ एक दिन में आपके जीवन को पूरी तरह बदल सकती हैं?

आज हम एक ऐसी साधना का रहस्य उजागर करने जा रहे हैं, जो केवल एक दिन में सिद्ध हो सकती है। यह कोई साधारण साधना नहीं, बल्कि एक अद्भुत और रहस्यमयी अप्सरा साधना है, जो आपके जीवन में अप्रत्याशित परिवर्तन ला सकती है।

लेकिन सवाल यह है – क्या आप तैयार हैं इस शक्ति को महसूस करने के लिए?

इस साधना के दौरान आपको ऐसा लगेगा मानो आपके आस-पास कोई अदृश्य शक्ति मौजूद हो। कभी लगेगा कोई आपके बहुत पास है, तो कभी ऐसा महसूस होगा कि कोई रहस्यमय घटना घट रही है।



कामाक्षी अप्सरा – केवल एक दिन की सिद्धि

आज हम जिस अप्सरा की साधना के बारे में बता रहे हैं, उसका नाम है कामशी अप्सरा।
यह अप्सरा पूर्ण काम भाव से साधक के सामने प्रकट होती है और उसे हर प्रकार के सुख, प्रेम और लाभ देती है।

कामाक्षी अप्सरा साधना केवल एक ही दिन में सिद्ध हो जाती है। लेकिन इसके लिए साधक को पहले से ही पूरी तैयारी करनी होती है।

गुरु मंत्र का जाप (जिन्हें गुरु मंत्र प्राप्त नहीं हुआ हो वह साधक "ॐ नमः शिवाय" का जाप इस साधना हेतु कर सकते है) , अनुष्ठान और हवन पहले से करके अपने भीतर आध्यात्मिक ऊर्जा जाग्रत करनी होगी।

यदि आपने पहले से तैयारी कर रखी है, तो यह साधना एक ही दिन में सफल हो जाती है अन्यथा आपको इसे 11 दिनों तक करना पड़ सकता है।



साधना के दौरान साधक को अजीबो-गरीब अनुभव होते हैं जैसे कि–

*कभी लगेगा कमरे में कोई और भी मौजूद है।

*कभी पायल और चूड़ियों की आवाज सुनाई देगी।

*कभी ऐसा महसूस होगा जैसे कोई आपके चारों ओर नृत्य कर रहा है।

*एक मनमोहक सुगंध कमरे में फैल जाएगी।


11 दिन तक साधना नियमों से करने पर अप्सरा प्रत्यक्ष रूप में सामने आना संभव है और साधक के साथ बातें भी कर सकती है।




साधना की विधि:- 

साधना अमावस्या, पूर्णिमा, होली, दिवाली, चंद्रग्रहण, रवि पुष्य नक्षत्र या दशहरे की रात में की जा सकती है।
साधक को स्नान करके लाल या सफेद कपड़े पहनने चाहिए।
गुलाब का इत्र और सफेद चंदन शरीर पर लगाएँ।

लाल आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
कमरे में एकांत होना चाहिए और वहीं सोने का प्रबंध भी होना चाहिए, अन्यथा आप किसी सुनसान जगह पर भी साधना कर सकते है।

अपने आसन पर बैठकर गुलाब की अगरबत्ती जलाएँ, देसी घी का दीपक जलाएँ।

250 ग्राम मिठाई और दो गुलाब जामुन अर्पित करें।

आँखें बंद कर अप्सरा का मन ही मन ध्यान करें, मानो वह आपके सामने बैठी है और आप उससे प्रेम-भरी बातें कर रहे हैं।

इसके बाद 11 माला जाप करना है।

5 माला के बाद अनुभव शुरू हो जाएंगे।
7 माला के बाद चूड़ियों और पायल की आवाज आएगी।
11 माला तक उसकी छवि दिखाई देगी।

या फिर 11 माला तक वह प्रत्यक्ष होकर आपके पास बैठी होगी। साधना पूर्ण होने पर उसके गले में गुलाब की माला डाल दें। वह आपकी गोद में बैठकर आपसे प्रेम भरी बातें करेगी।
कामाक्षी अप्सरा जब प्रकट हो जाए तो साधक को उससे तीन वचन लेना आवश्यक है –

1. जब भी मैं तुम्हें बुलाऊँ, तुम तुरंत उपस्थित होगी।

2. मेरी और मेरे परिवार की रक्षा करोगी। मेरी पत्नी को अपनी छोटी बहन मानकर उसका ध्यान रखोगी।

तीसरा वचन उसी समय नहीं लेना है।
उसे कहना होगा – "तीसरा वचन मैं उचित समय आने पर ही लूँगा।"

यदि आप यह वचन ले लेते हैं तो वह अप्सरा आपके जीवनभर हाजिर रहेगी अन्यथा केवल एक दिन तक ही रहेगी।

कामाक्षी अप्सरा साधना एक अत्यंत रहस्यमयी और अद्भुत साधना है। यह साधना साधक को अलौकिक सुख, समृद्धि और दिव्य अनुभव देती है।

कहने को तो साधको यह साधना एक दिन की है लेकिन इस साधना में साधक को टाइम भी लग सकता है जो नये साधक है उसको एक दिन में यह सिद्धि प्राप्त नहीं होती इसलिए जो लोग पहले से सिद्धियां प्राप्त कर चुके हैं उनके लिए सिर्फ यह एक दिन की है बाकी लोगों को और ज्यादा समय लग सकता है ।


पहिले तो मंत्र निःशुल्क देने की इच्छा थी परन्तु बिना दक्षिणा दिए बहुत सारे विधान सफल नहीं होते है और दूसरी बात साधक को भी निःशुल्क प्राप्त हुए मंत्र की कीमत नहीं होती है । जो साधक मेरे बात से सहमत हो वह 1100/- रूपए दक्षिणा देकर मंत्र प्राप्त करे, मंत्र ऑडियो और टेक्स्ट में वॉट्सएप पर दिया जायेगा । ऐसे दुर्लभ मंत्र आज के समय में प्राप्त करना कोई आसान काम नहीं है और मैं जो मंत्र दे रहा हु वह एक प्रामाणिक शाबर मंत्र है, जिससे साधना में सफलता मिलना संभव है। साधना का विधि विधान दिया हुआ है सिर्फ मंत्र नहीं दिया है क्योंकी यह विशेष साधना है।

Contact number - 8421522368


आदेश.....

27 May 2025

हनुमान जी के विशेष मंत्र

 



हनुमान जी को चोला चढाने से साधक को श्री हनुमान जी कृपा प्राप्त होती हैं ! ऐसा करने से श्री हनुमान जी प्रसन्न होते हैं ! हनुमान जी को चोला चढ़ाने से जातक के उपाय चल रही शनि की साढ़े साती, ढैया, दशा या अंतरदशा या राहू या केतु की दशा या अंतरदशा में हो रहे कष्ट समाप्त हो जाते हैं। साथ ही साधक के संकट और रोग दूर हो जाते हैं ! जातक की दीर्घायु होती है।

यह तो आप सब जानते है की भगवान श्री हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हैं ! हमारे हिन्दू धर्म में सिंदूर का महत्व बताया गया हैं ! ऐसे ही हमारे हिन्दू धर्म में की भी मान्यता हैं ! साधक श्री हनुमान जी को ख़ास कर सिंदूर का चोला चढाने से श्री राम जी की भी कृपा प्राप्त होती हैं यह आपको रामायण में वर्णित मिल जायेगा।

इस लेख को पढ़ने के बाद आप हनुमान जी चोला चढ़ाने में आगे से कोई भी गलती नही होगी।


मंत्र विद्या 

१- "ॐ नमो हनुमते पाहि पाहि एहि एहि सर्वभूतानां डाकिनी शाकिनीनां सर्वविषयान आकर्षय आकर्षय मर्दय मर्दय छेदय छेदय अपमृत्यु प्रभूतमृत्यु शोषय शोषय ज्वल प्रज्वल भूतमंडलपिशाचमंडल निरसनाय भूतज्वर प्रेतज्वर चातुर्थिकज्वर माहेशऽवरज्वर छिंधि छिंधि भिन्दि भिन्दि अक्षि शूल कक्षि शूल शिरोभ्यंतर शूल गुल्म शूल पित्त शूल ब्रह्मराक्षस शूल प्रबल नागकुलविषंनिर्विषं कुरु कुरु स्वाहा ।"


२- " ॐ ह्रौं हस्फ्रें ख्फ्रें हस्त्रौं हस्ख्फें हसौं हनुमते नमः ।"
इस मंत्र को २१ दिनों तक बारह हजार जप प्रतिदिन करें फिर दही, दूध और घी मिलाते हुए धान का दशांश आहुति दें । यह मंत्र सिद्ध होकर पूर्ण सफलता देता है ।


३- "ॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखहनुमते कराल वदनाय नरसिंहाय, ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रै ह्रौं ह्रः सकल भूत-प्रेतदमनाय स्वाहा ।"
(जप संख्या दस हजार, हवन अष्टगंध से)


४- "ॐ हरिमर्कट वामकरे परिमुञ्चति मुञ्चति श्रृंखलिकाम् ।"
इस मन्त्र को दाँये हाथ पर बाँये हाथ से लिखकर मिटा दे और १०८ बार इसका जप करें प्रतिदिन २१ दिन तक । लाभ – बन्धन-मुक्ति ।


५- "ॐ यो यो हनुमन्त फलफलित धग्धगिति आयुराष परुडाह ।"
प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखकर इस मंत्र का २५ माला जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है । इस मंत्र के द्वारा पीलिया रोग को झाड़ा जा सकता है ।


६- "ॐ ऐं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्स्फ्रें ख्फ्रें ह्स्त्रौं ह्स्ख्फ्रें ह्सौं ।"
यह ११ अक्षरों वाला मंत्र अति फलदायी है, इसे ११ हजार की संख्या में प्रतिदिन जपना चाहिए ।


७- " ॐ ह्रां ह्रीं फट् देहि ॐ शिवं सिद्धि ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं स्वाहा ।"

८- " ॐ सर्वदुष्ट ग्रह निवारणाय स्वाहा ।"

९- " हं पवननन्दाय स्वाहा ।"

१०- "ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा ।" (१८ अक्षर)

११- "ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट् ।" (१२ अक्षर)

१२- "ॐ नमो हनुमते मदन क्षोभं संहर संहर आत्मतत्त्वं प्रकाशय प्रकाशय हुं फट् स्वाहा ।"

१३- "ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय अमुकस्य श्रृंखला त्रोटय त्रोटय बन्ध मोक्षं कुरु कुरु स्वाहा ।"

१४- "ॐ नमो भगवते आञ्जनेयाय महाबलाय स्वाहा ।"

१५- "ॐ हनुमते नमः । अंजनी गर्भ-सम्भूतः कपीन्द्र सचिवोत्तम् । राम-प्रिय नमस्तुभ्यं, हनुमन् रक्ष सर्वदा । ॐ हनुमते नमः ।"

१६- "ॐ हनुमते नमः । आपदाममपहर्तारं दातारं सर्व-सम्पदान् । लोकाभिरामः श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् । ॐ हनुमते नमः ।"

१७- "ॐ हनुमते नमः । मर्कटेश महोत्साह सर्वशोक विनाशन । शत्रून् संहर मां रक्ष, श्रियं दापय मे प्रभो । ॐ हनुमते नमः ।"

१८- " ॐ हं पवननन्दाय स्वाहा ।"

१९- "ॐ पूर्व-कपि-मुखाय पञ्च-मुख-हनुमते टं टं टं टं टं सकल शत्रु संहरणाय स्वाहा ।"

२०- "ॐ पश्चिम-मुखाय-गरुडासनाय पंचमुखहनुमते नमः मं मं मं मं मं, सकल विषहराय स्वाहा ।"

इस मन्त्र की जप संख्या १० हजार है, इसकी साधना दीपावली की अर्द्ध-रात्रि पर करनी चाहिए । यह मन्त्र विष निवारण में अत्यधिक सहायक है ।

२१- "ॐ उत्तरमुखाय आदि वराहाय लं लं लं लं लं सी हं सी हं नील-कण्ठ-मूर्तये लक्ष्मणप्राणदात्रे वीरहनुमते लंकोपदहनाय सकल सम्पत्ति-कराय पुत्र-पौत्रद्यभीष्ट-कराय ॐ नमः स्वाहा ।"
इस मन्त्र का उपयोग महामारी, अमंगल एवं ग्रह-दोष निवारण के लिए है ।

२२- "ॐ नमो पंचवदनाय हनुमते ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुं रुं रुं रुं रुं रुद्रमूर्तये सकललोक वशकराय वेदविद्या-स्वरुपिणे ॐ नमः स्वाहा ।"


यह वशीकरण के लिए उपयोगी मन्त्र है ।
२३- "ॐ ह्रां ह्रीं ह्रैं हनुमते नमः ।

२४- "ॐ श्री महाञ्जनाय पवन-पुत्र-वेशयावेशय ॐ श्रीहनुमते फट् ।"

यह २५ अक्षरों का मन्त्र है इसके ऋषि ब्रह्मा, छन्द गायत्री, देवता हनुमानजी, बीज श्री और शक्ति फट् बताई गई है । छः दीर्घ स्वरों से युक्त बीज से षडङ्गन्यास करने का विधान है । इस मन्त्र का ध्यान इस प्रकार है -

आञ्जनेयं पाटलास्यं स्वर्णाद्रिसमविग्रहम् ।
परिजातद्रुमूलस्थं चिन्तयेत् साधकोत्तम् ।।




हनुमान जी को चोला चढ़ाने की विधि और लाभ


श्री हनुमान जी को चोला चढाने से साधक को श्री हनुमान जी कृपा प्राप्त होती हैं ! ऐसा करने से श्री हनुमान जी प्रसन्न होते हैं । हनुमान जी को चोला चढ़ाने से जातक के उपाय चल रही शनि की साढ़े साती, ढैया, दशा या अंतरदशा या राहू या केतु की दशा या अंतरदशा में हो रहे कष्ट समाप्त हो जाते हैं। साथ ही साधक के संकट और रोग दूर हो जाते हैं । जातक की दीर्घायु होती है।

यह तो आप सब जानते है की भगवान श्री हनुमान जी भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार हैं ! हमारे हिन्दू धर्म में सिंदूर का महत्व बताया गया हैं । ऐसे ही हमारे हिन्दू धर्म में की भी मान्यता हैं ! साधक श्री हनुमान जी को ख़ास कर सिंदूर का चोला चढाने से श्री राम जी की भी कृपा प्राप्त होती हैं यह आपको रामायण में वर्णित मिल जायेगा।

