एक फोटो यहा दे रहा हु और इसी प्रकार से आपको लकड़ी के बाजोट पर यह आकृति कुमकुम से बनानी है । वैसे मैंने यह आकृति टाइल्स पर बनायी है परंतु आप लोग बाजोट पर बनाये,जहा पर चार नीले रंग के गोल है वहा पर मिट्टी के दीपक रखने है और दिए का मुख पत्थर के तरफ हो । जैसा आकृति में दिख रहा है वैसे ही देवी शक्ति सवारी पत्थर और कृपा प्राप्ति यंत्र रखना है,जहा पीले रंग के पुष्प दिख रहे है वहा एक एक गुलाब का पुष्प रोज नया रखना है । साधना नवरात्रि या फिर शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू कर सकते है,मंत्र जाप बिना माला के एक घंटे तक करना है,धूपबत्ती आपको जो भी पसंद हो वही लगाए,रोज मिठाई का भोग भी रखा करे । यह साधना कम से कम 21 दिनों तक करना आवश्यक है,साधना में शरीर का तापमान बढना, सरदर्द होना, शरीर मे भारीपन जैसे अनुभव हो सकते है इसलिए डरने की आवश्यकता नही है । साधनात्मक अनुभव सिर्फ मुझे बता सकते हो अन्य किसीको बताना नही है,साधना में मुख उत्तर दिशा के तरफ होना चाहिए, आसन और वस्त्र लाल रंग के हो और बिना स्नान किये साधना करना वर्जित है,यह साधना रात्रिकालीन है ।
जीवन की प्रत्येक क्रिया तन्त्रोक्त क्रिया है॰यह प्रकृति,यह तारा मण्डल,मनुष्य का संबंध,चरित्र,विचार,भावनाये सब कुछ तो तंत्र से ही चल रहा है;जिसे हम जीवन तंत्र कहेते है॰जीवन मे कोई घटना आपको सूचना देकर नहीं आता है,क्योके सामान्य व्यक्ति मे इतना अधिक सामर्थ्य नहीं होता है के वह काल के गति को पहेचान सके,भविष्य का उसको ज्ञान हो,समय चक्र उसके अधीन हो ये बाते संभव ही नहीं,इसलिये हमे तंत्र की शक्ति को समजना आवश्यक है यही इस ब्लॉग का उद्देश्य है.
11 Sept 2019
सर्व देवी शक्ति सवारी मंत्र साधना.
एक फोटो यहा दे रहा हु और इसी प्रकार से आपको लकड़ी के बाजोट पर यह आकृति कुमकुम से बनानी है । वैसे मैंने यह आकृति टाइल्स पर बनायी है परंतु आप लोग बाजोट पर बनाये,जहा पर चार नीले रंग के गोल है वहा पर मिट्टी के दीपक रखने है और दिए का मुख पत्थर के तरफ हो । जैसा आकृति में दिख रहा है वैसे ही देवी शक्ति सवारी पत्थर और कृपा प्राप्ति यंत्र रखना है,जहा पीले रंग के पुष्प दिख रहे है वहा एक एक गुलाब का पुष्प रोज नया रखना है । साधना नवरात्रि या फिर शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू कर सकते है,मंत्र जाप बिना माला के एक घंटे तक करना है,धूपबत्ती आपको जो भी पसंद हो वही लगाए,रोज मिठाई का भोग भी रखा करे । यह साधना कम से कम 21 दिनों तक करना आवश्यक है,साधना में शरीर का तापमान बढना, सरदर्द होना, शरीर मे भारीपन जैसे अनुभव हो सकते है इसलिए डरने की आवश्यकता नही है । साधनात्मक अनुभव सिर्फ मुझे बता सकते हो अन्य किसीको बताना नही है,साधना में मुख उत्तर दिशा के तरफ होना चाहिए, आसन और वस्त्र लाल रंग के हो और बिना स्नान किये साधना करना वर्जित है,यह साधना रात्रिकालीन है ।
28 Aug 2019
भुवनेश्वरी मंत्र साधना
भुवनेश्वरी साधना:-
चन्दन,अष्टगंध और अक्षत पुष्प ,नैवेद्य के लिए
मिठाई या दूध या कोई भी वस्तु ,फल भी एकत्रित करे। अगर यह सामग्री नहीं है तो मानसिक पूजन करे ।
ॐ श्री गणेशाय नमः
ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नम:
क्रीं कालिकायै नमः
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम :
ह्रीं विद्या तत्वाय स्वाहा
ह्रीं शिव तत्वाय स्वाहा
ह्रीं सर्व तत्वाय स्वाहा
ॐ श्री परम गुरुभ्यो नमः
ॐ श्री पारमेष्ठी गुरुभ्यो नमः
।।बॐ श्री दुर्गा भुवनेश्वरी सहित महाकाल्यै नमः आत्मानं रक्ष रक्ष ।।
