31 Oct 2015

महाकाली प्रत्यक्ष दर्शन (शाबर मंत्र साधना).

माँ महाकाली के दर्शन प्राप्त करना प्रत्येक साधक का स्वप्न होता है और उनके दर्शन से कोई भी व्यक्ती फिर सामान्य व्यक्ती नही रहेता है.यह तो पुण्योदय है उन साधक वर्ग का जो इस जीवन मे कोई न कोई किसी भी प्रकार से महाकाली साधना संपन्न करते है,क्युके बिना पुण्य जाग्रत हुए कोई भी साधक महाकाली साधना नही करता है.ब्रम्हान्ड मे कूल 52 स्थान है जिसमे 48 स्थान महाकाली जी के है और बचे हुए 4 स्थानो मे अन्य देवी/देवताओ का स्थान माना जाता है.तो सोचिये महाकाली साधना करने से कितने लाभ प्राप्त होते है,महाकाली साधना से साधक अपना पूर्ण जीवन सदैव निडर होकर और प्रसन्नता के साथ बिना रोग,दोष,बाधा,पिडा,दरीद्रता एवं भय के जीता है.जो काली साधना करते है उनके लिये तो तंत्र के क्षेत्र मे कुछ भी प्राप्त करना असंभव नही है और काली साधना करने वालो मे मैने आजतक सबसे ज्यादा आत्मविश्वास देखा है.

कई साधको को यह भ्रम है की महाकाली एक तिश्ण देवी है और इनकी साधना मे कोई भी गलती हो जाती है तो विपरीत परिणाम भोगना पडता है.जबकी येसी बात नही है,माँ तो अत्यन्त सौम्य और सरल महाविद्या है.जिनका रुप भले ही विकराल हो परंतु माँ के हृदय मे करुणा, दया, ममता, स्नेह और अपने भक्तो के प्रती अत्याधिक ममत्व है.उनका भयंकर स्वरुप अपने भक्तो के शत्रुओ हेतु है जो माँ के पुत्रो को कष्ट देना चाहता है.माँ की कृपा से सभी प्रकार की समस्याये कोसो दूर भाग जाती जो फिर से आने की कोशिश भी नही करती है.कालीदास जी को माँ का ममत्व प्राप्त हुआ और वह सारे संसार मे प्रसिद्ध हुए.श्री रामकृष्ण परमहंस जी का नाम आज कौन नही जानता,उनका उपासना पद्धती आज तक गोपनिय रहा है.परमहंस जी ने माँ का ममत्व प्राप्त करने हेतु कई प्रकार के मंत्रो का जाप किया परंतु उन्हे "शाबर मंत्र जाप" से माँ के दर्शन प्राप्त करने हेतु पूर्ण सफलता प्राप्त हुयी.आज भी लोग खोज मे लगे हुए है के आखिर वह कौनसा शाबर मंत्र था जिससे उन्हे माँ के ममत्व स्वरुप का दर्शन हुआ.उन्हे महाकाली पूर्णरुपेण सिद्ध थी,एक बात बताता हू सिद्धी और दर्शन मे फर्क है.दर्शन होने का अर्थ सिद्धी प्राप्त करना नही है,यह दोनो विषय भिन्न है.उदाहरन हेतु मुझे माँ के दर्शन प्राप्त हुए परंतु माँ सिद्ध नही हुयी क्युके उन्हे सिद्ध करने हेतु कठिन तपस्या की आवश्यकता है.

यहा पर जो साधना दे रहा हू इसमे माँ के "तांत्रिक विग्रह"का महत्व मंत्र से भी ज्यादा है और बिना विग्रह के साधना करने से लाभ तो मिलेगा परंतु दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य जो अत्यन्त दुर्लभ है उसे प्राप्त करने हेतु कई वर्ष लग जायेगे.यह सिर्फ एक किसी धातु का विग्रह नही बल्की मेरे लिये और उनके सच्चे भक्तो के लिये जो हृदय से उनसे प्रेम करते है उनके लिये तो "स्वयम माँ है".इस विग्रह को निर्माण करना कठिन क्रिया है,जब धातु को अग्नी मे डालकर उसका पानी बनाया जाता है विग्रह निर्माण हेतु तब "नवार्ण मंत्र" का जाप किया जाता है.उसके बाद गरम धातु को साचे मे आकार देने के लिये जब प्रयोग मे लाया जाता है तब "रावण कृत अघोर काली मंत्र का जाप किया जाता है.जब विग्रह बन जाये तब उसकी प्राण-प्रतिष्ठा शस्त्रोक्त मंत्रो से होती है,उसके बाद "कामकाली साहस्त्राक्षरी" मंत्रो से विग्रह का अनार के रस से अभिशेक किया जाता है.अगले क्रिया मे काली हल्दी का लेप करके गुडहल का पुष्प चढाकर कुमकुम से तान्त्रोत्क न्यास विधी कर्म करके अंग-पुजन किया जाता है.अब आखरी क्रिया मे "शाबर महाकाली जागरण मंत्र' से विग्रह को जागृत किया जाता है.इस प्रकार से "तान्त्रोक्त महाकाली विग्रह" का निर्माण कार्य होता है.बाजार से विग्रह खरीदकर विग्रह का प्राण-प्रतिष्ठा करके किसी को देने से विग्रह प्रदान करने वाले को माँ के तान्त्रोत्क विग्रह के नाम पर पैसा खाने का भी दोष लगता है.इसलिये प्रामानिक विग्रह देना ही उचित है अन्यथा माँ तो सब कुछ देख रही है और उनके नाम पर व्यापार करके लोगो को ठगने वाले को वो बिना दंड दीये छोडेगी नही,येसे व्यक्ती पर माँ की अवकृपा होती है जिससे उसका जीवन निरंतर समस्याओ से भरपूर हो जाता है.
येसा दुर्लभ विग्रह हमसे अवश्य ही प्राप्त करे और जीवन के समस्त बाधाओ पर विजय प्राप्त करे.हमे सम्पर्क करने से आपको माँ के विग्रह का उचित मूल्य और पूर्ण "शाबर महाकाली दर्शन मंत्र" प्राप्त होगा.मैने इसलिये पूर्ण मंत्र अपने आर्टिकल मे नही डाला क्युके इंटरनेट पर चोरो की कोई कमी नही है.मेरा प्रत्येक आर्टिकल चोरी करके लोग अपने नाम से किताबो मे,फेसबूक पर,ब्लौग पर एवं वेबसाइट पर छाप रहे है और इस बार मैने पूर्ण मंत्र नही लिखा.इस मंत्र मे 2-2 शब्द गायब कर दीये है ताकी आर्टिकल चोरी नही किया जाये.अब बात करते है साधना विधी की जो हम सभी के लिये महत्वपूर्ण है.