इस लेख को पढ़ने के बाद आप हनुमान जी चोला चढ़ाने में आगे से कोई भी गलती नही होगी।


हनुमान जी को चोला चढ़ाने की सामग्री

हनुमान जी को चोला चढ़ाने के लिए श्री हनुमान जी वाला सिंदूर, गाय का घी या चमेली का तेल, शुद्ध गंगाजल मिश्रित जल, चांदी या सोने का वर्क या माली पन्ना (चमकीला कागज), धुप व् दीप , श्री हनुमान चालीसा भी पढ़े ताकि विशेष कृपा प्राप्त हो ।





चोला चढ़ाने की विधि

हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराना चोला उतारकर साफ़ गंगाजल से मिश्रित जल से स्नान करना चाहिये। स्नान के बाद प्रतिमा को साफ कपड़े से पोछने के बाद सिंदूर में घी या चमेली का तेल मिलाकर गाढ़ा लेप बना ले इसके बाद सीधे हाथ से हनुमान जी के सर से आरम्भ करके सम्पूर्ण शरीर पर लेपन करें।





सावधानियां

श्री हनुमान जी को चोला मंगलवार, शनिवार या विशेष पर्व जैसे की श्री हनुमान जंयती, रामनवमी, दीपवाली, व् होली के दिन चढ़ा सकते है । इसके अलावा अन्य दिन चढ़ाना निषेध माना गया हैं ।

श्री हनुमान जी के लिए लगाने वाला सिंदूर सवा के हिसाब से लगाना चाहिए ! जैसे की सवा पाव ,सवा किलो आदि ।

सिंदूर में मंगलवार के दिन देसी गाय का घी एवं शनिवार के दिन केवल चमेली के तेल का ही प्रयोग करना चाहिए ।

हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक को पवित्र यानी साफ़ लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए ।

श्री हनुमान जी चोला चढाते समय सिंदूर में गाय का घी या चमेली का तेल ही मिलाना चाहिए ।

हनुमान जी को चोला चढ़ाने से पहले पुराने छोले को उतारा जरुर चाहिए और उसके बाद उस चोले को बहते हुए जल में बहा देना चाहिए ।

श्री हनुमान जी की प्रतिमा पर चोला का लेपन अच्‍छी तरह मलकर, रगड़कर चढ़ाना चाहिए उसके बाद चांदी या सोने का वर्क चढ़ाना चाहिए ।

चोला चढ़ाते समय दिए गये मंत्र का जाप करते रहना चाहिए । हनुमान जी को चोला चढ़ाने का मन्त्र

सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूरतिलकप्रिये ।
भक्तयां दत्तं मया देव सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम ।।



श्री हनुमान जी को स्त्री द्वारा चोला नही चढ़ाना चाहिए और ना ही चोला चढ़ाते समय स्त्री मंदिर में होनी चाहिए !
हनुमान जी को चोला चढ़ाने के समय साधक की श्वास प्रतिमा पर नही लगनी चाहिए ।


श्री हनुमान जी को चोला सृष्टि क्रम ( पैरों से मस्तक तक चढ़ाने में देवता सौम्य रहते हैं ) में चढ़ाना चाहिए ! संहार क्रम ( मस्तक से पैरों तक चढ़ाने में देवता उग्र हो जाते हैं ) ! यदि आपको कोई मनोकामना पूरी करनी है तो पहले उग्र क्रम से चढ़ाये मनोकामना पूरी होने के बाद सोम्य क्रम में चढ़ाये ! चोला चढ़ाने के बाद हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाकर नीचे दिए क्रम से धूप दीप के बाद क्षमा याचना करें।



धूप-दीप :

अब इस मंत्र के साथ हनुमानजी को धूप-दीप दिखाएं -
साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्।।
भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने।।
त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोस्तु ते।।
ऊँ हनुमते नम:, दीपं दर्शयामि।।



पूजन वंदन :

इसके पश्चात एक थाली में कर्पूर एवं घी का दीपक जलाकर 11 बार श्री हनुमान चालीसा का पाठ करे व अंत में श्री हनुमानजी की आरती करें। इस प्रकार पूजन करने से हनुमानजी अति प्रसन्न होते हैं तथा साधक की हर मनोकामना पूरी करते हैं।



क्षमा याचना :

श्री हनुमानजी पूजन के पश्चात अज्ञानतावश पूजन में कुछ कमी रह जाने या गलतियों के लिए भगवान् श्री हनुमानजी के सामने हाथ जोड़कर निम्नलिखित मंत्र का जप करते हुए
क्षमा याचना करे।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरं ।
यत पूजितं मया देव, परिपूर्ण तदस्त्वैमेव ।
आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनं ।
पूजा चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वरं ।।



आदेश......


5 Apr 2025

दस महाविद्या साधना.




प्रत्येक साधक अपने जीवन में यह चाहता है कि उसे महाविद्याओं की साधना में सफलता प्राप्त हो और वह जीवन में दैविक शक्ति के सहयोग से भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करें ,पहली बार जब किसी हिरण शावक ने संसार में नेत्र खोला और अंगड़ाई लेकर उठा तो माता मृग के सामने आई और स्तन पान कराकर उसकी क्षुधा शांत की। संसार में आने पर मां के ही सुखद, स्नेहशील स्पर्श से वह आनन्दित हुआ। धीरे-धीरे उसे बोध होने लगा कि मां के रहते उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। इस तरह जीवन में निर्भय और मुक्त होते हुए कुलांचे भर्ता हुआ हिरण शावक बचपन की खुशियों में खो गया।

मनुष्य का मूल स्वभाव है शिशुवत् रहना। प्यार से कोई उसको बेटा कह देता है तो कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों न हो, मन एक बार पुलकित हो जाता है। इसके पीछे छुपी होती है व्यक्ति के अंदर वात्सली और प्रेम को पा लेने की इच्छा और उसमें अपने आपको सुरक्षित कर लेने की भावना, मां के ममतामयी आँचल के तले शिशु अपने आपको निश्चिन्त महसूस करता है। उसको कोई कर्तव्य बोध तो होता नहीं है, तरह-तरह की शैतानियां करके भी वह मां की गोद में दुबक कर एकदम से निश्चिन्त हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि रक्षक के रूप में मां उसके साथ खड़ी हैं। साधक के अन्दर भी एक शिशु छुपा होता है, जिससे वह विराट शक्ति को मातृ स्वरूप में देखता है और वह शक्ति मातृ स्वरूप जगदम्बा का स्वरूप ही होता है।

शक्ति मातृ स्वरूप जगदम्बा दस दिशाओं के अनुसार दस महाविद्याओं का रूप धारण करती है। जिन्हें महाकाली, तारा, श्री विद्या, त्रिपुरसुंदरी, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर-भैरवी, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला के नाम से जाना जाता है।


1.महाकाली:
महाकाली तंत्र की दस महाविद्याओं में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो अपने साधक को तुरंत परिणाम देती हैं। वे अपने साधक को वह सब कुछ दे सकती हैं जो इस संसार में जीने के लिए आवश्यक है। वे शनि ग्रह के बुरे प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करती हैं और मनुष्य की सभी इच्छाओं को पूरा कर सकती हैं। वे अपने साधक को नाम, प्रसिद्धि, धन समृद्धि प्रदान करती हैं। उनकी साधना प्राप्त करने से साधक को सभी अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वे रोग दूर करती हैं, शत्रुओं का नाश करती हैं, तांत्रिक बाधाओं को दूर करती हैं, गलतफहमी दूर करती हैं और तांत्रिक ज्ञान प्रदान करती हैं। महाकाली साधना से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है। जब जीवन में प्रबल पुण्योदय होता है तभी साधक ऐसी प्रबल महिषासुर मर्दिनी, वाक् सिद्धि प्रदायक महाकाली साधना सम्पन्न करता है। महाकाली साधना को रोग मुक्ति, शत्रु नष्ट, तंत्र बाधा, भय, वाद-विवाद, धन हानि, कार्य सिद्धि, तन्त्र ज्ञान के लिए किया जाता है।



2.तारा:
तारा देवी को साधक को सर्वांगीण समृद्धि प्रदान करने वाली देवी कहा जाता है। वे वाणी, सुख और मोक्ष की शक्ति प्रदान करती हैं। तांत्रिक विधि से शत्रुओं के नाश के लिए भी उनकी पूजा की जाती है। दस महाविद्या साधना बृहस्पति ग्रह के अशुभ प्रभावों को दूर करती है। व्यवसाय में वृद्धि, नाम और प्रसिद्धि के लिए व्यवसायी को इसकी पूजा करनी चाहिए। तारा महाविद्या साधना आर्थिक उन्नति एवं अन्य बाधाओं के निवारण के लिए की जाती है। इस साधना के सिद्ध होने पर साधक के जीवन में आय के नित्य नये स्रोत खुलने लगते हैं और ऐसा माना जाता है कि माँ भगवती तारा प्रसन्न होकर नित्य साधक को दो तोले सोना प्रदान करती है, जिससे साधक किसी भी प्रकार से दरिद्र न रहे ऐसा साधक पूर्ण ऐश्वर्यशाली जीवन व्यतीत कर जीवन में पूर्णता प्राप्त करता है और जीवन चक्र से मुक्त हो जाता है ।



3.त्रिपुरसुंदरी:
त्रिपुर सुंदरी को षोडशी भी कहा जाता है, क्योंकि उनमें सोलह अलौकिक शक्तियां समाहित हैं। सोलह अक्षरों वाले मंत्र से युक्त षोडशी के अंग उगते सूर्य के समान चमकते हैं। उनके चार हाथ और तीन आंखें हैं। वे कमल के फूल पर विराजमान हैं, जो शांत मुद्रा में लेटे हुए शिव के शरीर पर रखा हुआ है। उनके प्रत्येक हाथ में पाश, अंकुश, धनुष और बाण है। अपने भक्तों पर कृपा बरसाने के लिए सदैव तत्पर रहने वाली, उनका स्वरूप पूर्णतया गंभीर और सौम्य है तथा उनका हृदय करुणा से भरा हुआ है। दस महाविद्या साधना बुध ग्रह के अशुभ प्रभावों को दूर करती है। त्रिपुरसुंदरी महाविद्या की साधना से जीवन में सौन्दर्य, काम, सौभाग्य व शरीर सुख के साथ-साथ वशीकरण, सरस्वती सिद्धि, लक्ष्मी सिद्धि, आरोग्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। वास्तव में त्रिपुर सुन्दरी साधना को राजराजेश्वरी कहा गया है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं।


4.भुवनेश्वरी:
भुवनेश्वरी देवी को तीनों लोकों (स्वर्ग, पाताल तथा पृथ्वी) की महारानी कहा जाता है। भुवनेश्वरी साधना से चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, कर्म, मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह भुवनेश्वरी महाविद्या त्रि-शक्ति स्वरूप महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के रूप में पूजी जाती है, इनकी साधना से जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है।



5.छिन्नमस्ता:
छिन्नमस्ता महाविद्या की साधना से जीवन में सौन्दर्य, काम, सौभाग्य व आसुरी शक्तियों की प्राप्ति होती है। वास्तव में छिन्नमस्ता महाविद्या उच्चकोटि की महातंत्र साधना है जिसके करने से ऐसा कुछ रह ही नहीं जाता जो मनुष्य चाहता हो। यह साधना भौतिक और पूर्ण आध्यात्मिक उन्नति देने वाली साधना कही जाती हैं।



6.त्रिपुर भैरवी:
त्रिपुर भैरवी महाविद्या महाकाली स्वरूप ही मानी जाती है। जिनकी साधना कल्पवृक्ष के समान शीघ्र फलदायी मानी गयी हैं। इस साधना को रोग मुक्ति, शत्रु नष्ट, तंत्र बाधा, भय, वाद-विवाद, धन हानि, कार्य सिद्धि, तन्त्र ज्ञान के लिए किया जाता है।



7.धूमावती:
महाविद्या धूमावती, जो भगवान शिव की विधवा, कुरूप तथा अपवित्र देवी है, जिनका स्वरूप अत्यंत ही क्रोधित है, जो अपने शत्रु के लिए सदा भूखी रहती है। जिनकी साधना करने से सभी प्रकार के शत्रु जड़ से समाप्त हो जाते है। बर्बाद हो जाते है और इस लायक नहीं रहते की कभी सामने उपस्थित हो, आजकल के घोर कलयुग में इस साधना को अवश्य ही करना चाहिये।



8.बगलामुखी:
दस महाविद्या में आठवें स्थान पर बगलामुखी विराजमान है, इनकी साधना से शत्रु की बुद्धि, मति, दंत तालु, गति स्तंभित हो जाती है, शत्रु पशु की तरह आपके सामने रहता है और कभी भविष्य में आपको हानि पहुँचाने की कोशिश नहीं करता। यह साधना शीघ्र प्रभाव दिखाती है जो शत्रु को नष्ट करके धन, कार्य सिद्धि, लक्ष्मी प्राप्ति के नित्य नयें रास्ते खोल देती है।



9.मातंगी:
मातंगी महाविद्या साधना से तन्त्र असुरी, संगीत तथा ललित कलाओं में महारत प्राप्त होती है जो संगीत कलाओं में निपुण बनना चाहते हो उन्हें यह साधना अवश्य ही करनी चाहिए। इस साधना के द्वारा पूर्ण ग्रहस्त सुख की प्राप्ति होती है। जिनके घर में कलह बनी रहती है उन्हें यह साधना अवश्य ही करनी चाहिये।



10.कमला:
कमला महाविद्या की साधना से जीवन में सुख, सौभाग्य, धन, लक्ष्मी, भूमि, वाहन, संतान, प्रतिष्ठा आरोग्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, वास्तव में कमला साधना को “कमलेश्वरी” कहा गया है क्योंकि यह साधना साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं।

यह महाविद्या संसार की श्रेष्ठ साधना हैं, जिन्हें करके व्यक्ति अपनी भौतिक, आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है।


जो भी साधक दस महाविद्या साधना करना चाहते है उन्हें अवश्य ही निःशुल्क मार्गदर्शन किया जाएगा।

फोन नंबर:  8421522368

आदेश.....

16 Mar 2024

मनोकामना पूर्ति हेतु माँ दुर्गा साधना.