।। ॐ कलश मण्डलाय नमः ।।
"मन में यह बोले की मैं (अपना नाम और गोत्र ) भुवनेश्वरी जयंती (or भुवनेश्वरी पुंजन) पर् भगवती भुवनेश्वरी की कृपा प्राप्त होने हेतु तथा अपनी समस्या निवारण हेतु या अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु यथा शक्ति साधना कर रहा हूँ " और जल को जमीन पर छोड़े ।
निर्विघ्नं कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा
फिर भैरव जी का स्मरण करे -
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशाभितिकरां प्रभजे भुवनेशीम ।।
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: संस्थापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निधापिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सन्निरुद्धा भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सम्मुखी भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: अवगुंठिता भव
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: वरदो भव सुप्रसन्नो भव ।
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: पुष्पं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: धूपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: दीपं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: नैवेद्यं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: तांबूलं समर्पयामि
ह्रीं भुवनेश्वर्यै नम: सर्वोपचारार्थे पुन: गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।
गायत्रीसहित ब्रम्हमयि - सावित्रीसहित विष्णुमयि - सरस्वतीसहित रुद्रमयि - लक्ष्मीसहित कुबेरमयि - रतिसहित काममयि - पुष्टिसहित विघ्नराजमयि - शंखनिधि सहित वसुधामयि - पद्मनिधि सहित वसुमतिमयि - गायत्र्यादिसह श्री भुवनेश्वरी ! ह्रां हृदयदेवि - ह्रीं शिरोदेवि - ह्रैं कवचदेवि - ह्रौं नेत्रदेवि - ह्र: अस्त्रदेवि - सर्वसिद्धप्रदचक्रस्वामिनि !
अनंगकुसुमे - अनंगकुसुमातुरे - अनंगमदने - अनंगमदनातुरे - भुवनपाले - गगनवेगे - शशिरेखे - अनंगवेगे - सर्वरोगहर चक्रस्वामिनि !
कराले विकराले उमे सरस्वति श्री दुर्गे उषे लक्ष्मी श्रूति स्मृति धृति श्रद्धे मेधे रति कांति आर्ये सर्वसंक्षोभणचक्रस्वामिनि !
ब्राम्हि माहेश्वरी कौमारि वैष्णवी वाराही इंद्राणी चामुंडे महालक्ष्म्ये - अनंगरुपे - अनंगकुसुमे - अनंगमदनातुरे - भुवनवेगे - भुवनपालिके - सर्वशिशिरे - अनंगमदने - अनंगमेखले - सर्वाशापरिपूरक चक्रस्वामिनि !
इंद्रमयि - अग्निमयि - यममयि- नैर्ऋतमयि - वरुणमयि - वायुमयि - सोममयि - ईशानमयि - ब्रम्हमयि- अनंतमयि - वज्रमयि - शक्तिमयि - दंडमयि - खडगमयि- पाशमयि - अंकुशमयि - गदामयि- त्रिशूलमयि - पद्ममयि - चक्रमयि - वरमयि - अंकुशमयि - पाशमयि - अभयमयि - बटुकमयि- योगिनिमयि - क्षेत्रपालमयि - गणपतिमयि - अष्टवसुमयि - द्वादशआदित्य मयि - एकादशरुद्रमयि - सर्वभूतमयि - अमृतेश्वरसहित भुवनेश्वरी - त्रैलोक्यमोहन चक्रस्वामिनि - नमस्ते नमस्ते नमस्ते स्वाहा श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ ।।
यह बहुत संक्षिप्त पूजन है , इस साधना से घर मे कोइ नकारात्मक बाधा नही होगी , रोग नही आयेंगे ,शत्रू बाधा या काम मे कोइ रुकावट आ रही है तो वो दूर होगी ,भगवती दुर्गा महाकाली एवं भुवनेश्वरी की कृपा से जीवन मे कोइ किसी प्रकार की नकारात्मक बाधा नही होगी । पुजन के बाद माँ से मन ही मन क्षमा प्रार्थना भी अवश्य करे ।
12 Jul 2019
मधुमेह का आयुर्वेदिक इलाज .(Ayurvedic treatment of diabetes.)
+918421522368
7 Jul 2019
कुण्डली में अशुभ योग और उनका निवारण.