यह साधना अत्यंत महत्वपूर्ण साधना है,जो आज तक गोपनीय रहा है.आज उस गोपनीय रहस्य को मै आपके सामने उजागर कर रहा हू.सभी साधना मे
सफलता देने मे इस साधना का आपको प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त होगा,यह “महाकाली प्रत्यक्ष दर्शन” साधना है और जब माँ आपको दर्शन देगी तो आपको उनसे यह
प्रार्थना करनी है “हे माँ भगवती मुझे
सभी साधनामे सफलता और पूर्ण सिद्धि प्रदान करे”,निच्छित ही आपका प्रार्थना माँ स्वीकार करेगी और आपका अमूल्य जीवन तांत्रिक सिद्धियो के लिये महत्वपूर्ण होगा.

यह मेरा अनुभूतित साधना है जो केवल मात्र 31 दिन का है और इस साधना मे सिर्फ 1 माला मंत्र का जाप रात्री के समय मे 11:36 से 12:36 मध्य के समय मे करना आवश्यक है,पहिले दिन माताराणी को पंच-मेवा युक्त खीर का भोग लगाये और साथ मे कपूर का ज्योत भी जला दीजिये.माँ के तान्त्रोत्क विग्रह को सामने लाल कपडे पर स्थापित करके सामान्य पद्धती से पुजन करना है जिसके लिये किसी भी प्रकार के कर्मकान्ड की आवश्यकता नही है .

शाबर महाकाली मंत्र का जाप करने से पूर्व सामान्य रुप से गणेश+गुरुपूजन अवश्य करे लीजिये (जिनके गुरू ना हो वह शिव पुजन करे),इस विधान मे आपको साधना से पूर्व महाकाली जी के "तान्त्रोत्क विग्रह" का व्यवस्था पहिले ही कर लेना पड़ेगा क्यूके साधना मे माँ का तान्त्रोक्त विग्रह होना आवश्यक है और साधना के समय आप माँ को नीम के पत्तों का चोला उनकी कमर मे बांधना है ताकि उनका अंग ढग दिया जा सके अन्यथा माँ को हमने क्रोधित होते हुये भी देखा है इसलिये नीम का पत्तों का चोला पहनाना आवश्यक है,नीम के चोले का निर्मिति करना कोई कठिन कार्य नहीं है,नीम के पत्ते लाकर उनको लाल रंग
के धागे मे पिरो लीजिये जैसे हम फूलो के हार बनाते है उसी तरहा से.

1-नीम का चोला चढ़ाये,

2-भोग लगाये,

3-कपूर का ज्योत लगाये,

4-108 बार मंत्र का जाप (मतलब एक माला जाप) काली हकीक/रुद्राक्ष माला से करे.

यह सिर्फ चार क्रियाये महत्वपूर्ण है जिन्हे ध्यान मे रखना है.






मंत्र-

॥ श्री नरसिंग हरी,हर काली महाकाली ब्रम्हा की साली,अगन पवन ********* सारी,*******************महाकाली ॥






साधना तीन दिन का है आखरी दिन माँ अवश्य ही दर्शन देगी परंतु आपका अटूट विश्वास और धैर्य जरुरी है क्युके माँ दर्शन देने से पूर्व साधक के विश्वास और धैर्य की परीक्षा लेती है.एक बार मे सफलता ना मिलने पर हिम्मत ना हारे और सच्चे पुत्र के तराहा माँ के दर्शन हेतु ज्यादा से ज्यादा प्रयासरत रहे,माँ आपको निराश नही करेगी यह मै अपने अनुभव की बात बता रहा हू.साधना मे दिशा-उत्तर,आसन-वस्त्र लाल रंग के हो,माला रुद्राक्ष/काली हकीक की हो.साधना मंगलवार से शुरू करनी है.आपसे जैसे भी संभव हो समय निकालकर साधना अवश्य सम्पन्न कीजिये.

माताराणी आपको दर्शन प्रदान करे यही कामना करता हु इसीके साथ आपके लिये हृदय से मंगलकामना करता हू....





"तान्त्रोत्क महाकाली विग्रह" का महत्व:-

यह कोई साधारण विग्रह नही है,इस विग्रह पर ध्यान क्रिया करने से साधक को अखन्ड ध्यान का प्राप्ति होता है.घर मे स्थापित करने से वास्तुदोष/गृहदोष समाप्त होने लगता है,अभीचार कर्म जिसे तांत्रिक बाधा दोष कहेते है और काला जादु भी कहेते है उसका असर समाप्त होता रहेता है.लक्ष्मी बंधन दोष जिसके वजेसे धन प्राप्ती मे आनेवाली अडचने और घर मे पैसा/रुपया ना टिकना ये सब खत्म होते जाता है.लंबे समय से चल रही बिमारियो मे स्वास्थ लाभ देखने मिलता है.शत्रुओ से होने वाली हानी मे बदलाव देखने मिलता है.ये सारे लाभ विग्रह स्थापित करने से प्राप्त होते है भलेही आप साधना संपन्न करे या ना करे और इस विग्रह के सामने कोई भी किसी भी प्रकार का महाकालि मंत्र जाप करे तो शीघ्र परिणाम स्वरुप फल प्राप्ती होता होता है.
आप विग्रह प्राप्त करने के जानकारी हेतु मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते है.


जय काली महाकाली माई कृपा करो,भक्तो को अभय वरदान प्रदान करो.......







आदेश........

30 Oct 2015

पिशाच सिद्धी.(प्रत्यक्षिकरण साधना)

तंत्र का क्षेत्र असीम सम्भावनाओं से भरा पड़ा है....इसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे असंभव कह कर नजरअंदाज किया जा सके. एक से बढकर एक विधान, अचूक प्रयोग और अविश्वसनीय रहस्य है.

लोककथाओं के अनुसार, पिशाच अक्सर अपने प्रियजनों से मिला करते थे और अपने जीवन-काल में जहां वे रहते थे वहां के पड़ोसियों के अनिष्ट अथवा उनकी मृत्यु के कारण बन जाते थे.वे कफ़न पहनते थे और उनके बारे में अक्सर यह कहा जाता था कि उनका चेहरा फूला हुआ और लाल या काला हुआ करता था.यह 19 वीं सदी के शुरूआती दौर में आरंभ होने वले आधुनिक काल्पनिक पिशाचों के मरियल,कांतिहीन चित्रण से स्पष्ट रूप से भिन्न था.हालांकि पिशाचीय सत्ता अनेक संस्कृतियों में मिलती है फिर भी पिशाच शब्द 18वीं सदी के आरंभ तक लोकप्रिय
नहीं हुआ था.