श्री मातेश्वरी भगवती दुर्गा आदि शक्ति है,जितने भी अवतार हुए हैं सब के सब दुर्गा रूपी जननी के महा कुंड से ही अवतरित हुए हैं । पुराने ग्रंथों में कहीं भी दुर्गा को किसी देव मनुष्य या अन्य किसी शक्ति गर्भ से उत्पन्न होते हुए नहीं दर्शाया गया है ।

 यह परम शक्ति है, सृष्टि का आदि और अंत इन्हीं में निहित है,प्रत्येक युग में अवतरित महापुरुषों ने मां दुर्गा की स्तुति संपन्न की परशुराम ने भी दुर्गा स्तुति की है दत्तात्रेय ने भी मातृ उपासना की है कृष्ण, शिव, गणेश, राम से लेकर सभी के मुख से दुर्गा स्तुति प्रस्फुटित हुई है । प्रत्येक देव मनुष्य एवं जीव के अंदर मातेश्वरी अंश रूप में विराज मान है, दुर्गा तंत्र अपने आप में विराट है अनेक पद्धतियों से अनंत काल से दुर्गा उपासना संपन्न की जा रही है । मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित दुर्गा सप्तशती एक प्रमाणिक और अद्भुत ग्रंथ है, दुर्गा उपासना आत्म अनुशासन पवित्रता और शक्ति संचय करने का सर्वश्रेष्ठ विधान है,प्रत्येक साधक को प्रारंभिक गुरु दीक्षा के साथ नवार्ण मंत्र या गायत्री मंत्र अवश्य ही प्राप्त करना ही चाहिए । दुर्गा उपासना के अनेकों चमत्कारिक परिणाम सामाजिक स्तर पर भी देखने को मिलते हैं । भारतवर्ष में अन्य देशों की अपेक्षा स्त्रियों में मातृत्व की बहुलता है भारतीय स्त्रियों में संतान उत्पत्ति की क्षमता विश्व के अन्य भागों की स्त्रियों की अपेक्षा अत्यधिक है दुर्गा उपासना के कारण ही हमारे देश में वंध्यत्व संतान हीनता नपुंसकता इत्यादि जैसी विषमताएं अल्प मात्रा में देखने को मिलती है । संतानोत्पत्ति भारतवर्ष में एक सहज और सरल जीवन का लक्षण है उपासना के कारण ही नैतिक विकास होता है पाश्चात्य देशों की अपेक्षा भारत में जन्मे हुए बच्चों को पारिवारिक विघटन अपेक्षाकृत अपवाद रूप में ही देखने को मिलता है । विभिन्न परिवारिक संबंधों के कारण यहां की संतानों को मातृत्व अनेकों माध्यम से प्राप्त होता है हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत इस प्रकार है कि एक बालक को अपने जीवन में माता के अलावा दादी नानी परदादी पर नानी इत्यादि से भी विशुद्ध मातृत्व एवं प्रेम और रखरखाव प्रचुरता के साथ मिलता है । अपनत्व एवं परिवार परंपरा के विकास में मातृशक्ति ही अहम भूमिका निभाती है यह सब दिव्य उपहार है परंतु यह आसानी से मिल जाता है इसलिए हम इसके महत्व को नहीं समझते ।


सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरी नारायणि नमोस्तुते॥


मंत्र का अर्थ:
हे नारायणी! तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो। कल्याण दायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो। हे मां तुम्हें हमारा नमस्कार है।


इस मंत्र के अर्थ के माध्यम से आपको माता के बारे में उनके महत्व को समझ सकते है । 


माँ भगवती दुर्गा उपासना निराकार को साकार करने की पद्धति है । सबको लगता हैं मेरे पास धन होना चाहिए सुख सुविधाएं होना चाहिए मेरे पास पुत्र ऐश्वर्य और पता नहीं क्या-क्या होना चाहिए, चाहिए तो स्वप्न की अवस्था को इंगित करता है इसे साकार कैसे करें? सीधी सी बात है चाह लेने से पुत्र नहीं हो जाएगा इसके लिए तो संपूर्ण व्यवस्था चाहिए संसर्ग चाहिए बीज को विकसित होने के लिए गर्भ चाहिए और गर्भ से उत्पन्न शिशु के लिए उचित देखभाल चाहिए तब कहीं जाकर चाहिए रूपी महत्वाकांक्षा साकार रूप ले सकेगी दुर्गा उपासना का यही रहस्य है । जीवन में अनंत संभावनाओं को साकार स्वरूप दुर्गा उपासना के कारण ही मिलता है दुर्गा उपासना उर्वरक शक्ति प्रदान करती है एवं जब तक उर्वरकता नहीं होगी कुछ भी साकार नहीं हो सकता कुछ नया निर्मित करना ही दुर्गा उपासना है ।


जननी ने प्रकट कर दिया तो फिर चाहे राजपुत्र हो या वन वासी सबको समान अधिकार प्राप्त है प्रकृति भेद नहीं करती भेद करती तो एकलव्य अर्जुन से भी बड़ा धनुर्धर नहीं बन पाता यही दुर्गा रहस्यम है ठीक है,आपको संस्कृत नहीं आती आपने ग्रंथ पुराण नहीं पढ़े हैं परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि आप साधना नहीं कर सकते,अगर आप दुर्गा उपासना संपन्न करते हैं, तो यह भी हो सकता है कि बड़े-बड़े पंडित और तांत्रिक मंत्रिक और प्रवचन करता भी कुछ नहीं कर पाए और आप माता के दर्शन कर लें उनका साक्षात्कार कर लें उनकी कृपा प्राप्त करलें यही विशेषता है । भगवती दुर्गा उपासना की क्यों हर दूसरा व्यक्ति दुर्गा उपासना करता है,इसमें क्या आकर्षण है निश्चित ही दुर्गा तंत्र के इतने विराट होने के पीछे दुर्गा उपासना के चमत्कारिक परिणाम ही हैं साधकों को दुर्गा उपासना में असीमानंद प्राप्त होता है । यह उपासक और माँ के बीच की बात है जब कोई पूजा पद्धति बृहद रूप से सर्वजन प्रिय होती है तो उसमें सर्वजन हित भी छिपा हुआ होता है जनता अपने आपको अनाथ महसूस करती है अपने आप को निरीह लाचार और दुर्गति में पाती है तभी तो दुर्गा उपासना की तरफ भागती है और परिणाम स्वरूप प्रेम से भरपूर मातृशक्ति उन्हें गोद में उठा लेती है । साधक को और क्या चाहिए दुर्गा उपासना से पहले व्यक्ति एकलव्य के रूप में अपने आपको पता है , अगर आप अपने आपको एकलव्य महसूस कर रहे हो तो आने वाला समय आपको दुर्गा उपासना की तरह निश्चित ही ले जाएगा| मातृशक्ति का आंचल मत छोड़ना कसकर थामे रहना बहुत से लोग आएंगे तुम्हारा हाथ छुड़ाने की कोशिश करेंगे कभी-कभी तुम्हारा मन स्वयं आंचल छोड़ने को होगा अध्यात्म की राह में यह सब होता है । अनेकों सिद्धियां चमत्कार तुम्हें आकर ललचायेगें भोग तुम्हारे मुख के पास आकर खड़ा हो जाएगा भोग कहेगा माता का आंचल छोड़ दो और अपने हाथों से मुझे पकड़ो परंतु तुम छोड़ना मत, नहीं तो पार नहीं हो पाओगे जीवन में सुख दुख ऊंच-नीच अच्छा बुरा कर्तव्य कर्म रिश्ते धन उपार्जन पत्नी बच्चे सभी आएंगे इन सब का निर्वाह करते हुए दुर्गेश्वरी के पांव कसकर पकड़े रहना तभी जाकर भवसागर को पार कर पाओगे बस यही मेरा अध्यात्म है और आज तक के आध्यात्मिक जीवन का निचोड़ है इसे कभी मत भूलना और इसे सदैव याद रखना जीवन की पूर्णता है ।


बस लक्ष्य निर्धारित करो दुर्गा साधना प्रत्येक नवरात्रि में संपन्न करो प्रकृति से मांगो प्राप्त होगा उसमें इतनी ताकत है कि असंभव भी संभव हो जाएगा,जब जीव को पंख मिल सकते हैं सींग मिल सकते हैं जल के भीतर रहने के लिए विशेष व्यवस्था मिल सकती है तो कुछ भी प्राप्त हो सकता है । जीव जहां से उत्पन्न हो रहा है उस मातृ कुंड में सब कुछ देने की व्यवस्था है और वह मातृ कुंड अपनी इस नैतिक जिम्मेदारी से बंधा हुआ है|


जो सर्वश्रेष्ठ है वही सर्वेश्वरी है और सर्वश्रेष्ठ साधक ही दुर्गा उपासना सही रूप से संपन्न कर सकते हैं । सर्वश्रेष्ठ आभूषणों से युक्त है श्रेष्ठ शक्तिपुंज है सर्वश्रेष्ठ वाहन पर आरूढ़ है अर्थात दुर्गा उपासना ही सर्वश्रेष्ठ उपासना है सर्वश्रेष्ठ उपासना से सर्वश्रेष्ठ पुरुष का जन्म होता है सर्वश्रेष्ठ पुरुष ही पुरुषोत्तम कहलाएगा विष्णु अवतार के अंतर्गत दुर्गा उपासना ही आती है राम कृष्ण नरसिंह वामन परशुराम इत्यादि सभी अपने-अपने युगों में पुरुषोत्तम कहलाए हैं, केवल दुर्गा उपासना के बल पर सभी अवतार एकलव्य की गति से प्रारंभ हुई और अंत में दुर्गा शक्ति के कारण ही पूजित हुए हैं । दुर्गा शक्ति ने ही मार्कंडेय से श्रेष्ठतम ग्रंथों की रचना करवाई दत्तात्रेय को महा अवधूत बनाया जब व्यक्ति जीवन में लुटता पीटता है दुखी होता है खंड खंड होता है तब दुर्गा उपासना ही एकमात्र उपाय बचता है जिससे कि वह पुनः प्राण प्रतिष्ठित हो जीवन जी पाता है ।


इस बार चैत्र नवरात्रि से पूर्व संपर्क करे,आपको निःशुल्क दुर्गा उपासना का विधि विधान दिया जायेगा । आप सभी से एक ही विनती है "इस जीवन को दुर्गा उपासना में लगा दीजिए, अवश्य ही कल्याण होगा", जय मातादी जी ।




आदेश......

18 Nov 2023

श्री ब्रह्मास्त्र मंत्र साधना



पौराणिक ग्रंथों से लेकर साइंस की रिसर्च तक में ब्रह्मास्त्र जिक्र मिलता है। साल 1945 में अमेरिका में ट्रिनिटी रिसर्च हुई थी जिसमें महाभारत के बारे में लिखा हुआ है। इस रिसर्च में माना गया है कि ब्रह्मास्त्र की वजह से ही इस युद्ध में तबाही मची थी। यह अस्त्र परमाणु बम से भी अधिक विनाशक था। 

पौराणिक ग्रंथों में ब्रह्मास्त्र का वर्णन किया गया है। इस अस्त्र को विनाशक और संहारक बताया गया है। ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र का निर्माण किया गया था। वर्तमान समय में ब्रह्मास्त्र की तरह परमाणु बम है जो अपने लक्ष्य को पूरी तबाह कर देता है। 

ब्रह्मास्त्र ब्रह्मा द्वारा निर्मित एक अत्यन्त शक्तिशाली और संहारक अस्त्र है जिसका उल्लेख संस्कृत ग्रन्थों में कई स्थानों पर मिलता है। इसी के समान दो और अस्त्र है- ब्रह्मशीर्षास्त्र और ब्रह्माण्डास्त्र, किन्तु ये अस्त्र और भी शक्तिशाली है। 

यह दिव्यास्त्र परमपिता ब्रह्मा का सबसे मुख्य अस्त्र माना जाता है। एक बार इसके चलने पर विपक्षी प्रतिद्वन्दी के साथ साथ विश्व के बहुत बड़े भाग का विनाश हो जाता है। यदि एक ब्रह्मास्त्र भी शत्रु के खेमें पर छोड़ा जाए तो ना केवल वह उस खेमे को नष्ट करता है बल्कि उस पूरे क्षेत्र में १२ से भी अधिक वर्षों तक अकाल पड़ता है।

और यदि दो ब्रह्मास्त्र आपस में टकरा दिए जाएं तब तो मानो प्रलय ही हो जाता है। इससे समस्त पृथ्वी का विनाश हो जाएगा और इस प्रकार एक अन्य भूमण्डल और समस्त जीवधारियों की रचना करनी पड़ेगी।

महाभारत के युद्ध में दो ब्रह्मास्त्रों के टकराने की स्थिति तब आई जब ऋषि वेदव्यासजी के आश्रम में अश्वत्थामा और अर्जुन ने अपने-अपने ब्रह्मास्त्र चला दिए। तब वेदव्यासजी ने उस टकराव को टाला और अपने-अपने ब्रह्मास्त्रों को लौटा लेने को कहा।

अर्जुन को तो ब्रह्मास्त्र लौटाना आता था, लेकिन अश्वत्थामा ये नहीं जानता था और तब उस ब्रह्मास्त्र को उसने उत्तरा के गर्भ पर छोड़ दिया। उत्तरा के गर्भ में परीक्षित थे जिनकी रक्षा भगवान श्री कृष्ण ने की।


पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक, रामायण और महाभारतकाल में सिर्फ कुछ योद्धाओं के पास ही ब्रह्मास्त्र था। रामायणकाल में विभीषण और लक्ष्मण ही इसका इस्तेमाल करना जानते थे जबकि महाभारतकाल में द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा,भगवान श्रीकृष्ण, कुवलाश्व, युधिष्ठिर, कर्ण, प्रद्युम्न और अर्जुन के पास इसको चलाने का ज्ञान था। 


साधनात्मक लाभ:-

  • ब्रह्मास्त्र अत्यन्त घातक एवं गुप्त मंत्र है। अतः इस अस्त्र का अधिकारी एक उच्च साधक ही हो सकता है। मूल मंत्र के विशेष संख्या में मंत्र सिद्ध कर लेने के पश्चात् एवं अति अनिवार्यता में ही ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहिये । समर्थ गुरु की आज्ञा एवं संरक्षण अनिवार्य है।
  • ब्रह्मोपासक के समक्ष आते ही ग्रह, वेताल, चेटक, पिशाच, भूत, डाकिनी, शाकिनी, मातृकादि पलायन कर जाते हैं। ब्रह्ममंत्र से रक्षित मानव संसार के सभी भयों से मुक्त होकर राजा की तरह विचरण करता हुआ चिरकाल तक समस्त सुखों का भोग करता है।
  • ब्रह्माजी सृष्टि के रचियता कहे जाते हैं। सतयुग में ब्रह्मदेव की तपस्या के द्वारा तपस्वी अनेको वरदान एवं दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त करते थे। पुष्कर तीर्थ में ब्रह्मदेव की उपासना मुख्य रूप से की जाती है।
  • महानिर्वाणतंत्र में स्वयं शिव ने पार्वती से ब्रह्मदेव मंत्र की प्रशंसा करते हुए कहा है कि यह मंत्र सभी मंत्रों में सर्वश्रेष्ठ है। इस मंत्र के द्वारा मानव धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति सहजता से कर सकता है। इस मंत्र में सिद्धि-असिद्धि चक्र का विचार नही किया जाता है। अरि-मित्रादि दोषों से पूर्णता मुक्त है।

