5 Oct 2015

नवग्रह दोष निवारण (छिन्नमस्ता साधना).

नाथ पंथ सहित बौद्ध मताब्लाम्बी भी देवी की उपासना करते हैं, भक्त को इनकी उपासना से भौतिक सुख संपदा वैभव की प्राप्ति, बाद विवाद में विजय, शत्रुओं पर जय, सम्मोहन शक्ति के साथ-साथ अलौकिक सम्पदाएँ प्राप्त होती है, इनकी सिद्धि हो जाने पर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता, दस महाविद्यायों में प्रचंड चंड नायिका के नाम से व बीर रात्रि कह कर देवी को पूजा जाता है देवी के शिव को कबंध शिव के नाम से पूजा जाता है छिन्नमस्ता देवी शत्रु नाश की सबसे बड़ी देवी हैं,भगवान् परशुराम नें इसी विद्या के प्रभाव से अपार बल अर्जित किया था,गुरु गोरक्षनाथ की सभी सिद्धियों का मूल भी देवी छिन्नमस्ता ही है.देवी नें एक हाथ में अपना ही मस्तक पकड़ रखा हैं और
दूसरे हाथ में खडग धारण किया है देवी के गले में मुंडों की माला है व दोनों और
सहचरियां हैं देवी आयु, आकर्षण,धन,बुद्धि मे वृद्धि एवं रोगमुक्ति व शत्रुनाश विशेष रूप से करती है.

देवी की स्तुति से देवी की अमोघ कृपा प्राप्त होती है.

स्तुति:-

ll छिन्न्मस्ता करे वामे धार्यन्तीं स्व्मास्ताकम, प्रसारितमुखिम भीमां लेलिहानाग्रजिव्हिकाम, पिवंतीं रौधिरीं धारां निजकंठविनिर्गाताम,
विकीर्णकेशपाशान्श्च नाना पुष्प समन्विताम, दक्षिणे च करे कर्त्री मुण्डमालाविभूषिताम, दिगम्बरीं महाघोरां प्रत्यालीढ़पदे स्थिताम, अस्थिमालाधरां देवीं नागयज्ञो पवीतिनिम, डाकिनीवर्णिनीयुक्तां वामदक्षिणयोगत: ll

देवी की कृपा से साधक मानवीय सीमाओं को पार कर देवत्व प्राप्त कर लेता है.गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए देवी योगमयी हैं ध्यान समाधी द्वारा भी इनको प्रसन्न किया जा सकता है.इडा पिंगला सहित स्वयं देवी सुषुम्ना नाड़ी हैं जो कुण्डलिनी का स्थान हैं.देवी के भक्त को मृत्यु भय नहीं रहता वो इच्छानुसार जन्म ले सकता है.देवी की मूर्ती पर रुद्राक्षनाग केसर व रक्त चन्दन चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है.महाविद्या छिन्मस्ता के मन्त्रों से होता है आधी व्यादी सहित बड़े से बड़े दुखों का नाश कर देती है.
श्रीभैरवतन्त्र में कहा गया है कि इनकी आराधना से साधक जीवभाव से मुक्त होकर शिवभाव को प्राप्त कर लेता है.


साधना विधि:-

सर्वप्रथम देवी का प्रचंड चंडिका मंत्र "ऐं श्रीं क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचिनिये ह्रीं ह्रीं फट स्वाहा" को बोलते हुए अपने शरीर पर साधना मे बैठकर पानी के छीटे लगाये.
फिर नवग्रह दोष निवारण हेतु माँ से प्रार्थना करे और दीये हुए मंत्र का जाप मंगलवार से नित्य नौ दिनो तक ग्यारह माला (रुद्राक्ष माला) जाप करे.दिशा-उत्तर,आसन-वस्त्र-लाल रंग के,समय रात्री मे 9 बजे के बाद और दसवे दिन 108 बार घी की आहुति  मंत्र बोलकर देना है.
यह विधान पूर्ण होते-होते ही साधक को कई अनुभुतिया होती है परंतु घबराना नही चाहिये.साधना समाप्ती के बाद नवग्रह दोष का निवारण होता है.



