21 Aug 2017

वीर-वैताल शाबर मंत्र साधना



अदृश्य शक्ति का प्रवाह क्या आपने कभी विचार किया है कि ब्रह्माण्ड में कितनी अृदश्य शक्तियों का प्रवाह हो रहा है? कई शक्तियां आपको दिखाई नहीं देती है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि शक्तियां होती ही नहीं है। वैताल शिव के प्रमुख गण है, जिन्होंने दक्ष राज के यज्ञ का विंध्वस कर शिव सत्ता स्थापित की हर व्यक्ति वैताल साधना सम्पन्न कर अपने चारों और एक सुरक्षा चक्र स्थापित कर सकता है। वैताल साधना ऐसी ही अद्वितीय तंत्र साधना है जिसके पूर्ण होने पर वैताल हर समय सुरक्षा प्रहरी के रुप में साधक के साथ रहता है।
वैताल भगवान शिव का ही अंश स्वरूप हैं, शिव के गणों में वैताल नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अपनी दैवीय शक्तियों के कारण प्राचीन काल से ही भगवान शिव के विशिष्ट गण वैताल की साधना का प्रचलन रहा है।
इतिहास साक्षी है, कि सांदीपन आश्रम में भगवान श्री कृष्ण ने भी वैताल सिद्धि प्रयोग सम्पन्न किया था, जिसके फलस्वरूप वे महाभारत में अजेय बन सके, और जीवन में अद्वितीय सिद्ध हो सके, हजारों बाणों के बीच भी वे सुरक्षित रह सके। विक्रमादित्य ने भी वैताल सिद्धि प्रयोग कर अपने जीवन के कई प्रश्नों को सुलझा लिया था।

आगे चलकर गुरु गोरखनाथ और मछिन्दरनाथ तो वैताल साधना के सिद्धतम आचार्य बने और उन्होंने वैताल साधना द्वारा उन्होंने अपने जीवन में साधनात्मक उपलब्धियों को सहज ही प्राप्त कर लिया। महान् तंत्र वेत्ता और गोरख तंत्र के आदि गुरु गोरखनाथ प्रणीत वैताल साधना, इस साधना को आज भी गोरख पंथ प्रमुख रूप से सम्पादित करता है।



वैताल उत्पत्ति

एक बार राजा दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उस आयोजन में भगवान शिव को उचित मान-सम्मान नहीं दिया गया, इस कारण उनकी पत्नी सती जो राजा दक्ष की पुत्री थीं, व्यथित हो गईं और यज्ञ कुण्ड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिये। इस कारण भगवान शिव अत्यन्त क्रोधित हुए, उनके क्रोध से तीनों लोक थर्राने लगे, पेड़ों से पत्ते झड़ गये, चारों तरफ बिजलियां कड़कने लगीं और समुद्र में तूफान सा आ गया।

उसी क्रोध के आवेश में भगवान शिव ने अपनी जटा की एक लट को तोड़कर दक्ष के यज्ञ में होम कर दी, फलस्वरूप एक अत्यन्त तेजस्वी पराक्रमी बलवान और साहसी वीर की उत्पत्ति हुई जिसे ‘वैताल’ शब्द से संबोधित किया गया।
यज्ञ में से वैताल को प्रकट होते देख सारे देवता और दानव थर थर कांपने लगे, उसकी ज्वालाओं के सामने सारे देवता लोग झुलसने लगे और ऐसा लगने लगा कि यह पराक्रमी यदि चाहे तो पूरे भूमण्डल को एक हाथ से उठा कर समुद्र में फेंक सकता है।

भगवान शिव की शक्ति से उत्पन्न वैताल को भगवान शिव ने स्वयं आज्ञा दी की – जो साधक तुम्हारी साधना कर तुम्हें प्रत्यक्ष प्रकट करें, उसके सामने शांत स्वरूप में उपस्थित होना और जीवन भर उसकी छाया की तरह रक्षा करना, …यही नहीं, अपितु वह जीवन में तुम्हें जो भी आज्ञा दे, जिस प्रकार की भी आज्ञा दे उस आज्ञा का पालन करना ही तुम्हारा कर्त्तव्य होगा।



गोरक्ष संहिता के अनुसार वैताल साधना के निम्न छह लाभ हैं –

1. वैताल साधना से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, यह अत्यन्त सौम्य और सरल साधना है। जब वैताल साधना सिद्धि होती है, तो मनुष्य रूप में सरल प्रकृति और शांत रूप में वैताल प्रकट होता है, और जीवन भर दास की तरह साधक के कार्य सम्पन्न करता है।

2. वैताल सिद्धि होने पर वह छाया की तरह अदृश्य रूप से साधक के साथ बना रहता है, और प्रतिपल प्रतिक्षण उसकी रक्षा करता है। प्रकृति, अस्त्र शस्त्र या मनुष्य उसका कुछ भी अहित नहीं कर सकते, किसी भी प्रकार से उसके जीवन में न तो दुर्घटना हो सकती है और न उसकी अकाल मृत्यु ही संभव है।

3. ऐसे साधक के जीवन में शत्रुओं का नामो निशान नहीं रहता, वह कुछ ही क्षणों में अपने शत्रुओं को परास्त करने का साहस रखता है, और उसका जीवन निष्कंटक और निर्भय होता है, लोहे की सीखंचें या कठिन दीवारें भी उसका कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकतीं।

4. वैताल भविष्य सिद्धि सम्पन्न होता है, अतः अपने जीवन या किसी के भी जीवन के भविष्य से सम्बन्धित जो भी प्रश्न पूछा जाता है, उसका तत्काल उत्तर प्रामाणिक रूप से मिल जाता है, ऐसा व्यक्ति सही अर्थों में भविष्य दृष्टा बन जाता है।

5. जो साधक वैताल को सिद्ध कर लेता है, वह वैताल के कन्धों पर बैठ कर अदृश्य हो सकता है, एक स्थान से दूसरे स्थान पर कुछ ही क्षणों में जा सकता है और वापिस आ सकता है, उसके लिए पहाड़, नदियां या समुद्र बाधक नहीं बनते।
ऐसा साधक कठिन से कठिन कार्य को वैताल के माध्यम से सम्पन्न करा लेता है, और चाहे कोई व्यक्ति कितनी ही दूरी पर हो, उसे पलंग सहित उठा कर अपने यहां बुलवा सकता है, और वापिस लौटा सकता है, उसके द्वारा गोपनीय से गोपनीय सामग्री प्राप्त कर सकता है।