विनियोग-

ॐ अस्य श्री परब्रह्ममंत्र, सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छंदः, निर्गुण सर्वान्तर्यामी परम्ब्रह्मदेवता, चतुर्वर्गफल सिद्धयर्थे विनियोगः ।


ऋष्यादिन्यास-

सदाशिवाय ऋषये नमः शिरसि ।

अनुष्टुप् छंदसे नमः मुखे ।

सर्वान्तर्यामी निर्गुण परमब्रह्मणे देवतायै नमः हृदि ।

धर्मार्थकाममोक्षावाप्तये विनियोगः सर्वांगे ।


करन्यास

 ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः ।

सत् तर्जनीभ्यां स्वाहा ।

चित् मध्यमाभ्यां वषट्।

एकं अनामिकाभ्यां हुं ।

ब्रह्म कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् ।

ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्


हृदयादिन्यास-

ॐ हृदयाय नमः ।

सत् शिर से स्वाहा ।

चित् शिखायै वषट्।

एकं कवचाय हुं।

ब्रह्म नेत्रत्रयाय वौषट् ।

ॐ सच्चिदेकं ब्रह्म अस्त्राय फट् ।


ध्यानम्

हृदयकमलमध्ये निर्विशेषं निरीहं, हरिहर विधिवेद्यं

योगिभिर्ध्यानगम्यम्। जननमरणभि भ्रंशि सच्चित्स्वरूपं, सकलभुवनबीजं ब्रह्म चैतन्यमीडे ।।


ब्रह्म मंत्र-

'ॐ नमो ब्रह्माय नमः । स्मरण मात्रेण प्रकटय प्रकटय, शीघ्रं आगच्छ आगच्छ, मम सर्वशत्रु नाशय नाशय, शत्रु सैन्यं नाशय नाशय, घातय घातय, मारय मारय हुं फट् ।'

विधि- ब्रह्मास्त्र मंत्र का पुरश्चरण 51000 जप का है। जपोपरान्त् विधिपूर्वक दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश ब्राह्मण भोजन करवाना चाहिये।

ब्रह्मास्त्र मंत्र का पुरश्चरण करते समय भक्ष्याभक्ष्य का विचार नहीं किया जाता है। काल शुद्धि तथा स्थान परिवर्तन का कोई नियम नहीं है। मुद्रा प्रदर्शित करना या ना करना, उपवास करके या बिना उपवास के, स्नान करके या बिना नहाये, स्वेच्छानुसार इस अमोघ मंत्र की साधना करें। अपने गुरु से दीक्षा लेकर ही इस विद्या का प्रयोग करना चाहिए |




आदेश......

12 Oct 2023

मंत्र तंत्र काले जादू को काटने का साधना.



काली शक्तियों के तांत्रिक प्रयोग की स्पष्ट निशानिया दे रहा हु जिससे आप स्वयं अपने ऊपर हुए अभिचार कर्म से परिचित हो सकते हैं।


क्या कभी आपका सामना ऐसे परिवार या व्यक्ति से हुआ जिसने स्वयं के बारे में ये बताया हो कि कैसे उसका वसंत सा पल्लवित जीवन अचानक से पतझड़ की तरह वीरान सा हो गया ।जैसे सारी रौनक ही चली गई जीवन से , न तो खुशियों की आहट सुनाई देती है , न ही उम्मीद की खिलखिलाहट। जी हां...... ऐसा ही होता है जब उस परिवार /व्यक्ति की उन्नति /खुशियों से जल कर या मात्र प्रतिस्पर्धा वश कोई उनके ऊपर  काली शक्तियों का प्रयोग करवा देता है ।कलियुग को काली युग की संज्ञा उसके अतिशीघ्र साधना में फल प्राप्ति के लिए मिली  किंतु अतिशीघ्र सिद्ध होने वाली साधनाओं का सदुपयोग से ज्यादा दुरुपयोग ही हुआ । यद्यपि तांत्रिक प्रयोग इतने आसान नहीं  होते हैं  कि  कोई भी किसी पर कर दे किंतु ईर्ष्यावश या पुरानी दुश्मनी सधाने  के लिए लोग अपने विरोधियों पर तंत्र प्रयोग करवा देते है ।आजकल तंत्र ज्ञाता भी ईमान रहित  होकर मात्र धनौपार्जन  के लिए कार्य कर रहे है । ऐसे मे कई बार  बिना सही गलत का निर्णय किए ही , मात्र धन देने वाले का कार्य सम्पन्न कर देते है जिससे कई बार  निर्दोष व्यक्ति  भी तंत्र के घातक प्रयोग का शिकार हो जाते हैं ।

जिसपर तंत्र का घातक प्रयोग किया जा चुका होता है उसके साथ कई लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं ।जिनका बारीकी से अध्ययन करने पर तांत्रिक प्रयोग की  गहनता पता चलती है ।ये प्रमुख लक्षण इस प्रकार हैं ---

1.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो वह आसमान्य तरीके  से हरदम बीमार रहता है और डॉक्टर  वैद्य को दिखाने पर भी रोग पता नहीं चलता । असमान्य तरीके से उसके चेहरे की रौनक चली जाती है ।आंख के नीचे काले घेरे पड़ जाते हैं और काया  जर्जर होती जाती है ।

2.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो उसे बेवजह का ही तनाव बना रहता तथा आत्महत्या की  इच्छा  बनती रहती है ।वह हरदम  घर परिवार को छोड़ कर दूर चले जाने की  सोच रखता है ।उसे मित्र बांधव की अच्छी बातें भी कटु वचन लगने लगती हैं ,वह सबसे अलग थलग रहने लगता है।

3.) जिस पर तांत्रिक प्रयोग हुआ हो उसका स्व गृह नहीं बन पाता ,या तो वह जमीन ही नहीं खरीदता या उसका निर्माणकार्य कभी पूर्णता तक नहीं पहुँच पाता ।हरदम कोई न कोई विघ्न पड़ते रहते । निर्माण कार्य आरंभ करते ही घर के किसी सदस्य की मृत्यु हो जाती है या बहुत बड़ा आर्थिक  घाटा लग जाता है ।

4.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो उसके बच्चे भी हरदम बीमार पड़ते रहते है ,पढ़ाई मे कमजोर हो जाते है ,उनका शारीरिक - मानसिक विकास अवरुद्ध सा हो जाता है । बच्चों में आपराधिक प्रवृति बढ़ने लगती है ,अचानक से वो नशे की तरफ झुकाव करने लगते हैं । हरवक्त हिंसात्मक रवैया बनाए रहते हैं और बड़ों की बात नहीं मानते हैं।

5.) परिवार में  कोई न कोई हरदम बीमार रहता है जिससे कि बीमारी में धन की  बर्बादी होती है ,डॉक्टर भी रोग की  सही वजह नहीं बता पाते । एक सदस्य स्वस्थ्य हो तो दूसरा बीमार पड़ जाता है ।बीमारी का चक्र ही खत्म नहीं होता ।

6.) विवाह के कई वर्ष बीत  जाने पर और हर प्रकार से मेडिकली फिट होने पर भी संतानसुख  नहीं मिलता या बार बार गर्भपात हो जाता है या जन्म लेते ही संतान की  मृत्यु हो जाती है ।तब यह मान लेना चाहिए कि तांत्रिक प्रयोग द्वारा कोख बांध  दी गयी है ।

7.) यदि घर के सबसे छोटे सदस्य की  अचानक ही बिना कारण मौत हो जाए तो मुठ विद्या का प्रयोग मानना चाहिए ।

8.) जिसपर काली शक्तियों का प्रयोग किया जाता है  उसके हितैषी भी उससे मुंह फेरने लग जाते हैं और शत्रुवत व्यवहार  करने लगते है । जिनकी कभी मदद की  हो वह भी नजर फेर लेते है और उसे अकेला छोड़ देते है।

9.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो वह कहीं  भी चैन नही पाता है ।वह नया घर भी ले तो उसे समस्याओं का ही सामना करना पड़ता है ।परेशानी जैसे उसका पीछा  ही नहीं  छोड़ती है ।

10.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग हो उसके अंदर व्यर्थ की  चिड़चिड़ाहत भर जाती है ,वह अवसाद ग्रस्त हो जाता है और सफलता की  उम्मीद छोड़ देता है । उसका आत्मबल क्षीण हो जाता है और किसी की  प्रेरक बातें भी उसे जहर समान प्रतीत होती है।

11.) यदि भाई बहनों  से अकारण ही बैर भाव उत्पन्न हो गया हो और किसी भी मध्यस्थ  प्रयास से उन्हे साथ न लाया जा सक रहा हो तब निस्संदेह तंत्र प्रयोग मान  लेना चाहिए ।

12.) जिस व्यक्ति पर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो या जिस घर में तंत्र प्रयोग हुआ हो वहाँ पति पत्नी एक दूसरे के मत विरोधी हो जाते हैं और बेवजह भी विरोधाभास में रहते है ।न तो उनमें  सौहार्द्र  होता है ,न ही वो आँख मिलाकर प्रेम भाव से बात करते हैं  ।

13.) जिसपर तांत्रिक प्रयोग किया गया हो वह कितना भी अच्छा कार्य करे उसे यश प्राप्त नहीं होता ।उसके कार्यस्थल पर उसके अधिकारियों से भी उसकी नहीं बनती ।उससे कम कार्य  करके कोई अधिकारियों की  प्रशंसा पा लेता है पर इसे न तो मनचाही तरक्की मिलती है न ही मनचाहा स्थानांतरण ।

इसप्रकार हम देखते है कि तंत्र विद्या ,जिसका उद्देश्य लोक कल्याण सुनिश्चित था अब लोगों की  जीवन की  समस्या भी बन चुका है । कभी तांत्रिक को धरती पर चलता फिरता देवता ही माना जाता  था पर भौतिकवादी संस्कृति के सर्वत्र  हावी हो जाने पर तंत्र क्षेत्र ने भी अपना सम्मान और नैतिकता खोया है , जिसे पुनर्स्थापित करने की  आवश्यकता है  ।

जिन्हें मंत्र तंत्र काले जादु से बचना है या फिर उसकी काट करनी हो तो वह साधक व्हाट्सएप (whatsapp number-8421522368) पर मेसेज करे,निःशुल्क विधि विधान मंत्र के साथ दिया जाएगा । यह मेरा प्रयास जनकल्याण हेतु है इसलिए आपसे किसी भी प्रकार का दक्षिणा मुझे स्वीकार नही है और हो सके तो आप भी मेरे द्वारा दिये गए विधान से परेशान लोगो की मदत करे,इस प्रकार का जनकल्याण करने से आपको पूण्य मिलेगा ।




आदेश......

23 Mar 2023

अद्वितीय मंत्र प्रयोग


जय मातादी जी......



23 मार्च 2013 के दिन यह ब्लॉग बनाया था,अब इस ब्लॉग को 10 वर्ष पूर्ण हो गए,इस 10 वर्षो में बहोत सारे लोगो से बात हुए और बहोत से लोगो का समाधान भी किया गया है । अब तक ब्लॉग को 53 लाख से ज्यादा लोगों ने पढ़ा है इसके लिए आप सभी पाठकों का हृदय से धन्यवाद और आशा करते हैं के आगे भी आप निरंतर ब्लॉग को पढ़ते रहेंगे ।

आज हम एक विशेष साधना प्रयोग दे रहे हैं जिसके माध्यम से आप जीवन मे बहोत कुछ प्राप्त कर सकते है । सर्वप्रथम प्रयोग है बावन भैरव का तांत्रोत्क मंत्र जो सर्वोपरि मंत्र है । इस मंत्र साधना के माध्यम से आप अपने जीवन मे लटके हुए कामो को आसानी से पूर्ण कर सकते है,इसका विधान भी बहोत आसान है, कहि से पाँच मुखी रुद्राक्ष माला प्राप्त करे और उसी माला से आपको 11 माला मंत्र जाप रात्रि में 21 दिनों तक करने से मंत्र सिद्धि संभव होगी । 22 वे दिन आपको अग्नि प्रज्वलित करके लौंग की 108 बार आहुतिया देनी है, साधक का मुख साधना काल मे दक्षिण दिशा के तरफ होना जरूरी है।

मंत्र-

ॐ भ्रं भ्रं भैरवाय भ्रं भ्रं नमः
Om bhram bhram bhairavaay bhram bhram namah


जब भी आपकी कोई कामना आपको पूर्ण करनी हो तब दाए हाथ मे जल लेकर अपनी कामना बोले और जल को जमीन पर छोड़ दीजिए,उसके बाद उसी रुद्राक्ष माला से 11 माला जाप करे तो आपको कामना अवश्य ही पूर्ण होगी । यह मेरा स्वयं का आजमाया हुआ मंत्र है और इस मंत्र की 1 माला जाप मैं नित्य करता हु ।


अब बात करेंगे द्वितीय मंत्र की जो पूर्ण रूपेण एक रक्षात्मक मंत्र है,इस मंत्र का 101 माला जाप हनुमान जयंती के दिन करने से यह मंत्र सिद्ध होता है,जब भी आपको डर लगे या आप परेशान हो,या ग्रहों की स्थिति अनुकूल ना हो या आपको कोई अपनी मनोकामना पूर्ण करनी हो तब ईस मंत्र का 11 माला जाप करने से सफलता मिलता है । हनुमान जयंती के दिन स्नान के बाद लाल आसन पर दक्षिण दिशा के तरफ मुख करके बैठ जाये और लाल चंदन की माला से 101 माला जाप करे,11 या 21 माला के बाद आप जाप से उठकर शौच आदि करके या पाणी पीकर फिर बैठ सकते हैं परंतु उसी दिन 101 माला जाप आवश्यक है । जाप के बाद हनुमानजी के नाम से मोतीचूर के लड्डुओं का भोग लगाना है,उनकी आरती करके लड्डुओं को परिवार में बाट दे और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करे । आवश्यकता होने पर मंत्र से आप अपने कार्य कर सकते है,यह साधना सुबह से शुरू करे ताकि रात्रि से पहिले आपका जाप हो जाये ।


मंत्र

ॐ हूं हूं हनुमतये हूं हूं फट
Om hoom hoom hanumataye hoom hoom phat

यह दोनों मंत्र प्रयोग सरल और प्रामाणिक है,इन दोनों को सिद्ध करने से आपके जीवन मे राहु केतु मंगल और शनि ग्रह की पीड़ा से मुक्ती मिल सकती हैं ।


अन्य मार्गदर्शन हेतु संपर्क कर सकते है,मोबाइल नम्बर है 8421522368 ।



आदेश......

