18 Jan 2017

कामाख्या (कामिया) सिंदूर प्रयोग.

कामाख्या माता:

तांत्रिकों की देवी "कामाख्या देवी" की पूजा भगवान शिव के नववधू के रूप में की जाती है, जो कि मुक्ति को स्वीकार करती है और सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद कामाख्या माता तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी है।

मुख्य मंदिर जहां कामाख्या माता को समर्पित है, वहीं यहां मंदिरों का एक परिसर भी है जो दस महाविद्या को समर्पित है। ये महाविद्या हैं- मातंगी, कामाला, भैरवी, काली, धूमावति, त्रिपुर सुंदरी, तारा, बगुलामुखी, छिन्नमस्ता और भुवनेश्वरी। इससे यह स्थान तंत्र विद्या और काला जादू के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस क्षेत्र के आसपास कई तांत्रिक मंत्र पाए गए हैं जिससे स्पष्ट है कि कामाख्या मंदिर के आसपास इसका महत्वपूर्ण आधार है। ऐसा माना जाता है कि अधिकांश कौल तांत्रिक की उत्पत्ति कामापूरा में हुई है। सामान्य धारणा यह है कि कोई भी व्यक्ति तब तक पूर्ण तांत्रिक नहीं बन सकता जब तक कि वह कामाख्या देवी के सामने माथा न टेके।

अकसर यह सोचा जाता है कि तंत्र विद्या और काली शक्तियों का समय गुजर चुका है। लेकिन कामाख्या में आज भी यह जीवन शैली का हिस्सा है। अम्बुबाची मेला के दौरान इसे आसानी से देखा जा सकता है। इस समय को शक्ति तांत्रिक की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। शक्ति तांत्रिक ऐसे समय में एकांतवास से बाहर आते हैं और अपनी शक्तियों का प्रदर्शन करते हैं। इस दौरान वे लोगों को वरदान अर्पित करने के साथ-साथ जरूरतमंदों की मदद भी करते हैं।

इस मंदिर में दिया जाने वाला प्रसाद भी दूसरें शक्तिपीठों से बिल्कुल ही अलग है। इस मंदिर में प्रसाद के रूप में लाल रंग का गीला कपड़ा दिया जाता है और साथ मे कामाख्या सिन्दूर भी दिया जाता है । कहा जाता है कि जब मां को तीन दिन का रजस्वला होता है, तो सफेद रंग का कपडा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं, तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रंग से भीगा होता है। इस कपड़ें को अम्बुवाची वस्त्र कहते है। इसे ही भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। कामाख्या सिन्दूर असली में छोटे छोटे पत्थरोँ के रूप में होता है, जो की माँ कामाख्या मंदिर से प्राप्त होता है ।


कामाख्या सिन्दूर से वशीकरण सम्भव है और मै यहा आज मेरे आजमाये हुये प्रयोग दे रहा हूँ।

1-किसी भी अष्टमी के दिन शुभ समय पर कामाख्या सिन्दूर पर "त्रीं" (Treem) बीज मंत्र का 30-40 मिनट तक जाप करे और सिन्दूर को संम्भाल कर रखें। जब भी किसी महत्वपूर्ण कार्य पर जाना हो तो स्वयं सिन्दूर का तिलक करके जाये तो सभी कार्यो मे सफलता प्राप्त किया जा सकता है।

2-अगर किसी साधना मे सफलता ना मिल रहा हो तो कामाख्या सिन्दूर (स्याही) से भोजपत्र पर महुआ (पेड़) के कलम से जिस मंत्र को सिद्ध करना हो वह लिखे। उसका साधारण पुजन करते हुए उसको देखते हुए मंत्र का जाप करे तो मंत्र जागृति होता हैं। इस तरह से किसी भी विशेष मंत्र को सिद्ध किया जा सकता है।

3-मन मे कोइ मनोकामना हो जो पुर्ण नहीं हो रहा हो तो किसी नये लाल वस्त्र पर एक सुपारी रखे जो भैरव का रुप माना जायेगा और उसका किसी अमावस्या के रात्री मे पुजन करके "ॐ भं भैरवाय मम अमुक कामना शिघ्र सिद्धये ह्रीं फट" मंत्र का जाप 324 बार करके कामाख्या सिन्दूर का सुपारी को तिलक लगायें । यह क्रिया होने के बाद सुपारी को उसी लाल कपड़े मे बांधकर उसी रात से सर के निचे रखकर सो जाये। जब तक आपका मनोकामना पुर्ण ना हो तब तक सुपारी को सर के निचे रखकर ही सोना है और मनोकामना पुर्ण होने के बाद सुपारी को लाल वस्त्र के साथ बहते हुए जल मे प्रवाहित कर देना है। इस प्रयोग से नौकरी मिल सकता है,फसा हुआ धन वापस मिल सकता है,शादी जुड़ सकता है.....इस प्रकार से बहोत सारा मनोकामना पुर्ण किया जा सकता हैं।

4-जिवन मे धन का अभाव हो और अच्छा पैसा कमाने के बाद घर मे पैसा टिकता ना हो तो पिले रंग के वस्त्र मे कामाख्या सिन्दूर के साथ नागकेसर को बांधकर तिजोरी मे रखे तो इस प्रकार के समस्या का समाधान हो सकता है।

5-अब महत्वपूर्ण प्रयोग जो शायद कुछ लोगो के लिये विशेष है। यह प्रयोग वशीकरण हेतु है,जब दो प्यार करने वालो के जिवन मे किसी कारण से मनमुटाव आजाये और दोनो का रिश्ता टुट जाये तो यह साधनात्मक प्रयोग जो खोये हुए प्यार को वापस जिवन मे प्राप्त किया जा सकता है। यह एक तान्त्रिक प्रयोग होते हुए भी आसान सा प्रयोग है,इससे हम जिसे चाहते है उसको प्राप्त कर सकते है।


तांत्रिक वशीकरण प्रयोग:-

कामाख्या सिन्दूर को गुलाब जल मे मिलाकर स्याही बनाये और इस स्याही से भोजपत्र पर कैसा भी स्त्री पुरुष का चित्र बनाए । किसी भी सात हनुमान मन्दिर मे जाकर उनके दाए कंधे का सिन्दूर निकालकर लाये,अब हनुमानजी के सिन्दूर से दोनो चित्र मे नाम लिखे,नाम उनका लिखना है जिन दोनो को मिलाना है। प्रयोग चाहे स्त्री करे या पुरुष करे परंतु उनको दोनो का नाम लिखना होगा।