6. वैताल सिद्धि प्रयोग सफल होने पर साधक अजेय, साहसी, कर्मठ और अकेला ही हजार पुरुषों के समान कार्य करने वाला व्यक्ति बन जाता है।



वास्तव में वैताल साधना अत्यन्त सौम्य और सरल साधना है, जो भगवान शिव की साधना करता है वह वैताल साधना भी सम्पन्न कर सकता है। जिस प्रकार से भगवान शिव का सौम्य स्वरूप है, उसी प्रकार से वैताल का भी आकर्षक और सौम्य स्वरूप है। इस साधना को पुरुष या स्त्री सभी सम्पन्न कर सकते हैं।
यद्यपि यह तांत्रिक साधना है, परन्तु इसमें किसी प्रकार का दोष या वर्जना नहीं है। गायत्री उपासक या देव उपासक, किसी भी वर्ण का कोई भी व्यक्ति इस साधना को सम्पन्न कर अपने जीवन में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकता है। सबसे बड़ी बात यह है, कि इस साधना में भयभीत होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, घर में बैठकर के भी यह साधना सम्पन्न की जा सकती है। साधना सम्पन्न करने के बाद भी साधक के जीवन में किसी प्रकार अन्तर नहीं आता, अपितु उसमें साहस और चेहरे पर तेजस्विता आ जाती है, फलस्वरूप वह जीवन में स्वयं ही अपने अभावों, कष्टों और बाधाओं को दूर कर सकता है।

आज के युग में वैताल साधना अत्यन्त आवश्यक और महत्वपूर्ण हो गई है, दुर्भाग्य की बात यह है कि अभी तक इस साधना का प्रामाणिक ज्ञान बहुत ही कम लोगों को था, दूसरे साधक ‘वैताल’ शब्द से ही घबराते थे, परन्तु ऐसी कोई बात नहीं है। जिस प्रकार से साधक लक्ष्मी, विष्णु या शिव आदि की साधना सम्पन्न कर लेते हैं, ठीक उसी प्रकार के सहज भाव से वे वैताल साधना भी सम्पन्न कर सकते हैं।



साधना सामग्री

इस प्रयोग में न तो कोई पूजा और सिर्फ विशेष सामग्री की आवश्यकता होती है,नाथ संप्रदाय के अनुसार इस प्रयोग में केवल तीन उपकरणों की जरूरत होती है।


1. तांत्रोक्त वीर वैताल यंत्र (जिससे एक पत्ते वाले बेल वृक्ष की जड़ और एक पत्ते वाले पलाश के वृक्ष की जड़ होना ज़रूरी है,जो ताबीज में भरकर सिद्ध किया जाता है) 2. रुद्र मंत्र आवेशित तांत्रोक्त वैताल रुद्राक्ष माला और 3.रक्षा कवच (इस कवच में मसन्या उद का प्रयोग होना चाहिए ) ।



इसके अलावा साधक को अन्य किसी प्रकार की सामग्री जल पात्र या कुंकुम आदि की जरूरत नहीं होती, यह साधना रात्रि को सम्पन्न की जाती है, परन्तु जो साधक न भयभीत हों, और न विचलित हों, वे निश्चिन्त रूप से इस साधना को सम्पन्न कर सकते हैं।



साधना विधान:-

साधक रात्रि को दस बजे के बाद स्नान कर लें और स्नान करने के बाद अन्य किसी पात्र को छुए नहीं। पहले से ही धोकर सुखाई हुई काली धोती को पहन कर काले आसन पर दक्षिण की ओर मुंह कर घर के किसी कोने में या एकान्त स्थान में बैठ जाएं।

अपने सामने लकड़ी के एक बाजोट पर शिव परिवार चित्र/विग्रह/शिव यंत्र/शिवलिंग स्थापित कर लें और साथ ही अपने गुरु/गोरक्षनाथ का चित्र भी स्थापित कर दें। वैताल साधना में सफलता हेतु गुरु और शिव जी से आशीर्वाद अवश्य प्राप्त करें। इस हेतु सर्वप्रथम गुरु और शिव जी का  ध्यान करें –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥


अब भगवान शिव जी का मन ही मन नीचे लिखे मंत्र से ध्यान करें-

ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैव्र्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥



एक ताँबे के पात्र या स्टील की थाली में काजल से एक गोला बनाएं और उस गोले में वैताल यंत्र को स्थापित कर दें। यंत्र स्थापन के पश्चात् हाथ जोड़कर वैताल का ध्यान करें।



ध्यान

धूम्र-वर्ण महा-कालं जटा-भारान्वितं यजेत्
त्रि-नेत्र शिव-रूपं च शक्ति-युक्तं निरामपं॥
दिगम्बरं घोर-रूपं नीलांछन-चय-प्रभम्
निर्गुण च गुणाधरं काली-स्थानं पुनः पुनः॥



ध्यान के उपरान्त साधक वैताल सिद्धि माला से मंत्र की 3 माला मंत्र जप नित्य कम से कम 21 दिनों तक सम्पन्न करें। यह शाबर मंत्र छोटा होते हुए भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है और शाबरी तंत्र में इस मंत्र की अत्यन्त प्रशंसा की हुई है।



शाबर वैताल मंत्र

॥ॐ नमो आदेश गुरुजी को,वैताल तेरी माया से जो चाहे वह होये,तालाब के वीर-वैताल यक्ष बनकर यक्षिणियों संग चले,शिव का भक्त माता का सेवक मेरा कह्यो कारज करे,इतना काम मेरा ना करो तो राजा युधिष्ठिर का गला सूखे,(यहां पर मैं आगे का मंत्र नही लिख रहा हु,क्योके मंत्र गोपनीय होने के कारण अधूरा रखना ही बेहतर है) ॥



मंत्र जप करते समय किसी प्रकार आलस्य नहीं लायें, शांत भाव से मंत्र जप करते रहें। यदि खिड़की, दरवाजे खड़खड़ाने लगे तो भी अपने स्थान से न उठें। मंत्र जप के पश्चात् बेसन के लड्डुओं का भोग यंत्र के सामने अर्पित कर दें।
वास्तव में ही यह अत्यन्त गोपनीय प्रयोग है, अतः यह प्रयोग सामान्य व्यक्ति को, निन्दा करने वाले को, तर्क करने वाले दुराचारी को नहीं देना चाहिए और न इसकी विधि समझानी चाहिए।

यह साधना संपन्न करने हेतु ईमेल के माध्यम से सम्पर्क करें- snpts1984@gmail.com और आपको साधना सामग्री हेतु भी जानकारी दिया जाएगा ।




आदेश............