14 Dec 2022

विशेष नवग्रह मंत्र साधना.


जीवन मे व्यस्तता के कारण ब्लॉग पर आर्टिकल नही लिख सका इसके लिए आप सभी से क्षमाप्रार्थी हु परंतु अवश्य ही अगले वर्ष 2023 में हर महीने एक आर्टिकल लिखने की कोशिश करुंगा । आज के समय मे सभी के जीवन मे ग्रहों की विपरीत परिस्थितियों के कारण हलचल मची हुई है,अशांति का माहौल बन रहा है,90% लोगो के काम होते होते रुक रहे है । यहां हम सभी का जीवन ग्रहों के कृपा से चले तो अवश्य ही अच्छा रहता है परंतु ग्रहों की अवकृपा हो तो जीवन संघर्षमय बन जाता है,जो दुख और पीड़ाओं से असन्तुलित हो जाता है । आज हम नववर्ष पर संकल्प लेंगे की वर्ष 2023 पूर्णताः खुशियों से भरा हुआ हो और इसके लिए इसी वर्ष हम नवग्रह मंत्र साधना अवश्य करेंगे ।

व्यक्ति का जब जन्म होता है उस समय आकाश
मण्डल में ग्रहों की स्थिति का विवरण ही जन्म
कुण्डली कहलाता है अर्थात् जन्म कुण्डली
आकाशीय मण्डल का नक्शा हैऔर यही नक्शा पढ़कर भूत भविष्य वर्तमान का कथन किया जाता है।
जन्म कुण्डली का आधार 12 राशियां 27 नक्षत्र
और 9 ग्रह एवं 12 लग्न हैं। जिनके द्वारा गणना
करने से व्यक्ति को अपने जीवनकाल का पता चलता है, जन्म के
समय ग्रहों की स्थिति के अनुसार वे व्यक्ति पर
शुभ एवं अशुभ प्रभाव डालते हैं।
पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और एक वर्ष
में पूरा एक चक्कर काटती है, इस चक्कर वाले
रास्ते को भू-चक्र कहते हैं इस भू-चक्र को
ज्योतिषियों ने 12 भागों में बांटा जिसे जन्म
कुण्डली में भाव कहा जाता है। ज्योतिष एक विज्ञान है जो हमारे ऋषियों से प्राप्त वरदान है।

यह नवग्रह व्यक्ति पर अपना निश्चित रूप से
शुभ एवं अशुभ प्रभाव डालते हैं, इन ग्रहों के
अशुभ प्रभाव से अवतारी व्यक्ति भी नहीं बच
सके। जैसे भगवान राम जी को 14 वर्ष वनवास हुआ,भगवान कृष्ण जी को कारागृह में जन्म लेना पड़ा,भीष्म पितामह जी को बाणों की शय्या पर मृत्यु प्राप्त हुई,ऐसे हजारो उदाहरण हैं। केवल मंत्र साधना द्वारा इनके प्रभाव को ठीक किया जा सकता है। कुछ ज्योतिषी व्यक्ति को रत्न धारण करने की सलाह देते हैं। उनके इस विचार से में पूर्णतया सहमत नहीं हूं
ज्योतिष का ज्ञान सागर के समान है,जिसमें
गोते लगाने वाले व्यक्ति को अनेको नये अनुभव
और ज्ञान प्राप्त होता हैं। नौ ग्रहों में से प्रत्येक ग्रह
व्यक्ति पर कुछ शुभ और कुछ विपरीत प्रभाव
डालता है। यह सब व्यक्ति के पूर्वजन्म के कर्मो का फल या फिर इस जन्म कर्म का फल भी कह सकते है। यदि कोई ग्रह आपकी जन्म कुण्डली में अशुभ
स्थान पर बैठा है तो उसको अपने अनुकूल
करने के लिये आप उसका रत्न धारण नहीं कर
सकते जबकि कुछ लोग हर ग्रह के लिये रत्न
धारण करने की सलाह देते हैं,जो उपयुक्त नहीं
है। उदाहरण के लिए यदि कोई आपका शत्रु है
और आप उसके हाथ में बन्दूक देगा तो वह तो
आपको ही समाप्त कर देगा। उस व्यक्ति को
अपने अनुकूल करने के लिये आपको उसकी
सोच, आपके प्रति उसके विचार बदलने होंगे,
ठीक इसी प्रकार से ज्योतिष में भी विपरीत ग्रहों को
धारण करके बलवान नहीं बना सकते हैं बल्कि मंत्र
साधना द्वारा आप ग्रहों को अनुकूल कर सकते
हैं। यदि आपका कोई पड़ोसी आपके प्रति
विपरीत विचार रखता है किन्तु आप प्रति दिन
उसके प्रति सकारात्मक भाव रखें तो एक दिन
उसका नजरिया आपके प्रति अवश्य बदल जाता
है, इसी प्रकार यदि कोई ग्रह आपके शत्रु भाव में
है तो प्रतिदिन आप उस ग्रह का मंत्र जप करके
उसे अपने अनुकूल बना सकते हैं। इस संसार मे परेशानी चाहे कितनी ही बड़ी क्यो न हो याद रखिए उस परेशानी से निपटने के लिए ऋषिमुनियों के आशीर्वाद से मंत्र साधनाएं आज भी उपलब्ध है ।


साधना विधान

नवग्रह शांति जीवन में भाग्योदय के द्वार
खोलती है,जीवन मे शुभ फल देती है, अनिष्ट का नाश करती है और जीवन को पूर्ण बनाती है । इसी कारण प्रत्येक पूजन, यज्ञ कसे पूर्व नवग्रह शांति पाठ सम्पन्न किया जाता है। नवग्रह शांति से ग्रहों के कुप्रभावों से अवश्य ही बचा जा सकता है, पारिवारिक जीवन में आने वाली बाधाओं से पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है और जीवन में उन्नति के नये आयाम खुलते हैं। ग्रहों की
अनुकूलता से लक्ष्य को पाने में असफल व्यक्ति भी जल्द ही लक्ष्य को प्राप्त कर अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कर लेता है।

इस साधना को किसी भी शुभ मुहूर्त (सिद्धि
योग, सर्वार्थ सिद्धि योग, द्विपुष्कर, त्रिपुष्कर,
पुष्य, गुरु पुष्य या अमृत योग) में सम्पन्न
किया जा सकता है। यह साधना को प्रातः काल में
सम्पन्न करने से उचित फल मिलता है इसलिए साधक को प्रातः काल मे साधना करनी चाहिए। साधना करने से पूर्व ही अपने पूजा स्थान को साफ स्वच्छ कर लें।
साधना स्थल का वातावरण सुगंधित एवं
आनन्दमय होना चाहिए ताकि साधना में आपका मन लगे ।
साधक सफेद वस्त्र धारण कर उत्तराभिमुख
होकर अपने पूजा स्थान में सफेद आसन पर
बैठ जाएं और अपने सामने बाजोट पर सफेद वस्त्र स्थापित कर लें। सामने शिवलिंग को किसी पात्र मे रखे, चाहे पात्र स्टील का हो या फिर तांबे पीतल का हो चलेगा और शिवलिंग का पूजन सम्पन्न कर
शिव जी से साधना में सफलता का आशीर्वाद मांगे और साधना प्रारंभ करे ।
शिवलिंग के सामने धूप, दीप (घी का)
प्रज्वलित कर लें, मिठाई प्रसाद मे रखिये जिसे साधना के बाद साधक को नित्य ग्रहण करना है, हो सके तो अवश्य ही बेलपत्र भी चढाये।

प्रत्येक ग्रह मंत्र का 11 बार जप करते हुए
शिवलिंग पर  कुंकुम, अक्षत एवं पुष्प चढाये,अगर आपको मंत्र उच्चारण में कठिनाई आये तो आप 108 बार ॐ नमः शिवाय का भी जाप करके पूजन कर सकते है।

नवग्रह मंत्र इस प्रकार से हैं-

सूर्य- ॥ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः ॥
चन्द्र - ॥ ॐ ऐं क्लीं सोमायै नमः॥
मंगल - ॥ॐ हुं श्रीं मंगलाय नमः॥
बुध - ॥ॐ ऐं स्त्रीं श्रीं बुधायै नमः॥
गुरु - [॥ॐ ऐं क्लीं बृहस्पत्यै नमः॥
शुक्र - ॥ॐ ह्रीं श्रीं शुक्रायै नमः॥
शनि - ॥ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शनैश्चरायै नमः॥
राहु - ॥ॐ ऐं ह्रीं राहवे नमः॥
केतु - ॥ॐ केतवे ऐं सौ: स्वाहा ॥


नवग्रह मंत्रों से शिव पूजन के पश्चात्
रुद्राक्ष माला से दिये गये नवग्रह मंत्र की 11 माला जप अवश्य करें.

विशेष नवग्रह मंत्र-

॥ ॐ श्रीं क्लीं सूर्य चन्द्र भौम बुध गुरु शुक्र
शनीश्चराय राहु केतु मुंथा सहिताय क्लीं नमः ॥

Om shreem kleem Surya Chandra bhoum budha guru shukra shanishcharaay raahu ketu munthaa sahitaaya kleem namah


मंत्र जप के पश्चात् माला को सुरक्षित स्थान पर रख दें तथा शेष सामग्री को जल में विसर्जित कर दें। इस साधना में साधक को 11 दिन तक नित्य माला से उपरोक्त नवग्रह मंत्र का 11 माला जप करना चाहिए। इस प्रकार इस साधना में उपरोक्त मंत्र की 121 माला
का जप बताया गया है। मूल साधना के पश्चात्
नित्य क्रम में केवल 1 माला मंत्र जप सम्पन्न करना बताया गया है। आप 121 माला मंत्र जप अपनी सुविधानुसार भी सम्पन्न कर सकते हैं। जैसे नित्य 11 माला जाप नही कर सकते है तो 3,5,7 या हो सके तो 21 माला तक नित्य जाप कर सकते है।

अन्य किसीभी मार्गदर्शन हेतु आप संपर्क कर सकते है ।


आदेश.....

1 Aug 2022

मोरपंख (peacock feathers magic) का जादू.




हिन्दू धर्म में मोर के पंखों का विशेष महत्व है। मोर के पंखों में सभी देवी-देवताओं और सभी नौ ग्रहों का वास होता है। ऐसा क्यों होता है, हमारे धर्म ग्रंथों में इससे संबंधित कथा है ... 
 
भगवान शिव ने मां पार्वती को पक्षी शास्त्र में वर्णित मोर के महत्व के बारे में बताया है। प्राचीन काल में संध्या नाम का एक असुर हुआ था। वह बहुत शक्तिशाली और तपस्वी असुर था। गुरु शुकाचार्य के कारण संध्या देवताओं का शत्रु बन गया था।
 
संध्या असुर ने कठोर तप कर शिवजी और ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था। ब्रह्माजी और शिवजी प्रसन्न हो गए तो असुर ने कई शक्तियां वरदान के रूप में प्राप्त की। शक्तियों के कारण संध्या बहुत शक्तिशाली हो गया था। शक्तिशाली संध्या भगवान विष्णु के भक्तों का सताने लगा था। असुर ने स्वर्ग पर भी आधिपत्य कर लिया था, देवताओं को बंदी बना लिया था। जब किसी भी तरह देवता संध्या को जीत नहीं पा रहे थे, तब उन्होंने एक योजना बनाई।
 
योजना के अनुसार सभी देवता और सभी नौ ग्रह एक मोर के पंखों में विराजित हो गए। अब वह मोर बहुत शक्तिशाली हो गया था। मोर ने विशाल रूप धारण किया और संध्या असुर का वध कर दिया। तभी से मोर को भी पूजनीय और पवित्र माना जाने लगा।
 
 ज्योतिष शास्त्र में भी मोर के पंखों का विशेष महत्व बताया गया है। यदि विधिपूर्वक मोर पंख को स्थापित किया जाए तो घर के वास्तु दोष दूर होते हैं और कुंडली के सभी नौ ग्रहों के दोष भी शांत होते हैं।  

घर का द्वार यदि वास्तु के विरुद्ध हो तो द्वार पर तीन मोर पंख स्थापित करें।
 
 सूर्य के लिए : 

रविवार के दिन नौ मोर पंख लेकर आएं और पंख के नीचे मैरून रंग का धागा बांध लें। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ नौ सुपारियां रखें, गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ सूर्याय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
इसके बाद दो नारियल सूर्य भगवान को अर्पित करें।
 
 
चंद्र के लिए : 

सोमवार को आठ मोर पंख लेकर आएं, पंख के नीचे सफेद रंग का धागा बांध लें। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ आठ सुपारियां भी रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ सोमाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पान के पांच पत्ते चंद्रमा को अर्पित करें। बर्फी का प्रसाद चढ़ाएं।
 
मंगल के लिए : 

मंगलवार को सात मोर पंख लेकर आएं, पंख के नीचे लाल रंग का धागा बांध लेँ। इसके बाद एक थाली में पंखों के साथ सात सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें…
 
ॐ  भू पुत्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
 
पीपल के दो पत्तों पर चावल रखकर मंगल ग्रह को अर्पित करें। बूंदी का प्रसाद चढ़ाएं।
 
बुध के लिए : 

बुधवार को छ: मोर पंख लेकर आएं। पंख के नीचे हरे रंग का धागा बांध लें। एक थाली में पंखों के साथ छ: सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ बुधाय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
जामुन बुध ग्रह को अर्पित करें। 
केले के पत्ते पर रखकर मीठी रोटी का प्रसाद चढ़ाएं।
 
गुरु के लिए : 

गुरुवार को पांच मोर पंख लेकर आएं। पंख के नीचे पीले रंग का धागा बांध लें। एक थाली में पंखों के साथ पांच सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ बृहस्पते नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
ग्यारह केले बृहस्पति देवता को अर्पित करें।
बेसन का प्रसाद बनाकर गुरु ग्रह को चढ़ाएं।
 
शुक्र के लिए : 

शुक्रवार को चार मोर पंख लेकर आएं। पंख के नीचे गुलाबी रंग का धागा बांध लेँ। एक थाली में पंखों के साथ चार सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ शुक्राय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मीठे पान शुक्र देवता को अर्पित करें।
गुड़-चने का प्रसाद बना कर चढ़ाएं।

शनि के लिए : 

शनिवार को तीन मोर पंख ले कर आएं। पंख के नीचे काले रंग का धागा बांध लें। एक थाली में पंखों के साथ तीन सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें-
 
ॐ शनैश्वराय नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
तीन मिटटी के दीपक तेल सहित शनि देवता को अर्पित करें।
गुलाब जामुन या प्रसाद बना कर चढ़ाएं। इससे शनि संबंधी दोष दूर होता है।

राहु के लिए : 

शनिवार को सूर्य उदय से पूर्व दो मोर पंख लेकर आएं। पंख के नीचे भूरे रंग का धागा बांध लें। एक थाली में पंखों के साथ दो सुपारियां रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें…
 
ॐ राहवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
चौमुखा दीपक जलाकर राहु को अर्पित करें।
कोई भी मीठा प्रसाद बनाकर चढ़ाएं।
 
केतु के लिए :

शनिवार को सूर्य अस्त होने के बाद एक मोर पंख लेकर आएं। पंख के नीचे स्लेटी रंग का धागा बांध लें। एक थाली में पंख के साथ एक सुपारी रखें। गंगाजल छिड़कते हुए 21 बार इस मंत्र का जप करें।
 
ॐ केतवे नमः जाग्रय स्थापय स्वाहा:
पानी के दो कलश भरकर राहु को अर्पित करें।
फलों का प्रसाद चढ़ाएं।




Peacock feathers have special significance in Hindu religion. In the peacock feathers, all the gods and goddesses and all nine planets are inhabited. Why does this happen, in our religious texts there is a related story ...