1).चांडाल योग-
गुरु के साथ राहु या केतु हो तो जातक बुजुर्गों काएवम् गुरुजनों का निरादर करता है ,मोफट होता है,तथा अभद्र भाषाका प्रयोग करता है । यह जातक पेट और श्वास के रोगों से पीड़ित हो सकता है और इनका जीवन कष्टदायक होता है। वह निराश व हताश रहता है उसकी प्रकृति आत्मघाती होती है ।
2).सूर्य ग्रहण योग-
सूर्य के साथ राहु या केतु हो तो जातक कोहड्डियों की कमजोरी, नेत्र रोग, ह्रदय रोग होने की संभावना होती है ,एवम् पिताका सुख कम होता है,आत्मविश्वास की कमी होती है इसके वजेसे सफलताये नही मिलती है । ग्रहण का शाब्दिक अर्थ है खा जाना तथा इसी प्रकार यह माना जाता है कि राहु अथवा केतु में से किसी एक के सूर्य अथवा चन्द्रमा के साथ स्थित हो जाने से ये ग्रह सूर्य अथवा चन्द्रमा का कुंडली में फल खा जाते हैं जिसके कारण जातक को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करना पड़ता है।3).चंद्र ग्रहण योग-
चंद्र के साथ राहु या केतु हो तो जातक को मानसिक पीड़ा एवं माता को हानई पोहोंचती है,जीवन मे सुख को कमी और दुःख ज्यादा होते है । चन्द्रमा पर राहु अथवा केतु की स्थिति अथवा दृष्टि से प्रभाव पड़ता है तो कुंडली में ग्रहण योग का निर्माण हो जाता है जो जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसे भिन्न भिन्न प्रकार के कष्ट दे सकता है।4).श्रापित योग-
शनि के साथ राहु हो तो यह योग होता है,इस योग से जीवन मे नर्क यातनाएं भुगतनी पड़ती है,ऐसा जातक आत्महत्या के विचार ज्यादा करता है । शाप का सामान्य अर्थ शुभ फलों का नष्ट होना माना जाता है । जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह योग बनता है उसे इसी प्रकार का फल मिलता है यानी उनकी कुण्डली में जितने भी शुभ योग होते हैं वे प्रभावहीन हो जाते हैं । इस स्थिति में व्यक्ति को कठिन चुनौतियों एवं मुश्किल हालातों का सामना करना होता है ।5).पितृदोष-
यदि जातक को 2,5,9 भाव में राहु केतु या शनि है तो जातक पितृदोष से पीड़ित है । इसके प्रभाव से किसी भी कार्य को पूर्ण करने की कोशिशें नाकाम हो जाती है । पितृ दोष के कारण व्यक्ति को बहुत से कष्ट उठाने पड़ सकते हैं, जिनमें विवाह ना हो पाने की समस्या, विवाहित जीवन में कलह रहना, परीक्षा में बार-बार असफल होना, नशे का आदि हो जाना, नौकरी का ना लगना या छूट जाना, गर्भपात या गर्भधारण की समस्या, बच्चे की अकाल मृत्यु हो जाना या फिर मंदबुद्धि बच्चे का जन्म होना, निर्णय ना ले पाना, अत्याधिक क्रोधी होना।6).नागदोष-
यदि जातक के पाचवे भाव में राहु विराजमान है तो जातक पितृदोष के साथ-साथ नागदोष से भी पीड़ित होता है,ऐसा जातक जीवन मे हमेशा असंतुष्ट होता है और संतान प्राप्ति में इसे कष्ट उठाने पड़ते है । यह दोष होने पर जातक किसी पुराने या यौन संचारित रोग से ग्रस्त रहता है। कुंडली में नागदोष हो तो जातक को अपने प्रयासों में सफलता प्राप्त नहीं होती। नाग दोष का अत्यंत भयंकर प्रभाव है कि इसके कारण महिलाओं को संतान उत्पत्ति में अत्यधिक परेशानी आती है। कुंडली में नागदोष होने से व्यक्ति की गंभीर दुर्घटना होने की संभावना रहती है। इन्हें जल्दी-जल्दी अस्पताल के चक्कर लगाने पड़ते हैं एवं इनकी आकस्मिक मृत्यु भी संभव है । नागदोष से प्रभावित जातकों को उच्च रक्तचाप और त्वचा रोग की समस्या रहती है।7).ज्वलन योग-
सूर्य के साथ मंगल की युति हो तो जातक ज्वलन योग (अंगारक योग) से पीड़ित होता है,हमेशा किसी न किसी चीज की कमी और स्वास्थ्य में तकलीफे रहती है । जिस स्थान मे हो उसी स्थान के खराब फल देता है ।8).अंगारक योग-