17 Aug 2017

सूर्यग्रहण साधना



ग्रहण एक महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक घटना है जिसके दूरगामी दुष्प्रभाव होते हैं और अनिष्ट शक्तियां इनका लाभ उठातीं हैं ।
हम जहां रह रहे हैं यदि उस क्षेत्र में ग्रहण दिखार्इ दे रहा हो, तो सभी आध्यात्मिक सावधानियां रखना आवश्यक है । पूरे वर्ष नियमित साधना करने से ग्रहण के दुष्प्रभाव कम करने में सहायता प्राप्त होती है । साथ ही यदि कोई ग्रहण काल में तीव्र साधना करता है तो उसे इसका व्यक्तिगत सकारात्मक लाभ भी आध्यात्मिक दृष्टि से प्रगति के रूप में होता है ।
चंद्र की अपेक्षा सूर्य पृथ्वी पर जीवन के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है । सूर्य को सूक्ष्म अथवा स्थूल स्तर पर अवरुद्ध करने से पृथ्वी सूक्ष्म एवं अमूर्त रूप से अधिक संवेदनशील हो जाती है जिसके कारण वातावरण अनिष्ट शक्तियों के (भूत, प्रेत, पिशाच इ.) लिए अधिक पोषक बन जाता है ।


ग्रहण काल में साधना करने से वातावरण के बढे हुए रज-तम एवं काली शक्ति के प्रभाव को निष्प्रभ किया जा सकता है । इसलिए यदि कोई व्यक्ति ग्रहण काल में तीव्र साधना करता है तो वह अवश्य ही काली शक्तियों के दुष्प्रभाव से बच सकता है । एक ग्रहण से होनेवाले दूसरे ग्रहण तक काली शक्तियों के दुष्प्रभाव से बचने हेतु नित्य साधना करना मूर्खता है,इसलिए ग्रहण काल मे दुष्प्रभाव से बचने हेतु साधना करे और पूर्ण लाभ उठाएं । आजकल कुछ लोगो ने दुष्प्रभाव को ग्रहो का खेल बना दिया है जिसके कारण बहोत सारे लोगो का पेट रत्न बेचने से भर रहा है परंतु हमे यहां कुछ तो समझना ही होगा के हम जीवन मे आध्यात्मिक/भौतिक प्रगति कैसे करेगे? क्युके आज के समय मे सामान्य जीवन जीना एक श्राप बन चुका है,जिसके पास धन ना हो वह हर जगह हार जाता है ।


आज मैं धन-धान्य से संबंधित साधना दे रहा हु,जिसे ग्रहण काल मे संपन्न करना प्रत्येक व्यक्ति के लिये आवश्यक है । जो लोग ग्रहण काल को मजाक में लेते है शायद वह दुख-संकट के समय मे भी हँसते हो परंतु जिन्हें दुख-दर्द-संकट का एहसास है वह लोग इस साधना से खुशिया प्राप्त कर सकते है ।
ग्रहण भारत में दृश्य नहीं होगा अतः इसका धार्मिक दृष्टिकोण से शुभाशुभ प्रभाव भी मान्य नहीं होगा। परंतु ज्योतिषीय दृष्टिकोण से इसका प्रभाव संपूर्ण विश्व पर पड़ेगा । ग्रहण चाहे दुनिया के किसी भी क्षेत्र में हो परंतु उसका असर सभी प्राणियों पर होता है,यह ग्रहण भारत मे दृश्य नही है तो कोई बात नही पर साधना सिद्धियों हेतु पूर्णतः एक अपेक्षाकृत योग है और इस अवसर का लाभ उठाना प्रत्येक साधक का कार्य है ।



चाणक्य ने तो स्पष्ट कहा है कि-

त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं
पुत्राश्च दाराश्च सुहज्जनाश्च।
तमर्शवन्तं पुराश्रयन्ति अर्थो
हि लोके मनुषस्य बन्धुः॥

निर्धन हो जाने पर मनुष्य को पत्नी, पुत्र, मित्र, निकट सम्बन्धी, नौकर और हितैषी जन सभी छोड़कर चले जाते हैं और जब पुन: धन प्राप्त हो जाता है तो फिर से उसी के आश्रय में आ जाते हैं। शास्त्रों में भी ‘ धर्मार्थ काम मोक्षाणां पुरुषार्थ चतुष्टयम्’ कहकर मनुष्य की उन्नति के लिए चार प्रकार के पुरुषार्थ बतायें हैं, जिसमें सबसे पहला पुरुषार्थ धर्म, दूसरा अर्थ (लक्ष्मी प्राप्ति), तीसरा काम (सन्तान उत्पन्न करना) और चौथा मोक्ष प्राप्ति के लिए साधना आदि सम्पन्न करना है ।

दरिद्रता एवं दुःख को यदि जड़ से उखाड़ फेंकना हो, तो सूर्य ग्रहण मे कमला तंत्र वर्णित लक्ष्मी के मूल स्वरूप की ‘कमला साधना’ अवश्य सम्पन्न करें। इस साधना को जो भी साधक श्रेष्ठ मुहूर्त (सूर्य ग्रहण) में पूर्ण विधि-विधान से करता है, उसके जीवन की दरिद्रता समाप्त हो जाती है और उसका दुर्भाग्य, सौभाग्य में परिवर्तित हो जाता है।