माँ छिन्नमस्ता नवग्रहदोष निवारण मंत्र:-

llॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं वं वज्रवैरोचिनिये हुमll

(om shreem hreem aim kleem vam vajravairochiniye hoom)


मंत्र जाप के बाद देवी की स्तुती करे जो दि हुयी है.मंत्र का सही उच्चारण करने से ही लाभ प्राप्त होगा अन्यथा नही होगा.साधना काल मे ज्यादा से ज्यादा मौन रहेने से तीव्र अनुभुतिया प्राप्त होती है,हवन के समय मंत्र के आखरी मे "स्वाहा" लगाना नही भूलना चाहिये.

माँ चिंतापुरिनी आपका भला करे.....


आदेश......

4 Oct 2015

दसमहाविद्या स्तोत्र प्रयोग.

ll दसमहाविद्यास्तोत्रम् ll

ॐ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि ॥ १॥

शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम् ॥ २॥

जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम् ।
करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ ३॥

हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम् ।
गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालङ्कारभूषिताम् ॥ ४॥

हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम् ।
सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरङ्गणैर्युताम् ॥ ५॥

मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां
लिङ्गशोभिताम् ।
प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम् ॥ ६॥

उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम् ।
नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम् ॥ ७॥

श्यामाङ्गीं श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम्।
प्रणमामि जगद्धात्रीं गौरीं सर्वार्थसाधिनीम्
॥ ८॥

विश्वेश्वरीं महाघोरां विकटां
घोरनादिनीम् ।
आद्यामाद्यगुरोराद्यामाद्यनाथप्रपूजिताम् ॥
९॥

श्रीं दुर्गां धनदामन्नपूर्णां पद्मां सुरेश्वरीम् ।
प्रणमामि जगद्धात्रीं चन्द्रशेखरवल्लभाम् ॥ १०॥

त्रिपुरां सुन्दरीं बालामबलागणभूषिताम् ।
शिवदूतीं शिवाराध्यां शिवध्येयां सनातनीम् ॥ ११॥

सुन्दरीं तारिणीं सर्वशिवागणविभूषिताम् ।
नारायणीं विष्णुपूज्यां ब्रह्मविष्णुहरप्रियाम् ॥
१२॥

सर्वसिद्धिप्रदां नित्यामनित्यां
गुणवर्जिताम् ।
सगुणां निर्गुणां ध्येयामर्चितां सर्वसिद्धिदाम् ॥ १३॥

विद्यां सिद्धिप्रदां विद्यां महाविद्यां
महेश्वरीम् ।
महेशभक्तां माहेशीं महाकालप्रपूजिताम् ॥ १४॥

प्रणमामि जगद्धात्रीं शुम्भासुरविमर्दिनीम् ।
रक्तप्रियां रक्तवर्णां रक्तबीजविमर्दिनीम् ॥
१५॥

भैरवीं भुवनां देवीं लोलजिव्हां सुरेश्वरीम् ।
चतुर्भुजां दशभुजामष्टादशभुजां शुभाम् ॥ १६॥

त्रिपुरेशीं विश्वनाथप्रियां विश्वेश्वरीं शिवाम् ।
अट्टहासामट्टहासप्रियां धूम्रविनाशिनीम् ॥ १७॥

कमलां छिन्नभालाञ्च मातङ्गीं सुरसुन्दरीम्।
षोडशीं विजयां भीमां धूमाञ्च वगलामुखीम् ॥ १८॥

सर्वसिद्धिप्रदां सर्वविद्यामन्त्रविशोधिनीम् ।
प्रणमामि जगत्तारां साराञ्च मन्त्रसिद्धये ॥
१९॥

इत्येवञ्च वरारोहे स्तोत्रं सिद्धिकरं परम् ।
पठित्वा मोक्षमाप्नोति सत्यं वै गिरिनन्दिनि ॥ २०॥

इति दसमहाविद्यास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

यह गोपनिय दसमहाविद्या स्तोत्र है और इसके पठन से समस्त प्रकार की बाधा से मुक्ती मिलती मिलती है और साधक का जीवन शक्तिपूर्ण बनता है.जीवन के प्रत्येक समस्या का निवारण इसी स्तोत्र से होता है.किसी भी शक्ति साधना मे इस स्तोत्र के पठन से माँ भगवती प्रसन्न होती है.साधक चाहे तो नित्य स्तोत्र का 1,3,5,7,9,11,21.....108 बार पठन कर सकता है सिर्फ उच्चारण शुद्ध होना चाहिये और शरीर भी स्नान करके शुद्ध होना जरुरी है.