यह साधना अमावस्या से करना है,समय रात्री मे 10 बजे का होगा।आसन और वस्त्र लाल रंग के हो,दिपक कडवे तेल (सरसो) का होगा,धूप बत्ती भी जलाये,पुजा मे लाल रंग के पुष्प होना चाहिए। मंत्र जाप उत्तर दिशा मे मुख करके करना है,जिस भोजपत्र पर दो चित्र बनाये हुए है उनको को भी लाल वस्त्र पर ही स्थापित करना है। अब दो चित्र के बिच मे लाल रंग का गुलाब का पुष्प रखकर मातारानी से साधना मे सफलता हेतु प्रार्थना करें। वैसे यहा पर पुर्ण मंत्र साधना विधान देना संम्भव नही है क्युके यह एक गोपनिय प्रयोग है।


मंत्र:-

ॐ नमो आदेश गुरुजी को,कामाख्या रानी की मोहिनी त्रिभुवन मे चले आकाश मोहे पाताल मोहे,मोहे सारा संसार,अमुक का मन अमुक के लिये मोहे,ना मोहे तो तो कामिया सिन्दूर मोहिनी ना कहेलाये,दुहाई ******मेरी भक्ति गुरु की शक्ति,फुरो मंत्र इश्वरो वाचा ।।

अब आप लोग समझ ही गये होगे के कामिया सिन्दूर को कामाख्या मोहिनी भी कहा जाता है। मैंने यहा मंत्र को अधूरा रखा हुआ है और इसका कारण यही है के "what's app & Facebook" पर घुमने वाले कथीत तांत्रिक मंत्र को यहा से चुराकर अपने नाम से ना छाप सके। 




आदेश..........

6 Jan 2017

षोडश काली नित्या साधना.

सभी वेबसाइट पर पंद्रह काली नित्या साधनाये दिया हुआ है इसलिए मै यहा षोडश काली नित्या साधना विधी-विधान के साथ दे रहा हूं। यह साधना किसी भी अमावस्या से प्रारंभ करें या फिर अब आनेवाले ग्रहण काल मे करें। यह साधना गुरुगम्य है इसलिए इसका महत्व अधिक है। यह साधना कइ योगी महायोगी तपस्वी और अघोर साधकों ने किया हुआ है। इस साधना से साधक को स्वयं भगवती काली अपनी विशेष  क्रुपा साधक पर बरसाती है,इसी साधना से कइ साधको ने जिवन मे अन्य साधनाओं मे सिद्धीया प्राप्त की है। जब कोइ साधक साधनाओं मे असफल हो जाये तब उसको काली नित्या साधना अवश्य करना चाहिए।


साधना विधी-

अमवस्या के रात्री मे साधक को स्नान करके लाल वस्त्र पहनकर अपने साधना स्थल पर बैठना है। माथे पर बभुत का त्रिपुण्ड लगाना है और बिच मे लाल कुम्कुम का अंगुठे से तिलक करना है। सामने कोई लकड़ी का बाजोट रखे और उस पर लाल वस्त्र बिछाकर भगवती काली का चित्र स्थापित करें। चित्र के सामने सोलह पान के पत्ते रखे,पान के वो पत्ते होने जिसमें हम कथ्था चुना मिलाकर खाते है। पत्तो को अच्छेसे धोकर रखें,पत्ते फटे नही होने चाहिए। अब उन पत्तो पर सोलह सुपारीया स्थापित करदे और भगवती चित्र के साथ उन पत्तो पर रखे हुए सुपारीयो का सामान्य पुजन करें। सामान्य पुजन का मतलब है,कुम्कुम पुष्प चढाना,धूप दिप ("यहा पर कडवे (सरसों) तेल का जरुरी है") जलाना, प्रसाद स्वरुप मे कुछ मिठा भोग रखें। अब सामान्य पुजन के बाद काली हकिक माला से दिये हुए प्रत्येक मंत्र का कम से कम एक माला जाप करना आवश्यक है। जब तक पुर्ण मंत्र जाप नही होता है तब तक आसन से उठना नही है और साथ मे रोज एक पाठ काली कीलकम का करना है। इस तरहा से हमे यह साधना ग्यारह दिनो तक करना है ।


मंत्र-

१. काली :-

प्रथम नित्य का नाम भी काली ही है और मंत्र है :-

II ॐ ह्रीं काली काली महाकाली कौमारी मह्यं देहि स्वाहा II


२. कपालिनी :-

माता काली कि द्वितीय नित्य का नाम कपालिनी है और मन्त्र है :-

II ॐ ह्रीं क्रीं कपालिनी - महा - कपाला - प्रिये - मानसे कपाला सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II


३. कुल्ला :-

माता काली कि तृतीय नित्या का नाल कुल्ला है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं कुल्लायै नमः II


४. कुरुकुल्ला :-

माता कि चतुर्थ नित्या का नाम कुरुकुल्ला है और मंत्र है :-

II क्रीं ॐ कुरुकुल्ले क्रीं ह्रीं मम सर्वजन वश्यमानय क्रीं कुरुकुल्ले ह्रीं स्वाहा II


५. विरोधिनी :-

माता कि पंचम नित्या का नाम विरोधिनी है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्रीं क्लीं हुं विरोधिनी शत्रुन उच्चाटय विरोधय विरोधय शत्रु क्षयकरी हुं फट II


६. विप्रचित्ता :-

माता कि छटवीं नित्या का नाम विप्रचित्ता है और मंत्र है :-

II ॐ श्रीं क्लीं चामुण्डे विप्रचित्ते दुष्ट-घातिनी शत्रुन नाशय एतद-दिन-वधि प्रिये सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II


७. उग्रा :-

माता कि सप्तम नित्या का नाम उग्रा है और मंत्र है :-

II ॐ स्त्रीं हुं ह्रीं फट II


८. उग्रप्रभा :-

माँ कि अष्टम नित्या का नाम उग्रप्रभा है और मंत्र है :-

II ॐ हुं उग्रप्रभे देवि काली महादेवी स्वरूपं दर्शय हुं फट स्वाहा II


९. दीप्ता :-

माता कि नवमी नित्या का नाम दीप्ता है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं दीप्तायै सर्व मंत्र फ़लदायै हुं फट स्वाहा II