साधना विधि-विधान:-


कमला तंत्र के अनुसार सूर्य ग्रहण से पूर्व साधक स्नान, ध्यान कर पीले वस्त्र धारण कर पीले आसन पर उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठ जाएं और अपने सामने एक बाजोट पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर लक्ष्मी चित्र स्थापित कर दें। लक्ष्मी जी के चित्र के समीप ही गुरु चित्र स्थापित कर, गुरु चित्र का पंचोपचार पूजन कर लें (जिनके गुरु ना हो वह शिव पूजन करे) । इसके पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर नवग्रहों की शांति हेतु प्रार्थना करें ।


नवग्रह प्रार्थना –

ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च गुरुश्च शुक्रः शनि राहुकेतवः सर्वेग्रहाः शांतिकरा भवन्तु॥

नवग्रह प्रार्थना के पश्चात् एक थाली में नया पीला वस्त्र बिछाकर उसे बाजोट पर रख दें, कपड़े के ऊपर सिन्दूर से सोलह बिन्दियां लगावें। सबसे ऊपर चार फिर उनके नीचे चार-चार बिन्दियां चार पक्तियों में, इस प्रकार कुल 16 बिन्दियां लगा कर प्रत्येक बिन्दी पर एक-एक लौंग तथा एक-एक इलायची रख कर फिर इनका अष्टगंध से पूजन करें और हाथ जोड़कर निम्न ध्यान मंत्र का उच्चारण करें –


उद्यन्मार्तण्ड-कान्ति-विगलित
कवरीं कृष्ण वस्त्रवृतांगाम्।
दण्डं लिंगं कराब्जैर्वरमथ
भुवनं सन्दधतीं त्रिनेत्राम्॥

नाना रत्नैर्विभातां स्मित-मुख
-कमलां सेवितां देव-देव-सर्वै
र्भार्यां रा ज्ञीं नमो भूत स-रवि-कल
-तनुमाश्रये ईश्वरीं त्वाम्॥


जो साधक संस्कृत पढ़े लिखे नहीं हैं, उनको चिंता नहीं करनी चाहिए और धीरे-धीरे शब्द उच्चारण करते हुए यह ध्यान मंत्र पढ़ सकते हैं।



इसके बाद दोनों हाथों में पुष्प तथा अक्षत लेकर निम्न मंत्र से अपने घर में भगवती कमला (लक्ष्मी जी का रूप) का आह्वान करते हुए चित्र  पर पुष्प, अक्षत समर्पित करें ,अब दाहिने हाथ मे थोड़ा जल लेकर विनियोग मंत्र बोले और जल को जमीन पर छोड़ दे-


विनियोग:-

ॐ ब्रह्मा ॠषये नमः शिरसि। गायत्रीश्छन्दसे नमः मुखे,श्री जगन्मातृ महालक्ष्म्यै देवतायै नमः हृदि,श्रीं बीजाय नमः गुह्ये,सर्वेष्ट सिद्धये मम धनाप्तये ममाभीष्टप्राप्तये जपे विनियोगाय नमः।


इसके बाद साधक सामने शुद्ध घृत का दीपक जलाएं, उसका पूजन करें तत्पश्चात् सुगन्धित अगरबत्ती प्रज्वलित करें, ऐसा करने के बाद साधक चित्र पर कुंकुम समर्पित करें, पुष्प तथा पुष्प माला पहनाएं, अक्षत चढ़ावें तथा नैवेद्य का भोग लगावें, सामने ताम्बूल, फल और दक्षिणा समर्पित करें।


भगवती कमला के आह्वान और पूजन के पश्चात् इस साधना में ‘कवच’ पाठ का विधान है। इस दुर्लभ कवच का पांच बार पाठ करें, जो महत्वपूर्ण है, कवच पाठ से चित्र का साधक के प्राणों से सीधा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, और साधना सम्पन्न करने पर साधक को ओज, तेज, बल, बुद्धि तथा वैभव प्राप्त होने लग जाता है। इस कवच का उच्चारण सनत्कुमार ने भगवती लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए किया था। कमला उपनिषद् में इस लघु कवच का अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रयोग है –



कमला कवच:-


ऐंकारी मस्तके पातु वाग्भवी सर्व सिद्धिदा।
ह्रीं पातु चक्षुषोर्मध्ये चक्षु युग्मे च शांकरी।

जिह्वायां मुख-वृत्ते च कर्णयोर्दन्तयोर्नसि।
ओष्ठाधरे दन्त पंक्तौ तालु मूले हनौ पुनः॥

पातु मां विष्णु वनिता लक्ष्मीः श्री विष्णु रूपिणी।
कर्ण-युग्मे भुज-द्वये-रतन-द्वन्द्वे च पार्वती॥

हृदये मणि-बन्धे च ग्रीवायां पार्श्वयोर्द्वयोः।
पृष्ठदेशे तथा गृह्ये वामे च दक्षिणे तथा॥

स्वधा तु-प्राण-शक्त्यां वा सीमन्ते मस्तके तथा।
सर्वांगे पातु कामेशी महादेवी समुन्नतिः॥

पुष्टिः पातु महा-माया उत्कृष्टिः सर्वदावतु।
ॠद्धिः पातु सदादेवी सर्वत्र शम्भु-वल्लभा॥

वाग्भवी सर्वदा पातु, पातु मां हर-गेहिनी।
रमा पातु महा-देवी, पातु माया स्वराट् स्वयं॥

सर्वांगे पातु मां लक्ष्मीर्विष्णु-माया सुरेश्वरी।
विजया पातु भवने जया पातु सदा मम॥

शिव-दूती सदा पातु सुन्दरी पातु सर्वदा।
भैरवी पातु सर्वत्र भैरुण्डा सर्वदावतु॥

पातु मां देव-देवी च लक्ष्मीः सर्व-समृद्धिदा।
इति ते कथितं दिव्यं कवचं सर्व-सिद्धये॥



वास्तव में ही यह कवच जो कि ऊपर स्पष्ट किया गया है अपने आप में महत्वपूर्ण है, यदि साधक नित्य इसके ग्यारह पाठ करता है, तो भी उसे जीवन में धन, वैभव, यश सम्मान प्राप्त होता रहता है। प्रयोग में इसके पांच पाठ करें। कमला कवच के पाठ के पश्चात् ‘ कमल गट्टा माला ’ या " स्फटिक माला " का कुंकुम, अक्षत, पुष्प इत्यादि से पूजन करें और पूजन के पश्चात् ‘ जप माला ’ से निम्न कमला मंत्र की 16 माला मंत्र जप करें।