माँ भगवती आपका कल्याण करे,यही कामना करता हू.....

आदेश.....

शाबर धूमावती मंत्र.

धूमावती देवी का स्वरुप बड़ा मलिन और
भयंकर प्रतीत होता है.धूमावती देवी का स्वरूप विधवा का है तथा कौवा इनका वाहन है,वह श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, खुले केश रुप में होती हैं. देवी का स्वरूप चाहे जितना उग्र क्यों न हो वह संतान के लिए कल्याणकारी ही होता है. मां धूमावती के दर्शन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती
है.पापियों को दण्डित करने के लिए इनका अवतरण हुआ.नष्ट व संहार करने की सभी क्षमताएं देवी में निहीत हैं.देवी नक्षत्र ज्येष्ठा नक्षत्र है इस कारण इन्हें ज्येष्ठा
भी कहा जाता है.ऋषि दुर्वासा, भृगु, परशुराम आदि की मूल शक्ति धूमावती हैं. सृष्टि कलह के देवी होने के कारण इनको कलहप्रिय भी कहा जाता है.चौमासा देवी का प्रमुख समय होता है जब देवी का पूजा पाठ किया जाता है.माँ धूमावती जी का रूप अत्यंत भयंकर हैं इन्होंने ऐसा रूप शत्रुओं के संहार के लिए ही धारण किया है. यह विधवा हैं,इनका वर्ण विवर्ण है, यह मलिन वस्त्र धारण करती हैं.केश उन्मुक्त और रुक्ष हैं.इनके रथ के ध्वज पर काक का चिन्ह है.इन्होंने हाथ में शूर्पधारण कर रखा है, यह भय-कारक एवं कलह-प्रिय हैं.

पौराणिक ग्रंथों अनुसार इस प्रकार रही है-
एक बार देवी पार्वती बहुत भूख लगने लगती है और वह भगवान शिव से कुछ भोजन की मांग करती हैं. उनकी बात सुन महादेव देवी पार्वती जी से कुछ समय
इंतजार करने को कहते हैं ताकी वह भोजन का प्रबंध कर सकें.समय बीतने लगता है परंतु भोजन की व्यवस्था नहीं हो पाती और देवी पार्वती भूख से व्याकुल हो
उठती हैं.क्षुधा से अत्यंत आतुर हो पार्वती जी भगवान शिव को ही निगल जाती हैं. महादेव को निगलने पर देवी पार्वती के शरीर से धुआँ निकलने लगाता है.
तब भगवान शिव माया द्वारा देवी पार्वती से
कहते हैं कि देवी,धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण तुम्हारा एक नाम धूमावती होगा. भगवान कहते हैं तुमने जब मुझे खाया तब विधवा हो गई अत: अब तुम इस वेश में ही पूजी जाओगी.दस महाविद्यायों में दारुण विद्या कह कर देवी को पूजा जाता है.

आज यहा आपको माँ धूमावती जी का शाबर मंत्र दे रहा हू जो समस्त प्रकार के कल्याण हेतु शीघ्र फलदायी है.मंत्र जाप के माध्यम से सभी कष्ट से राहत मिलती है.

साधना विधि-
नवरात्री मे साधना आरंभ करे,साधना 7 दिन की है और अष्टमी को हवन करके एक अनार का बलि देना है.काली हकिक माला से नित्य 11 माला जाप रात्री मे 9 बजे के बाद करे.आसन-वस्त्र काले रंग के हो.साधना मे चमेली के तेल का दीपक जलाये जो साधना काल मे बुझना नही चाहिये.


धुमावती मंत्र:-

ll ओम नमो आदेश गुरूजी को,धुमावती माई भुक से व्याकुल ग्रहण करो शत्रु मेरे,शिव की माया धुम्र का शरीर हरो कष्ट मेरे,दुहाई महादेव की ll

मंत्र अत्यन्त तीव्र है.हवन मे मंत्र से 108 बार आहुती दिजिये.हवन सामग्री मे सिर्फ घी का प्रयोग करे.