१०. नीला :-

माता कि दसवीं नित्या का नाम नीला है और मंत्र है :-

II हुं हुं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हसबलमारी नीलपताके हम फट II


११. घना :-

माता कि ग्यारहवीं नित्या के रूप में माता घना को जाना जाता है और मंत्र है :-

II ॐ क्लीं ॐ घनालायै घनालायै ह्रीं हुं फट ।।


१२. बलाका :-

माता कि बारहवीं नित्या का नाम बलाका है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं ह्रीं बलाका काली अति अद्भुते पराक्रमे अभीष्ठ सिद्धिम में देहि हुं फट स्वाहा II


१३. मात्रा :-

माता कि त्रयोदश नित्या का नाम मात्रा है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्लीं हुं ऐं दस महामात्रे सिद्धिम में देहि सत्वरम हुं फट स्वाहा II


१४. मुद्रा :-

माता कि चतुर्दश नित्या का नाम मुद्रा है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं ह्लीं हुं प्रीं फ्रें मुद्राम्बा मुद्रा सिद्धिम में देहि भो जगन्मुद्रास्वरूपिणी हुं फट स्वाहा II


१५. मिता :-

माता की पंचादशम नित्या का नाम मिता है और मंत्र है :-

II ॐ क्रीं हुं ह्रीं ऐं मिते परामिते ॐ क्रीं हुं ह्लीं ऐं सोहं हुं फट स्वाहा II


१६. रौद्री:-

माता की षोडश नित्या का नाम रौद्री है और मंत्र है:-

।। ॐ ह्रीं भगवत्यै विद्महे महामायायै धीमहि । तन्न रौद्री प्रचोदयात ।।


यह सोलह मंत्र आपको समस्त साधानाओ मे सफलता प्रदान करने मे तप्तर है। ग्यारह दिनो का साधना सम्पन्न होने के बाद सोलह पान के पत्तो के साथ सुपारीयो को बहते हुए जल मे प्रवाहित करदे । साधना मे इस्तेमाल किये हुए काली हकिक माला को सम्भाल कर रखिये क्योके यह माला जिवन मे फिर से इसी साधना के लिये काम मे आयेगा। रोज मंत्र जाप के बाद काली कीलकम का एक पाठ किया करे और ग्रहण काल मे 108 पाठ किये जाय तो यह काली कीलकम सिद्ध हो जायेगा।




काली कीलकम्

मंत्र से अधिक प्रभाव कवच का होता है और कवच से गुना अधिक प्रभाव कीलक का कहा गया है । अतः काली पूजन के पश्चात कीलक का पाठ अवश्य करना चाहिए । इसका पाठ किए बिना मंत्र, स्तोत्र, कवच आदि के पाठ का फल नष्ट हो जाता है । कीलक पठ करने वाला मनुष्य धनवान, पुत्रवान, समाज में प्रमुख, धीर, निरोगी रहता है । उसके सभी कार्य निर्विघ्न संपन्न होते हैं । शत्रु या जंगली जीवों से उसे भय नहीं रहता । इस कीलक के प्रभाव से ही दुर्वासा, वशिष्ठ, दत्तात्रेय, देवगुरु बृहस्पति, इंद्र, कुबेर अंगिरा, भृगु, च्यवन, कार्तिकेय, कश्यप, ब्रह्मा आदि ऐश्वर्य संपन्न हुए हैं । काली ही परतत्त्व हैं, अतः उसका यह कीलक भी प्रभावशाली है, ऐसा शिवकथन है ।

दाए हाथ मे थोड़ा जल लेकर विनियोग मंत्र पढकर जल को जमिन पर छोड़ देना है।

विनियोग:-

ॐ अस्य श्री कालिका कीलकस्य सदाशिव ऋषिरनुष्टप् छन्दः, श्री दक्षिण कालिका देवता, सर्वार्थ सिद्धि साधने कीलक न्यासे जपे विनियोगः ।

अथातः सम्प्रवक्ष्यामि कीलकं सर्वकामदम् ।
कालिकायाः परं तत्त्वं सत्यं सत्यं त्रिभिर्ममः ॥
दुर्वासाश्च वशिष्ठश्च दत्तात्रेयो बृहस्पतिः ।
सुरेशो धनदश्चैव अङ्गराश्च भृभूद्वाहः ॥
च्यवनः कार्तवीर्यश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।
कीलकस्य प्रसादेन सर्वैश्वर्चमवाप्नुयुः ॥



अथ कीलकम्

ॐ कारं तु शिखाप्रान्ते लम्बिका स्थान उत्तमे ।
सहस्त्रारे पङ्कजे तु क्रीं क्रीं वाग्विलासिनी ॥

कूर्चबीजयुगं भाले नाभौ लज्जायुगं प्रिये ।
दक्षिणे कालिके पातु स्वनासापुट युग्मके ॥

हूंकारद्वन्द्वं गण्डे द्वे द्वे माये श्रवणद्वये ।
आद्यातृतीयं विन्यस्य उत्तराधर सम्पुटे ॥

स्वाहा दशनमध्ये तु सर्व वर्णन्न्यसेत् क्रमात् ।
मुण्डमाला असिकरा काली सर्वार्थसिद्धिदा ॥

चतुरक्षरी महाविद्या क्रीं क्रीं हृदय पङ्कजे ।
ॐ हूं ह्नीं क्रीं ततो हूं हट् स्वाहा च कंठकूपके ॥

अष्टाक्षरी कालिकाया नाभौ विन्यस्य पार्वति ।
क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहान्ते च दशाक्षरी ॥

मम बाहु युगे तिष्ठ मम कुण्डलिकुण्डले ।
हूं ह्नीं मे वह्निजाया च हूं विद्या तिष्ठ पृष्ठके ॥

क्रीं हूं ह्नीं वक्षदेशे च दक्षिणे कालिके सदा ।
क्रीं हूं ह्नीं वह्निजायाऽन्ते चतुर्दशाक्षरेश्वरी ॥

क्रीं तिष्ठ गुह्यदेशे मे एकाक्षरी च कालिका ।
ह्नीं हूं फट् च महाकाली मूलाधार निवासिनी ॥

सर्वरोमाणि मे काली करांगुल्यङ्क पालिनी ।
कुल्ला कटिं कुरुकुल्ला तिष्ठ तिष्ठ सदा मम ॥