मंगल के साथ राहु या केतु वीराजमान हो तो जातक अंगारक योग से पीड़ित होता है,ऐसा जातक सारी जिंदगी अंगारों पर चलने वाली जैसी तकलीफ को सहता है । इसके कारण जातक का स्वभाव आक्रामक, हिंसक तथा नकारात्मक हो जाता है तथा इस योग के प्रभाव में आने वाले जातकों के अपने भाईयों, मित्रों तथा अन्य रिश्तेदारों के साथ संबंध भी खराब हो जाते हैं।9).प्रेत दोष-
शनि के साथ बुध होने से यह दोष उत्पन्न होता गई,प्रेत बाधा का अर्थ मनुष्य के शरीर पर किसी भूत-प्रेत का साया पड़ जाना है। यह योग न केवल जातक को परेशान करता है अपितु उसके पूरे परिवार को भयभीत कर देता है। प्रेत बाधा में अदृश्य शक्तियां मनुष्य के शरीर पर कब्जा कर लेती हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कुंडली में प्रेत बाधा योग बनने पर जातक को भूत-प्रेत से पीड़ा मिलती है।10).पिशाच योग-
शनि के साथ केतु हो तो यह योग बनता है,इनमें इच्छा शक्ति की कमी रहती है,इनकी मानसिक स्थिति कमज़ोर रहती है,ये आसानी से दूसरों की बातों में आ जाते हैं जिससे इनको धोका मिलता है ।इनके मन में निराशात्मक विचारों का आगमन होता रहता है,कभी कभी स्वयं ही अपना नुकसान कर बैठते हैं ।11).केमद्रुम योग-
चंद्र के साथ कोई ग्रह ना हो एवम् आगेपीछे के भाव में भी कोई ग्रह न हो तथा किसी भी ग्रह की दृष्टि चंद्रपर ना हो तब वह जातक केमद्रुम योग से पीड़ित होता है तथा जीवन में बोहोत ज्यादा परिश्रम अकेले
ही करना पड़ता है ।
12).दरिद्र योग-
यदि किसी कुंडली में 11वें घर का स्वामी ग्रह कुंडली के 6, 8 अथवा 12वें घर में स्थित हो जाए तो ऐसी कुंडली में दरिद्र योग बन जाता है। ऐसे में व्यक्ति के व्यवसाय तथा आर्थिक स्थिति पर बहुत अशुभ प्रभाव डाल सकता है। दरिद्र योग के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की आर्थिक स्थिति जीवन भर खराब ही रहती है तथा ऐसे जातकों को अपने जीवन में अनेक बार आर्थिक संकट का सामाना करना पड़ता है।13).कुज योग-
यदि किसी कुंडली में मंगल लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में हो तो कुज योग बनता है। इसे मांगलिक दोष भी कहते हैं। जिस स्त्री या पुरुष की कुंडली में कुज दोष हो उनका वैवाहिक जीवन कष्टप्रद रहता है इसीलिए विवाह से पूर्व भावी वर-वधु की कुंडली मिलाना आवश्यक है। यदि दोनों की कुंडली में मांगलिक दोष है तो ही विवाह किया जाना चाहिए।14).षड़यंत्र योग-
यदि लग्नेश आठवें घर में बैठा हो और उसके साथ कोई शुभ ग्रह न हो तो षड्यंत्र योग का निर्माण होता है। यह योग अत्यंत खराब माना जाता है। जिस स्त्री-पुरुष की कुंडली में यह योग हो वह अपने किसी करीबी के षड्यंत्र का शिकार होता है जैसे धोखे से धन-संपत्ति का छीना जाना, विपरीत लिंगी द्वारा मुसीबत पैदा करना आदि।15).भाव नाश योग-
जब कुंडली में किसी भाव का स्वामी त्रिक स्थान यानी छठे, आठवें और 12वें भाव में बैठा हो तो उस भाव के सारे प्रभाव नष्ट हो जाते हैं और उससे भाव नाश योग केजते है। उदाहरण के लिए यदि धन स्थान की राशि मेष है और इसका स्वामी मंगल छठे, आठवें या 12वें भाव में हो तो धन स्थान के प्रभाव समाप्त हो जाते हैं।16).अल्पायु योग-
जब कुंडली में चंद्र पाप ग्रहों से युक्त होकर त्रिक स्थानों में बैठा हो या लग्नेश पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो और वह शक्तिहीन हो तो अल्पायु योग का निर्माण होता है। जिस कुंडली में यह योग होता है उस व्यक्ति के जीवन पर हमेशा संकट मंडराता रहता है और उसकी आयु कम होती है।17).कालसर्प दोष के प्रकार-
30 Jun 2019
दोष निवारण और रक्षा कवच.