आदेश......

दुर्गा पुजन.(नवरात्री विशेष)

माँ दुर्गा जी की कोई छोटी प्रतिमा स्थापित करे और पुजन से पूर्व स्नान शुद्धि इत्यादी कर ले.अब पुजन प्रारंभ करते है-

हाथ में फ़ूल लेकर अंजलि बांध कर
दुर्गाजी का ध्यान करे। ध्यान का मंत्र इस प्रकार है:-

सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिभुजै:,
शंखं चक्रधनु:शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभि: शोभिता।
आमुक्तांगदहारकंकणरणत्कांचीरणन्नूपुरा,दुर्गा दुर्गति हारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥

(ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ओम दुर्गायै नम:)

अर्थ:- जो सिंह की पीठ पर विराजमान
है,जिनके मस्तक पर चन्द्रमा का मुकुट है,जो मरकतमणि के समान कान्तिवाली अपनी चार भुआओं में शंख चक्र धनुष और बाण धारण करती हैं,तीन नेत्रों से सुशोभित होती है,जिनके भिन्न भिन्न अंग बांधे हुये बाजूबंद हार कंकण खनखनाती हुई करधनी और रुनझुन करते हुये नूपुरों से विभूषित है,तथा जिनके कानों में रत्न जटित कुण्डल झिलमिलाते रहते है,वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करने वाली हों।

यदि प्रतिष्टित मूर्ति हो तो आवाहन की जगह पुष्पांजलि दें,नहीं तो दुर्गाजी का आवाहन करें।

आवाहन आगच्छ त्वं महादेवि ! स्थाने चात्र स्थिरा भव।
यावत पूजां करिष्यामि तावत त्वं संनिधौ भव॥
श्री जगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:।
दुर्गादेवीमावाहयामि। आवाहनार्थे पुष्पांजलि समर्पयामि ॥

(दोनो हाथों में फ़ूल लेकर प्रतिमा या आवाहन करने वाले नारियल के
ऊपर हाथ का पृष्ठ भाग नीचे रखकर चढायें।

आसन

अनेक रत्न संयुक्तम नाना मणि गणान्वितम। इदम हेममयम
दिव्यासनम प्रति गृह्यताम॥
श्री जगदाम्बायै दुर्गा देव्यै नम:। आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि।

(सजा हुआ आसन या प्रतिमा पर फूल चढाकर आसन पर स्थापित होने की प्रार्थना करें)

पाद्य

गंगादि सर्व तीर्थेभ्य आनीतम तोय
मुत्तमम।
पाद्यार्थम ते प्रदास्यामि ग्रहाण परमेश्वरि॥

(साफ़ बिना टोंटी के लोटे से प्रतिमा या नारियल में देवी के पैरों में जल चढायें).

अर्घ्य

गन्ध पुष्प अक्षतैर्युक्तम अर्घ्यम सम्पादितम मया।
ग्रहाण त्वम महादेवि प्रसन्ना भव सर्वदा॥

(पानी में लाल चन्दन घिसकर मिलालें,फ़ूल डाल लें,और चावल मिलाकर देवी के हाथों में लगायें)

आचमन

कर्पूरेण सुगन्धेन वासितम स्वादु शीतलम। तोयम आचमनीयार्थम ग्रहाण परमेश्वरि॥

(कोरे घडे से निकाला हुआ ठंडा जल,कपूर मिलाकर देवी को प्रार्थना करके उनको आचमन के लिये चढायें)

स्नान

मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापहरम शुभम। तदिदम कल्पितम देवि!
स्नार्थम प्रतिगृह्यताम॥

(गंगाजल या पवित्र नदी का जल लेकर प्रतिमा अथवा नारियल को स्नान करवाने का क्रम करें)

स्नानांग-आचमन

स्नानान्ते पुनराचमनीयम जलम समर्पयामि।

(स्नान के बाद आचमन के लिये शुद्ध कपूर मिला जल दें)

दुग्ध स्नान

कामधेनु सम उत्पन्नम सर्व ईशाम जीवनम
परम।
पावनम यज्ञ हेतुश्च पय: स्नानार्थम अर्पितम॥
(गाय के दूध से स्नान करवायें)