विरोधिनी जानुयुग्मे विप्रचित्ता पदद्वये ।
तिष्ठ मे च तथा चोग्रा पादमूले न्यसेत्क्रमात् ॥

प्रभा तिष्ठतु पादाग्रे दीप्ता पादांगुलीनपि ।
नीली न्यसेद्विन्दु देशे घना नादे च तिष्ठ मे ॥

वलाका विन्दुमार्गे च न्यसेत्सर्वाङ्ग सुन्दरी ।
मम पातालके मात्रा तिष्ठ स्वकुल कायिके ॥

मुद्रा तिष्ठ स्वमत्येमां मितास्वङ्गाकुलेषु च ।
एता नृमुण्डमालास्त्रग्धारिण्य: खड्गपाणयः ॥

तिष्ठन्तु मम गात्राणि सन्धिकूपानि सर्वशः ।
ब्राह्मी च ब्रह्मरंध्रे तु तिष्ठ स्व घटिका परा ॥

नारायणी नेत्रयुगे मुखे माहेश्वरी तथा ।
चामुण्डा श्रवणद्वन्द्वे कौमारी चिबुके शुभे ॥

तथामुदरमध्ये तु तिष्ठ मे चापराजिता ।
वाराही चास्थिसन्धौ च नारसिंही नृसिंहके ॥

आयुधानि गृहीतानि तिष्ठस्वेतानि मे सदा ।
इति ते कीलकं दिव्यं नित्यं यः कीलयेत्स्वकम् ॥

कवचादौ महेशानि तस्यः सिद्धिर्न संशयः ।
श्मशाने प्रेतयोर्वापि प्रेतदर्शनतत्परः ॥

यः पठेत्पाठयेद्वापि सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ।
सवाग्मी धनवान्दक्षः सर्वाध्यक्ष: कुलेश्वर: ॥

पुत्र बांधव सम्पन्नः समीर सदृशो बले ।
न रोगवान् सदा धीरस्तापत्रय निषूदनः ॥

मुच्यते कालिका पायात् तृणराशिमिवानला ।
न शत्रुभ्यो भयं तस्य दुर्गमेभ्यो न बाध्यते ॥

यस्य य देशे कीलकं तु धारणं सर्वदाम्बिके ।
तस्य सर्वार्थसिद्धि: स्यात्सत्यं सत्यं वरानने ॥

मंत्रच्छतगुणं देवि कवचं यन्मयोदितम् ।
तस्माच्छतगुणं चैव कीलकं सर्वकामदम् ॥

तथा चाप्यसिता मंत्रं नील सारस्वते मनौ ।
न सिध्यति वरारोहे कीलकार्गलके विना ॥

विहीने कीलकार्गलके काली कवच यः पठेत् ।
तस्य सर्वाणि मंत्राणि स्तोत्राण्यन सिद्धये प्रिये ॥


साधना पुर्ण विधि-विधान से सम्पन्न करे। अवश्य आपको सफलता मिलेगा।




आदेश........

4 Jan 2017

शिव गुरु मंत्र

गुरु वे हैं जो मानव जाति के आध्यात्मिक अज्ञान रूपी अंःधकार को मिटाते हैं और उसे आध्यात्मिक अनुभूतियां और आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान करते हैं ।

सबसे बड़ा तीर्थ तो गुरुदेव ही हैं जिनकी कृपा से फल अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरुदेव का निवास स्थान शिष्य के लिए तीर्थ स्थल है। उनका चरणामृत ही गंगा जल है। वह मोक्ष प्रदान करने वाला है। गुरु से इन सबका फल अनायास ही मिल जाता है। ऐसी गुरु की महिमा है।

तीरथ गए तो एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले तो अनन्त फल, कहे कबीर विचार।।

मनुष्य का अज्ञान यही है कि उसने भौतिक जगत को ही परम सत्य मान लिया है और उसके मूल कारण चेतन को भुला दिया है जबकि सृष्टि की समस्त क्रियाओं का मूल चेतन शक्ति ही है। चेतन मूल तत्व को न मान कर जड़ शक्ति को ही सब कुछ मान लेनाअज्ञानता है। इस अज्ञान का नाश कर परमात्मा का ज्ञान कराने वाले गुरू ही होते हैं।

किसी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रथम आवश्यकता समर्पण की होती है। समर्पण भाव से ही गुरु का प्रसाद शिष्य को मिलता है। शिष्य को अपना सर्वस्व श्री गुरु देव के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए। इसी संदर्भ में यह उल्लेख किया गया है कि
यह तन विष की बेलरी, और गुरू अमृत की खान,

शीश दियां जो गुरू मिले तो भी सस्ता जान।
गुरु ज्ञान गुरु से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

प्राय: शिष्य गुरु को मानते हैं पर उनके संदेशों को नहीं मानते। इसी कारण उनके जीवन में और समाज में अशांति बनी रहती है।

गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य का पतन शुरू हो जाता है।

सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की सभी प्रकार के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों को दूर करने एवं उसे बैकुंठ धाम में पहुंचाने का दायित्व गुरु का होता है।

आनन्द अनुभूति का विषय है। बाहर की वस्तुएँ सुख दे सकती हैं किन्तु इससे मानसिक शांति नहीं मिल सकती। शांति के लिए गुरु चरणों में आत्म समर्पण परम आवश्यक है। सदैव गुरुदेव का ध्यान करने से जीव शिव स्वरूप हो जाता है। वह कहीं भी रहता हो, फिर भी मुक्त ही है। ब्रह्म निराकार है। इसलिए उसका ध्यान करना कठिन है। ऐसी स्थिति में सदैव गुरुदेव का ही ध्यान करते रहना चाहिए। गुरु शिव स्वरूप हैं। इसलिए गुरु का नित्य ध्यान करते रहने से जीव शिवमय हो जाता है।

देखते ही अपना मस्तक झुक जाए, उसका नाम गुरु। अतः यदि गुरु हों, तो विराट स्वरूप होना चाहिए। तो अपनी मुक्ति होगी, नहीं तो मुक्ति नहीं होगी।

जहाँ पर अपने दिल को ठंडक हो उन्हें गुरु बनाना। दिल को ठंडक नहीं होती, तब तक गुरु मत बनाना। इसलिए हमने क्या कहा है कि यदि गुरु बनाओ तो आँखों में समाएँ वैसे को बनाना।