" Whatsapp number +918421522368 "
29 Jun 2019
कुंडलिनी उर्जा का सत्य
क्यूंकि बिना अभ्यास सीधा ही कुंडलिनी जागरण में प्रवेश करना तबाही का कारण हो सकता है। गुरु परम्परा या सिद्ध कौलमार्ग को समझे बिना मूर्खतावश कुंडलिनी जाग्रत करना साधक का अधोपतन करवाता है। कुंडलिनी विषय गहरा और ध्यानात्मक विषय है। यह एक दिन के शिबिर या कुछ महीनो की प्राणायाम की प्रेक्टिस से सिद्ध नहीं होता। प्राणायाम केवल मस्तिष्क और ब्रह्मरंध्र शरीर के सोये हुए कोषों को चार्ज करता है। इससे कुंडलिनी का वहन 1 प्रतिशत भी नहीं होता। यह मिथ्या धारणा फेली हुई है। इस पर न जाने कितने लोग अपना बिज़नेस बना कर बैठ गए हैं। बिना सिद्धि को प्राप्त किये साधना में कुंडलिनी पर काबू पाना सम्भव नहीं है।
जीवात्मा बनाया जाता है। प्रोग्रामर के द्वारा पहले से जन्म और आने वाले जन्मो का कर्म पहले से ही इंस्टाल है। कभी-कभी इन्सान सिक्स्थ सेन्स की बातें करता है मानो वो नॉनसेन्स है क्यूंकि उसको पता ही नहीं प्रेरणा देने वाला उसका ही प्रोग्राम किया हुआ मन है। वो अपने प्रोग्राम के अनुसार ही कर्म करता है
और पाप-पूण्य सिद्धियो के चक्र को सत्य मान लेता है। यही मायाजाल है और उसका सेंसर है मन।
उसको बाह्य, सूक्ष्म और अंतर मन कहते हैं। बाह्य वाला व्यक्ति जड और तामसिक होता है। सूक्ष्म वाला भोगी और राजसिक होता है। अंतर मन वाला सात्विक और वैरागी होता है। यह तीनो मायाजाल में घूमते है। किसी प्रोग्रामर के संकल्पों को पूरा करता है। सत्व वाला सत्व बढ़ा कर वापस दूसरे जन्म में रजस में फसता है क्यूंकि उसने सत्व में भौतिक सुखों का त्याग किया किन्तु बाह्य और सूक्ष्म मन के प्रोग्राम को नहीं जिया। विधाता कर्म का चक्र ऐसे घुमाता है।
दुसरे तत्वों वाले उसके विपरीत तत्वों का चयन करेंगे। कुंडलिनी का कार्य है भोगी बनाना।
परमात्मा त्रिगुणातीत है, काला तीत है।
समय उसके हिसाब से चलता है वो समय के हिसाब से नहीं।
गुरु ही केवल मार्ग है जो प्रोग्रामर से विपरीत भाषा को जानते हैं। इस हेतु बिना सिद्ध गुरु-निर्देशन से साधना मुक्ति में बाधा बनती है। एक बार गुरुदेव से इस विषय पर बातचीत हुई। उन्होंने कहा था मूर्ख होते है जो कुंडलिनी के पीछे पडते हैं। कुंडलिनी के वश में नहीं होना है कुंडलिनी को अपने वश में करना है। चैतन्य को साधा नहीं जाता, चैतन्यमय हुआ जाता है। जब तक यह अवस्था नहीं है तब तक जीव अपनी आत्मा को कुंडलिनी के पाश में पाता है। कुंडलिनी जागरण में अनेकों सिद्धियों को बताया गया है किन्तु वो सिद्धि साधक को मोक्ष में भटका सकती है।
एक परा सिद्धि और एक अपरा सिद्धि। परा सिद्धि के अंतर्गत देवता, यक्ष ,किन्नर, गंधर्व, भूत-प्रेत, डाकिनी-शाकिनी-लाकिनी-हाकिनी-काकिनी--इन तत्वों से जुडी हुई सिद्धि मिलती है। इसमें जीव के प्रमुख तत्वों के अनुसार यह सिद्धियां जाग्रत होती हैं।
साधक कौनसे तत्वों में अपनी साधना करता है उस हिसाब की सिद्धि होती है। 'पराशक्ति पिंडे सौ ब्रह्मांडे' के अनुसार ब्रह्मांड को एक पिंड समझो। उसके अंतर्गत जीव, देवता, मनुष्य सब आ जाते हैं। यह मूल पंचभूतो के माध्यम से 3 तत्वों से अनुसन्धान करता है।
इसमें से कौन-से तत्व का जीव है,उस प्रकार की सिद्धि जाग्रत होती है।