मूल लोककथाओं में पैशाचिक पीढियों के
पीछे अनेक एवं विविध कारण हैं.स्लाव एवं चीनी प्रथाओं में जिन मुर्दों को कोई पशु खासकर कुत्ते या बिल्ली लांघ ले तो लोगों को ऐसी शंका हो जाती थी कि वे मरे नहीं.यदिकिसी घायल शरीर पर कोई घाव हो जिसका उपचार उबलते हुए पानी से
नहीं किया गया है तो वह भी जोखिम भरा हो जाता था.रूसी लोककथाओं में, पिशाच कभी चुड़ैल या वैसे लोग हुआ करते थे जिन्होंने जीवित अवस्था में चर्च के विरुद्ध विद्रोह किया था.हालांकि यूरोपीय लोककथाओं में ऐसे अनेक तत्व हैं जो सर्व सामान्य हैं.पिशाचों के बारे में ऐसी रिपोर्ट थी कि वे आमतौर पर देखने में फूले हुए रक्ताभ या पीले बैंगनी अथवा काले रंग जैसे उनकी इन चारित्रिक विशेषताओं को अक्सर आजकल के रक्त पीने की घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. वास्तव में, अक्सर कफ़न में लिपटे या ताबूत में लेटे शव के नाक और मुंह से खून रिसता हुआ देखा गया और बायीं आंख को अक्सर खुला हुआ पाया गया.यह झीने पारदर्शी कफ़न में लिपटा हुआ कब्र में दफ़न, जिसके दांत, बाल और नाखून बड़े हो गए हो सकते थे, जबकि आमतौर पर ऐसे नुकीले दांत नहीं देखे जाते थे.अब बात करते है पिशाच को वश करने की,जिसके मदत से कई प्रकार के कार्य संभव है.

पिशाच सिद्धि यह भी भूत की तरह ही एक योनि होती है,पर अत्यंत बलिष्ठ,अत्यंत मजबूत और द्र्ढ निच्छय युक्त,अगर साधक इसे सिद्ध करले और इसे आज्ञा दे दे तो सामने चाहे,पचास शत्रु,बंदूक या
पिस्तोल लाठी या भाले लिय हुए खड़े हो तो उसे पाच मिनट मे ही भगा देता है,इसका क्षमता बहोत भयंकर होता है.

यह साधक को 24 घंटे अदृश्य रूप मे मित्र के तरहा रहेता है और बुलाने पर हर आज्ञा का पालन करता है.चाहे कितने भी जिवन मे शत्रु हो उन्हे पिशाच शत्रुत्व छोडने पर मजबुर कर देते है.फसा हुआ धन वापस पाने के लिये पिशाच साधना सर्वोत्तम है.




साधना विधि-

कृष्ण पक्ष के शुक्रवार को साधक दक्षिण को मुख करके गुरु जी से आज्ञा लेकर नग्न अवस्था मे साधना मे बैठे (जिन्हे गुरू ना हो वह शिव जी से मानसिक रुप मे आग्या माँगे),आसन काले रंग का हो और सामने स्टील या तांबे के प्लेट मे सिंदूर मे चमेली का तेल मिलाकर पुरुष आकृति बनाये,पुरुष आकृति मे हृदय का पूजन करे और उसपे "पिशाच सिद्धी गोलक"स्थापित कर दीजिये इस साधना मे रुद्राक्ष या काले हकीक का माला आवश्यक है,गुरुमंत्र के जाप होने के बाद साधक पिशाच मंत्र का 21 माला जाप करे और यह मंत्र साधना 3 दिनो तक करना है.अगर पहीले बार मे सफलता प्राप्त ना हो तो येसा 3 शुक्रवार तक रात्रि मे 10 बजे के बाद साधना करने से पिशाच साधक के सामने प्रत्यक्ष होता है और वचन मांगता है,पिशाच सिद्धि होने के बाद मुजसे संपर्क कीजिये मै आपको पिशाच विसर्जन का विधि भी बता दुगा,सिर्फ 3 शुक्रवार करने से पिशाच सिद्ध होकर हमारा मनचाहा कार्य सम्पन्न करता है.इस साधना मे रक्षा मंत्र जाप भी आवश्यक है और कमजोर हृदय वाले गलती से भी साधना ना करिये क्युके यह उग्र प्रकार का मंत्र साधना है.




देह रक्षा मंत्र:-

llओम नम: वज्र का कोठा, जिसमें पिंड हमारा बैठा। ईश्वर कुंजी ब्रह्मा का ताला, मेरे आठों धाम का  यती हनुमन्त रखवाला ll



इस मंत्र को किसी भी शुभ समय काल में 1 घंटा तक लगातार जप करके सिद्ध कर लें.
किसी भी दृष्टि से आपको किसी भी प्रकार के अहित का डर हो तब ग्यारह बार मंत्र पढ़कर शरीर पर फूंक मारे तो आपका शरीर हर प्रकार सुरक्षित रहेगा।




पूर्ण पिशाच सिद्धी मंत्र:-

ll ऐं क्रीं क्रीं ख्रिं ख्रिं खिचि खिचि पिशाच खिचि खिचि ख्रिं ख्रिं क्रीं क्रीं ऐं फट ll

Aim kreem kreem khreem khreem khichi khichi pishach khichi khichi khreem khreem kreem kreem aim phat




साधना सिर्फ तीन दिवसीय है परंतु 3 शुक्रवार तक करना आवश्यक है पूर्ण
सिद्धि के लिये.पिशाच सिद्धी गोलक के साथ आपको होली का बभूत भेजा जायेगा है और गोलक को हमेशा बभूत मे ही रखना है अन्यथा आपको परेशानी हो सकता है क्यूके गोलक के साथ हमेशा शक्तिया घूमता-फिरता रहेता है,उनको बभूत मे रखने से काबू पाया जाता है.आप जब भी साधना करे तो आपको पिशाच सिद्धी गोलक को जब भी साधना मे स्थापित करना हो तो आप चावल या कोई भी बभूत का ढेरी बनाये और उसिपे गोलक को स्थापित कीजिये,साधना के समय गोलक का भी पूजन आवश्यक है,पूजन सामान्य पद्धती से करना है सिर्फ जल चढाना वर्जित है.गोलक को सिर्फ साधना काल मे ही स्थापित रखिये बाकी समय बभूत के साथ डिब्बिया मे रखिये अगर आपको महसूस हो रहा हो के आपके उपर किसी प्रकार का तंत्र-मंत्र का बाधा है तो थोडासा बभूत डिब्बिया से निकाल कर अपने आपको या फिर पीड़ित को बभूत का तिलक महामृत्युंजय मंत्र बोलकर करे तुरंत असर होगा,तिलक शाम को गौधूलि वेला मे करना आवश्यक है बाकी समय मे करने से असर धीमा होता है कार्य पूर्ति के बाद किसी गरीब को कुछ दान कर दीजिये तो आपको भी अच्छा लगेगा और हा अगर घर के ऊपर तंत्र-मंत्र का बाधा हो तो बभूत को एक ग्लास पानी मे मिलाकर पूरे घर मे जल के छीटे लगा दीजिये समय गौधूलि वेला ही होगा.विशेष कार्य को जाते समय अपना कामना गोलक को स्पर्श करते हुये बोलिये और कार्य को सम्पन्न कीजिये फायदा मिलेगा.