आप शिव जी को इष्ट मानते हो तो आपके लिये शिव जी स्वयं गुरु बनने के लिये तय्यार है,ये मै नही कह रहा हूँ। यह हमे तब पता चलता है जब नाथ साम्प्रदाय मे एक शाबर मंत्र देखने मिलता है जो शिव जी से सम्बन्धित गुरु मंत्र है। अब अगर स्वयं शिव जी हमारे गुरु बन जाये तो फिर जिवन मे कुछ भी शेष नही रहेगा। हमारा साधनात्मक जिवन तो सिद्धिमय हो जायेंगे और अंततः मोक्ष भी सम्भव है।

आज यहा पर एक येसा मंत्र दे रहा हू,जिसके माध्यम से स्वयं शिव जी स्वप्न मे आकर साधक को गुरु दीक्षा प्रदान करते हुए साधक को अपना शिष्य बना लेते है। इस साधना मे आवश्यकता है धैर्य की क्योके कथित समय पर साधक को सफलता ना मिले तो साधक को साधना तब तक करनी चाहिए जब तक वह सफल ना हो जाये।

यह साधना किसी भी सोमवार से प्रातः शुरू करें। मंत्र जाप रुद्राक्ष माला से करना है। वस्त्र आसन का रंग सफेद या पिला हो,दिशा पुर्व या ईशान हो । साधना शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने करें। इस साधनों मे कम से कम एक माला करना जरुरी है और ज्यादा से ज्यादा 51 माला जाप कर सकते है।

मंत्र:-

।। ओम नमो आदेश गुरुजी को,शिवा शिवाय ओंकार स्वरुपाय गुरु महादेवाय प्रसन्न हो जाओ,मेरी भक्ति मंत्र की शक्ति,शिव वाचापुरी ।।

मंत्र आसानसा है,कुछ ज्यादा साधना मे परेशानी नही होगा। मै आप सभी के लिये कल्याण कामना करता हूँ, आप सभी को सफलता मिले।


आदेश.............

21 Dec 2016

साधना सिद्धियां



26/06/2016 को आखरी आर्टिकल लिखा था,सोचा अब 2016 ख़त्म हो रहा है तो एखादा साधनात्मक धमाका किया जाए । आज आपको अप्सरा साधना सिद्धि का एक उपाय बता रहा हूँ, जो आसान सा उपाय है । इस उपाय से आपको निच्छित फायदा होगा ऐसा हम उम्मीद करते हैं।


कोई ऐसा कुँवा ढूंढिये जिसको खोदने के बाद वो फेल हो गया हो मतलब उसको पानी ही ना लगा हो । वैसे देखा जाए तो ऐसे कुँवे बहोत मिल जायेगे, हमें इस तरह के कुँवे के अंदर के सात कंकर का आवश्यकता है । ये सात कंकर ही आपको निच्छित सिद्धि प्राप्त करने हेतु आवश्यक होंगे । इस प्रकार के कंकर पर आप भुत,प्रेत,पिशाच,जिन-जिन्नात,यक्षिनी,परि और अप्सरा साधना में सफलता प्राप्त कर सकते है ।


इस प्रकार का कुँवा बंद कुँवा कहलाता है और बंद कुँवे में हमेशा इतर योनिया अपना स्थान बना लेती है । कुँवा जितना अधिक पुराना हो उतना ही श्रेष्ठ माना जाता है और इस प्रकार का कुँवा अगर जंगल में मिले तो सोने पर सुहागा समाजीये,चार रास्ते में भी अगर ऐसा कुँवा हो तो भी यह उपाय किस्मत बदल सकता है । इस प्रकार के कुँवे में विशेष प्रकार की मंत्र विधि करके अगर अपनी इच्छा कुँवे में विसर्जित कियी जाए तो षटकर्म भी किये जा सकते है । षटकर्म का अर्थ है वशीकरण, मोहन, विद्वेषण,शांतिकर्म, उच्चाटन और मारण....... परंतु इस प्रकार के प्रयोग से कभी भी दुसरो का नुकसान नहीं करना चाहिए अन्यथा साधक को स्वयं ही हानि होता है । अच्छे कार्य हेतु अवश्य ही विशेष मंत्र विधि-विधान करना चाहिए, यह साधना कई प्रकार के रोगों से भी मुक्ति दिलाने में सहायता करता है ।

तंत्र शास्त्र में माना जाता है किसी भी वीराने स्थानों पर इतर योनियो का वास होता है और अघोर साम्प्रदायिक साधक हमेशा ऐसे स्थानों पर साधना करना पसंद करते है । यह उपाय उन साधक के लिए है जिन्हें इतर योनि साधना में सफलता ना मिली हो और जो सिद्धि प्राप्त करना अपना लक्ष्य मानते है ।
सर्वप्रथम मेरे बताये अनुसार कुँवा ढूंढे,फिर अमावस्या के दिन प्रात: कुँवे के पास जाए,वहा पर कुँवे का सामान्य पूजन करे जिस प्रकार का आप लोग जानते हो । पूजन के बाद कुँवे में उतरकर किसी भी प्रकार के सात कंकर उठाकर उनको लाल कपडे में बांधकर कुँवे से बाहर निकालकर लाये । एक आवश्यक बात कुँवा फेल हो जाने का एक ओर बात होता है "इस प्रकार के कुँवे में जल नहीं होता है" । कंकर कुँवे से बाहर लाने के बाद कुँवे में कच्चा दुध डाले और प्रार्थना करे "मुज़े साधना में सफलता प्राप्त होने हेतु अमुक शक्ति मेरे साथ चले"। प्रार्थना करने के बाद एक नारियल फोडकर उसको कुँवे में डाल दे और बिना पीछे मुड़कर देखते हुये वहा से चुप चाप घर को चले जाये ।


यह एक आवश्यक साधन है जो साधक को इतर योनि साधना में प्रत्यक्षीकरण करने के लिये सहाय्यक है । लाल कपडे में बंधे हुये सात कंकर को अपने दाएं हात में बांधकर साधना करने से शिघ्र साधना में सफलता प्राप्त करना संभव हो जाता है । कुँवे में से छोटे छोटे कंकर ही निकालना ताकि बाजू दंड (हाथ) में सही तरह से बाँध सको । इतर योनि साधना कोई भी हो और कैसी भी हो,इसमे रक्षा कवच हमेशा गले में बाँधकर ही रखा करो ।


आनेवाले नववर्ष 2017 में हम आपको इन्ही सात कंकर पर किये जाने वाले आवश्यक मंत्र प्रयोग भी बताएँगे । आनेवाला नववर्ष अवश्य ही सिद्धिदायक होगा क्योंके ग्रहो का साथ इस वर्ष में साधक को सफलता दायक प्रतीत हो रहा है ।


हम इस कोशिश में है,नववर्ष में आप सभी से मिल सके और आपको मार्गदर्शन कर सके । 2016 में व्यस्तता के कारण कुछ ही साधको से मिलना संभव हुआ और एक अलग आनंद की अनुभूति हुयी,यह सब मातारानी की कृपा है ।




आदेश..........