ऐसीे परासिद्धि से वो एक काल- चक्र के सीमित ज्ञान काउद्बोधन कर सकता है। यह जाग्रति ने कितने सिद्ध आत्माओं को फंसा दिया है।
कौन बोल रहा है कौन-सी भाषा आ रही है? उस हिसाब की सिद्धि का पता चलता है।
इसमें मध्यमा, वैखरी, परा और पश्यन्ति की प्राप्ति होती है किन्तु वो सार या बोध की अवस्था की प्राप्ति नहीं कर पाता। ललिता सहस्त्र नाम् में भगवती और कुंडलिनी के नामो का विवरण आता है। उसमे एक मन्त्र आता है जिसमें पश्यन्ति पर देवता यानि देवताओ की वाणी समझना जिसे श्रुति कहते हैं। यह आकाशिक रिकॉर्ड का ज्ञान मिल जाता है किन्तु आकाश और अन्तरिक्ष वो ब्रह्मांड यानि पिंड का ही सत्य है। साधक अपने आप को यहाँ मोक्ष प्राप्त किया हुआ समझता है पर यह मोक्ष का छल है।
सात्विक वृतियों की सर्वोच्च सिद्धि मिलने पर इन्सान मुक्ति को समझता है, प्राप्त नहीं करता। यहां वह कुछ सिद्धियो को प्राप्त करके अपने आप को पद दे देता है। पर इससे आगे यानि हिरण्यगर्भ संकल्प के अंतर्गत यह एक छलावे के लिए रचना की गयी है कि
साधक को मुक्ति का भ्रम हो। जिसमे बहुत सारे सिद्ध फंस चुके। हमने कितने देवताओं के पीछे नाग का चित्र देखा है। उसका निर्देश यही है की वो कुंडलिनी के अंतर्गत मोक्ष को मिले है मूल मुक्ति इससे काफी दूर है। कृष्ण ने कालियानाग का दमन किया उसके ऊपर चढ़कर। हम इश्वर या देवता की लीला में फंस गए किन्तु यह नहीं सोचा कि बोध क्या है ?
आत्मा की मूल शक्ति शब्दब्रह्म है नकि कुंडलिनी।
कुंडलिनी काल का पाश है।वो बार- बार अपने ज़हर से इन्द्रिय रूपी गोकुल में तबाही करता है। नाद अनुसन्धान से ही अपरा प्रकृति उद्भव होती है।
इंद्र भी दास हो जाता है। देवता तुम्हारी सेवा में आ जाते हैं। ब्रह्मा तुम्हे समझने नीचे आते हैं। यह बहुत उच्चतम और भगवदीय अवस्था है। इसको मात्र गुरुसेवा और गुरुभक्ति से ही प्राप्त किया जाता है।
24 Jun 2019
ग्रहण और गुप्त नवरात्रि मंत्र साधना.
( मंत्र Whatsapp पर दिया जाएगा no. है +918421522368 )
1-मनोकामना पूर्ति
2-रोग निवारण
3-वशीकरण
4-विवाह होता है
5-नॉकरी प्राप्त होती है
6-भगवती की कृपा
7-धनलाभ.
30 May 2019
धूमावती साबर मंत्र साधना
माँ धूमावती विधवा स्वरूप में पूजी जाती हैं तथा इनका वाहन कौवा है, ये श्वेत वस्त्र धारण कि हुए, खुले केश रुप में होती हैं। धूमावती महाविद्या ही ऐसी शक्ति हैं जो व्यक्ति की दीनहीन अवस्था का कारण हैं, विधवा के आचरण वाली यह महाशक्ति दुःख दारिद्रय की स्वामिनी होते हुए भी अपने भक्तों पर कृपा करती हैं ।
महाविद्या धूमावती के मन्त्रों से बड़े से बड़े दुखों का नाश होता है ।
6. केवल काली मिर्च से होम करने पर कारागार में फसा व्यक्ति मुक्त हो जाता है ।
साबर मन्त्र :-
जीव रक्षन्ते जीव भक्षन्तेजाया जीया आकाश तेरा होये ,धूमावन्तीपुरी में वास,न होती देवी न देव ,
तहा न होती पूजा न पाती तहा न होती जात न जाती ,तब आये श्रीशम्भुजती गुरु गोरखनाथ ,आप भयी अतीत ॐ धूं धूं धूमावती फट स्वाहा ।।
सांबरशिंगां और साबरशिंगां में फर्क है,यहा हम यंत्र हेतु साबरशिंगां के जड़ का इस्तेमाल करने वाले है । यंत्र प्राप्त करने हेतु +918421522368 पर फोन भी कर सकते है,बात करने का समय होगा सुबह 11 बजे से शाम 7 बजे तक और इस पर आप व्हाट्सएप के जरिये भी संपर्क कर सकते है ।