कमला मंत्र

॥ ॐ ऐं ईं हृीं श्रीं क्लीं ह्सौः जगत्प्रसूत्यै नमः॥

Om aing ing hreeng shreeng kleeng hasoum jagatprasutyai namah


जब सोलह माला मंत्र जप हो जाय तब भगवती लक्ष्मी की विधि-विधान के साथ आरती सम्पन्न करें ।


ग्रहण के बाद भी साधक को 21 दिनों तक नित्य 1 माला जाप करते रहना चाहिए और साधना काल मे साधनात्मक नियमो का भी पालन करे । मैं कुछ  साधनात्मक नियम बता देता हूं जो जरूरी है,प्रथम नियम साधना नित्य एक ही समय पर करे,दूसरा नियम स्त्री को जब राजस्वाल हो तो उस समय उनके हाथों बना भोजन ना करे और उनका स्पर्श भी ना होने दे,तीसरा नियम साधना में ब्रम्हचैर्यत्व का पालन करे,आखरी नियम मास-मदिरा का त्याग कर । जिसने भी ये चार नियम समझलिये उसका जीवन साधना के क्षेत्र में अद्वितीय हो सकता है । इस साधना के बाद आपको जीवन मे किसी भी प्रकार की कोई भी कमी ना पड़े यही संकल्प मैं इस ग्रहण में करने वाला हूँ ताकि आपका जीवन अद्वितीय बन सके ।


ग्रहण का समय:-इस बार 21 अगस्त को सूर्य ग्रहण पड़ रहा है। भारतीय समय के मुताबिक यह ग्रहण रात में 9.15 मिनट से शुरु होगा और रात में 2.34 मिनट पर खत्म होगा। भारत में इस दौरान रात रहेगी तो यहां पर कहीं भी सूर्य ग्रहण दिखाई नहीं देगा परंतु साधको के लिये यह एक साधना सिद्धि हेतु महत्वपूर्ण समय माना जायेगा ।







आदेश.........

18 Jul 2017

शिव शाबर मंत्र सिद्धि

इंसान के जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष यह चुनने की कोशिश है कि क्या सुंदर है और क्या भद्दा, क्या अच्छा है और क्या बुरा? लेकिन अगर आप हर चीज के इस भयंकर संगम वाली शख्सियत को केवल स्वीकार कर लेते हैं तो फिर आपको कोई समस्या नहीं रहेगी।

समस्या सिर्फ आपके साथ है कि आप किसे अपनाएं व किसे छोड़ें और यह समस्या मानसिक समस्या है, न कि जीवन से जुड़ी समस्या। यहां तक कि अगर आपका दुश्मन भी आपके बगल में बैठा है तो आपके भीतर मौजूद जीवन को उससे भी कोई दिक्कत नहीं होगी। आपका दुश्मन जो सांस छोड़ता है, उसे आप लेते हैं। आपके दोस्त द्वारा छोड़ी गई सांसें आपके दुश्मन द्वारा छोड़ी गई सांसों से बेहतर नहीं होती है। दिक्कत सिर्फ मानसिक या कहें मनोवैज्ञानिक स्तर पर है। अस्तित्व के स्तर पर देखा जाए तो कोई समस्या नहीं है।

घोर का मतलब है – भयंकर। अघोरी का मतलब है कि ‘जो भयंकरता से परे हो’। शिव एक अघोरी हैं, वह भयंकरता से परे हैं। भयंकरता उन्हें छू भी नहीं सकती।

एक अघोरी जब इस अस्तित्व को अपनाता है तो वह उससे प्रेम के चलते नहीं अपनाता, वह इतना सतही या कहें उथला नहीं है, बल्कि वह जीवन को अपनाता है। वह अपने भोजन और मल को एक ही तरह से देखता है। उसके लिए जिंदा और मरे हुए शरीर में कोई अंतर नहीं है। वह एक सजी संवरी देह और व्यक्ति को उसी भाव से देखता है, जैसे एक सड़े हुए शरीर को। इसकी सीधी सी वजह है कि वह पूरी तरह से जीवन बन जाना चाहता है। वह अपनी दिमागी या मानसिक सोचों के जाल में नहीं फंसना चाहता।

कोई भी चीज उनमें घृणा नहीं पैदा कर सकती। वह हर चीज को, सबको अपनाते हैं। ऐसा वह किसी सहानुभूति, करुणा या भावनाओं के चलते नहीं करते, जैसा कि आप सोचते होंगे। वे सहज रूप से ऐसा करते हैं, क्योंकि वो जीवन की तरह हैं। जीवन सहज ही हरेक को गले लगाता व अपनाता है।

शिव जी का व्यक्तित्व विशाल है, अनेक आयामों से देखकर उनके अनेक नाम रखे गये हैं:

1. महेश्वर- महाभूतों के ईश्वर होने के कारण तथा सूंपूर्ण लोकों की महिमा से युक्त।

2. बडवामुख- समुद्र में स्थित मुख जलमय हविष्य का पान करता है।

3. अनंत रुद्र- यजुर्वेद में शतरूप्रिय नामक स्तुति है।

4. विभु और प्रभु- विश्व व्यापक होने के कारण।

5. पशुपति- सर्पपशुओं का पालन करने के कारण।

6. बहुरूप- अनेक रूप होने के कारण।

7. सर्वविश्वरूप- सब लोकों में समाविष्ट हैं।

8. धूर्जटि- धूम्रवर्ण हैं।

9. त्र्यंबक- आकाश, जल, पृथ्वी तीनों अंबास्वरूपा देवियों को अपनाते हैं।

10. शिव- कल्याणकारी, समृद्धि देनेवाले हैं।

11. महादेव- महान विश्व का पालन करते हैं।

12. स्थाणु- लिंगमय शरीर सदैव स्थिर रहता है।

13. व्योमकेश- सूर्य-चंद्रमा की किरणें जो कि आकाश में प्रकाशित होती हैं, उनके केश माने गये हैं।