26 May 2016

साधना सामग्री हेतु.

यह एक महत्वपूर्ण बात है,जो सभी प्रिय साधको के लिये आवश्यक है। जिस साधक को किसी भी प्रकार का साधना सामग्री हमसे प्राप्त करना हो तो ईमेल भेजते समय अपना कोई भी एक फोटो आई.डी. भी भेजीये । अगर किसी समस्या का समाधान भी प्राप्त करना हो तो फोटो आई.डी. भेजना अनिवार्य है। फोटो आई.डी. मे आप आधार कार्ड,voting id card, driving license or pan card भी भेज सकते है ।
यह सब करना पड रहा क्युके कुछ लोग अलग-अलग नाम से हमसे प्रामाणिक साधना सामग्री प्राप्त करते है और ज्यादा धनराशि लेकर किसी दुसरे व्यक्ति को बेचते है। जैसे मुझे एक आदमी से पता चला उसने किसीसे बिर कंगन 20,000/-रुपये मे खरिदा और जब उसने हमारे साईट पर पढा तो वह हैरान होकर मुझसे पुछता है के आप 6100/- रुपये मे बिर कंगन कैसे दे रहे है ? जब मैने उससे उससे पुछा आप येसा क्यु पुछ रहे हो तो उसने मुझे बताया उसने किसी धिरज ******* नाम के व्यक्ति से 20 हजार रुपये मे खरिदा,जब मैने अपने रेकार्ड मे देखा तो मुझे भी पता चला "अब तक धिरज ******* ने मुझसे 3 बिर कंगन प्राप्त किये है।

ये सब हो गया तब मुझे येसा लगा के अब तो बहोत कुछ गड़बड़ हो चुका है क्युके कुछ लोग मुझसे प्रत्येक महिने मे बहोत सारा सामग्री मंगवाते है। परंतु अब आगेसे येसा नही होगा,हम लोगो को सामग्री बनवाने मे बहोत श्रम करना पड़ता है। येसे ही सब कुछ हवा मे निर्मित नही होता है,एक तो हमारे पास समय कम होता है और साधना करने वाले साधको का साधनाओं मे रुचि बढते जा रहा है। इसलिये आगेसे आप जब भी ईमेल से कुछ भी पुछना चाहो या साधना सामग्री प्राप्त करना चाहो तो अब आपको अपना आई.डी. कार्ड (I.D.card) भेजना जरुरी है। आई.डी. कार्ड ना भेजने वालो को किसी भी प्रकार का रिप्लाइ नहि दिया जायेंगा ।

हमारे तरह से आप सभी को ढेर सारा प्यार.....


आदेश.......

24 May 2016

चौरासीनाथ सिद्ध चालीसा


श्री गुरु गणनायक सिमर , शारदा का आधार |
कहूँ सुयश श्री नाथ का , निज मति के अनुसार ||
श्री गुरु गोरक्षनाथ के , चरणों में आदेश |
जिन के जोग प्रताप को , जाने सकल नरेश ||
जय श्री नाथ निरंजन स्वामी , घट घट के तुम अन्तर्यामी |