8 Apr 2019
तंत्र बाधा निवारण पीताम्बरा साधना
12 Feb 2019
शिव-मोहिनी साधना ( महाशिवरात्रि विशेष )
अनामयिलुभ्यां त्वां ताम्यां स्पृश्यामसि।।
यह मोहिनी प्रयोग का सबसे सुंदर उदाहरण है। दुर्गा सप्तशती में इस विद्या का उल्लेख कुंजिका स्तोत्र में मिलता है।
पाठ मात्र संसिद्धयेत कुंजिका स्तोत्रम्।।
साधना विधि-महाशिवरात्रि के दिन सूर्योदय के बाद दूसरे दिन के सूर्योदय से पूर्व यह साधना किसी भी समय पर कर सकते है । आसन वस्त्र दिशा का कोई बंधन नही है इसलिए आपको जैसा उचित हो आप आसन वस्त्र का इस्तेमाल करे और हो सके तो उत्तर दिशा में मुख करके मंत्र जाप करे । मंत्र जाप शिवलिंग के सामने करना आवश्यक है,मंत्र का कम से कम 21 माला जाप करे,हो सके तो मंत्र जाप से पूर्व सामान्य पद्धति से अवश्य ही शिवपूजन करे ताकि आपको पूर्ण सफलता मीले ।
मंत्र
।। ॐ शं शिवाय मोहिनी सिद्धये ह्रीं ॐ नमः ।।
Om sham shivaay mohini siddhaye hreem om namah
24 Dec 2018
पुर्णत्वं स्वात्म सिद्धि साधना
बहोत सारे लोग कहेते है के उनके जीवन मे ढेर सारी समस्याएं है और उन समस्याओं का उन्हें खोजने पर भी कोई उपाय नही मिल रहा है । सबसे पहिली बात उपाय मिल भी जाये तो क्या कोई भी परेशान व्यक्ति उस उपाय पर विश्वास करेगा? जब तक आप लोग विश्वास नही करोगे तब तक उपाय से आपकी समस्याएं दूर नही हो सकती है । यहां आज के समय मे सभी लोग बिना मेहनत के फल चाहते है और दिन-रात गूगल फेसबुक व्हाट्सएप यु-ट्यूब पर तांत्रिकों को ढूंढते रहेते है,इस उम्मीद से के कोई उनका काम करवा दे । लाचार के तरहा जीवन जीने से कुछ भी संभव नही है,स्वयं की पहेचान ही सर्वप्रथम होती है,आप लोग अपने जीवन को 100% सवार सकते हो सिर्फ आपको प्रमाणिकता से तंत्र-मंत्र के क्षेत्र में मेहनत करना है ।
प्रत्येक मंत्र शक्तिशाली होता है,मंत्रो को कभी भी छोटा ना समझे,तंत्र की शक्ति कोई साधारण शक्ति नही होती है,जिसने इन शक्तियों को समझ लिया वह जीवन मे सवर जाता है । कोई भी मंत्र जब भी प्राप्त करो तो उस मंत्र के प्रति प्रामाणिक रहो और उस मंत्र पर इतना विश्वास रखो के वह एक मंत्र आपको सिद्ध हो सके । चाहे आप कोई भी साधना करो परंतु साधना काल मे मंत्र का स्मरण ज्यादा-से-ज्यादा करो, जैसे आपको कोई मंत्र साधना 21 माला जाप 21 दिनों तक करना हो तो आप निच्छित समय पर जाप करते रहो और साथ मे उसी मंत्र का जाप दिन-रात जब भी समय मिले तो मन ही मन मंत्र जाप या स्मरण करते रहे । ऐसा करने से ही मंत्र सिद्धि संभव है अन्यथा 21 दिन के साधना में आपको 210 दिन भी मंत्र सिद्धि हेतु कम पड़ जायेंगे । मैं आपको मंत्र दे सकता हु परंतु उसे सिध्द आपको ही करना है,आप हृदय से विश्वास करते है तो वह मंत्र आपके लिए संजीवनी है अन्यथा वह आपके लिए सिर्फ कुछ शब्द है ।