आखिर इस साधना मे "पिशाच सिद्धी गोलक" का आवश्यकता क्यू है?

इस गोलक का निर्माण क्रिया घर पर नही कर सकते है और इस गोलक को पारद  घोटायी के समय समशान मे पिशाच आवाहन मंत्रो का जाप करके पारद को घट बनाने की प्रक्रीया की जाती है और पारद को पकाने हेतु सिर्फ समशान के कोयलो का इस्तेमाल होता है.इस गोलक को दूसरे शब्दो मे पिशाच हृदय भी कह सकते है क्युके गोलक मे पिशाच को कैद करने जैसा ही क्रिया किया जाता है.जब हम गोलक को देखते हुए मंत्र जाप करते है तब गोलक मे हलचल होता है और यही साधना सिद्धी का खास समय माना जाता है.जब मंत्र जाप काल मे गोलक हिलेगा तो आपका विश्वास साधना प्रती मजबुत होगा और आप ज्यादा से ज्यादा आत्मविश्वास के साथ मंत्र जाप कर सकेगे.जैसे बिना सिमकार्ड के मोबाइल किसी काम का नही उसी तरहा गोलक के बिना ये साधना किसी काम का नही.मोबाइल चलाने को नेटवर्क का आवश्यकता होता है और नेटवर्क सिमकार्ड के बिना मिलना कैसे संभव है.उसी तराहा से ये गोलक आपका सम्पर्क पिशाच से करवा देता है जिसमे कोई शंका नही है.सिर्फ आपमे विश्वास और मेहनत करने की क्षमता होना जरुरी है,साथ मे धैर्य भी जरुरी है क्युके जिनमे धैर्य ना हो वह तो कुछ भी सिद्ध नही कर सकते है.धैर्य ही प्रत्येक साधना का मुलतत्व है,जिसमे धैर्य हो उनके स्वप्न अवश्य पूर्ण हो जाते है.पिशाच सिद्धी गोलक का मूल्य 1590/- रुपये है जो अद्वितीय गुणो से संपन्न है (गोलक प्राप्त करने हेतु ई-मेल से सम्पर्क करे),येसा गोलक निर्माण करना हर किसिके लिये संभव नही है.प्रत्यक्षिकरण साधना मे आवश्यक सामग्री हो तो साधक को सफलता मिलना असंभव नही होता है.इसमे आपका मेहनत और मेरा मार्गदर्शन आपको सफलता अवश्य प्राप्त करवायेगा येसा मुझे विश्वास है,आगे मर्जी मातारानी की जो आप पर सदैव कृपा बरसाकर अन्य सभी साधना मे सफलता प्रदान करे.







आदेश......

भुत-प्रेत सिद्धी (प्रत्यक्षिकरण)

जिसका कोई वर्तमान न हो, केवल अतीत ही हो वही भूत कहलाता है.अतीत में अटका आत्मा भूत बन जाता है.जीवन न अतीत है और न भविष्य.वह सदा वर्तमान है.जो वर्तमान में रहता है वह मुक्ति की ओर कदम बढ़ाता है.

आत्मा के तीन स्वरुप माने गए हैं जीवात्मा, प्रेतात्मा और सूक्ष्मात्मा। जो भौतिक शरीर में वास करती है उसे जीवात्मा कहते हैं। जब इस जीवात्मा का वासना और कामनामय शरीर में निवास होता है तब उसे प्रेतात्मा कहते हैं। यह आत्मा जब सूक्ष्मतम शरीर में प्रवेश करता है, उस उसे सूक्ष्मात्मा कहते हैं. भूत-प्रेतों की गति एवं शक्ति अपार होती है.इनकी विभिन्न जातियां होती हैं और उन्हें भूत, प्रेत, राक्षस, पिशाच, यम, शाकिनी,डाकिनी, चुड़ैल, गंधर्व आदि कहा जाता है.



भूत प्रेत कैसे बनते हैं:-

इस सृष्टि में जो उत्पन्न हुआ है उसका नाश भी होना है व दोबारा उत्पन्न होकर फिर से नाश होना है यह क्रम नियमित रूप से चलता रहता है. सृष्टि के इस चक्र से मनुष्य भी बंधा है. इस चक्र की प्रक्रिया से अलग कुछ भी होने से भूत-प्रेत की योनी उत्पन्न होती है.जैसे अकाल मृत्यु का होना एक ऐसा कारण है जिसे तर्क के दृष्टिकोण पर परखा जा सकता है.सृष्टि के चक्र से हटकर आत्मा भटकाव की स्थिति में आ जाती है.इसी प्रकार की आत्माओं की उपस्थिति का अहसास हम भूत के रूप में या फिर प्रेत के रूप में करते हैं.यही आत्मा जब सृष्टि के चक्र में फिर से प्रवेश करती है तो उसके भूत होने का अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है. अधिकांशतः आत्माएं अपने जीवन काल में संपर्क में आने वाले व्यक्तियों को ही अपनी ओर आकर्षित करती है, इसलिए उन्हें इसका बोध होता है.जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ रही है वे सैवे जल में डूबकर बिजली द्वारा अग्नि में जलकर लड़ाई झगड़े में प्राकृतिक आपदा से मृत्यु व दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं और भूत प्रेतों की संख्या भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है.अब बात करते है दुर्लभ भूत-प्रेत प्रत्यक्षिकरण साधना का जो अत्यन्त सरल और उग्र मंत्र के साथ शीघ्र फलिभूत होने वाले विधान के बारे मे-