दीन दयालु दया के सागर , सप्तद्वीप नवखंड उजागर |
आदि पुरुष अद्वैत निरंजन , निर्विकल्प निर्भय दुख भंजन |
अजर अमर अविचल अविनाशी , रिद्धी सिद्धि चरणों की दासी |
बाल यती ज्ञानी सुखकारी , श्री गुरुनाथ परम हितकारी |
रूप अनेक जगत में धारे , भगत जनों के संकट टारे |
सुमिरन चौरंगी जब कीन्हा , हुए प्रसन्न अमर पद दीन्हा |
सिद्धों के सिरताज मनाओ , नवनाथों के नाथ कहावो |
जिसका नाम लिए भव जाल , अवागंमन मिटे तत्काल |
आदिनाथ मत्स्येन्द्र पीर, धोरामनाथ धुंधली वीर |
कपिल मुनि चर्पट कुण्डेरी , नीमनाथ पारस चगेरी |
परशुराम जमदग्नि नंदन , रावण मार राम रघुनन्दन |
कंसादिक असुरन दलहारी , वासुदेव अर्जुन धनुर्धारी |
अन्चलेश्वर लक्ष्मण बलबीर , बलदाई हलधर यदुवीर |
सारंगनाथ पीर सरसाईं , तुंगनाथ बद्री बलदाई |
भूतनाथ धरीपा गोरा , बटुकनाथ भैरो बल जोरा |
वामदेव गौतम गंगाई , गंगनाथ धोरी समझाई |
रतननाथ रण जीतन हारा , यवन जीत काबुल कंधारा |
नागनाथ नाहर रमताई , बनखण्डी सागर नन्दाई |
बंकनाथ कन्थड सिद्ध रावल , कानीपा निरीपा चंद्रावल |
गोपीचंद भर्तृहरि भूप , साधे योग लखे निज रूप |
खेचर भूचर बाल गुन्दाई , धर्मनाथ कपली कनकाई |
सिद्धनाथ सोमेश्वर चंडी , भुसकाई सुन्दर बहुदण्डी |
अजयपाल शुकदेव व्यास , नासकेतु नारद सुख रास |
सनत्कुमार भारत नहीं निद्रा , सनकादिक शरद सुर इन्द्रा |
भंवरनाथ आदि सिद्ध बाला , च्यावननाथ मानिक मतवाला |
सिद्ध गरीब चंचल चन्दराई , नीमनाथ आगर अमराई |
त्रिपुरारी त्र्यम्बक दुःख भन्जन, मंजुनाथ सेवक मन रंजन |
भावनाथ भरम भयहारी , उदयनाथ मंगल सुखकारी |
सिद्ध जालंधर मूंगी पावे, जाकी गति मति लखि न जावे |
अवघड देव कुबेर भंडारी , सहजाई सिद्धनाथ केदारी |
कोटि अनन्त योगेश्वर राजा , छोड़े भोग योग के काजा |
योग युक्ति करके भरपूर , मोह माया से हो गए दूर |
योग युक्ति कर कुन्तिमाई , पैदा किये पांचो बलदाई |
धर्मं अवतार युधिष्ठिर देवा , अर्जुन भीम नकुल सहदेवा |
योग युक्ति पार्थ हिय धारा , दुर्योधन दल सहित संहारा |
योग युक्ति पांचाली जानी , दुशासन से यह प्रण ठानी |
पावूं रक्त न जब लग तेरा , खुला रहे यह शीश मेरा |
योग युक्ति सीता उद्धारी , दशकन्धर से गिरा उच्चारी |
पापी तेरा वंश मिटाऊँ , स्वर्ण लंका विध्वंस कराऊँ |
श्री रामचंद्र को यश दिलाऊं , तो मैं सीता सती कहाऊँ |
योग युक्ति अनसूया कीनो , त्रिभुवननाथ साथ रस भीनो |
देव दत्त अवधूत निरंजन , प्रगट भए आप जगवंदन |
योग युक्ति मैनावती कीन्ही , उत्तम गति पुत्र को दीन्ही |
योग युक्ति की बांछल मातू , गोगा जाने जगत विख्यातू |
योग युक्ति मीरा ने पाई , गढ चित्तौड़ में फिरी दुहाई |
योग युक्ति अहिल्या जानी , तीन लोक में चली कहानी |
सावित्री सरस्वती भवानी , पार्वती शंकर मनमानी |
सिंह भवानी मनसा माई , भद्रकाली सहजा बाई |
कामरू देश कामाक्षा जोगन , दक्षिण में तुलजा रस भोगन |
उत्तर देश शारदा रानी , पूरब में पाटन जग मानी |
पश्चिम में हिंगलाज बिराजे , भैरवनाद शंख ध्वनि बाजे |
नवकोटी दुर्गा महारानी , रूप अनेक वेड नहीं जानी |
काल रूप धर दैत्य संहारे , रक्त बीज रण खेत पछारे ।
मैं जोगन जग उत्पत्ति करती , पालन करती संहार करती |
जती सती की रक्षा करनी , मार दुष्ट दल खप्पर भरनी |
में श्री नाथ निरंजन की दासी , जिनको ध्यावे सिद्ध चौरासी |
योग युक्ति से रचे ब्रम्हाण्डा , योग युक्ति थरपे नवखण्डा |
योग युक्ति तप तपे महेश , योग युक्ति धर धरे हैं शेष |
योग युक्ति विष्णु तन धारे , योग युक्ति असुरन दल मारे |
योग युक्ति गजानन जाने , आदि देव त्रिलोकी माने |
योग युक्ति करके बलवान , योग युक्ति करके बुद्धिमान |
योग युक्ति करा पावे राज , योग युक्ति कर सुधारे काज |
योग युक्ति योगेश्वर जाने , जनकादिक सनकादिक माने |
योग युक्ति मुक्ति का द्वार , योग युक्ति बिन नहीं निस्तारा |
योग युक्ति जाके मन भावे , ताकि महिमा कही न जावे |
जो नर पढ़े सिद्ध चालीसा , आदर करे देव तैंतीसा |
साधक पाठ पढ़े नित्य जो कोई , मनोकामना पूरण होई |
धुप दीप नैवेद्य मिठाई , रोट लंगोट भोग लगाई |

दोहा

रतन अमोलक जगत में , योग युक्ति है मीत |
नर से नारायण बने , अटल योगी की रीत |
योग विहंगम पंथ को , आदिनाथ शिव कीन्हा |
शिष्य प्रशिष्य परंपरा , सब मानव को दीन्हा |
प्रातःकाल स्नान कर , सिद्ध चालीसा ज्ञान |
पढ़े सुने नर पावही , उत्तम पड़ा निर्वाण |
इति चौरासी सिद्ध चालीसा संपूर्ण भया |
श्री नाथजी गुरूजी को आदेश | आदेश |
गुरु गोरक्षनाथ भगवान की जय |


चौरासीनाथ सिद्धों को आदेश आदेश.....

23 May 2016

निच्छित अप्सरा सिद्धी.

सुंदर और बेहद आकर्षक.... सही मायनों में शायद यही है अप्सराओं की परिभाषा। हिन्दू पौराणिक ग्रंथों एवं कुछ बौद्ध शास्त्रों द्वारा भी अप्सराओं का ज़िक्र किया गया है। जिसके अनुसार ये काल्पनिक, परंतु नितांत रूपवती स्त्री के रूप मे चित्रित की गई हैं। यूनानी ग्रंथों मे अप्सराओं को सामान्यत: 'निफ' नाम दिया गया है।
हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा माना जाता है कि इन अप्सराओं का कार्य स्वर्ग लोक में रहनी वाली आत्माओं एवं देवों का मनोरंजन करना था। वे उनके लिए नृत्य करती थीं, अपनी खूबसूरती से उन्हें प्रसन्न रखती थीं और जरूरत पड़ने पर वासना की पूर्ति भी करती थीं। लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता, क्योंकि इनका उल्लेख अमूमन ऐतिहासिक दस्तावेजों में ही प्राप्त हुआ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिन्दू धार्मिक ग्रंथों के अलावा अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी अप्सराओं का उल्लेख पाया गया है। लेकिन इनके नाम काफी भिन्न हैं। चीनी धार्मिक दस्तावेजों में भी अप्सराओं का ज़िक्र किया गया है, लेकिन शुरुआत हम हिन्दू इतिहास से करेंगे।
हिन्दू इतिहास की बात करें ऋग्वेद के साथ-साथ महाभारत ग्रंथ में भी कई अप्सराओं का उल्लेख पाया गया है।