Lord Shiva told Mother Parvati about the importance of the peacock as described in bird science. In ancient times, there was an Asura named Sandhya. He was very powerful ascetic. Due to Guru Shukacharya, Sandhya became the enemy of Gods.

Sandhya Asur had made Shiva and Brahma happy by harsh tenacity. When Brahmaji and Shiva were pleased, Asura got many powers in the form of boon. Due to strengths Sandhya became very powerful. Lord Vishnu devotees were tortured and harrassed. Asur also possessed heaven, made the gods captive. Whenever the gods were not able to win Sandhya, they made a plan.

According to the plan all the gods and all the nine planets became entrenched in the wings of a peacock. Now the peacock became very powerful. Peacock took a huge look and killed Sandhya. Since then, peacocks have also been considered sacred and devoted.

In astrology, peacock feathers have also been shown to have special significance. If peacock feathers are established, the Vastu defects of the house are removed and all the nine planets in the horoscope are also calmer.

If the door of the house is against Vaastu, then set up three peacock feathers at the door.

For Sun:

On Sunday, bring nine peacock feathers and wrap the maroon colored thread under the wings. After this, place nine supari’s with wings in a plate, chanting this mantra 21 times spraying ganga water.

Om Surya Namah Jagraya Sthapaya Swaha:

After this, offer two coconut to the God Sun.

For the Moon:

Bring eight peacock feathers on Monday, bundle the white thread under the wings. After this, place eight betel leaves with wings in a plate. Chant this mantra 21 times spraying the Ganga Water.

Om Somaye Namah Jagraya Sthapaya Swaha:

Offer five leaves of paan to the moon. Offer barfi to Moon as prasad.

For Mars:

On Tuesday, bring seven peacock feathers, bind the red thread under the wings. After this, place seven suparias with wings in a plate. Chanting this mantra 21 times spraying the Ganga Water.

Om Bhu Putraye Namah Jagraya Sthapye Swaha:

Put rice on Peepal leaves and offer Mars to Mars. Offerings of Bundi  should be made.

For Mercury:

On Wednesday bring six peacock feathers. Tie green thread under the wings. Place six Suparias with wings in a plate. Chant this mantra 21 times spraying the Ganges water or any holy water.

Om Buddhaye Namah Jagraya Sthapye Swaha:

Offer black berries to the planet Mercury.
Offer sweetened bread offerings on the banana leaves.

For the Guru:

On Thursday, bring five peacock feathers. Tie a yellow thread under the wings. Put five beetle nuts with wings in a plate. Chant this mantra 21 times spraying the Ganges water or any holy water.

Om Brihaspat Namah Jagraya Sthapaye Swaha:

Offer eleven bananas to the god Jupiter.
Make offerings of thimgs made of Besan and offer it to the Guru Planet.

For Venus:

O Friday bring four peacock feathers. Bind a pink thread under the wings. Place four beetle nuts in one plate with the wings. Chant this mantra 21 times spraying the Ganges water or any holy water.

Om Shukraya Namah Jagraya Sthapaye Swaha:

Offer three sweet beeteal (paan) to Venus.
Make offerings by making gurh-gram (Gud Chana) offerings.

For Saturn:

On Saturday Bring three peacock feathers. Bind with black thread under the wings. Put three beetle nuts in one plate with wings. Chant this mantra 21 times spraying gangaajal -

Om Shaneshwariya Namah Jagraya Sthapaye Swaha:

Offer lighted three clay lamp filled wth mustard oil.
Make Gulab Jamuns and offer to lord Saturn. It removes saticuline defects.

For Rahu:

Before sunrise on Saturdays, bring two peacock feathers. Bind the brown thread under the wings. Put two betel leaves with wings in a plate. Chanting this mantra 21 times spraying the Ganges water or any holy water.

Om Rahave Namah Jagraya Sthapaye Swaha:

Offer Chhamukha lamp to Rahu.
Make any sweet offerings and offer them.


For Ketu:

After sunset on Saturday, bring a peacock feather. Bind the gray thread under the wings. Place a betel nut with a feather in the plate. Chant this mantra 21 times spraying the Ganges water or any holy water.

Om Ketave Namah Jagraya Sthapaye Swaha:

Offer two pots filled with water to Rahu.
Offer offerings of fruits.


आदेश.....

संपर्क (contact)- 8421522368

29 Jun 2022

महाभैरव शाबर मंत्र साधना.

 महाभैरव साधना



मानव अपने जीवन में विभिन्न प्रकार की समस्याओं, बाधाओं, परेशानियों, दुःखों से प्रतिपल संघर्षरत रहता ही है। व्यक्ति का पूरा जीवन इनको समाप्त करने, इन पर विजय प्राप्त करने में ही बीत जाता है। नित्य प्रति व्यक्ति इन्हें सुलझाने का प्रयास करता है, पर वह उतना ही ज्यादा उनमें उलझता जाता है, कोई उपाय जब उसकी बुद्धि के अनुसार सफल नहीं हो पाता, तब वह हार कर देवी-देवताओं की आराधना करने लगता है, क्योंकि जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए आवश्यक है, कि मानव मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ हो और किसी भी प्रकार का तनाव उसको नहीं हो, तभी वह निश्चिंतता पूर्वक सभी समस्याओं का हल प्राप्त कर सकता है।


इस प्रकार की स्थिति प्रदान करने में साधना पक्ष का सहारा लेना मनुष्य के लिए अत्यधिक हितकारी होता है, अब यहां प्रश्न यह उठता है कि हमारे सामने तो सैकड़ों प्रकार की साधनाएं हैं और प्रत्येक ही अपने आपमें महत्वपूर्ण और तेजस शक्तियों से युक्त हैं, ऐसी स्थिति में हम अपने जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए, वह भी विशेष कर शत्रुओं पर पूर्ण विजय प्राप्त करने के लिए, अपने जीवन की समस्त विपत्तियों का नाश करने के लिए साथ ही अपने बालकों की सुरक्षा करने के लिए जो साधना अत्यधिक उपयुक्त हो, उसका चयन कैसे करें ?


ऐसी स्थिति में व्यक्ति का ध्यान सर्वप्रथम 'भैरव साधना' की ओर ही आकृष्ट होता है। वैसे भी देखा जाए तो एक भी ऐसा गाँव नहीं है, जहां भैरव का मंदिर न हो। जन-जन के देवता के रूप में भैरव के प्रति लोगों की आस्था जुड़ी हुई है।


विभिन्न तांत्रिक ग्रंथों में चाहे वह 'तंत्र चूड़ामणि' हो अथवा किसी भी ऋषि-मुनि के द्वारा रचित साधना विधान हो। प्रत्येक देवी-देवता के पूजन के पूर्व गुरु, गणपति एवं भैरव पूजन अनिवार्य होता ही है, क्योंकि भैरव समस्त प्रकार के शत्रुओं का नाश करने में पूर्ण सक्षम होते हैं। 'भैरव तंत्र' के अनुसार - भैरव साधना सम्पन्न करने से मनुष्य को अपने जीवन में निम्न लाभ प्राप्त होते हैं ।


(1) मानसिक कष्ट एवं संताप का नाश । 

 

(2) समस्त प्रकार के उपद्रवों का नाश। 

 

(3) शरीर स्थित रोगों का नाश । 

 

(4) सामाजिक शत्रुओं का नाश ।

 

(5) समस्त प्रकार के कर्जों की समाप्ति । 

 

(6) शासन की ओर से आने वाली अकारण बाधाओं का नाश ।

 

(6) मुकदमे में विजय । 

 

(7) अकाल मृत्यु निवारण | 

 

(8) वृद्धावस्था के समय व्याप्त होने वाले रोगों का नाश । बालकों की सर्वविधि रक्षा के लिए । 

 

(9) व्यवसाय में आनेवाली बाधाओं का नाश ।

 

(10) परिवार तथा स्वयं के ऊपर आने वाली बाधा या तंत्र बाधा का नाश ।

 

( 11 ) विपत्ति को पहले से ही समाप्त करने के लिए। किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचाव के लिए ।

 

यहां शत्रु "नाश" का अर्थ शत्रु समाप्ति नही है,शत्रुत्व समाप्ति है ।

 

ऐसे अनेक लाभ महाभैरव साधना से साधक को प्राप्त होते ही है। 

 

भैरव तंत्र में ही वर्णन आता है, कि जो व्यक्ति अपनेआप के प्रति सजग एवं चैतन्य होता है, वह निश्चित रूप से महाभैरव साधना सम्पन्न करता ही है, क्योंकि उसे अपना जीवन प्रिय होता है, अपने बच्चों का जीवन प्रिय होता है, पूरे परिवार का जीवन प्रिय होता है। यदि कोई शत्रु हो तो सर्वविधि वध शत्रुदोष समाप्त करने के लिए भी भैरव साधना उपयुक्त है। इसके अलावा भैरव दिवस पर प्रत्येक उच्चकोटि के संन्यासी महाभैरव साधना सम्पन्न करते ही हैं, जिससे उन्हें अपने द्वारा की जा रही समस्त प्रकार की साधनाओं में किसी भी प्रकार की विपत्ति का सामना न करना पड़े। 

 

समाज में पूर्ण सम्माननीय स्थान प्राप्त व्यक्ति भी निश्चित रूप से भैरव साधना सम्पन्न करता ही है। इस प्रकार समस्त व्यक्तियों का अनुभव यही है कि कलियुग में महाभैरव साधना अतिशीघ्र लाभदायक होती है। महाभैरव साधना करने के लिये कोई विशेष विधि-विधान की आवश्यकता नहीं होती है। 

 

साधना विधि 

 

(1) महाभैरव यंत्र, रुद्राक्ष माला ,महाभैरव कंगण इन तीनो सामग्रियों का प्रयोग इस साधना में किया जाता है। भैरव तंत्र में वर्णित विशिष्ट मंत्रों से अनुप्राणित इन सामग्रियों को आप पहले से ही प्राप्त कर लें।

 (2) स्नान आदि से निवृत्त होकर, साफ-स्वच्छ वस्त्र पहिन कर साधना में प्रवृत्त हो। 

 (3) धोती आप लाल या काली इन दोनों में से किसी भी रंग की पहिने । 

 (4) पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठे। 

 (5) अपने सामने किसी प्लेट में काले तिल की एक ढेरी निर्मित करें और उस पर 'महाभैरव यंत्र' स्थापित करें। महाभैरव यंत्र के ऊपर ही 'महाभैरव कंगण"' स्थापित करें। 

 (6) काले रंग में रंगे हुए अक्षत एवं काली सरसों चढ़ाकर यंत्र और कंगण का पूजन करें।

(7) गुड़ से बने नैवेद्य का भोग लगायें। 

(8) पूजन करने के पश्चात् निम्न महाभैरव मंत्र का 'रुद्राक्ष माला' से 1 या 3 माला मंत्र जप शाबर मंत्र का अपनी सामर्थ्य एवं कार्य की कठिनता को देखते हुए सम्पन्न करें। 

(9) मंत्र जप सम्पन्न करते समय आपको हिलना डुलना नहीं है। 

(10) भैरव यंत्र की ओर अपलक देखते हुए मंत्र जप को करना है ।

 (11) मंत्र जप समाप्ति के पश्चात् महाभैरव से अपनी जिस इच्छा को, जिस कामना को लेकर अपने साधना सम्पन्न की है, उसे पूर्ण करने के लिए पुन: प्रार्थना करें। 

 (12) जिस दिन आप इस साधना को सम्पन्न करे, उसके ठीक ग्यारहवे दिन के बाद रात्रि में हवन करना है । हवन सामग्री हेतु फोन पर संपर्क करे । 

 (13) यह साधना किसी भी शनिवार के दिन अथवा किसी भी मास की कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली अष्टमी को तथा भैरवाष्टमी के दिन रात्रि 9 बजे के पश्चात् तथा सुबह 3 बजे के बीच में सम्पन्न की जाती है। 

 

 पूर्ण श्रद्धा भावना के साथ इस साधना को सम्पन्न करने पर 15 दिन के अन्दर - अन्दर लाभ प्राप्त होने लगता हैं । जो शाबर मंत्र महाभैरव साधना में आपको दिया जाएगा वह अत्यंत गोपनीय है और यह मंत्र सिर्फ साधना सामग्री के साथ ही दिया जाएगा क्योके ऐसे तिष्ण और प्रामाणिक शाबर मंत्र बिना साधना सामग्री के जपने नही चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की संभावनाये ज्यादा हैं । इसलिए सर्वप्रथम फोन पर संपर्क करे, मार्गदर्शन जो निःशुल्क है, वह प्राप्त करे, फिर साधना सामग्री के साथ महाभैरव शाबर मंत्र प्राप्त करे । मंत्र ब्लॉग पर पोस्ट करना संभव नही है ।


 नोट:-इस एक मंत्र साधना से षट्कर्म सम्भव है ।

फ़ोन नम्बर :-        8421522368

साधना सामग्री न्योच्छावर राशि: "3800/-रुपये" ।




आदेश......