विधि-विधान:-

भूत-प्रेत सिद्धि साधना यह बहोत आसान सा साधना है जिसे 11 दिन तक करना है और सिर्फ 21 माला मंत्र जाप करना है इसमे भी लड्डू को भोग लगाना है और जब भूत-प्रेत प्रत्यक्ष हो तो उससे वचन मांगे जो भी आप चाहते है,इस साधना से अन्य देवी-देवता के दर्शन प्राप्त करने मे बहोत मदत मिलता है यह एक कटु सत्य है उन लोगो के लिए जो भूत-प्रेत साधना को खराब मानते है,जहा देवी-देवता के दर्शन के लिए साधक व्यर्थ ही कई वर्ष लगा देते जहा की भूत के माध्यम से यह कार्य कुछ ही महीनो मे हो जाता है.दिशा- दक्षिण आसन-वस्त्र काले रंग के हो समय रात्रि मे 10 बजे के बाद,साधना के लिए आवश्यक सामग्री एक मट्टी का दिया,सरसो का तेल,काजल और चावल, प्रेत सिद्धी गोलक सफेद वस्त्र पर काले रंग के काजल से पुरुष आकृति बनाना है,इस वस्त्र को चावल के ऊपर स्थापित करना है,आकृति मे पुरुष के हृदय पर प्रेत-सिद्धी गोलक स्थापित कीजिये और गोलक को देखते हुये मंत्र जाप करना आवश्यक है क्युके सर्वप्रथम भुत-प्रेत का परछायी गोलक मे दिखता है,गोलक मे जब सर्वप्रथम भुत-प्रेत का दर्शन होता है तो समझ जाना चाहिये के उसी घडि उसी पल आपको भुत सिद्ध हो गया है बस अब कुछ ही समय मे वह शक्ती प्रत्यक्ष होनेवाली है.साधना समाप्ती के बाद लड्डु गरीबो मे बाट दे और सफ़ेद वस्त्र को जल मे प्रवाहित कर दे. यह मंत्र भी किसी भी किताब से प्राप्त नहीं हो सकता है और साधना अच्छे कार्यो को सम्पन्न करवाने के लिए कीजिये अन्यथा आपके हानी का जिम्मेदार मै नहीं हु बाकी साधना हेतु मै मार्गदर्शन करुगा और "भुत-प्रेत सिद्धी गोलक" कच्चे पारद के साथ भुतकेशी जड से जो श्वेत रस निकलता है उसिके मिश्रण से 12 विभिन्न क्रिया से बनाया जाता है जिसका मूल्य 1550/- रुपये तक है.बिना गोलक के साधना मे अनुभुतिया संभव नही है और यह गोलक बनाने का ग्यान सुशील नरोले के अलावा कुछ ही लोग जानते है जो इंटरनेट पे कार्यरत नही है.





भुत-प्रेत सिद्धी मंत्र:-

ll ह्रौं हूं प्रेत प्रेतेश्वर आगच्छ आगच्छ प्रत्यक्ष दर्शय दर्शय हूं फट ll

hroum hoom pret preteshwar aagachch aagachch  pratyaksh darshay darshay hoom phat





साधना से पूर्व एक बार मुजसे संपर्क कीजियेगा,बाकी सूत्र भी बता दुगा......
इस साधना विधान से कई लोगो ने जो मेरे सम्पर्क मे है उनको साधना सिद्ध हुआ है






आदेश.....

हनुमान बिर ताबीज.


हनुमान जी को प्रसन्न करना बहुत सरल है। राह चलते उनका नाम स्मरण करने मात्र से ही सारे संकट दूर हो जाते हैं। जो साधक विधिपूर्वक साधना से हनुमान जी की कृपा प्राप्त करना चाहते है उनके लिये मै हनुमान बिर ताबीज बना रहा हू l
वर्तमान युग में हनुमान साधना तुरंत फल देती है। इसी कारण ये जन-जन के देव माने जाते हैं। इनकी पूजा-अर्चना अति सरल है, इनके मंदिर जगह-जगह स्थित हैं अतः भक्तों को पहुंचने में कठिनाई भी नहीं आती है। मानव जीवन का सबसे बड़ा दुख भय'' है और जो साधक श्री हनुमान जी का नाम स्मरण कर लेता है वह भय से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
“पंचवत्रं महाभीमं पंचदश नयनेर्युतम्"
हनुमान मन्दिर देशभर में सर्वत्र हैं। वे अजर-अमर, कल्पायु-चिरायु, कालजयी,
मृत्युंजयी, वत्सल, कल्पतरू, मंगलकर्ता
सर्वाभीष्ट प्रदाता है। उनकी उपासना, गुणगान, चर्चा, कथा देश-विदेशों में प्रचलित है। स्कन्दपुराण ब्रह्मखंड के वर्णनानुसार तथा तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में उनके हाथ में वज्ज्, गदा, आयुध कहा है।
वैसे तो कलियुग में 33 करोड़ देवी.देवताओं की कल्पना की गयी हैं जिनमें
शिवए रामए कृष्णए दुर्गाए लक्ष्मीए गणेशए
पार्वती हनुमान आदि प्रमुख हैं। इनमें हनुमान की एकमात्रा ऐसे देवता हैं जिनकी पूजा करने से लगभग सभी देवी.देवताओं
की पूजा का एक साथ फल मिल जाता है। हनुमान साधना कलियुग में सबसे सरल और प्रभावी मानी जाती है। पौराणिक ग्रंथों में हनुमान जी को शिव जी का अंश कहा गया है l
सभी हनुमत भक्त ये बात भली भाती जानते है "हनुमान जी की शक्ति अपरंम्पार है" परंतु कुछ लोग ये बात नही जानते जैसे हनुमान जी की एक तीव्र शक्ती जिसे मसानी शक्ती के रुप मे "हनुमान बिर"कहा जाता है.हनुमान जी बिरो के बिर है इसलिये उनका एक नाम "महाबिर" नाम से प्रचलित है.देवताओ की स्मशानी ताकतो को तंत्र मे "बिर" कहा जाता है और कोई भी काम बिर शीघ्र ही करवा देते है,उनको किसी भी काम को करने का कोई बंधन नही है.जैसे अन्य देवी/देवता की कृपा से इंसान का जीवन बदल सकता है परंतु कोई भी देवी/देवता मनुष्य के वश मे होकर काम नही करते.बिरो को वश मे करने का विधान शाबर विद्याओ मे बहोत प्रचलित है.बिरो को वश करके उनसे सभी प्रकार के काम किये जाते है जिसके लिये ज्यादा पुजा-पाठ करने की आवश्यकता नही होती है.बिर काम करने के बाद साधक से कुछ प्रसाद भी माँगते है जैसे हनुमान बिर से कोई भी काम करवाओ तो उन्हे प्रत्येक समय भेट स्वरुप नारियल और सिंदूर देना पडता और हम जो भेट चढाते है उसके बदले मे हनुमान बिर हमारा कोई भी काम तुरंत कर देते है.अभि कुछ दिनो पहिले मेरे पास कामाख्या शक्तीपीठ के एक तांत्रिक आये थे जिनका नाम है "कालीदास बाबा",उन्होने मुझे कोई काम बताया था और वो काम मै 3-4 घंटे के अंदर हनुमान बिर की कृपा से करवा दिया.ये सब देखकर वो आच्छर्यचकित हो गये और कहेने लगे "सुशील भाइ,येसा कौनसा तंत्र है आपके पास के जो काम मै 20-25 दिनो से पूर्ण करने मे लगा हुआ हू परंतु हो नही रहा था और आपने इतने शीघ्र कैसे करवा दिया?"
असल मे बाबा ने मुझे उनके भक्त को शराब की बुरी आदत छुडाने का काम दिया था और अब तक मै सेकडो लोगो की शराब हनुमान बिर के कृपा से छुडवा चुका हु.जब कलीदास बाबा को मैने हनुमान बिर के कार्यप्रणाली के बारे मे बताया तो वो मेरे से 7 हनुमान बिर ताबीज लेकर गये.कालीदास बाबा कामाख्या शक्तीपीठ के आस-पास के क्षेत्र मे प्रसिद्ध तांत्रिको मे से एक जबरदस्त तांत्रिक है.उनको मैने अच्छेसे बिर को चलाने का विधि-विधान समझाया जिससे वो बहोत खुश हुए.
यह विद्या बहोत आसान है आपके लिये परंतु हनुमान बिर ताबीज बनाने वालो के लिये बडी जटिल क्रिया है.आपको सिर्फ छोटासा काम करना है जैसे मंत्र को याद करना है और मंत्र को याद करके 7 दिन तक मंत्र का 108 बार जाप करना है.अब सात दिनो मे किस तरहा से मंत्र को सिद्ध किया जाये तो इसका गोपनिय विधान मै आपको बता दुगा.हनुमान बिर ताबीज को हमेशा प्लास्टिक की डिबीया मे सिंदूर के साथ सम्भाल के रखना है और जब भी हनुमान बिर से काम करवाना हो तब चावल के कुछ दानो मे सिंदूर+केवडे का इत्र मिलाकर मंत्र का 11 बार जाप करके चावल हनुमान बिर ताबीज पर चढाना है.यह विधान करने के बाद हनुमान बिर की कृपा से कार्यसिद्धी होती है और काम पूर्ण होने के बाद हनुमान बिर को नारियल+सिंदूर अर्पित करे ताकि उनके कृपा से आगे भी जीवन मे कार्यसिद्धी होता रहे.हनुमान बिर ताबीज 1150/- रुपये के मूल्य मे आपको प्राप्त होगा.इस ताबीज का शुल्क बहोत कम है वो इसलिये ताकी आपको जिवन मे अन्य लोगो की सहय्यता करने का लाभ प्राप्त हो.मै अगर यही ताबीज 11 हजार मे दु तो बहोत कम ही लोग इसे प्राप्त कर सकेगे जिससे हमारे समाज मे सामाजिक कल्याण कम तौर पर घटित होगा और कम मूल्य मे दे देता हु तो ज्यादा-से-ज्यादा लोग हनुमान बिर की कृपा प्राप्त कर सकेगे.
यहा हनुमान बिर का मंत्र दे रहा हु जो मराठी भाषा मे है,कृपया इसे हनुमान बिर ताबीज को प्राप्त करने से पहिले याद करके रखिये.