अप्सराएँ निच्छित सिद्ध हो सकती है परंतु इसके लिये साधक को सय्यम रखना आवश्यक है। जो साधक सय्यम खो देते है,उनको तो कई जन्मो तक अप्सराएँ सिद्ध नही हो सकती है। यहा आजकल कुछ लोग अप्सरा को प्रत्यक्ष करने का दावा करते,जिसे मै एक अफवा मानता हू । क्युके आजकल के दुनिया मे चाहे कोई कितना भी प्रेम करता हो या सुंदर लड़का हो,उसको किसी गलि की लड़की को पटाने मे 3-4 महिने लग जाते है और यहा लोग बात करते है एक देवकन्या जो अत्यंत सुंदर है उस अप्सरा को प्रत्यक्ष करने की । सोचो येसे सुंदर अप्सरा को प्रत्यक्ष करने मे कितना समय लगेगा ? तंत्र शास्त्र मे 108 अप्सराओं का वर्णन मिलता है,जिनका आज के समय मे किसीको नाम तक पता नही चला और एक प्राचीन किताब मे लिखा हुआ है "जब तक 108 अप्सराओं की रजामंदी ना मिल जाये तब कोई भी एक विशेष अप्सरा किसी भी साधक के सामने प्रत्यक्ष नही हो सकती है" और इस बात का प्रमाण भी हमे देखने मिलता है।

आप सभी जानते है,श्री हनुमानजी जी के माता का नाम "अंजनी" था,माता अंजना देवी स्वयं एक अप्सरा थी । देवताओ के कार्यपुर्ति हेतु उन्होंने धरती पर जन्म लिया था। उनका उद्देश्य सिर्फ हनुमानजी को जन्म देना ही नही बल्कि उनका पालन-पोषण करने के साथ साथ उन्हे अच्छे सन्स्कार से पुर्ण करना था। उनको धरती पर जन्म लेने हेतु समस्त अप्सराओं की रजामंदी लेनी पडी थी और एक समय येसा भी आया था के "उन्हे बाल हनुमानजी को छोड़कर अप्सरा लोक वापिस जाना पडा था क्युके समय काल के हिसाब से उनका धरती पर कार्यकाल पुर्ण हो गया था" । उस समय अचानक अपने माता से दुर हो जाने के वजेसे बाल हनुमानजी का व्यथा बहोत खराब हो चुका था और ममता स्वरुप समस्त अप्सराओं ने देवराज इंद्र से पुनः निवेदन करके माता अंजना देवि को धरती पर भेजने का प्रस्ताव रखा था । देवराज इन्द्र ने उस समय यह गोपनियता स्पष्ट की थी,जिसमें उन्होंने कहा था "अगर आप समस्त अप्सराओं की रजामंदी (अनुमति) है,तो अंजना देवि को पुनः धरती लोक पर भेज सकते है"। तो इस तरह से देवि अंजना माता को पुनः धरती लोक पर आकर हनुमानजी को एक महाबली बनाने मे समस्त अप्सराओं की मदत प्राप्त हुई।

यह सिर्फ एक कहानी नही है अपितु अप्सरा साधक के लिये गोपनिय रहस्य है। जब अप्सरा साधक 21 दिनो तक "सर्व अप्सरा सिद्धी यंत्र" के सामने बैठकर "सर्व अप्सरा सिद्धी शाबर मंत्र" का जाप करता है तो उसके लिये स्वयं समस्त अप्सराएँ किसी भी एक विशेष अप्सरा को सिद्ध करने हेतु सहायता करती है। जब कोई भी अप्सरा साधक यह सर्व अप्सरा सिद्धी शाबर मंत्र का 21 दिनो तक जाप कर लेता है तो कोई भी एक अप्सरा उसका इच्छित कार्य पुर्ण कर देती है। सर्व अप्सरा सिद्धी यंत्र को भोजपत्र पर विशेष मुहुर्त मे बनाया जाता है,जिसपर सुर्य के रोशनी के साथ शुक्र ग्रह के होरा का ध्यान रखकर निर्मित किया जाता है। भोजपत्र पर यंत्र निर्मित हो जाने के उपरांत कुछ विशेष जडीबुटियो के माध्यम से सर्व अप्सरा सिद्धी यंत्र का निर्माण होता है। जैसे चंद्रनाग, मनमोहीनी, मायाजाल, लज्जावती, केसर, जटाशंकर......इत्यादि 11 प्रकार की जडीबुटिया इस ताबीज स्वरुप यंत्र मे स्थापित करना आवश्यक है। साथ मे सर्व अप्सरा सिद्धी माला जो डबल झिरो साईज का हो,जिससे जाप करते समय आसानी हो और वह माला भी "क्लीम्" बीज मंत्र के साथ क्रोध भैरव के मुल मंत्र से सिद्ध करना आवश्यक है। इस साधना को करने के बाद ही विशेष अप्सरा साधना को सम्पन्न करने से प्रत्यक्ष अप्सरा साधना सिद्धी सम्भव है,जो इस साधना को सम्पन्न करने मे तत्पर ना हो,उन्हे अप्सरा साधना सिद्धी मे सफलता प्राप्त करना  एक मुश्किल कार्य हो सकता है।

जो साधक सर्व अप्सरा सिद्धी एवं विशेष अप्सरा (मेनका , उर्वशी , रम्भा , लिलावती ,.......नाभीदर्शना ..... इत्यादि) साधना सम्पन्न करना चाहते है,वह हमसे सम्पर्क करे । हमसे प्रामाणिक एवं प्राण-प्रतिष्ठीत चैतन्य साधना सामग्री प्राप्त करने हेतु हमारे ई-मेल आय.डी. पर ईमेल भेजकर सम्पर्क करे- amannikhil011@gmail.com पर ।इस साधना को सम्पन्न करने हेतु आपको सर्व अप्सरा सिद्धी शाबर यंत्र और माला भेज दिया जायेगा,इस सामग्री को प्राप्त करने हेतु आपको 5150/-रुपये न्योच्छावर राशि देना होगा। इस साधना सामग्री के साथ विशेष अप्सरा यंत्र और सर्व अप्सरा सिद्धी दीक्षा निशुल्क मे दीया जायेगा। आपसे धनराशि प्राप्त होने के बाद 2-3 दिनो मे हमारे तरफ से साधना सामग्री भेज दिया जायेगा और सर्व अप्सरा सिद्धी दीक्षा फोटो पर साधना प्रारंभ करने से एक दिवस पहिले दिया जायेगा।

सर्व अप्सरा सिद्धी दीक्षा के माध्यम से साधक को अप्सरा साधना मे विशेष अनुभूतियाँ हो सकती है,जिसके माध्यम से साधक अपने जिवन मे सभी प्रकार के सुख प्राप्त कर सकता है। अप्सरा साधना से पुरे जिवन बदला जा सकता है ।





आदेश.....