दधि स्नान

पयस अस्तु समुद भूतम मधुर अम्लम शशि प्रभम।
दध्यानीतम मया देवि! स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(गाय के दही से स्नान करवायें)

घृतस्नान

नवनीत सम उत्पन्नम सर्व संतोष कारकम।
घृतम तुभ्यम प्रदस्य अमि स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(गाय के घी से स्नान करवायें)

मधु स्नान

पुष्प रेणु सम उत्पन्नम सु स्वादु मधुरम मधु। तेज: पुष्टि
सम आयुक्तम स्नार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शहद से स्नान करवायें)

शर्करा स्नान

इक्षु सार सम अद्भुताम शर्कराम पुष्टिदाम शुभाम।मल
अपहारिकाम दिव्याम स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शक्कर से स्नान करवायें)

पंचामृत स्नान

पयो दधि घृत चैव मधु च शर्करान्वितम। पंचामृतम मय
आनीतम स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(किसी दूसरे बर्तन में दूध,दही,घी,शहद,शक्कर मिलाकर पंचामृत का निर्माण करें और किसी कांसे या चांदी के पात्र में इसी पंचामृत से स्नान करवायें)

गन्धोदक स्नान

मलयाचल सम्भूतम चन्दन अगरु मिश्रितम।
सलिलम देव देवेशि शुद्ध स्नानाय गृह्यताम॥

(सफ़ेद चंदन लकडी वाला घिसकर और अगर को पानी में घिस कर एक बर्तन में मिलाकर स्नान करवायें)

शुद्धोदक स्नान

शुद्धम यत सलिलम दिव्यम गंगाजल समम स्मृतम।
समर्पितम मया भक्त्या स्नानार्थम प्रति गृह्यताम॥

(शुद्ध जल से स्नान करवायें,और स्नान करवाने के बाद आचमन के लिये वही कपूर मिला शीतल जल दें)

वस्त्र पहिनाना

पट्ट युगमम मया दत्तम कंचुकेन समन्वितम।
परिधेहि कृपाम कृत्वा माता दुर्गति नाशिनि॥

(लाल रंग की कंचुकी पहिनायें,फ़िर लाल रंग की साडी या वेश पहिनायें और ऊपर सेचुनरी ओढायें,हाथों में लाल रंग की
मौली बांधे,फ़िर आचमन के लिये वही कपूर से युक्त शीतल जल आचमन के लिये दें)

सौभाग्यसूत्र

सौभाग्य सूत्रम वरदे सुवर्ण मणि संयुतम। कण्ठे बघ्नामि देवेशि सौभाग्यम देहि मे सदा॥

(मंगल सूत्र लाल धागे का पीले रंग के मोतियों से युक्त या स्वर्ण से बने मोतियों से युक्त देवी के गले में पहिनायें,माता पुत्र का मानसिक ध्यान करे)

चन्दन

श्रीखण्डम चन्दनम दिव्यम गन्ध आढ्यम
सुमनोहरम। विलेपनम सुर श्रेष्ठे चन्दनम प्रति गृह्यताम॥
(लकडी वाला लाल चन्दन शिला पर पानी के साथ घिस कर माता के माथे पर तिलक स्थान पर,दोनो कानों की लौरियों पर दोनो हाथों के बाजुओं पर और दोनो हाथों
की हथेलियों पर लगायें)

हरिद्राचूर्ण

हरिद्रा रंचिते देवि ! सुख सौभाग्य दायिनी। तस्मात त्वाम पूज्याम यत्र सुखम शान्तिम प्रयच्छ में॥

(हल्दी को पहले से घिसकर लेप बनाकर सुखा लें,फ़िर उसका चूर्ण पूजा के लिये सावधानी से रख ले,और माता के सभी अंगों पर लगायें,हल्दी को पीस कर या बाजार की हल्दी को पिसी हुयी लाकर कदापि नहीं चढायें)

कुंकुम

कुंकुमम कामदम दिव्यम कामिनी काम सम्भवम।
कुंकुमेन अर्चितम देवी कुंकुमम प्रति गृह्यताम॥

(माता के पैरों में कुंकुम लगायें,दोनो हाथों में लगायें)