14. भूतभव्यभवोद्भय- तीनों कालों में जगत् का विस्तार करनेवाले हैं।

15. वृषाकपि- कपि अर्थात श्रेष्ठ, वृष धर्म का नाम है।

16. हर- सब देवताओं को काबू में करके उनका ऐश्वर्य हरनेवाले।

17. त्रिनेत्र- अपने ललाट पर बलपूर्वक तीसरा नेत्र उत्पन्न किया था।

18. रुद्र- रौद्र भाव के कारण।

19. सोम- जंघा से ऊपर का भाग सोममय है। वह देवताओं के काम आता है और अग्नि- जंघा के नीचे का भाग अग्निवत् है। मनुष्य-लोक में अग्नि अथवा 'घोर' शरीर का उपयोग होता है।

20. श्रीकंठ- शिव की श्री प्राप्त करने की इच्छा से इन्द्र ने वज्र का प्रहार किया था। वज्र शिव ने कंठ को दग्ध कर गया था, अत: वे श्रीकंठ कहलाते हैं।

ऐसे अनेको नामो से शिव जी देवाधिदेव महादेव कहलाते है । अभी अमावस्या के बाद हम लोगो का श्रावण माह शुरू होगा और कुछ लोगो का श्रावण माह गुरुपूर्णिमा के बाद से ही शुरू हो गया है । आनेवाली अमावस्या के बाद पूर्णिमा तक बहोत ही अच्छे शुभ मुहूर्त है और ऐसे दुर्लभ मुहूर्त का लाभ प्रत्येक साधक को उठाना ही चाहिए ।

आज यहां दिया जानेवाला मंत्र साधना एक दुर्लभ साधना है,जिसका प्रभाव साधक के जीवन मे उसे कई सारे समस्याओं से मुक्ति दिला सकता है । जो शिवभक्त है,उनके लिए तो यह शाबर मंत्र शिवाशिष है । साधना संकल्प युक्त होकर सम्पन्न करे अर्थात मंत्र जाप से पूर्व दाहिने हाथ मे जल लेकर संकल्प करें "मैं अमुक गोत्रीय, अमुक पिता का पुत्र और अमुक नाम का साधक जीवन के समस्त दुःखो के नाश हेतू यह साधना प्रयोग सम्पन्न कर रहा हूं " । जिन्हें गोत्र पता ना हो वह साधक अपने जाती का उच्चारण करे , जिनके पिता का स्वर्गवास हुआ हो वह अपनी माता का नाम ले सकते है या किसी साधक के माता-पिता इस दुनिया मे ना हो तो उस जगह  "अमुक गुरु का शिष्य" उच्चारण करे ।

साधना अमावस्या के दिन से शुरू करे,सफेद वस्त्र और आसान आवश्यक है । किसी भी धातु के प्लेट में अष्टगंध से स्वस्तिक बनाये और उसपर किसी भी प्रकार का शिवलिंग स्थापित करे । मंत्र जाप से पूर्व शिव मानस पूजन अवश्य करे और शिव मानस पूजन हेतु आपको सिर्फ शिव मानस पूजन स्तोत्र पढ़ना है ।

“शिव मानस पूजा” अर्थात्; मन से भगवान की पूजा । मन से कल्पित सामग्री द्वारा की जाने वाली पूजा को ही मानस पूजा कहा जाता है। मानस पूजा की रचना आदि गुरु शंकराचार्य जी ने की है। “शिव मानस पूजा” में हम प्रभू को भक्ति द्वारा मानसिक रूप से तैयार की हुई वस्तुएं समर्पित करते हैं; अर्थात; किसी भी बाहरी वस्तुओं या पदार्थो का उपयोग नहीं किया जाता। मात्र मन के भावों मानस से ही भगवान को सभी पदार्थ अर्पित किए जाते हैं। शास्त्रों में भगवान “शिव मानस पूजा” को हजार गुना अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचित “शिव मानस पूजा” मंत्र में मन और मानसिक भावों से शिव की पूजा की गई है। इस पूजा की विशेषता यह है कि; इसमें भक्त भगवान को बिना कुछ अर्पित किए बिना मन से अपना सब कुछ सौंप देता है।

आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा रचे गए इस स्त्रोत में भगवान की ऐसी पूजा है जिसमें भक्त किसी भौतिक वस्तु को अर्पित किये बिना भी, मन से अपनी पूजा पूर्ण कर सकता है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिव मानस पूजा, भगवान शिव की एक अनुठी स्तुति है। यह स्तुति शिव भक्ति मार्ग के अत्यंत सरल एवं एक अत्यंत गुढ रहस्य को समझाता है। यह स्तुति भगवान भोलेनाथ की महान उदारता को प्रस्तुत करती है।

इस स्तुति को पढ़ते हुए भक्तों द्वारा भगवान शिव को श्रद्धापूर्वक मानसिक रूप से समस्त पंचामृत दिव्य सामग्री समर्पित की जाती है।
“शिव मानस पूजा” में मन: कल्पित यदि एक फूल भी चढ़ा दिया जाए, तो करोड़ों बाहरी फूल चढ़ाने के बराबर होता है। इसी प्रकार मानस- चंदन, धूप, दीप नैवेद्य भी भगवान को करोड़ गुना अधिक संतोष देते हैं। अत: मानस-पूजा बहुत अपेक्षित है।

वस्तुत: भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं, वे तो भाव के भूखे हैं। संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे परमेश्वर की पूजा की जा सके, इसलिए पुराणों में मानस-पूजा का विशेष महत्त्व माना गया है।

श्री शिव मानस पूजा स्तोत्र

रत्नैः कल्पित मासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्यांबरं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदांकितं चंदनम् ।
जाजीचंपकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं
देवदयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ १ ।।

सौवर्णे मणिखंडरत्नरचिते पात्रे घृतं पायसं भक्ष्यं
पंचविधं पयोदधियुतं रंभाफलं स्वादुदम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर खंडोज्ज्वलं
तांबूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभोस्वीकुरु ॥ २ ॥

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणाभेरि मृदंग काहलकला गीतं च नृत्यं तधा ।
साष्टांगं प्रणतिः स्तुति र्बहुविधा एतत्समस्तं
मया संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३ ॥

आत्मा त्वं गिरिजा मति स्सहचराः प्राणाश्शरीरं गृहं पूजते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधि स्थितिः ।
संचारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भोतवाराधनम् ॥ ४ ॥