हनुमान बिर मंत्र:-
ll बि.र.र. गणा न गणपती सारजा सरस्वती,सारजा सरस्वती न काय केल?डाग डुबला,डाग डुबल्याची काजल आणली,शिरी कुंकवाची चिरी ल्याली,ये अंजनिच्या पुता,रामाच्या दुता,आमचे काम सिद्ध करावे,नाही करशिल तर राम-लक्ष्मणाची आण,सिता जानकीची आण,सिद्धांशी गुरू छू वाचापुरी ll



बि.र.र.का अर्थ मै बता दुगा और तब तक आप बिना "बि.र.र."का उच्चारण किये मंत्र को याद करके रखिये.





आदेश.....

शाबर रोगमुक्ती साधना.

मनुष्य ब्रम्हांड की एक अद्भुत रचना है,
जिसे जितना भी समजा जाए उतना
ही कम लगता है. आधुनिक विज्ञान तो
मनुष्य के कुछ ही हिस्सों तक पहोचा है और इस क्षेत्र में पूर्ण रूप से अपनी शोध को गतिशील बनाये हुवे है.

“स्वस्थ’ की परिभाषा हैं जो अपने मे स्थित हो .पर कितने हैं जो अपने मे स्थित हैं और आधुनिक युग मे जिसे भागादौड़ी करना पड़ रही हो.... अपने जीवन को बचाए
रहने के लिए ...हर पल सघर्ष रत रहना पड़ रहा हो वह कहाँ से और कैसे अपने मे स्थित हो जाए .
“जीवेत शरद शतम “ अब सिर्फ सुनने
की बात हैं ऋग्वेद मे यह आशीर्वाद कहा हैं पर क्या इसका मतलब किसी भी तरफ से खींच-खांच करके विस्तर मे पड़े पड़े १०० वर्ष का जीवन ..पर नही जो स्वस्थ हो
और बलशाली हो ऐसा जीवन ..जो
उमंग् युक्त हो ...और जो भले ही ७० का हो गया हो पर उस मे अभी भी जीवन उर्जा
हैं वह हैं नौजवान और जो २० वर्ष का हो पर जीवन से हार रहा हो वही हैं वृद्ध .
पर यह बात तो उमंग की हुयी पर जब शरीर ही रोग ग्रस्त हैं तब ...आपकी इच्छा शक्ति भी कमजोर हो जाती हैं क्योंकि
कहीं न कहीं इच्छशक्ति का भी लेना देना इसी भौतिक शरीर से तो हैं .
हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने भी इसी दिशा में शोध कार्य किया था और शरीर से सबंधित कई प्रकार के गोपनीय तथ्यों के बारे में अपनी तपस्या से पता लगाया था. मनुष्य शरीर एक अत्यधिक जटिल रचना है, यह ठीक एक यंत्र की तरह है जिसमे कई प्रकार के पुर्जे होते है और कोई भी एक पुर्जा खराब होने पर पूरा यंत्र खराब हो जाता है. हमारा शरीर स्वस्थ हो तब हमारा जीवन स्वस्थ है और हमारा
शरीर अपनी गितिशिलता के अनुरूप
कार्यशील रहेगा. लेकिन जब यह कार्य में
रुकावट आती है तो कई प्रकार की
समस्याओ का सामना करना पड़ता है. ये रुकावट को या फिर यह गतिशीलता में शरीर को जो बाधा प्राप्त हो रही है उसे ही रोग कहते है. रोग मनुष्य को मात्र बाह्य या
शारीरिक रूप से नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी तोड़ देता है तथा जीवन के क्रियाकलाप में विक्षेप का प्रसार करने लगता है. आज के युग की चिकित्सा
पध्धति मात्र बाह्य लक्षणों की तरफ ध्यान
देती है लेकिन मानसिक रूप से जो क्षति
पहोचाती है तथा जो सूक्ष्म भाग और
शरीर के अंदर के अन्य शरीर तथा तत्वों पर जो क्षति होती है उस की क्षति पूर्ती करना अत्यधिक कठिन कार्य होता है और इसी लिए कई बार कई प्रकार के रोग उत्तम चिकित्सा लेने पर भी पूरी तरह मिटते नहीं और कई बार होते है. तंत्र क्षेत्र के कई अद्भूत विधान है जिसके माध्यम से रोगों से मुक्ति पा कर एक सम्पूर्ण जीवन को जिया जा सकता है. ऐसे दुर्लभ विधानों
के माध्यम से जहा एक और रोग और रोगजन्य कष्ट और पीड़ा से मुक्ति मिलती है,वहीँ दूसरी और जो क्षति हुई है
उसकी भी पूर्ति होती है जिससे भविष्य में वह रोग के लक्षण नहीं होते है और समस्त रोगो से मुक्ती प्राप्त होती है.