सिन्दूर

सिन्दूरमरुणाभासम जपा कुसुम संनिभम। अर्पितम ते मया भक्त्या प्रसीद परमेश्वरि॥

(माता के माथे पर सिन्दूर की बिन्दी
लगायें,नाक की सीध में बालों के अन्दर
सिन्दूर भरें)

काजल

चक्षुर्भ्याम कज्जलम रम्यम सुभगे शान्ति कारकम।
कर्पूर्ज्योति समुत्पन्नम गृहाण परमेश्वरि॥

(कपूर को जलाकर उसकी लौ के ऊपर कांसे का बर्तन रखें थोडी सी देर में काले रंग का काजल बर्तन पर आजायेगा,उस काजल को माता की आंखों में नीचे की तरफ़ सावधानी से दाहिने हाथ की अनामिका उंगली से लगायें)

दूर्वांकुर

तृणकान्त मणि प्रख्य हरित अभि: सुजातिभि:।
दूर्वाभिराभिर्भवतीम पूजयामि महेश्वरि॥

(किसी नदी या साफ़ स्थान से हरी और सफ़ेद दूब जिसके अन्दर ऊपर के भाग
की तीन पत्तियों के अंकुर हों साफ़ करने
के बाद अपने पास रखलें,रोजाना लाना सम्भव नही हो तो पहले लाकर किसी साफ़ सफ़ेद कपडे को गीला करने के बाद उसके अन्दर लपेट कर रख दें,पीली दूब या सूखी दूब कभी नही चढायें,१०८ या कम से कम १८ अंकुर रोजाना जरूर चढाये)

आभूषण

हार कंकण केयूर मेखला कुण्डलादिभि:। रत्नाढ्यम हीरकोपेतम भूषणम प्रति गृह्यताम॥

(दुर्गापूजा से पहले ही माता के लिये स्वर्ण या रजत से निर्मित हार कंगन बाजूबंद कनकती कुन्डल पाजेब बिछिया जिनके अन्दर विभिन्न रत्न लगे हों बनवाकर रख लेना चाहिये,और पूजा में पहिनाने चाहिये,तथा मूर्ति विसर्जित होने पर
उनको किसी कन्या को दान कर देना चाहिये,या मूर्ति के साथ जाने देना चाहिये,भूलकर भी लोभ वश उन्हे अन्य
काम के लिये नहीं रखना चाहिये)

पुष्पमाला

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तित:।
मय आर्ह्यतानि पुष्पाणि पूजार्थम प्रति गृह्यताम॥

(अपने हाथ से लाल फ़ूलों की माला लाल रंग के धागे में अपने हाथों से पिरोना चाहिये,फ़ूल सौ से अधिक या कम
नही हों,एक बार या प्रतिमा के अनुसार दो बार तीन बार माला को घुमाकर दाहिने से पहिनानी चाहिये)

परिमल द्रव्य

अबीरम गुलालम च हरिद्रा आदि समन्वितम।
नाना परिमल द्रव्यम गृहाण परमेश्वरि॥

(सफ़ेद रंग की खडिया मिट्टी को
पीसकर लाल रंग और सुगन्धित केवडा आदि मिलाकर अबीर तैयार करना
चाहिये,हल्दी,चन्दन,छोटी इलायची और तेज पत्ता को पीसकर गुलाल तैयार करना चाहिये,हल्दी का पहले तैयार किया चूर्ण
कपूर पीस कर मिलाकर तैयार करना चाहिये,और माता के चारों तरफ़ दाहिने से बायें चढाना चाहिये)

सौभाग्य पेटिका

हरिद्राम कुंकुमम चैव सिन्दूरादि समन्वितम। सौभाग्यपेटिकामेताम
गृहाण परमेश्वरि॥

(हल्दी का चूर्ण कुंकुम सिन्दूर हरी चूडियां श्रिंगार का अन्य सामान सहित सौभाग्य पेटी (श्रिंगारदान) माता को अर्पित करें)

धूप

वनस्पतिरसोदभूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तम:।
आघ्रेय: सर्वदेवानाम धूपोअयम प्रति गृह्यताम॥

(धूप जो बनी हुई अगर तगर कपूर चन्दन के बुरादे से युक्त माता के सामने धूपें)