22 Feb 2022

वशीकरण साबर मंत्र,षटकर्म भाग-2.

द्वितीय क्रिया शाबर वशीकरण मंत्र




वश्यं जनानां सर्वेषां वात्सल्य हृद्-गतं-स्मृतम् ।

(सांख्यायन तंत्र)


वश्यं जनानां सर्वेषां विधेयत्वमुदीरितम् ।

(उड्डीश तंत्र)


राजअर्थात् जिससे सभी जीवों (स्त्री-पुरुषों) को वश में किया जाता है और सबके हृदय में अपने प्रति वात्सल्य (प्रेम) पैदा किया जाता है उसे वशीकरण कहते हैं। स्त्री-पुरुष वशीकरण, -वशीकरण, आकर्षण, मोहन आदि वश्य-कर्म के भेद हैं।


उपरोक्त मंत्र से यह स्पष्ट है कि वशीकरणा साधना प्रेम की साधना है। संसार के सारे प्राणियों को प्रेम से वश में किया जा सकता है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति काम इत्यादि भाव से अथवा बुरे विचार रखता है तो उसे लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है। शुद्ध भाव से प्रेम में सफलता राज्यकार्य में सफलता, परिवार में अनुकूलता, मित्रों से सहयोग इत्यादि कार्य हेतु ही यह वशीकरण साधना सम्पन्न करनी चाहिये।


साधना विधान:-


साधक किसी भी माह के शनिवार को रात्रि में 10 बजे के पश्चात् शुद्ध पवित्र होकर पश्चिम दिशा की ओर मुख कर अपने सामने लकड़ी के एक बाजोट पर लाल वस्त्र बिछा दें।


इसके पश्चात साधक अपने सामने रखे बाजोट पर एक सरसों की ढेरी बनाकर उस पर मोहिनी वशीकरण यंत्र स्थापित करें, यंत्र का फोटो व्हाट्सएप पर दिया जाएगा और आपको वैसा ही यंत्र भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से घर पर ही किसी शुभमुहूर्त में बनाना है । अब यंत्र के सामने सफेद आक की जड़ स्थापित कर दें। साधक जिन व्यक्तियों को अपने वश में करना चाहता है अथवा अपने अनुरूप करना चाहता है उन सभी के नाम एक कागज पर काजल से लिख कर यंत्र के नीचे रख दें। अब साधक यंत्र का पूजन कुंकुम, चावल से करें तथा घी का दीपक जलाएं । इस साधना में विशेष बात यह है कि मंत्र जप दीपक की लो को देखते हु ही करना है। सामान्य साधक के लिये यह संभव नहीं है क्योंकि मंत्र थोड़ा बड़ा है और याद रखना संभव नहीं है। अतः प्रत्येक बार मंत्र जप के पश्चात् दीपक की लौ की ओर अवश्य देख लें। इसके बाद साधक रुद्राक्ष माला से निम्न मंत्र की 1 माला मंत्र जप करें।


मंत्र


।। ॐ नमो आदेश गुरु को,चल चल रे मोहन्या बिर मोहन का काम करने चल अमुक को मेरा मोह लगा मेरे वश में कर सोते सुख ना बैठे सुख फिर फिर देखे मेरा मुख सम्मोहन का बाण चला मेरे से आकर्षित कर इतना काम ना करे तो मांगनी के कुंड में पड़े दुहाई महादेव पार्वती की इतने पर भी काम ना करे तो पिता से वैर करे महादेव की जटा टूट तेरे पर पड़े फुरो बंगाली मंत्र ईश्वरो वाचा छू ।।




मंत्र जप के पश्चात जिस पर वशीकरण क्रिया करनी है उसका नाम लिखा हुआ कागज सफेद आक की जड़ के साथ बांध कर अपने आज्ञा चक्र से 11 बार स्पर्श कराये और मन में यह भावना व्यक्त करें कि इस साधना के फलस्वरूप यह व्यक्ति पूर्ण रूप से मेरे आकर्षण, सम्मोहन, मोहन में मुझसे बंध जाये ।


यह साधना उतने दिनों तक कर सकते हैं, जब तक पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हो तथा 21 दिन बाद सफेद आक की जड़ को माला सहित जल में प्रवाहित कर दें।



नोट: मोहिनी वशीकरण यंत्र का फ़ोटो व्हाट्सएप पर निःशुल्क दिया जाएगा,इस यंत्र को आपको स्वयं बनाना है ।


Contact and whatsapp number

+91 8421522368



आदेश......

26 Jan 2022

षट्कर्म साबर मंत्र साधना-भाग 1.

 प्रथम क्रिया शांति कर्म




नाना रोगः कृतिमष्ट नाना चेष्टा क्रमेण च ।

विष-भूत निराशः शान्तिरीरिता ।।

रोग-कृत्या ग्रहादीनां निरासः शान्तिरीरिता ।।


अर्थात् नाना प्रकार के रोग, नाना प्रकार की चेष्टाओं (क्रियाओं, विधियों) से निर्मित विष, भूत आदि प्रयोगों (अभिचार) कृत्या और दुष्ट ग्रहों का निराकरण करना शान्ति कर्म कहा जाता है।


(ब्लॉग पर हम षट्कर्म साधनाये देने वाले है,यह प्रथम साधना है, इसके बाद वशीकरण साधना पोस्ट किया जाएगा)


साधना विधान


इस प्रयोग को किसी भी सोमवार अथवा बुधवार को सम्पन्न किया जा सकता है। यह साधना रात्रि अथवा प्रातः काल दोनों ही समय सम्पन्न की जा सकती है। इस साधना में वस्त्र के रंग का महत्व नही है,वस्त्र किसी भी रंग का पहन सकते है । साधना वाले दिन साधक स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व दिशा की ओर मुंह कर बैठ जाएं। अपने सामने एक लकड़ी के बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाकर उस पर भगवती काली विग्रह अथवा चित्र स्थापित करें।  इसके पश्चात् साधक अपने दाहिने हाथ में जल लेकर अपनी कामना बोलकर जल को भगवती के चित्र के सामने छोड़ दीजिए ।


इसके पश्चात् साधक बाजोट पर आयताकार रूप में चावल को फैला दें। इस आयत के मध्य पीपल के एक पत्ते को रख कर उस पर एक सुपारी स्थापित करें। सुपारी पर कुमकुम से रंगे चावल चढ़ाये और एक पुष्प चढ़ाये ।

अब मुख्य सुपारी के आठो दिशाओ के तरफ शांति, श्रद्धा, कीर्ति, लक्ष्मी, घृति, दया, तुष्टि और पुष्टि के स्वरूप की स्थापना आठ सुपारी रख कर करें। इनका पूजन करते समय निम्न मंत्र का आह्वान करें।


ॐ शांत्यै नमः 11 बार ,

ॐ श्रद्धायै नमः 11बार,

ॐ कीर्त्यै नमः 11 बार,

ॐ लक्ष्म्यै नमः 11 बार,

ॐ धृत्यै नमः 11 बार,

ॐ दयायै नमः 11 बार,

ॐ तुष्टयै नमः 11 बार,

ॐ पुष्टयै नमः 11 बार जपे,


इस प्रकार प्रार्थना करने से ये शक्तियां स्थापित होती है तदन्तर मुख्य सुपारी का फिर से कुंकुम, अक्षत, रक्त चंदन इत्यादि से पंचोपचार पूजन करें। पूजन के समय निरन्तर अक्षत चढ़ाते रहें। इसके पश्चात् मुख्य मंत्र का जप करें। शांति कर्म में रुद्राक्ष माला का प्रयोग किया जा सकता है । एक ही स्थान पर बैठे - बैठे 1 माला मंत्र जप अवश्य करें । यह विधान कम से कम सात दिन तक सम्पन्न करना चहिये। यदि नियमित रूप से सात दिन संभव ना हो तो वे भाग में कर सकते हैं।


मंत्र


।। ॐ नमो आदेश गुरु को काली काली महाकाली कावड़ देश बंगाल वाली, आवो माता कृपा करो दुःख बांधो भूत प्रेत पिशाच बांधो दुष्ट ग्रहो का फल बांधो अभिचार कर्म का असर बांधो आयी बला बांधो बुरी नजर बांधो दरिद्रता बांधो कौन बांधे माता काली बांधे ना बांधे तो महादेव की आन गुरु गोरखनाथ की आन गुरु की शक्ति मेरी भक्ति फुरो मंत्र ईश्वरी वाचा छू ।।


इस मंत्र के जप से रोगों का नाश होता है तथा दुष्ट ग्रह अनुकूल होते हैं। जब भी विपरीत स्थिति का अनुभव करें तो मुख्य सुपारी के आगे रुद्राक्ष माला से इस मंत्र का जप अवश्य करें।


जिस घर में साधना पूर्ण होने के बाद मुख्य सुपारी को पूजा स्थान में स्थापित किया जाता है उस घर में भूत-प्रेत इत्यादि आ नहीं सकते हैं। प्रत्येक साधक के लिये यह साधना आवश्यक है ।


साधनात्मक मार्गदर्शन हेतु निःशुल्क मार्गदर्शन किया जाएगा ।


आदेश.......

13 Nov 2021

पहाड़िया मामा प्रत्यक्षीकरण साधना सिद्धी.


आज आप सभी के ज्ञान हेतु "पहाड़िया-मामा" की सिद्धि के विषय में बताने जा रहा हूँ। यह मूलतः हिमाचली देव माना जाता है, यहा जहा पर पहाड़ी-क्षेत्र होता है वहां इनका निवास होता है।

जैसा कि मैंने अपनी पिछली कई पोस्ट्स में कहा है कि साधना अपितु शक्ति कोई बुरी नहीं होती बस उसका उपयोग सही या गलत होता है, हाँ यह अवश्य है कि जिस गुण की वह शक्ति है वह आपको उसी गुण-स्वभाव का बनाने का प्रयत्न करती है, तामसिक या सात्विक यदि आपके इष्ट या गुरु की शक्ति आपके साथ है तो ये अधिक प्रभाव नहीं डाल सकती ।

पहाड़िया-मामा कहि से भी सबकुछ ला सकता है या आस-पड़ोस में कलह करवा सकता है, जो चाहो वह यह कर सकता है किंतु हिमाचल में इसे देव कहा जाता है न कि भूत-प्रेत, जिस प्रकार बुलाकी आदि देव होते हैं उसी प्रकार यह हिमाचल में प्रसिद्ध है।

यह मूलतः 21 दिन की साधना होती है, जिसमें प्रत्येक दिन साधना में आपको इसके भोग के लिए शराब और मांस रखना होता है,ज़्यादा मात्रा में न रखें थोड़ा-बहुत चलेगा और नित्य मंत्र जप के पश्च्यात उस शराब को आप किसी शराबी को पीने के लिए दे देवें या निर्जन स्थान पर रख दें और वह मांस कुत्तों को डाल दिया करें।

21वें दिन मामा सफेद वस्त्रों में हंसते हुए प्रकट होंगे और सिर पर टोपी भी होगी वे बिल्कुल आदमी की तरह आपसे बात करेंगे और आपसे कहेंगे कि मुझे दारू और मांस खिला जोकि उनका भोग है। आप वह मांस, शराब और एक गिलास पानी भरकर उनके सामने रख दें। अब यह उनकी इच्छा है कि दारू नीट पियें या पानी मिलाकर पिएं फिर वे आपके साथ बैठकर ही वह दारू-मांस खाएंगे तत्पश्चात आपसे पूछेंगे कि 'बताओ मेरे लिए क्या काम है?'

फिर आपकी जो भी इच्छा या मनोरथ हो वह कह दें जो भी आपको चाहिए, किन्तु इच्छा भी वही प्रकट करें जो सम्भव हो अन्यथा आप कहें कि मुझे हवाई-जहाज चाहिए तो थोड़े ही मिलेगा।


पहाड़ी मामा का मन्त्र -

।। पहाड़िया आवे आवे तुझे मनावे, तुझे भोग में दारू मास खिलावे, मेरा काम कर नहीं आवे, तुझे गौरा माता की दुहाई जय पहाड़िया मामा तेरी सेवा करूँ दिन रात ।।


जपसंख्या - नित्य 11 माला जाप.
साधना सामग्री-रुद्राक्ष माला,रक्षा कवच,पहाड़िया मामा प्रत्यक्षीकरण यंत्र.
साधना समय-रात्रिकालीन.
अन्य सामग्री-सफेद आसन, सफेद वस्त्र,धूप,दीप और सफेद पुष्प.

यह साधना कम समय मे सिद्धिदायक है,ऐसी प्रामाणिक साधना प्राप्त होना नसीब की बाते है,जिन्हें मिल जाती है उनका जीवन बदल जाता है ।

साधना सामग्री न्यौच्छावर राशी 3500/-रुपये है,साधना की गोपनीय क्रियाये सिर्फ फोन पर बतायी जाएगी,क्योंकि कुछ क्रिया को हमे गोपनीय रखना पड़ता है ।

साधना सामग्री प्राप्त करने हेतु संपर्क करे-
📞 8421522368


आदेश.....

26 Oct 2021

दीपावली सम्पूर्ण लक्ष्मी पूजन एवं मंत्र विधान.