शाबर मंत्रो से शीघ्र लाभ प्राप्त होता है,आज जो मंत्र दे रहा हू इससे समस्त प्रकार की रोग-पीडा हमेशा के लिये दुर हो जाती है.यहा तक की इस मंत्र से कैन्सर,टि.बी.,जोडो का दर्द,वात-पित्त,शुगर जैसे गंभीर रोग भी ठिक हो जाते है तो फिर छोटि-छोटि बिमारिया तो जल्दी ठिक होती है.




मंत्र:-

ll ओम नमो केतकी ज्वालामुखी काली,दो वर-रोग पीडा दूर कर,सात समुद्र पार कर,आदेश कामरू देश कामाख्या माई,हाडी दासी चंडी की दुहाई ll




विधि-विधान:-

यह शाबर मंत्र है इसलिये सफलता तो मिलती है,सर्वप्रथम किसी लकडे के बाजोट पर लाल वस्त्र स्थापित करे और उस पर महाकाली जी का चित्र रखीये.माँ का सामान्य पुजन करे और गुरू जी गणेश जी का भी पुजन भी कर लिजिये.मंत्र का 10,000 बार जाप करना आवश्यक है.यह साधना मंगलवार से या किसी भी नवरात्री से प्रारंभ करे.यह साधना 11 दिन की है जिसमे 10 दिन 10 माला जाप रुद्राक्ष माला से करना है और 11 वे दिन घी की 108 आहुती हवन मे देना जरुरी है.आसन-वस्त्र लाल रंग के हो और उत्तर दिशा साधना हेतु उत्तम है.इस तरहा से विधि-विधान संपन्न होने के बाद मंत्र सिद्धी होती है.जब भी आपको मंत्र से लाभ उठाना हो तब आप किसी भी रोगी को ठिक करने हेतु "एक ग्लास शुद्ध जल"लेकर उसपर सात बार मंत्र बोलकर जल पे तीन फुंक लगाये,फिर वह जल रोगी को पिलाये तो 30-40 मिनिट रोगी आराम मिलना प्रारंभ हो जाता है और यह क्रिया कुछ दिन नित्य करने से 7-8 दिन के अंदर पूर्णता: स्वस्थ हो जाता है,यह मेरा स्वयम का आजतक का अनुभव रहा है.जब हम मंत्र सिद्धी करते है तब हमारे स्वयम के रोग भी समाप्त होते है.इस मंत्र को आप बभुत पर पढकर भी रोगी को दे सकते है या मोर पंख से मंत्र बोलकर झाडा कर सकते है.परंतु इस विद्या से आप सामाजिक कल्याण करे और धनप्राप्ति हेतु करेगे तो आपकी सिद्धी समाप्त हो जायेगी ये मेरी गारंटि है.






आदेश......

अर्पना अप्सरा प्रत्यक्षिकरण साधना.

प्रत्येक धर्म का यह विश्वास है कि स्वर्ग में पुण्यवान् लोगों को दिव्य सुख, समृद्धि तथा भोगविलास प्राप्त होते हैं और इनके साधन में अन्यतम है अप्सरा जो काल्पनिक, परंतु नितांत रूपवती स्त्री के रूप मे चित्रित की गई हैं। यूनानी ग्रंथों मे अप्सराओं को सामान्यत: 'निफ' नाम दिय गया है। ये तरुण, सुंदर, अविवाहित, कमर तक वस्त्र से आच्छादित और हाथ मे पानी से भरे हुआ पात्र लिए स्त्री के रूप मे चित्रित की गई हैं जिनका नग्न रूप देखनेवाले को पागल बना डालता है और इसलिए नितांत अनिष्टकारक माना जाता है। जल तथा स्थल पर निवास के कारण इनके दो वर्ग
होते हैं।

शतपथ ब्राह्मण में (११/५/१/४) ये तालाबों मे पक्षियों के रूप में तैरनेवाली चित्रित की गई हैं और पिछले साहित्य में ये निश्चित रूप से जंगली जलाशयों में, नदियों में, समुद्र के भीतर वरुण के महलों मे भी रहनेवाली मानी गई हैं।
इस्लाम में भी स्वर्ग में इनकी स्थिति मानी जाती है। फारसी का 'हूरी' शब्द अरबी
'हवरा' (कृष्णलोचना कुमारी) के साथ संबद्ध बतलाया जाता है।
यह जानकारी भारतकोशग्यान पर है जो सत्य है,अब मै आगे "अर्पना अप्सरा सिद्धी"के बारे मे बता रहा हू.



"कुंकुमपंअकलंकितदेहा गौरपयोधरकपम्पितहारा। नूपूरहंसरणत्पदपदूमाकं नवशीकुरुते भुविरामा॥"

अर्थ-जिसका शरीर केसर के उबटन से सुन्दर बना हुआ है, जिसके गुलाबी स्तनोँ पर मोती का हार झूल रहा है चरण कमल मे नुपूर रुपी हंस शब्द करतेँ हो। एसी लोकोत्तर सुन्दरी किसे अपने वश मे नहि कर सकती।



आवश्यक सामग्री-

गुलाब जल,गुलाब का इत्र,कोई भी अप्सरा का चित्र,दीपक, शुद्ध घी या चमेली का तेल, एक बेजोट,कोरा श्वेत वस्त्र केसर दो गुलाब के फूल,शंख की माला, श्वेत या कंबल का आसन, सफेद धोती और मुख्य सामग्री "अर्पना अप्सरा सिद्धी यंत्र"जिसके बिना ये साधना संभव नही है.

दिन व समय-किसी भी मास की एक तारीख को या किसी भी पुष्य नक्षत्र मे की जा सकती है या फिर शुक्ल पक्ष शुक्रवार के दिन करे,रात्रि 11 बजे करे।




विधि-विधान:-

साधना के करने से पूर्व बाजोट पर श्वेत वस्त्र कोरा वस्त्र बिछा कर अप्सरा का चित्र रखे और उसका पुजन करे जैसे भी आपको करना आता हो साथ मे "अर्पना अप्सरा यंत्र का पुजन करे.नीचे जो मंत्र दीये हुए है उसमे "अप्सरा अंगन्यास" दीये है तो चित्र को स्पर्श करते हुए कुमकुम या अष्टगंध का अप्सरा के चित्र को स्पर्श करे (जहा-जहा शरीर के भागो का उच्चारण है वहा)