किसी भी मंत्र को आप पूजनीय समझे तो वही मंत्र आपको पूजनीय बना देगा,यही सिद्धांत रखे । आपको जीवन मे परेशानी से मुक्त होना है तो 4-5 दिन स्मशान में जाकर बैठकर देखिए,जलते हुए मुर्दो को देखकर आप समझ जाओगे,जब समय समाप्त होता है तो सब कुछ समाप्त हो जाता है,इसलिए आज आपके पास समय है तो उसे व्यर्थ की परेशानियों से दूर कराने से अच्छा तो आनेवाली परेशानियों को मुक्त कराने हेतु इस्तेमाल करे । जो आपका है वह आपको ही मिलेगा इसके लिए भी प्रयास करना जीवन मे एक अनुभव उत्पन्न करेगा । अब नववर्ष आरहा है,उसका स्वागत करे और संकल्प लीजिए के " मै अमुक पिता का पुत्र अमुक नाम का व्यक्ति आजसे जीवन मे अपनी समस्याओं पर पैर रखकर खड़ा होना चाहता हु और इसमे मेरे गुरु/इष्ट/अमुक देवी/देवता मेरा संकल्प पूर्ण करने हेतु आशीर्वाद प्रदान करे" , यह संकल्प और शक्तियो से सम्बंधित मंत्र का जाप आपको जीवन मे सब कुछ प्रदान कर सकता है ।
आपके जीवन की समस्याओं को आप स्वयं दूर करे,किसी के सामने आपको जाकर सहायता मांगने की कोई जरूरत ही नही है । यह तो तब संभव होगा जब आप इस भावना को अपने अंदर जाग्रत करेंगे,देवता सिर्फ साधु सन्यासी तांत्रिक मंत्रिको के लिए नही है,वह तो सभी पर कृपा करते है । आप सभी दैवीय शक्ति के अंश हो,अगर ये बात आप समझ जाओ तो आपको इस जीवन मे कोई भी परेशानी छू भी नही सकती है । आपके जेब मे पैसा हो ना हो परंतु शरीर मे प्राणवायु होना जरूरी है अगर प्राणवायु ही ना हो तो करोड़ो रूपये भी आपको जीवनदान नही दे सकता है इसलिए दैवीय शक्ति को अनुभव करने हेतु अच्छे मार्ग पर चले और बकवास तांत्रिक मंत्रिको के चक्कर काटने से अच्छा है के स्वयं मंत्र साधना संपन्न करे, आशा करता हु के आपको मेरे शब्दों को समझने में कोई तकलीफ नहीं हुई होगी ।
आज एक अनुभवी मंत्र साधना दे रहा हु जिससे आपके जीवन का नवीनीकरण होना संभव है,जो भी जीवन मे परेशानी हो वह समाप्त हो सकती है ।
साधना विधि-स्फटिक माला से नित्य मंत्र का 11 माला जाप करे,मुख उत्तर दिशा के तरफ होना चाहिए, आसन और वस्त्र पिले रंग के हो,मंत्र जाप सुबह 5-6 बजे के समय मे या रात ने 9-10 बजे तक के समय मे करे,साधना किसी भी सोमवार से शुरू करे,यह साधना 21 दिनों तक करना अनिवार्य है ।
।। ॐ ह्रीं त्रीं पूर्णत्वं स्वात्म सिद्धये ॐ नमः ।।
Om hreem treem purnatwam swaatm siddhaye om namah
साधना समाप्ति के 21 वे दिन किसी गरीब को कुछ आवश्यक वस्तु अवश्य दान करे । यह साधना सूर्यग्रहण के समय मे 21 माला करने से उसी दिन पूर्ण हो जाएगी । साधनात्मक अनुभव किसीको ना बताये,इससे आपको जीवन मे चमत्कारीक लाभ प्राप्त हो सकते है ।
सूर्यग्रहण समय
इस वर्ष 2019 का पहला सूर्य ग्रहण 6 जनवरी को है, इस दिन रविवार पड़ रहा है । यह एक आंशिक सूर्य ग्रहण है,यह सूर्य ग्रहण भारतीय समयानुसार सुबह 5:04 बजे से 9:18 बजे तक रहेगा अर्थात इसकी अवधि क़रीब 4 घंटे 14 मिनट है । साथ ही यह भी बता दें कि देखने पर यह ग्रहण भारत में नहीं दिखाई देगा परंतु मध्य-पूर्वी चीन, जापान, उत्तरी-दक्षिणी कोरिया आदि क्षेत्रों में यह ग्रहण नजर आएगा ।
ज्योतिषीय के अनुसार सूर्य ग्रहण धनु राशि और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में लग रहा है । इस कारण धनु राशि और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के जातकों के जीवन पर इसका प्रभाव होगा । इसलिए धनु राशि और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के जातकों को सावधानियां बरतनी होगी ।
आदेश.........
18 Nov 2018
गुरु गोरखनाथ कृपा प्राप्ति साधना
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