दीपावली की आप सभी को बहोत बहोत शुभकामनाएं
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐



माँ भगवती आप सभी पर कृपा करें इसी कामना के साथ दीपावली सम्पूर्ण लक्ष्मी पूजन दिया जा रहा है-

भगवती श्री-लक्ष्मी का विधिवत पूजन जिसमे ऋद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ का पूजन समाहित है | 

श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्न्यां बहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि 
रूप मश्विनो! इष्णन्निषाणां मुम्म ईषाणा सर्वलोकम्म ईषाणा | 

हे जगदीश्वर! ये समस्त ऐश्वर्य और समग्र शोभा अर्थात 'लक्ष्मी' और 'श्री' दोनों ही आपकी पत्नी तुल्य हैं, दिन और रात आपकी सृष्टि में विचरण करते रहते हैं, सूर्य चंद्र आपके मुख हैं | नक्षत्र आपके रूप है, मैं आपसे समस्त सुखों की कामना करता हूं |

यही प्रश्न हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषि-मुनियों के मन में भी अवश्य आया होगा, तभी उन्होनें लक्ष्मी की पूर्ण व्याख्या की | प्रारम्भ के श्लोक में यही विवरण आया है कि लक्ष्मी, जो 'श्री' से भिन्न होते हुए भी "श्री" का ही स्वरुप हैं, जो पालनकर्ता विष्णु के साथ रहती हैं, जिनके चारों ओर सारे नक्षत्र, तारे, विचरण करते हैं, जो सारे लोकों में विद्यमान हैं, उस 'श्री'का मैं वन्दन करता हूं |

अर्थात 'श्री' ही मूल रूप से लक्ष्मी हैं और इसीलिए हमारी संस्कृति में  'मिस्टर' की जगह 'श्री' लिखा जाता है|  अर्थात वह व्यक्ति, जो श्री से युक्त है, उसी के नाम के आगे 'श्री' लगाकर सम्बोधित किया जाता है|

'श्री सूक्त' जिसे 'लक्ष्मी सूक्त' भी कहा जाता है, उसमें लक्ष्मी का श्री रूप से ही प्रार्थना की गई है, जो वात्सल्यमयी हैं,धन-धान्य, संतान देने वाली हैं, जो मन और वाणी को दीप्त करती हैं, जिनके आने से दानशीलता प्राप्त होती है, जो वनस्पति और वृक्षों में स्थित हैं, जो कुबेर और अग्नि अर्थात तेजस्विता प्रदान करने वाली हैं, जो जीवन में परिश्रम का ज्ञान कराती हैं, जिसकी कृपा से मन में शुद्ध संकल्प और वाणी में सत्यता आती है,जो शरीर में तरलता और पुष्टि प्रदान करने वाली हैं, उस श्री के सांसारिक जीवन में स्थायी स्थान के लिए बार-बार प्रार्थना और नमन किया गया है |

श्री सूक्त में एक विशेष बात यह कही गई है कि लक्ष्मी की जेष्ट भगिनी अर्थात अलक्ष्मी अर्थात अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता है जो भूख और प्यास के साथ दुर्गन्धयुक्त है, अर्थात यदि जीवन में धन तो है लेकिन तृष्णाएं यथावत हैं, मानसिक रूप से विकारों में मलिनता है तो वह लक्ष्मी 'श्री' रुपी लक्ष्मी नहीं है और वह लक्ष्मी स्थायी रह भी नहीं सकती है |

जो 'श्री' रुपी लक्ष्मी है, वही जीवन में स्थायी रह सकती है, और इस श्री रुपी लक्ष्मी की नौ कलाओं का जब जीवन में पदार्पण होता है तभी जीवन में पूर्णता आ पाती है |


लक्ष्मी की नौ कलाएं -

जिस व्यक्ति में लक्ष्मी की इन नौ कलाओं का विकास होता है, वहीं लक्ष्मी चिरकाल के लिए विराजमान होती है|

१. विभूति  - सांसारिक कर्तव्य करते हुए दान रुपी कर्तव्य जहां विद्यमान होता है, अर्थात शिक्षा दान, रोगी सेवा, जल दान इत्यादि कर्तव्य हैं, वहां लक्ष्मी की 'विभूति' नामक पीठिका है, यह लक्ष्मी की पहली शक्ति है |

२. नम्रता  - दूसरी शक्ति है नम्रता | व्यक्ति जितना नम्र होता है, लक्ष्मी उसे उतना ही ऊंचा उठाती है |

३. कान्ति - जब विभूति और कान्ति दोनों कलाएं आ जाती हैं, तो वह लक्ष्मी की तीसरी कला 'कान्ति' का पात्र हो जाता है, चेहरे पर एक तेज आता है |

४. तुष्टि  - इन तीनों कलाओं की प्राप्ति होने पर 'तुष्टि' नामक चतुर्थ कला का आगमन होता है, वाणी सिद्धि, व्यवहार, गति, नए-नए कार्य, पुत्र-प्राप्ति, दिव्यता-सभी उसमें एक रास होती हैं|

५. कीर्ति - यह लक्ष्मी की पांचवी कला है, इसकी उपासना करने से साधक अपने जीवन में धन्य हो जाता है, संसार के आधार का अधिकारी हो जाता है |

६. सन्नति - कीर्ति-साधना से लक्ष्मी की छटी कला सन्नति मुग्ध होकर विराजमान होती है|

७. पुष्टि - इस कला द्वारा साधक अपने जीवन में जो सन्तुष्टि अनुभव करता है| उसे अपने जीवन का सार मालूम पड़ता है |

८. उत्कृष्टि - इस कला से जीवन में क्षय-दोष होता है वह समाप्त हो जाता है | केवल वृद्धि ही वृद्धि होती है |

९. ऋद्धि - सबसे महत्वपूर्ण, सर्वोत्तम कला ऋद्धि पीठाधिष्ठात्री है, जो बाकी आठ कलाओं के होने पर स्वतः ही समाविष्ट हो जाती है |

दीपावली रात्रि को विधिवत पूजन से श्री-लक्ष्मी, नौ कलाओं सहित घर में स्थायी निवास करती है |

पूजन सामग्री

कुंकुम,मौली, अगरबत्ती, केशर, कपूर, सिन्दूर, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, फल, पुष्प माला, गंगाजल, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और चीनी), यज्ञोपवीत, वस्त्र, मिठाई एवं पंचपात्र |

पवित्रीकरण 

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा | 
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः || 

संकल्प 
दाहिने हाथ में जल लेकर निम्न मन्त्र को पढ़े -

ॐ विर्ष्णु विर्ष्णु विर्ष्णुः श्री मदभगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्रह्मनोहि द्वितीय परार्द्वे श्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे जम्बु द्वीपे भारतवर्षे अस्मिन पवित्र क्षेत्रे अमुक वासरे (दिन बोले) अमुक गोत्रोत्पन्नहं (अपना गोत्र बोले), अमुक शर्माहं (अपना नाम बोले) यथा मिलितोपचारैः श्री महालक्ष्मी प्रीत्यर्थे तदंगत्वेन यथाशक्ति गणपति पूजनं च एवं मंत्र जाप करिष्ये | 

जल भूमि पर छोड़ दें |

गुरु पूजन 
दोनों हाथ जोड़ कर निम्न मन्त्र का उच्चारण करें -

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वर | 
गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः || 
गुरुं आवाहयामि स्थापयामि नमः | 
पाद्यं स्नानं तिलकं पुष्पं धूपं 
दीपं नैवेद्यं च समर्पयामि नमः || 

ऐसा बोलकर पाद्य, जल स्नान, तिलक, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदि समर्पित करें, फिर दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें -

अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया | 
चक्षुरन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः || 

गणपति-पूजन 
इसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर भगवान् गणपति का ध्यान करें -

गजाननं भूत गणाधिसेवितं,
कपित्थ जम्बूफल चरुभक्षणं| 
उमासुतं शोक विनाश कारकं ;
नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम || 
ॐ गणेशाय नमः ध्यानं समर्पयामि || 

भगवान् गणपति को आसन के लिए पुष्प समर्पित करें |  इसके बाद सामने स्थापित 'महागणपति-महालक्ष्मी' यंत्र अथवा विग्रह को जल से स्नान करावें, फिर पंचामृत स्नान करावें, स्नान के समय निम्न मन्त्र बोलें -

पञ्च नद्यः सरस्वती मपियन्ति सस्त्रोतसः | 
सरस्वती तू पञ्चधा सोदेशेभवत सरित || 

इसके बाद चन्दन, अक्षत, पुष्पमाला, नैवेद्य आदि समर्पित करें तथा धुप-दीप दिखाएं -

चन्दनं अक्षतान पुष्प मालां 
नैवेद्यं च समर्पयामि नमः | 
धूपं दीपं दर्शयामि नमः || 

इसके बाद तीन बार मुख शुद्धि के लिए आचमन करायें, इलायची और लौंग आदि से युक्त पान चढ़ायें|  फिर दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें  -

नमस्ते ब्रह्मरूपाय विष्णुरूपाय ते नमः | 
नमस्ते रुद्ररूपाय करिरूपाय ते नमः || 
विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे | 
भक्तिप्रियाय देवाय नमस्तुभ्यं विनायक || 
ॐ गं गणपतये नमः | 
निर्विघ्नमस्तु|  निर्विघ्नमस्तु | निर्विघ्नमस्तु | 
अनेन कृतेन पूजनेन सिद्धि बुद्धि सहितः || 
श्री भगवान् गणाधिपतिः प्रीयन्ताम || 

इसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर भगवती महालक्ष्मी का ध्यान करें -

ॐ अम्बेअम्बिके अम्बालिके न मा नयति कश्चन| 
ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम || 
श्री महालक्ष्म्यै नमः आवाहनं समर्पयामि || 

महालक्ष्मी ध्यान 
दोनों हाथ जोड़कर मन ही मन स्मरण करें कि भगवती महालक्ष्मी आकर विराजमान हो, प्रार्थना करे  -

पदमासना पदमकरां पदममाला विभूषिताम | 
क्षीर सागर संभूतां हेमवर्ण समप्रभाम || 
क्षीर वर्ण समं वस्त्रं दधानं हरिवल्लभाम | 
भावये भक्तियोगेन भार्गवीं कमलां शुभां || 
श्री महालक्ष्म्यै नमः ध्यानं समर्पयामि || 

आसन 
आसन के लिए पुष्प अर्पित करें  -
श्री महालक्ष्म्यै नमः आसनं समर्पयामि नमः || 

पाद्य 
पाद्य के लिए दो आचमनी जल चढ़ायें  -
श्री महालक्ष्म्यै नमः पाद्यं समर्पयामि | 
अर्घ्यं आचमनीयं स्नानं च समर्पयामि || 

पंचामृत स्नान 
पंचामृत से भगवती महालक्ष्मी को स्नान कराये -
मध्वाज्यशर्करायुक्तं दधिक्षीरसमन्वितम | 
पंचामृतं गृहाणेदं पंचास्यप्राणवल्लभे |
श्री महालक्ष्म्यै नमः पंचामृत स्नानं समर्पयामि || 

शुद्धोदक स्नान 
इसके बाद उन्हें शुद्ध जल से स्नान करायें -

परमानन्द बोधाब्धि निमग्न निजमूर्तये | 
शुद्धोदकैस्तु स्नानं कल्पयाम्यम्ब शंकरि || 
श्री महालक्ष्म्यै नमः  शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि || 

वस्त्र 
वस्त्र समर्पित करे  -
श्री महालक्ष्म्यै नमः वस्त्रं समर्पयामि || 

आभूषण 
श्री महालक्ष्म्यै नमः आभूषणं समर्पयामि || 

गन्ध 
इत्र चढ़ावें
श्री महालक्ष्म्यै नमः गन्धं समर्पयामि || 

अक्षत 
श्री महालक्ष्म्यै नमः अक्षतान समर्पयामि || 

पुष्प 
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पाणि समर्पयामि || 

इसके बाद कुंकुम, चावल तथा पुष्प मिला कर निम्न मन्त्रों का उच्चारण करते हुए विग्रह/यंत्र पर चढ़ायें -

ॐ चपलायै नमः पादौ पूजयामि || 
ॐ चञ्चलायै नमः कटिं पूजयामि || 
ॐ कमलायै नमः कटिं पूजयामि || 
ॐ कात्यायन्यै नमः नाभिं पूजयामि || 
ॐ जगन्मात्रे नमः जठरं पूजयामि || 
ॐ विश्ववल्लभायै नमः वक्षःस्थलं पूजयामि || 
ॐ कमलवासिन्यै नमः हस्तौ पूजयामि || 
ॐ पाद्याननायै नमः मुखं पूजयामि || 
ॐ कमलपत्राख्यै नमः नेत्रत्रयं पूजयामि || 
ॐ श्रियै नमः शिरः पूजयामि || 
ॐ महालक्ष्म्यै नमः सर्वाङ्गं पूजयामि || 


धूप 
श्री महालक्ष्म्यै नमः धूपं आघ्रापयामि ।।

दीप 
श्री महालक्ष्म्यै नमः दीपं दर्शचयामि ||


नैवेद्य 
नाना विधानी  भक्ष्याणी
व्यञ्जनानी       हरिप्रिये |
यथेष्टं   भूङक्ष्व    नैवेद्यं |
षडरसं   च    चतुर्विधम || 
श्री महालक्ष्म्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि || 

नैवेद्य समर्पित कर तीन बार जल का आचमन कराएं |


ताम्बूल 
लौंग इलायची युक्त पान समर्पित करें -
श्री महालक्ष्म्यै नमः ताम्बूलं समर्पयामि || 

दक्षिणा 
दक्षिणा द्रव्य समर्पित करें  -
श्री महालक्ष्म्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि ||


इसके बाद 'कमलगट्टे की माला' से निम्न मन्त्र का १ माला मन्त्र जप करें -

|| ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्मी आगच्छ आगच्छ धनं देहि देहि ॐ || 


 इसके बाद घी की पांच बत्ती की आरती बना कर आरती करें ।

जल आरती 
तीन बार आचमनी से जल लेकर दीपक के चरों ओर घुमायें तथा निम्न मन्त्र का उच्चारण करें -

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष (गूं ) शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति 
रोषधयः शान्तिः |  वनस्पतयः शान्ति र्विश्वे देवाः शान्तिः ब्रह्म 
शान्तिः सर्व (गूं ) शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि || 


 पुष्पाञ्जलि 
दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करें तथा यंत्र अथवा विग्रह पर चढ़ा दे -

नाना सुगंध पुष्पाणि यथा कालोदभवानि च |
पुष्पाञ्जलिर्मया दत्ता गृहाण जगदम्बिके || 
श्री महालक्ष्म्यै नमः पुष्पांजलि समर्पयामि ||


समर्पण 
इसके बाद निम्न समर्पण मन्त्र का उच्चारण करते हुए पूजन व् जप भगवती लक्ष्मी को समर्पित करें, जिससे कि इसका फल आपको प्राप्त हो सके -

ॐ     तत्सत         ब्रह्मार्पणमस्तु,
अनेन कृतेन पूजाराधन कर्मणा | 
श्री  महालक्ष्मी  देवता  परासंवित 
स्वरूपिणी                प्रियनताम || 

एक आचमनी जल लेकर, पूजन की पूर्णता हेतु भूमि पर छोड़ दें | इसके बाद वहा उपस्थित परिवार के सभी सदस्यों एवं स्वजनों को प्रसाद वितरित करें|

इस प्रकार यह सम्पूर्ण पूजन व् साधना संपन्न होती है| साधना समाप्ति के पश्चात सवा माह तक नित्य कमलगट्टे की माला से - 
|| ॐ श्रीं श्रीं महालक्ष्मी आगच्छ आगच्छ धनं देहि देहि ॐ ||
मंत्र का १ माला जप करें | सवा माह पश्चात माला तथा यंत्र को जल में विसर्जित कर दें |


आदेश.....