दीप

साज्यं च वर्ति संयुक्तम वाहिन्ना योजितम मया।
दीपम गृहाण देवेशि त्रैलोक्य तिमिरापहम॥

(शुद्ध रुई की दोहरी बत्ती बनायें,और आरती वाले पात्र में जिसमे कमसे कम दो अंगुल ऊंचा शुद्ध गाय का घी भरा हो,उसके अन्दर बत्तियों को डुबोकर अगरबत्ती से दीपक को प्रज्वलित करें,दीपक के अन्दर एक चांदी का या सोने का सिक्का डालें और माता को दिखायें,दीपक दिखाकर दीपक को अपने दाहिने रखें और हाथ साफ़ पानी से धो लें)


नैवेद्य

शर्कराखण्ड खाद्यानि दधि क्षीर घृतानि च।
आहारार्थम भक्ष्य भोज्यम नैवेद्यम प्रति गृह्यताम॥

(शक्कर और दही तथा खीर में घी मिलाकर नैवेद्य माता को आहार के रूप में अर्पित करें,नैवेद्य अर्पित करने के बाद आचमन के लिये कपूर मिला शीतल जल अर्पित करें,उसके बाद सादा पानी हाथ और मुंह धोने के लिये अर्पित करें)

ऋतुफ़ल

इदम फ़लम मया देवि स्थापितम पुरतस्तव। तेन मे सफ़ल अवाप्तिर भवेज जन्मनि जन्मनि॥

(जो भी फ़ल बाजार में आ रहे हों,उन्ही
को बिना दाग धब्बे के लेकर आवें,और माता को प्रकार प्रकार के चढावें)

ताम्बूल

पूगीफ़लम महाद्दिव्यम नागवल्ली
दलैर्युतम।
एलालवंगसंयुक्तम ताम्बूलम प्रतिगृह्यताम॥

(इलायची लौंग सुपाडी और पान माता को
अर्पित करें)

दक्षिणा

दक्षिणाम हेमसहिताम यथा शक्ति समर्पिताम।
अनन्तफ़लदामेनाम गृहाण परमेश्वरि॥

(मुद्रा में जो वर्तमान में चल रही हो,सिक्कों के रूप में माता को चढायें,भूलकर भी कागज की मुद्रा नही चढायें,अगर नही मिले तो केवल चावल बिना टूटे चढावें)

आरती

कदली गर्भ सम्भूतम कर्पूरम तु
प्रदीपितम।
आरार्तिकमहम कुर्वे पश्य माम वरदा भव॥

(चलते हुये दीपक से पीतल के बर्तन में
कपूर को जला लें और माता की दाहिने बायें सात बार आरती उतारें,और आरती के बाद पानी को तांबे के लोटे में भरकर सात बार पानी से आरती उतारें)


अब लाल हकिक या मुँगा मालासे मंत्र का 11 माला मंत्र जाप करे.

मंत्र-

ll ओम दुं दुर्गायै नम: ll

(om dung durgayai namah)

दिशा-पूर्व,आसन-वस्त्र-लाल रंग के हो.

मातारानी आप सभी की कामना पूर्ण करे यही कामना करता हू.




आदेश.....

2 Oct 2015

स्त्री वशीकरण विद्या.

यह यंत्र रमल के नुसार एक गुप्त भेद चक्र है.इसको अनार के रस के साथ अनार के कलम मे डुबोकर कोरे सफेद कपडे पर यंत्र को लिखे.फिर उसका बत्ती बनाकर घी के दीये मे जलाये,दीये का मुह स्त्री के घर की दिशा मे हो,चालीस दिन प्रतिदिन ढाई घंटे तक दिया जलाना जरुरी है.येसा विधान करने पर वह स्त्री वशिभुत होती है और जीवन भर पुरुष के साथ रहती है.दीया जलाने से पहिले स्त्री का स्मरण करे और उसका तीन बार नाम लेकर मन-ही-मन प्रेम की भावना उसके प्रती बोलना है.
गलती करने पर वशीकरण संभव नही परंतु प्रयोग सहि प्रकार से करने पर 100% सफलता मिलती है.इसका असर आज तक कभी खाली नही गया है येसा वर्णन रमल तंत्र से प्राप्त होता है.





आदेश