अं नारिकेल रुपायै नमः-शिरसि
आं वासुकी रुपायै नमः-केशाय
इं सागर रुपायै नमः- नेत्रयो
ईँ-मत्यस्य रुपायै नमः -भ्रमरे
उं मधुरायै नमः- कपोले
ऊं गुलपुष्पायै नमः- मुखे
एं गह्वरायै नमः-चिबुके
ऐं पद्मपत्रायै नमः-अधरोष्ठे
ओं दाडिमबीजायै नमः-दंतपंक्तौ
औं हंसिन्यै नमः-ग्रिवायै
अं पुष्प वल्ल्यै नमः-भुजायोः
अः सूर्यचंद्रमाय नमः-कुचे
कं सागरप्रगल्भायै नमः- वक्षे
खं पीपरपत्रकायै नमः-उदरौ
गं वासुकीझील्यै नमः-नाभौ
घं गजसुंडायै नमः-जंघायै
चं सौंदर्यरुपायै नमः पादयौ
घं हरिणमोहिन्यै नमः-चरणे
जं आकाशाय नमः-नितम्भयो
झं जगतमोहिन्यै नमः-रुपे
टं काम प्रियायै नमः- सर्वांगे



*अब अप्सरा के भावो की कल्पना करे-

ठं देवमोहिन्यै नमः-गत्यमौ
डं विश्व मोहिन्यै नमः-चितवने
ढं अदोष रुपायै नमः-द्रष्ट्यै
तं अष्टगंधायै नमः-सुगंधेषु
थं देवदुर्लभायै नमः-प्रणयं
दं सर्वमोहिन्यै नमः-हास्ये
घं सर्वमंगलायै नमः-कोमलांग्यै
नं धनप्रदायै नमः- लक्ष्म्यै
पं देहसुखप्रदाय नमः-रत्यै
फं कामक्रिडायै नमः-मधुरे
बं सुखप्रदायै नमः-हेमवत्यै
भं आलिंगनायै नमः-रुपायै
मं रात्रौसमाप्त्यै नमः-गौर्यै
यं भोगप्रदायै नमः-भोग्यै
रं रतिक्रयायै नमः-अप्सरायै
लं प्रणयप्रियायै नमः-दिव्यांगनायै
वं मनोवांछितप्रदाय नमः-अप्सरायै
शं सर्वसुखप्रदायै नमः-योगरुपायै
षं कामक्रिडायै नमः-देव्यै
सं जलक्रिडायै नमः-कोमलांगिन्यै
हं स्वर्ग प्रदायै नमः-अर्पणाप्सरायै


अब एक गुलाब का पुष्प चित्र के पास रखे गुलाब का इत्र रुई मे ले कर चित्र के पास रख दे। एवं अब स्वयं इत्र लगावे,मुलैठी या इलायची चबा जाऐ। अब लोटे मे जल ले उसमे गंगा जल मिला कर विनयोग करे.



विनियोग:-

ll ॐ अस्य श्री अर्पणा अप्सरा मंत्रस्य कामदेव ऋषि पंक्ति छंद काम क्रिडेश्वरी देवता सं सौन्दर्य बीजं कं कामशक्ति अं कीलकं श्री अर्पणाप्सरा सिध्दयर्थं रति सुख प्रदाय प्रिया रुपेण सिद्धनार्थ मंत्र जपे विनयोगः ll



न्यास/करन्यास:-

ॐअद्वितीयसौँदर्यनमः शिरषि
ॐकामक्रिड़ासिध्दायैनमः मुखे
ॐआलिंगनसुखप्रदायैनमः ह्रिदी
ॐदेहसुखप्रदायैनमः गुह्यो
ॐआजन्मप्रियायैनमः पादयो
ॐमनोवांछितकार्यसिद्धायै नमः करसंपुटे
ॐ दरिद्रनाशय विनियोगायैनमः सरवांगे
ॐसुभगायै अंगुष्ठाभ्यां नमः
ॐसौन्दर्यायै तर्जनीभ्यां नमः
ॐरतिसुखप्रदाय मध्यमाभ्यां नमः
ॐदेहसुखप्रदाय अनामिकाभ्याम नमः
ॐ भोगप्रदाय कनिष्ठाभ्यां नमः
ॐ आजन्मप्रणयप्रदायै करतलपृष्ठाभ्यां नमः l


ध्यान:-

ll हेमप्रकारमध्ये सुरविटपटले रत्नपीठाधिरुढां यक्षीँ बालां स्मरामः परिमल कुसुमोद्भासिधम्मिल्लभाराम पीनोत्तुंग स्तननाढ्य कुवलयनयनां रत्नकांचीकराभ्यां भ्राम द्भक्तोत्पलाभ्यां नवरविवसनां रक्तभूषांगरागाम् ll



मंत्र:-

(मंत्र साधना सामग्री के साथ उपलब्ध है )
       amannikhil011@gmail.com


रात्री काल मे साधना के समय अप्सरा को अपनी प्रेमिका समझकर उसको मिलने का भाव रख कर 11 माला जाप  "क्रोध भैरव मंत्र से सिद्ध प्राण-प्रतीष्ठीत माला" से जाप करे,मंत्र जाप पूर्ण हो जाने पर प्रभाव प्रत्यक्ष होने लगता है। नाना प्रकार की क्रिडा अप्सरा द्वारा की जाती है विचलित हुए बिना मंत्र जाप पूर्ण हो जाए तो उचित है और अप्सरा सामने आते ही उससे वचन ले लिजिये.



*विशेष:-

साधना से एक दिन पूर्व ही साधना कक्ष को साफ कर लेना चाहिए अर्धरात्री से मौन रखे कर अकले दिन रात मेँ साधना से पूर्व मौन खत्म होता है व्यसन कामुकता पूर्णतः वर्जित है। साधना से पूर्व गुरु,गणेश,शिव,इष्ट पूजन अवश्य कर लेना चाहिए ताकी साधना की सफलता की संभावना बनी रहे ये सभी साधनाओँ का आधार होते है.



*भाव की प्रधानता:-

जो इस साधना का मुख्य अंग है, यह साधना काम भाव की है अर्थ ये नही की आप कामुक भाव से करे। भाव ये है की एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के प्रेम मे व्याकुल उसे पुकार रहा है और इस साधना मे अर्पना आपकी प्रेमिका है.


*नोट- ये साधना एक दिवसीय अवश्य है परंतु सरल नहि है क्युके सात्विक रह कर, मौन रह कर, काम क्रोध लोभ मोह त्याग कर, मनको शांत रख कर ही आप साधना मे अपनी सफलता की संभावना को बढा सकते सकते है.इस साधना को बिना साधना सामग्री के नही करना चाहिये.बहोत कम रुपये मे आपको इस साधना की सामग्री प्राप्त होगी,जैसे "अर्पना अप्सरा सिद्धी यंत्र" 750/- रुपये मे और स्फटिक माला 350/- रुपये मे दे रहा हु.इस हिसाब से 1100/- रुपये मे आपको पूर्ण प्रामानिक साधना सामग्री और "अर्पना अप्सरा  प्रत्यक्षिकरण" मंत्र दिया जायेगा.अब जिनको माला नही चाहिये तो उनके लिये यंत्र भी उपलब्ध करवा देगे फिर एक बात कहुगा यंत्र के साथ माला भी जरुरी है.जिनको साधना समझने मे परेशानि हो तो उनको साधना डिटेल मे समजायी जायेगी l

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आदेश......