करचरणकृतं वा कर्म वाक्कायजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत् क्षमस्व
शिवशिव करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥ ५ ॥

:: इति श्री शिवमानस पूजा स्तोत्रं संपूर्णम् ::

शिव मानस पूजन के बाद आपको दिए जाने वाले मंत्र का अमावस्या से पूर्णिमा तक रोज काम से 108 बार जाप करे । कोई साधक ज्यादा मंत्र जाप करना चाहता है तो वह कर सकता है,इस मंत्र के जाप हेतु आप रुद्राक्ष माला का उपयोग कर सकते है या फिर माला ना होतो तो 30-40 मिनट तक भी जाप कर सकते हो ।

मंत्र-

।। ॐ नमो आदेश गुरुजी को आदेश, नाथो के नाथ आदिनाथ कैलाशपती, गंगाधारी पवित्र करे सिद्धि हमारी ,डम-डम डमरू बजाके भोलेनाथ आओ,त्रिशूल चलाके अमुक बाधा भगाओ,मेरी भक्ति गुरु की शक्ति,चलो मंत्र ईश्वरी वाचा ।।

मंत्र छोटा है परंतु अत्यंत प्रभावशाली है,अमावस्या से पूर्णिमा तक जाप करने से मंत्र सिद्धि हो जाती है । इस मंत्र के सिद्धि से जिस साधक ने कोई भी सिद्धि प्राप्त की हो तो उसकी वह सिद्धि पवित्र होकर शक्तिशाली हो जाती है । मंत्र में अमुक के जगह पर आप किसी भी बाधा का उच्चारण कर सकते है जैसे भूत बाधा, तंत्र बाधा, नोकरी प्राप्ति में आनेवाली बाधा,व्यवसायिक बाधा,पढ़ाई में आनेवाली बाधा,विवाह बाधा/प्रेम विवाह बाधा,साधना सिद्धि बाधा,आजीविका बाधा और रोग बाधा......।

मंत्र जाप के समय साधक का मुँह उत्तर दिशा के तरफ हो और हो सके तो साधना के आखरी दिन साधक 108 आहुतियां शुद्ध देसी गाय के घी का अवश्य ही दे तो मंत्र सिद्धि पुर्ण हो सकती है ।
इस तरह से साधना सम्पन्न कर लाभ उठाएं ।

फेसबुक और व्हाट्सएप के भूखे कथित तांत्रिकों ये साधना तुम लोग भी कर लो,जितना यहां से मंत्र चुराकर पोस्ट करते हो उससे अच्छा तो उतनी बार पढकर पोस्ट किया होता तो कुछ काम अच्छे तुम्हारे भी अब तक बन जाते थे ।


आदेश.......

7 Jul 2017

चंद्रग्रहण साधना

आज का ये पोस्ट उन सभी के लिए है जो अपना भविष्य बेहतर बनाना चाहते है । सभी को स्वयं के भविष्य का चिंता होना चाहिए ताकि जीवन मे दुख और दर्द कम हो । मैने जीवन मे ऐसे कई बेकार साधक देखे है जो सिर्फ निंदा करने में तो कोई बुराइया करने में अपना समय बर्बाद कर देता है और ये सब कुछ एक अच्छे साधक के लक्षण नही होते है । कुछ मूर्ख किसी अच्छे गुरु से दीक्षा प्राप्त करके स्वयं को विशेष समझने लगते है और दूसरों की बुराइया करने में अपने गुरु के महानता को दाग लगा देते है । मैं ये बात अच्छेसे जानता हूं व्हाट्सएप जैसे तांत्रिक ग्रुपो में मेरे आर्टिकल लोग अपने नाम से चला रहे है,कोई बात नही । ये भी एक अच्छा ही कार्य है परंतु कम से कम इतना तो याद रखो "जिस दिन उस आर्टिकल पर तुमसे कोई सवाल पूछे तो उसे क्या जवाब दोगे?",इतना तुम्हे समझ होता तो तुम लोग चोरी ही क्यों करते ।

मेरे ईमेल आई.डी. में "निखिल" नाम लिखा हुआ है तो इसमें भी लोगो को समस्या है । आज तक इसका जवाब मुझे किसी से नही मिला के इन लोगो को निखिल नाम ईमेल आई.डी. में रखने में क्या समस्या है । यहां पर निखिल नाम से कुछ भी नही लिखा जाता है और नाही इस ब्लॉग पर निखिल नाम के प्रोडक्ट बेचे जाते है । निखिल नाम के प्रोडक्ट फेसबुक पर बेचने वालों की कोई कमी नहीं है और निखिल नाम पर दीक्षा देने वाले भी फेसबुक पर आझाद घूम रहे है,आजकल तो कुछ लोग निखिल नाम पर साधना शिबिर भी ले रहे है । शिबिर लेने का हक सिर्फ जोधपुर में सुरक्षित है परंतु आज उनके शिष्य ही गुरु बन गए है,मैं आज फिर से एक बार इस ब्लॉग के माध्यम से लिखना चाहता हूँ "बुरी नजर वाले तेरा मुह काला",वैसे तो ये ट्रक पर ज्यादा लिखा जाता है परंतु कुछ मूर्खो ने अपने नाम को इज्जत देने के लिये मेरे नाम का इस्तेमाल करके बुराइया करने का संकल्प लिया है । माताराणी से प्रार्थना करता हु के तुम्हारा संकल्प पूर्ण होता रहे और तुम्हे इतनी तो बुद्धि मीले के तुम लोग मेरा चिंतन भगवान से ज्यादा ना करो ।

कई लोग मुझे कहते है,हमे आपसे गुरुदीक्षा लेना है परंतु साधक मित्रो मैं यह बात आज साफ साफ लिख देता हूं "मैं गुरुदीक्षा नही देता हूँ,मुझे गुरु बनने का कोई लालच नही है" । मेरा आज तक कोई भी एक शिष्य नही है,जब भी मुझे दीक्षा हेतु फोन आते है तो मैं उन्हें यही कहेता हु "ये रहा गुरुमंत्र और आज से तुम्हारे गुरु जो है वह गोरखनाथ जी है" , यह कार्य निशुल्क होता है । मेरे बारे में मूर्खो ने कही सारे वहम पाल के रखे है जो सही नही है,ये बात मैं उन लोगो को समझा रहा हु जो गलत सोच रखते है और सुबह-शाम फेसबुक की सेवा करते है । कुछ पालना ही है तो मेरे नाम से कुत्ता ही पालो,मुझे सही में अच्छा महसूस होगा परंतु वहम मत पालो । ये वहम पालने वाले लोग हाथ मे चूड़ियां पहनकर चुगलियां करते रहते है और स्वयं को तंत्र की कुछ किताबे पढकर प्रकांड तांत्रिक समजते है । चलिये अब गधो पर बात करने से अच्छा आगे बढ़ते हुए हम लोग साधना पर बात करते है ।

यह साधना ग्रहण काल मे शुरू करने से सफलता निच्छित मानी जाती है । इस साधना को प्रामाणिकता से करो तो तुम्हारा जीवन वर्तमान जीवन से बेहतर हो जाएगा, आज मैं सभी को चुनौती देकर बोल रहा हु "यह सरस्वती साधना है,इसको संपन्न कर ही लो तो बहोत कुछ अच्छा होगा " ।

साधना के फायदे भी लिख देता हूं,नही तो चंद्रग्रहण के अवसर पर यह साधना आप लोग नही करोगे । इस साधना से स्मरणशक्ति बढ़ती है,व्यवसाय में वृद्धि होती है,जिन्हें सरकारी नोकरी चाहिए उनके लिये यह साधना अमृत है,इस साधना से स्वयं का भूत-भविष्य-वर्तमान भी देखा जा सकता है और माताराणी ने चाहा तो दूसरो का भी देख सकते हो । यह साधना मैं अपने मानसपुत्र सागर मशरू से करवाना चाहता था परंतु वो अभी बच्चा है 16 वर्ष का और चमत्कार के पीछे पागल है । जब के इसी साधना के भरोसे उसने दसवीं कक्षा में अच्छे अंक प्राप्त किये परंतु वह इस साधना के फायदों से अब तक अनजान था,अब नही रहेगा और साथ मे एक और व्यक्ति वीर राजपूत ये साधना कर ले तो अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा । शायद ये दोनों यह साधना पढ़े तो मुझे खुशी होगी,इन दोनों के साथ-साथ आप सभी यह साधना संपन्न करें ।

मैं गारंटी के साथ बोल रहा हूं,यह साधना जो भी करेगा उसको फायदा ही हो सकता है और किसी भी प्रकार का कोई नुकसान नही हो सकता है । इस साधना से इच्छाएं भी पुर्ण हो सकती है साथ मे वशिकरण क्रिया भी संभव है मेरे प्यारे प्रेम के रोगियों । वैसे तो मैं वशिकरण क्रिया के खिलाफ हु परंतु क्या करे प्रेमवीरो का दिल भी रखना पड़ता है,जिस दिन आज ये प्रेम के रोगी किसी को वश में करके विवाह करना चाहते है,भविष्य में इनके ही लड़की/लड़के को कोई भी वश कर सकता है और वह लड़का/लड़की बुरे भी हो सकते है । शायद इन्हें तब ये क्रिया बुरी लग सकती है,आज तो सभी प्रेमरोगी/प्रेमवीर प्यार के नशे में पागल हो चुके है तो कुछ लोग अपने अय्याशी के लिए किसी को वश में करना चाहते है । ये सब कुछ अच्छा नही है,सबके पास निर्णय लेने का हक है अब अगर आपका पार्टनर ब्रेक अप कर रहा है तो ये उसकी आझादी है । आप उसको वशिकरण क्रिया से बंदी बनाकर क्या करोगे,कोई इससे ख़ुश नही रह सकता है । हा, मैं मानता हूं "आपको इसमे दर्द हुआ तकलीफ हुई परंतु जबरदस्ती करके क्या हासिल करोगे,प्यार?",जबरदस्ती प्रेम को प्राप्त करना फायदेमंद साबित नही होता है । अगर आपका पार्टनर आपसे भटक गया होतो वशिकरण क्रिया अवश्य करना ही चाहिए,यह अच्छी बात है ।

शायद अब ज्ञान की बाते बहोत हो गयी,अब सिर्फ साधानात्मक चिंतन होना चाहिए और मेरा भी चिंतन ना करो । 7 ऑगस्ट को चंद्र ग्रहण है जो हमारे देश मे दिखेगा,यह खंडच्छाया युक्त ग्रहण है परन्तु इसका भी महत्व माना जायेगा । ग्रहण रात्रि में 9.20 मिनट पर शुरू होगा और 2.20 मिनट पर समाप्त होगा,मतलब यह ग्रहण 5 घंटे तक का है । चंद्रग्रहण पर एक बार मंत्र जाप करने का अर्थ है एक लाख बार जाप करना,तो इसीलिए हम जो भी मंत्र साधना का आवश्यकता हो वह मंत्र जाप कर लेना चाहिए ।

मंत्र:-

।। ॐ श्रीं ह्रीं हसौ: हूं फट निलसरस्वत्यै स्वाहा ।।
Om shreem hreem hasouh hoom phat nilasaraswatyai swaahaa

ग्रहण काल मे मंत्र का ज्यादा से ज्यादा जाप करे,दिशा उत्तर,आसन-वस्त्र सफेद या नीले रंग के हो,माला स्फटिक या नीले हकीक का हो और माला नही हो तो भी बिना गिनती किये जाप कर सकते हो ।
ग्रहण साधना के बाद नित्य 21 दिनों तक रात्री में 9 बजे के बाद 11 माला जाप या फिर 30 मिनट जाप किया करे ।

हो सके तो इस आर्टिकल के लिंक को अपने व्हाट्सएप ग्रुप और फेसबुक ग्रुप या प्रोफाइल पर शेयर करे ताकि चंद्रग्रहण के उच्चतम समय का और इस साधना का सभी लाभ उठा सके । यह आर्टिकल जनकल्याण हेतु है और इसको आप शेयर करके सभी लोगो की मदत करेगे यही मैं आप सभी से उम्मीद रखता हूं । जिन लोगो को लिंक शेयर करने में शर्म आता है वह इसमें ना पड़े,आगे आपकी मर्जी.......

आदेश.........